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बुधवार, 2 जून 2021

मास्क ने छीन ली चेहरे की खूबसूरती, मुस्कुराहट और भाव-भंगिमा


कोरोना महामारी के चलते घर से बाहर निकलने पर मास्क लगाना बेहद जरूरी है। राजस्थान में तो कानून तक बना कर भारी जुर्माने का प्रावधान कर दिया गया है। जान है तो जहान है के जुमले को अपनाते हुए  हम अपनी सुरक्षा भी कर रहे हैं। मगर तस्वीर का दूसरा रुख है कि मास्क ने हमसे बहुत कुछ छीन लिया है।

मास्क ने सबसे बड़ा झटका ये दिया है कि इसने हमारी पहचान छीन ली है। कई बार मास्क में लोग आपको पहचान नहीं पाते और आपको मजबूरी में मास्क हटाना ही पड़ता है। मास्क लगा होने पर अलबत्ता आपके बोलने से भी सामने वाला आपकी आवाज से पहचान लेता है, मगर जब तक आप चुप होते हैं तो पहचानना कठिन हो जाता है। कहते हैं न कि जरा मुस्कुराइये, ताकि सामने वाले को तनिक खुशी मिल सके, मगर प्राणियों में केवल मानव को भगवान की दी हुई वह शानदार व अनुपम भेंट भी अब छिन चुकी है। आप चाह कर भी किसी को स्माइल भेंट नहीं कर सकते। मास्क ने उस पर आवरण लगा दिया है। एक तरह से चेहरे सपाट हो गए हैं। नीरस और भाव विहीन हो गए हैं। उनकी रौनक गायब है। चेहरे की कितनी अहमियत है, इसका अनुमान आप एक फिल्मी गीत की पंक्ति से लगा सकते हैं- दिल को देखो, चेहरा न देखों, चेहरे ने लााखों को लूटा।


कई लोगों को इस बात की भी तकलीफ है कि मास्क ने उनके चेहरे की खूबसूरती छीन ली है। विशेष रूप से महिलाओं को। असल में ये चेहरा ही तो है, जिसकी खूबसूरती पर आप इठलाते हैं। सजते-संवरते हैं। तरह-तरह की दाढ़ी-मूंछ रखते हैं। महिलाएं भांति-भांति की लिपस्टिक लगाती हैं। आखिरकार भगवान की ओर से दी गई सुंदरता का भी महत्व है। माना कि पुरुष सुंदरता के प्रति अपेक्षाकृत कम सजग होते हैं, मगर महिलाएं तो बहुत अधिक ध्यान रखती हैं। तनिक कम सुंदर महिलाएं भी ब्यूटी पॉर्लर जा कर सुंदर हो आती हैं। कई पुरुष आजकल केवल इसी कारण दस-पंद्रह दिन तक शेव नहीं करते कि वह बढ़ी हुई मास्क में ढ़क जाती है।

हम सब जानते हैं कि कुछ भी बोलने के लहजे के साथ चेहरे की भाव-भंगिमा भी भावनाओं की अभिव्यक्ति करती है। हालांकि आंखें भी बोलती हैं, आंखों ही आंखों में बहुत कुछ इशारे किए जा सकते हैं, मगर पूरे चेहरे की भाव-भंगिमा के साथ। अकेले आंखें उतना इजहार नहीं कर पातीं। आप किसी से बात करते हैं अथवा मीटिंग या सभा में भाषण देते हैं तो आपके चेहरे की रेखाएं ही आपके वक्तव्य में जान डालती हैं। लेकिन अब उसका सारा दारोमदार आवाज पर आ गया है। ध्वनि के उतार-चढ़ाव से ही उसमें सोल डाली जा सकती है। 

कुल मिला कर कोरोना ने मानव जीवन से बहुत कुछ झपट लिया है। 


-तेजवानी गिरधर

7742067000

tejwanig@gmail.com

शनिवार, 29 मई 2021

कोरोना ने किया पूरी दुनिया को जैन सिद्धांतों पर चलने को मजबूर


चौबीसवें तीर्थंकर भगवाान महावीर के काल में जैन धर्म अपने चरमोत्कर्ष पर था। जैन धर्मावलम्बी भी अनगिनत थे। मगर अकेले कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया को जैन धर्म के सिद्धांतों पर चलने को मजबूर कर दिया है।

