असल में अदालत में किसी भी धार्मिक ग्रंथ पर हाथ रखवाने का उद्देश्य यह होता है कि व्यक्ति ईश्वर या अपने नैतिक विश्वास के प्रति जवाबदेही महसूस करे और सच बोले। यह मनोवैज्ञानिक दबाव सत्य बोलने की संभावना बढ़ाता है। अब सवाल यह कि इसके लिए गीता ही क्यों चुनी गई। दरअसल सारगर्भित और दार्शनिक ग्रंथ गीता में धर्म, कर्तव्य और सत्य पर गहरा जोर है। हिंदू समाज के अधिकतर वर्गों में गीता को सार्वभौमिक सम्मान प्राप्त है। यह अपेक्षाकृत छोटी है, इसलिए शपथ के लिए व्यावहारिक रूप से उपयोगी मानी गई। यूं रामायण अत्यंत पूजनीय ग्रंथ है, फिर भी अदालतों में कम उपयोग के पीछे कुछ कारण जरूर होंगे। रामायण एक महाकाव्य कथा है, जबकि गीता सीधे उपदेशात्मक है। रामायण के कई संस्करण हैं (वाल्मीकि, तुलसीदास आदि), जिससे कौन-सा संस्करण? का प्रश्न उठ सकता है। इसके अतिरिक्त अंग्रेजी शासनकाल में जो प्रथा शुरू हुई, उसमें गीता को प्राथमिकता मिली और वही चलन बन गया। ब्रिटिश काल में जब भारतीय न्याय प्रणाली विकसित की गई, तब अंग्रेजों ने हिंदुओं के लिए एक प्रतीकात्मक धार्मिक ग्रंथ के रूप में गीता को चुना, जैसे ईसाइयों के लिए बाइबिल। यह चयन धीरे-धीरे परंपरा बन गया।
असल में आज भारतीय कानून में किसी विशेष ग्रंथ पर हाथ रखना अनिवार्य नहीं है। भारतीय शपथ अधिनियम 1969 के अनुसार व्यक्ति ईश्वर की शपथ ले सकता है या सिर्फ “सत्य कहने की प्रतिज्ञा” भी कर सकता है।