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गुरुवार, 6 मई 2021

मूर्ति पर पैसे फैंकना : ऐसे चढ़ाने से तो न चढ़ाएं वो अच्छा


मंदिरों में हमने अक्सर देखा होगा कि लोग चढ़ावे के नाम पर मूर्ति के आगे पैसे फैंकते हैं। विशेष रूप से तब तो यह दृश्य आम होता है, जब लोग रास्ते के मंदिर के सामने अपने वाहन से उतरना नहीं चाहते और बस या कार की खिड़की से ही मंदिर के गेट पर पैसे फैंकते हैं। कुछ पैसे अंदर पहुंच जाते हैं तो कुछ बाहर रह जाते हैं, जिन्हें राह चलते लोग उठा कर चलते बनते हैं।

कभी विचार किया है कि यह कृत्य कितना अशोभनीय और घटिया है। अरे एक भिखारी में यही चाहता है कि कोई उसे पैसे दे तो सम्मान से उसके कटोरे में डाल दे या हाथ में  पकड़ाए। अगर आप उसके कटोरे में दूर से पैसे फैंकगे या उसकी तरफ पैसे उछाल कर देंगे तो उसे बहुत बुरा लगता है। विचार कीजिए कि अगर हमें भी किसी मदद चाहिए और वह हमारी ओर पैसे या रुपए फैंक कर दे तो कैसा महसूस करेंगे। आप यही कहेंगे न कि कितना असभ्य है? मदद देने का ये कैसा तरीका है?

अब विचार कीजिए कि जिसे हम भगवान समझते हैं, सर्वशक्तिमान, वह कैसा महसूस करता होगा? अव्वल तो आपके भगवान को आपके पैसे की तनिक भी जरूरत नहीं है। आपके पास जो कुछ भी है, वह उसी का ही तो दिया हुआ है। वह आपसे लेने की कोई अपेक्षा नहीं करता। उसी का दिया हुआ उसी देकर आप कौन सा गौरव हासिल कर रहे हैं? वह तो आपका भाव है कि आप उसे भेंट दे कर रिझाने की कोशिश करते हैं। चंद रुपए चढ़ा कर उससे कई गुना की अपेक्षा करते हैं। कई बार तो वो भी पहले नहीं, बल्कि काम हो जाने पर अमुक रुपए का प्रसाद चढ़ाने का संकल्प लेते हैं। ये श्रद्धा नहीं, बल्कि सौदा है। सरासर व्यापार जैसा है।

चलो, यह मान भी लिया जाए कि भगवान आपकी भेंट से खुश होता है, मगर यदि आप उसकी ओर उछाल कर पैसा फैंकेंगे तो निश्चित ही उसे बुरा महसूस होता होगा। इससे बेहतर तो ये है कि आप पैसे चढ़ाएं ही नहीं। यदि चढ़ाने की वाकई श्रद्धा है तो या तो भेंट पात्र में डालें या फिर पुजारी के हाथ में दें। वैसे भी वह पैसा भगवान के काम नहीं आता, बल्कि पुजारी की आजीविका चलती है। यह अच्छा है कि पूरे दिन मंदिर में सेवा करने वाले की मदद हो जाती है, मगर उछाल कर इस प्रकार की मदद करना बेहद शर्मनाक है।


-तेजवानी गिरधर

7742067000

tejwanig@gmail.com

शनिवार, 1 मई 2021

ईश्वर पुरुष है या स्त्री?


हालांकि ईश्वर को त्रिगुणातीत और निराकार माना जाता है। उसका कोई लिंग नहीं, अर्थात न तो वह पुरुष है और न ही स्त्री। बावजूद इसके प्रचलन में यही है कि जब ही हम उसके बारे चर्चा करते हैं, जिक्र करते हैं तो उसे पुरुषवाचक के रूप में ही संबोधित करते हैं। कहते हैं न कि ईश्वर भला करेगा, वह सब पर कृपा करता है? जिससे प्रतीत होता है कि वह पुरुष है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर वास्तविकता क्या है? सवाल इसलिए भी स्वाभाविक है क्यों कि हमारी सोच के अनुसार वह पुरुष या स्त्री, कोई एक तो होगा। इन दोनों से इतर जो भी तत्त्व है, उससे हम अनभिज्ञ हैं। सिर्फ कल्पना ही कर सकते हैं।

इस विषय को लेकर विशेष रूप से ईसाई समुदाय में काफी बहस छिड़ी हुई है। चर्च ऑफ इंग्लैंड का एक समूह दैनिक प्रार्थना के दौरान ईश्वर को पुरुषवाचक के साथ ही स्त्रीवाचक के रूप में भी संबोधित करने की मांग कर रहा है। उसकी मांग में दम भी है। लेकिन दिक्कत ये है कि जब भी हम ईश्वर का जिक्र करते हैं तो स्वाभाविक रूप से बिना सर्वनाम के उसके बारे में चर्चा करना कठिन है। यह भाषा की भी समस्या है। या तो हमें उसे पुरुष या स्त्री वाचक शब्द से पुकारना होगा। पुरुषवादी समाज में उसे स्त्री के रूप में संबोधित करना हमें स्वीकार्य नहीं, इसलिए हम उसे पुरुष मान कर ही संबोधित करते हैं।