एक समय वह भी था, जब हम जैन धर्म के श्वेतांबर पंथीय मुनि, श्रावक और श्राविकाओं को देखा करते थे कि वे अपने मुंह पर सफेद पट्टी बांधते हैं, तो कौतुहल होता था, मगर आज जब पूरी दुनिया मुंह पर पट्टी बांधने को मजबूर है तो इसे स्वीकार करना पड़ता है कि करीब ढ़ाई हजार साल पहले मुंह पट्टी अर्थात मास्क का इजाद करने वाले इस धर्म की सोच कितनी गहरी थी। आज जब कोरोना महामारी ने पूरे विश्व को झकझोड़ कर रख दिया है तो अहसास होता है जैन दर्शन प्रांसगिक ही नहीं, बल्कि आवश्यक हो गया है।

ज्ञातव्य है कि मुख पट्टिका लगाने की परंपरा भगवान महावीर स्वामी ने शुरू की थी। इसका उल्लेख विभिन्न जैन आगमों में मिलता है। श्वेतांबर जैन संप्रदाय के स्थानकवासी, अमूर्तिपूजक और तेरापंथ में मुंह पर पट्टी बांधने की परंपरा है। यह 4 इंच चौड़ी व 7 इंच लंबी होती है। इसे कपड़े को चार तह करके बनाया जाता है। इसलिए इसमें कीटाणु जाने का खतरा बिल्कुल नहीं होता। उल्लेखनीय है कि वर्तमान में मास्क के बारे में वैज्ञानिक मान्यता है कि वायरस को रोकने के लिए कम से कम थ्री लेयर मास्क जरूरी है।


वस्तुत: जैन धर्म में मुंह पट्टी, जिसे हम आज मास्क के रूप में जानते हैं, उसका उपयोग सांस की गरमाहट से सूक्ष्मतम जीवों की हिंसा को रोकने और वाणी पर संयम के लिए किया जाता है। आज हम जानलेवा सूक्ष्मतम जीवाणु अर्थात कोरोना वायरस से बचने के लिए इसका उपयोग करने लगे हैं। हालत ये है कि कोरोना वायरस से बचने के लिए अब तक कोई दवाई का इजाद नहीं होने के कारण यह कहा जाने लगा है कि जब तक दवाई नहीं, तब तक मास्क ही दवाई है। हालांकि कोरोना से बचने के लिए वैक्सीन की खोज की जा चुकी है, मगर वह केवल रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए है, ताकि हमारा शरीर से उससे लड़ सके। कोरोना से ग्रस्त होने के बाद उससे मुक्ति के लिए परफैक्ट दवाई अभी तक नहीं खोजी जा सकी है। ऐसे में मुंह पट्टी बनाम मास्क ही कोरोना से जंग लडऩे के लिए सबसे बड़ा शस्त्र माना जा रहा है।  कोरोना ने पूरी दुनिया को मुंह पट्टी बांधने को मजबूर कर दिया है। राजस्थान में तो मास्क पहनना कानूनन जरूरी कर दिया है। अमरीका में वैक्सीन के दो डोज लगा चुके लोगों को मास्क पहनने से छूट दे दी गई है, मगर उसके पीछे वहां के स्थानीय राजनीतिक कारण हैं।

अकेले मुंह पट्टी ही नहीं, बल्कि जैन धर्म के संघेटा, अलगाव, सम्यक् एकांत सहित शाकाहार जैसे सिद्धांतों को भी अपनाने को हम मजबूर हैं।

अब बात करते हैं, कोराना से बचने के लिए किए जा रहे दूसरे उपाय की। विश्व स्वास्थ्य संगठन की गाइड लाइन के अनुसार कोरोना से बचने के लिए सोशियल डिस्टेंसिंग को अपनाना जरूरी है। वैसे यह शब्द उचित नहीं है, क्योंकि सामाजिक दूरी नहीं बल्कि शारीरिक दूरी की जरूरत है, अर्थात फिजिकल डिस्टेंसिंग। दो व्यक्तियों के बीच कम से कम दो गज की दूरी होना जरूरी है। वजह ये कि खांसने या सांस लेने से कोरोना एक से दूसरे में फैलता है, इसलिए एक दूसरे से दूर रहने की हिदायत दी गई है। जैन धर्म में इसी सोशल डिस्टेंसिंग को संघेटा कहा जाता है। मास्क के अतिरिक्त पूरा जोर इसी पर दिया जा रहा है।

तीसरा जैन सिद्धांत है सम्यक एकांत, जिसका अंग्रेजी में समानार्थी शब्द है आइसोलेशन। कोरोना के संक्रमण के डर से डब्ल्यूएचओ की ओर से जारी आइसोलेशन के नियमों को सारी दुनिया मान रही है। आइसोलेशन की पालना की जाए तो कोरोना संक्रमण का खतरा बिलकुल नहीं रहेगा।

जैन धर्म के चौथे सिद्धांत अलगाव को वर्तमान में क्वारेंटाइन के नाम से अपनाया जा रहा है। वस्तुत: जैन धर्म में ध्यान लगाने के लिए अलगाव के सिद्धांत का भी पालन किया जाता है। यदि किसी व्यक्ति में कोरोना के सामान्य लक्षण दिखते हैं, तो उसे 14 दिन के लिए क्वारेंटाइन कर दिया जाता है। ज्ञातव्य है कोरोना गाइड लाइन की अवहेलना करने वालों को तुरंत क्वारेंटाइन सेंटर्स भेजा जाता है, भले ही उनमें कोरोना के सामान्य लक्षण न हों। उन सेंटर्स में जांच के बाद नेगेटिव पाए जाने पर ही छोड़ा जाता है।

सर्वविदित है कि अहिंसा के मूल मंत्र को मानने वाले जैन धर्मावलम्बी पूर्णत: शाकाहार का पालन करते हैं। यहां तक कि जमीन के भीतर उगने वाली सब्जियों का भी उपयोग नहीं करते। वर्तमान में कोरोना के डर से शाकाहार अपनाने पर जोर दिया जा रहा है। कोरोना की पृष्ठभूमि में जाएं तो इस वायरस की शुरुआत चीन के वुहान शहर से हुई। वहां सी फूड का मार्केट है। बताया जाता है कि जानवरों व पक्षियों के इस मार्केट से ही कोरोना वायरस पनपा है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि अन्य वायरल बीमारियों बर्ड फ्लू व स्वाइन फ्लू की उत्पत्ति भी अन्य जीवों से फैलती है। 

कुल मिला कर कोरोना ने पूरी दुनिया को जैन धर्म के सिद्धांतों पर चलने को मजबूर कर दिया है। इससे साबित होता है कि जैन धर्म के सिद्धांतों में कितनी दूर दृष्टि रही है। इन सिद्धातों की स्थापना उस काल में हुई, जब विज्ञान बिलकुल भी उन्नत नहीं था।


-तेजवानी गिरधर

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गुरुवार, 20 मई 2021

मैंने त्रिशूल नहीं बांटे, बच्चों के हाथ में दिए हैं-माउस और की-बोर्ड

राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के भूतपूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय डॉ. पी. सी. व्यास के इस जुमले की गूंज दिल्ली तक सुनाई दी थी


यह शीर्षक है राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के भूतपूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय डॉ. पी. सी. व्यास के उस बेबाक साक्षात्कार का, जो दैनिक भास्कर के अजमेर लाइव पेज पर जवाब-तलब कॉलम के अंतर्गत 20 जनवरी 2003 को प्रकाशित हुआ था। ज्ञातव्य है कि हाल ही उनका निधन हो गया। जैसे ही  यह खबर सुनी तो यकायक लगा कि वे आज भी मेरे सामने साक्षात बैठे हैं। साथ ही वह साक्षात्कार भी फिल्म की भांति मेरी आंखों के आगे तैरने लगा। जवाब-तलब कॉलम में मैंने अजमेर की अनेक हस्तियों के साक्षात्कार लिए, मगर इस साक्षात्कार की गूंज दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में सुनाई दी थी।

डॉ. पी. सी. व्यास

वस्तुत: साक्षात्कार में सवाल इतने तीखे थे कि आज जब 18 साल बाद उसको पढ़ा तो सहसा यकीन ही नहीं हुआ कि मेरे जैसे सदाशयी पत्रकार ने नश्तर की तरह चुभते निर्मम सवाल कैसे कर डाले थे? एक तरह से इस साक्षात्कार में व्यास जी का पूरा व्यक्तित्व व कृतित्व उभर कर आ गया था। सकारात्मक भी और नकारात्मक भी। राजनीतिक भी, गैर राजनीतिक भी। यह कितना तीखा था, इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि उसका आरंभ ही इन शब्दों से हुआ था- कम्प्यूटर युग में नवाचार के जरिये स्कूली शिक्षा को नए आयाम देकर बोर्ड अध्यक्ष डॉ. पी. सी. व्यास ने जितनी शोहरत पाई, कमोबेश उतनी आलोचना के शिकार हुए, अपनी कांग्रेसी कार्यशैली के कारण। कभी वे प्रगतिशील व दूरदृष्टा शिक्षाविद् की झलक देते हैं तो कभी उनके भीतर मौजूद घाघ राजनीतिज्ञ छिपाए नहीं छिपता। इन दो सर्वथा विपरीत व्यक्तित्वों के बीच पैंडुलम बने डॉ. व्यास अपनी हरकतों से सदैव सुर्खियों में बने रहते हैं।

बात आगे बढ़ाने से पहले यह बताना उचित समझूंगा कि दैनिक भास्कर में जवाब-तलब कॉलम तत्कालीन स्थानीय संपादक व सुप्रसिद्ध पत्रकार श्री अनिल लोढ़ा ने आरंभ करवाया था। उन्होंने स्थानीय संपादक रहते स्थानीय संस्करण में पत्रकारिता को अनेक नए आयाम दिए। असल में वर्षों पहले वे जवाब-तलब शीर्षक के नाम से एक साप्ताहिक निकाला करते थे। बाद में दैनिक समाचार पत्रों में काम करने के कारण वह अखबार बंद हो गया। जैसा उसका शीर्षक था, वैसा ही उसका मिजाज था। वे चाहते थे उसी मिजाज का यह कॉलम बने और शहर की टॉप की हस्तियों से तीखे अंदाज में सवाल-जवाब किए जाएं।

खैर, डॉ. व्यास के साक्षात्कार की बात चल रही थी। छपने के बाद वह उनको इतना भाया कि कांग्रेस हाईकमान और दिल्ली व जयपुर के राजनीतिक गलियारों तक प्रचारित किया, हालांकि उसके सारे सवाल उनको बुरी तरह से छीलने वाले थे। स्वाभाविक रूप से भास्कर की इतनी प्रतियां जुटाना संभव नहीं था, इस कारण उन्होंने हजारों फॉटो कॉपियां निकलवा कर उन्हें बंटवाया था। वस्तुत: शीर्षक इतना मारक था कि वह जहां कांग्रेस हाईकमान को बहुत अच्छा लगा, वहीं हिंदूवादियों पर सीधा हमला कर रहा था। यह वह दौर था, जब विश्व हिंदू परिषद के दिग्गज नेता श्री प्रवीण भाई तोगडिय़ा देशभर में त्रिशूल बांटने के लिए निकले थे और उसका आगाज उन्होंने राजस्थान से किया था। अजमेर में त्रिशूल वितरण कार्यक्रम के बाद जयपुर जाते समय रास्ते में तत्कालीन अशोक गहलोत सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था।  

स्पष्ट है कि शीर्षक के जरिए उन्होंने जो कटाक्ष किया था, वह एक तरह से विहिप की मुहिम पर कड़ा प्रहार था। कांग्रेस पृष्ठभूमि का होने के कारण ही उन्हें बोर्ड अध्यक्ष बनाया गया और उसी मानसिकता व विचारधारा को पुष्ट करने के लिए उन्होंने यह जुमला गढ़ा था।

खैर, बाद में वे जब भी अजमेर आते थे, तो मुझे जरूर याद करते थे और मिलने पर यही कहते थे कि आपने तो मुझे दिल्ली तक लोकप्रिय कर दिया।

उनकी एक आदत, जो मैंने नोट की, वो यह कि वे बातचीत के दौरान कई बार सवालियां अंदाज में आंखों की पुतलियों को तब तक ऊपर-नीचे किया करते थे, जब तक कि उनके सवाल का जवाब न दे दिया जाए। यानि कि उनकी बात पर प्रतिक्रिया न दे दी जाए। उनके निकटस्थ रहे लोगों ने यह जरूर पाया होगा।

प्रयास रहेगा कि उनका पूरा साक्षात्कार साझा करूं, ताकि आप भी समझ सकें कि एक जुमले की खातिर वे कितने धारदार सवाल झेलने को राजी थे। मैंने पूछा भी कि क्या आपका जुमला साक्षात्कार का शीर्षक बना दूं, तो वे बोले यही तो मुझे संदेश देना है।

ज्ञातव्य है कि हाल ही उनका बेंगलूरु में निधन हो गया। वे 85 वर्ष के थे। डॉ. व्यास बोर्ड में 1999 से 2004 तक अध्यक्ष रहे और राजीव गांधी स्टडी सर्किल की स्थापना के साथ बोर्ड में कई नए प्रयोग किए। उनमें  प्रमुख रूप से प्रदेश के विद्यालयों में कंप्यूटर शिक्षा का आरंभ करना रहा, जिस पर विवाद भी हुआ। वे देश के सभी राज्यों के शिक्षा बोर्डों के समूह कोब्से के अध्यक्ष भी रहे थे।


-तेजवानी गिरधर

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रविवार, 2 मई 2021

मुझे वाह ड़े सिंधी वाह के नाम से पुकारने वाला चला गया


अरविंद गर्ग। शहर के लिए जाना-पहचाना नाम। शायद ही कोई राजनेता, अफसर, पत्रकार या सोसायटी के विभिन्न तबकों से जुड़ा कोई व्यक्ति उनसे अपिरिचित हो। बेशक उनकी पहचान एक पत्रकार के रूप में थी, मगर उनकी असल पहचान थी, हरदिल अजीज इंसान के रूप में। सदैव सहयोग के तत्पर उत्साही युवक के रूप में। बेहद प्यारा शख्स। दिल का साफ। हंसमुख। अफलातून टाइप की पर्सनल्टी। यायावर व्यक्तित्व। मजाकिया स्वभाव। गुस्से से कोसों दूर। बेबाक बयानी। कोई लाग-लपेट नहीं। साफगोई। सच को सच और झूठ को झूठ कहने का माद्दा। चाहे किसी को बुरा लग जाए। मस्त मौला, इतने कि गई कई बार शर्ट के बटन ऊपर-नीचे होने का भी भान नहीं रहता था। ये थे उनके विलक्षण गुण, जिनकी वजह से उन्होंने अजमेर में अपनी खास पहचान बनाई। उनके व्यक्तित्व की जितनी तारीफ की जाए, कम है। वस्तुत: ऐसे लोग विरले ही पैदा होते हैं।

उन्होंने मेरे साथ दैनिक भास्कर से पहले दिशा दृष्टि सांध्य दैनिक में भी काम किया। समाचार लेखन में सामान्य हिंदी का प्रयोग करते थे, अर्थात साहित्यिक रूप से बहुत पारंगत नहीं थे, मगर थे वे नंबर के वन खबरची। सांध्य दैनिक दिशादृष्टि छाया ही वरिष्ठ पत्रकार सुशील जी और उनकी वजह से। न जाने कहां से खबर खोद कर लाया करते थे। खूब धूम मचाई। बहुचर्चित अश्लील छायाचित्र कांड को प्रारंभिक तौर पर उजागर करने में इस जोड़ी का विशेष योगदान रहा। शहर की शायद ही कोई छोटी-मोटी घटना ऐसी होती थी, जो उनकी जानकारी में तुरंत न आती हो। उसकी वजह थी समाज के सभी तबके के लोगों के साथ उनकी अंतरगता। हर घटना पर पैनी नजर रखना उनके स्वभाव में था। दूसरी वजह थी, उनकी नया बाजारीय पृष्ठभूमि। उनका निवास व पैतृक व्यवसाय नया बाजार में ही है। सब जानते हैं कि नया बाजार में शहर की हर धड़कन स्पंदित होती है। इसी वजह से शहर की संस्कृति से भलीभांति परिचित थे। न्यूज की बीट उनकी चाहे जो रही, मगर दफ्तर में आते ही अन्य बीट के साथी पत्रकारों को बताया करते थे कि आज कहां क्या हुआ। उनकी इसी खासियत की वजह से स्थानीय संपादक डॉ. रमेश अग्रवाल के खास चहेते थे। छेडख़ानी उनकी फितरत में थी। वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रताप सनकत से उनकी खूब पटती थी। दोनों एक दूसरे को खूब छेड़ा करते थे। इसी प्रकार वरिष्ठ फोटोग्राफर सत्यनारायाण जाला के साथ भी उनका जमकर धोल-धप्पा हुआ करता था। अजयमेरु प्रेस क्लब के वे अहम हिस्सा थे। 

राजनीतिक गतिविधियों पर उनकी गहरी पकड़ रहा करती थी। कांग्रेस हो या भाजपा, हर पार्टी के नेता से उनके व्यक्तिगत संबंध थे। विशेष रूप से भूतपूर्व काबीना मंत्री स्वर्गीय श्री किशन मोटवानी के बहुत चहेते थे। दरगाह बादाम शाह में उनकी गहरी आस्था थी।

संवेदना से भरपूर यह इंसान किसी भी पत्रकार साथी को किसी संकट में देख कर तुरंत उसका समाधान करने में जुट जाता था। शहर की धड़कन से जुड़ा फागुन महोत्सव हो या कोई खेल गतिविधि या शायद ही कोई ऐसा सार्वजनिक आयोजन हो, जिसमें उनकी सहभागिता नहीं रहती हो। भास्कर के आरंभिक काल में आई समस्याओं के समाधान में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। तत्कालीन विशेष संवाददाता एस. पी. मित्तल के साथ भास्कर को शुरू में स्थापित करने में उन्होंने कंधे से कंधा मिला कर काम किया। प्रबंधन उनके इस ऋण से कभी उऋण नहीं हो पाएगा। उन दिनों का मजाक में गढ़ा गया एक किस्सा मुझे आज भी याद है। मित्तल जी की टीम ने 18-18 घंटे काम किया। हालत ये होती थी कि कई बार एक वक्त ही खाना खा पाते थे। एक बार अरविंद जी को कब्ज की शिकायत हो गई। तीन दिन तक लेट्रिन ही नहीं आई। वे डॉक्टर के पास गए। उन्होंने पूरी जांच करने के बाद पूछा कि आप काम क्या करते हो, वे बोले भास्कर में। इस पर डॉक्टर साहब का कहना था कि ये लो मेरी ओर से दो सौ रुपए। खाना खा लेना। लेट्रिन आ जाएबी। अगर खाना ही नहीं खाओगे तो लेट्रिन आएगी कैसे?


-तेजवानी गिरधर

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रविवार, 21 मार्च 2021

कभी एडवोकेट दशोरा व डॉ. बाहेती की दोस्ती के किस्से जवान थे


अजमेर शहर भाजपा के पूर्व अध्यक्ष व राजस्व मामलों के नामी वकील श्री पूर्णा शंकर दशोरा हमारे बीच नहीं रहे। यह अजमेर के लिए अपूरणीय क्षति है। उनके पिछले जन्मदिन पर एक ब्लॉग लिखा था। उसके तत्व आज भी कहीं अधिक प्रासंगिक हैं। ऐसी आत्मा को नमन। यही मेरी शब्दाजंलि है। पेश है हूबहू आपकी नजर::-


हाल ही शहर भाजपा के पूर्व अध्यक्ष व राजस्व मामलों के वरिष्ठ वकील श्री पूर्णाशंकर दशोरा का जन्मदिन था, तो यकायक ख्याल आया कि उन पर भी एक शब्दचित्र खींचने का प्रयास करूं। वैसे उनके बारे में लिखने  का विचार बहुत दिन से था कि चर्चाओं से दूर ऐसे शख्स से मौजूदा पीढ़ी को रूबरू कराया जाए, ताकि उसे भी कोई प्रेरणा मिले।

अपने वकालत के पेशे के प्रति पूरी ईमानदारी व लगन के बलबूते ही आज वे प्रदेश के दिग्गज वकीलों में शुमार हैं। यह उनकी निजी उपलब्धि है। उनके परम मित्र, जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार श्री ओम माथुर की पंक्तियों को चुराने की धृष्टता करते हुए सुखद लग रहा है कि हमारे यहां ऐसी विषय विशेषज्ञ शख्सियत है, जिससे रेवेन्यू मेंबर, चेयरमैन, यहां तक राजस्व मंत्री तक उनसे कानूनी राय लेते हैं। मगर मुझे अफसोस कि राजनीति ने उनकी सेवाएं तो पार्टी हित में ले लीं, मगर मौका पड़ा तो राज्य स्तर पर उनका कोई उपयोग नहीं लिया। कदाचित इस वजह से कि राजनीति का सबसे पहला गुण, चाटुकारिता उन्हें नहीं आती।

एक जमाने में वे बहुत सक्रय रहे। राजनीति के साथ-साथ लायंस क्लब के जरिए समाजसेवा में खूब काम किया। शहर के जाने-माने बुद्धिजीवियों में उनकी गिनती रही है। उनकी बदोलत शहर ने कई कवि सम्मेलनों के दीदार किए। शहर की बहबूदी का शायद ही कोई ऐसा मुद्दा रहा हो, जिसमें उनकी भूमिका न रही हो। सबसे अधिक रेखांकित करने वाली बात ये है कि राजनीति में पूर्ण रूप से सक्रिय रहते हुए भी उन्हें राजनीति कभी छू तक नहीं पाई। राजनीति बाहर नाचती रही और भीतर वे स्थितप्रज्ञ बने रहे। ऐसा होना विलक्षणता का प्रमाण है। ऐसे सरल, सौम्य, सहज, योग्य व ईमानदार विरले ही पैदा होते हैं। विशेष रूप से राजनीति में। महात्मा गांधी से उन्होंने भले ही प्रेरणा न ली हो, मगर मेरी नजर में वे एक सच्चे गांधीवादी व्यक्तित्व हैं। आपको मेरा यह कथन अटपटा जरूर लगेगा। स्वाभाविक है। असल में हमने गांधीजी व आरएसएस के बीच एक दीवार उठा रखी है। एक नेरेटिव सेट कर रखा है। हालांकि बदलते जमाने में अब भाजपा भी गांधीजी को उतना ही सम्मान देने लगी है, जितना कांग्रेसी देते रहे हैं। उसके अपने कारण हैं, हम अभी उसमें नहीं जा रहे। हां, प्रसंगवश यह बताना उचित रहेगा कि कुछ विद्वानों ने आरएसएस कार्यकर्ताओं व गांधीजी के अनुयाइयों की सामान्य जीवनशैली में राजनीतिक तौर पर नहीं, मगर निजी तौर पर साम्य पाया है। इस विषय पर बाकायदा गहन अध्ययन तक हुआ है। कारण साफ है, इन धाराओं में बाद में भले ही कितनी ही राजनीतिक विषमताएं आई हों, मगर जड़ में सादा जीवन, उच्च विचार ही मौलिक लक्षण रहा है। भाजपा में इसके दो उदाहरण और हैं- पूर्व विधायक स्वर्गीय श्री नवलराय बच्चानी व पूर्व विधायक श्री हरीश झामनानी। उनका चेहरा ख्याल में आते ही, मेरी बात आपके समझ में आ जाएगी। चालबाजी के अभाव ने उन्हें राजनीति ने मिसफिट कर दिया। श्री दशोरा जी भी वर्तमान में हर दृष्टि से फिट हैं, मगर कुटिल राजनीति ने उन्हें भी एक तरह से हाशिये पर खड़ा कर रखा है।

खैर, यह भी एक दिलचस्प तथ्य है कि गांधीवादी माने जाने वाले मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत के स्थानीय प्रतिबिंब पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती से तब भी उनकी खूब पटती थी, जबकि वे भी शहर जिला कांग्रेस अध्यक्ष हुआ करते थे। यह कोई गोपनीय तथ्य नहीं, बाकायदा जनचर्चा का विषय था। दोनों अपनी-अपनी पार्टी की विचारधारा व कार्यक्रमों के प्रति एक निष्ठ रहे, फिर भी दोस्ती कायम रही। न तो कोई निजी विवाद हुआ और न ही सार्वजनिक। वस्तुत: तब राजनीति का मिजाज कुछ और हुआ करता था। डॉ. बाहेती आज भी राजनीति में सक्रिय हैं, इस कारण उनमें राजनीति से जुड़ी आवश्यक बुराइयां गिनाई जा सकती हैं, मगर निजी जिंदगी कितनी सरल, सहज, सौम्य है, यह सब जानते हैं। खबर के मामले में भी दशोरा जी व डॉ. बाहेती में एक साम्य है। जैसा कि श्री माथुर बताते हैं कि आमतौर पर राजनीतिज्ञ, पत्रकारों से इस मोह में रिश्ता रखते हैं कि उन्हें प्रचार का ज्यादा अवसर मिलेगा, लेकिन दशोरा जी ने कभी संबंधों का इसके लिए दुरुपयोग नहीं किया। ठीक ऐसा ही है, डॉ. बाहेती भी खबर या नाम के लिए बहुत ज्यादा फांसी नहीं खाते। बहुत जरूरी हो तो ही खबर जारी करते हैं। 

अरे, एक और मजेदार बात। श्री माथुर की डॉ. बाहेती से उतनी ही गहरी छनती है, जितनी दशोरा जी से। दोनों नेताओं के बीच जो साम्य है, कहीं वही तत्त्व श्री माथुर के भीतर तो गहरे छिपा हुआ नहीं है। बेशक, श्री माथुर की पत्रकारिता की धार बहुत पैनी है, इस कारण हो सकता है, उनसे कई को तकलीफ भी हुई हो, मगर अजमेर की पत्रकारिता में उनके जैसे साफ-सुथरी छवि के पत्रकार गिनती के ही हैं, जिन पर इतने लंबे पत्रकारिता के जीवन में कोई दाग नहीं लगा। 

बात कहां से शुरू हुई और कहां तक पहुंच गई। लब्बोलुआब ये कि दशोरा जी एक आदर्श व्यक्तित्व हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे किस पार्टी के हैं, महत्वपूर्ण ये है कि हमारे बीच ऐसे प्रकाश स्तम्भ मौजूद हैं, जिनसे हमारी भावी पीढ़ी को रोशनी मिलती रहेगी।

जरा दशोरा जी के जीवन परिचय पर भी नजर डालें:-

उनका जन्म 1 जनवरी 1950 को श्री रामलाल दशोरा के घर हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा चितौडग़ढ़, माध्यमिक शिक्षा बस्सी जिला चितौडग़ढ़, स्नातक शिक्षा चितौडग़ढ़ और एलएलबी की शिक्षा उदयपुर में हासिल की। उन्होंने बीए. एलएलबी की शिक्षा अर्जित की और वकालत को अपना पेशा बनाया। उन्हें करीब 43 वर्ष तक राजस्व मामलों की वकालत का अनुभव है। वे राजस्थान राजस्व अभिभाषक संघ के अध्यक्ष और सचिव और राजस्थान अधिवक्ता परिषद के संयुक्त सचिव रहे हैं। वे करीब पचास साल से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हुए हैं। प्रदेश भाजपा विधि प्रकोष्ठ के उपाध्यक्ष रहे हैं। सन् 1998 से 2007 तक शहर जिला अध्यक्ष पद पर रहते हुए उन्होंने अपनी विशेष पहचान बनाई है। विभिन्न चुनावों में पार्टी प्रत्याशियों के मुख्य चुनाव एजेंट रहे हैं। वे लायन्स क्लब पृथ्वीराज के अध्यक्ष रहे।


-तेजवानी गिरधर

7742067000

tejwanig@gmail.com

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस शब्द उपयुक्त नहीं है?

इन दिनों आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का बोलबाला है। हर क्षेत्र में इसका उपयोग किया जा रहा है। यकायक ख्याल आया कि क्या आर्टिफिशियल षब्द उपयुक्त है...