वस्तुत: ईश्वर एक सत्ता है, एक शक्ति केन्द्र है। वह स्वयंभू है। उसी सत्ता के अधीन संपूर्ण चराचर जगत संचालित हो रहा है। वह कोई व्यक्ति नहीं है। लेकिन चूंकि हम स्वयं व्यक्ति हैं, हमारी सीमित शक्ति है, इस कारण सर्वशक्तिमान की परिकल्पना करते समय हम उसे अपार क्षमताओं से युक्त एक महानतम व्यक्ति के रूप में देखते हैं। और चूंकि पूरी प्रकृति व समाज की व्यवस्था पुरुषवादी है, इस कारण उसके प्रति संबोधन में स्वाभाविक रूप से पुरुषवाचक शब्दों का चलन है। 

आइये, जरा हमारी पुरुष प्रधान व्यवस्था पर जरा चर्चा कर लें। असल में प्रकृति की गति नर व नारी की संयुक्त भूमिका से है। न तो आदमी अपेक्षाकृत बेहतर है और न ही औरत तुलनात्मक रूप से कमतर। बावजूद इसके समाज की संरचना में आरंभ से पुरुष की प्रधानता रही। यही वजह है कि धार्मिक, सामाजिक व पारिवारिक रूप से पुरुष अग्रणी रहा। आप देखिए, बेशक, नाम स्मरण करते हुए राधे-श्याम, सीता-राम, लक्ष्मी-नारायण कहा जाता है, अर्थात पहले स्त्री का नाम लिया जाता है, स्त्री तत्त्व को विशेष सम्मान दर्शाया जाता है, मगर सच्चाई ये है कि प्रधानता पुरुष की ही रही है। सारे भगवान पुरुष हैं। चित्रों में भगवान विष्णु शेष नाग पर लेटे होते हैं और माता लक्ष्मी उनके चरणों में बैठी दिखाई जाती है। अन्य भगवानों व देवी-देवताओं में भी पुरुष की ही प्रधानता है। धर्म की पुरस्र्थापना के लिए अवतार लेने वाले सभी भगवान पुरुष हैं। सारे आश्रमों के प्रमुख ऋषि रहे हैं। लगभग सारे मठाधीश पुरुष ही रहे हैं। सभी शंकराचार्य पुरुष हैं। अधिसंख्य मंदिरों में पुजारी पुरुष हैं। तीर्थराज पुष्कर में पवित्र सरोवर की पूजा-अर्चना पुरुष पुरोहित ही करवाते हैं। 

जैन धर्म की बात करें। जैन समाज के सभी तीर्थंकर पुरुष हैं। जैन मुनियों के नाम के आगे 108 व जैन साध्वियों के नाम के आगे 105 लिखा जाता है। उसके पीछे बाकायदा तर्क दिया जाता है जैन साध्वियों में जैन मुनियों की तुलना में तीन गुण कम हैं।

इस्लाम की बात करें तो पैगम्बर हजरत मुहम्मद साहब पुरुष है। सारे मौलवी पुरुष हैं। मस्जिदों में नमाज की इमामत पुरुष करते हैं। यहां तक कि सार्वजिनक नमाज के दौरान महिलाओं की सफें पुरुषों से अलग लगती हैं। अजमेर की विश्व प्रसिद्ध दरगाह ख्वाजा साहब की दरगाह में खिदमत का काम पुरुष खादिम करते हैं। दरगाह स्थित महफिलखाने में महिलाएं पुरुषों के साथ नहीं बैठ सकतीं। उनके लिए अलग से व्यवस्था है। जानकारी तो ये भी है कि दरगाह परिसर में महिला कव्वालों को कव्वाली करने की इजाजत नहीं है। इसी प्रकार इसाई धर्म में भी ईश्वर के दूत ईसा मसीह पुरुष हैं। गिरिजाघरों में प्रार्थना फादर करवाते हैं।

सामाजिक व्यवस्था में भी पुरुषों की प्रधानता है। अधिसंख्य समाज प्रमुख पुरुष ही होते हैं। पारिवारिक इकाई का प्रमुख पुरुष है। वंश परंपरा पुरुष से ही रेखांकित होती है। स्त्रियां ब्याह कर पुरुष के घर जाती हैं, न कि पुरुष स्त्री के घर। हमारे यहां तो पत्नी से अपेक्षा की जाती है कि वह पति को भगवान माने। पति की लंबी आयु के लिए पत्नियां करवा चौथ का व्रत करती हैं। इस तरह की धारणा चलन में हैं कि महिला यदि कोई पुण्य करे तो उसका आधा फल पुरुष को मिलता है, जबकि पुरुष को उसके पुण्य का पूरा फल मिलता है।

कुल मिला कर अनादि काल से पुरुष तत्व की प्रधानता रही है। सामाजिक व धार्मिक परंपराओं का ढ़ांचा बनाने वाले पुरुष हैं। यही वजह है कि लिंगातीत, निर्गुण, निराकार ईश्वर का जिक्र पुरुष वाचक शब्दों से करते हैं।

आखिर में एक बात पर गौर कीजिए। ईश्वर के बारे हम चाहे जितनी टीका-टिप्पणियां कर लें, लेकिन वह हमारी कल्पनाओं व अवधारणों से कहीं बहुत आगे है। उसका पार पाना कठिन ही नहीं, नामुमकिन है। वेद भी व्याख्या करते वक्त आखिर में नेति-नेति कह कर हाथ खड़े कर देते हैं।

-तेजवानी गिरधर

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tejwanig@gmail.com

सोमवार, 15 मार्च 2021

अच्छे लोगों को भगवान अपने पास जल्दी बुला लेता है?


आम तौर पर यदि किसी सज्जन व्यक्ति का कम उम्र में ही देहावसान हो जाता है तो यही कहा जाता है कि भगवान अच्छे लोगों को अपने पास जल्द बुला लेता है। ऐसे उदाहरण ऐसे हैं भी, मगर इस धारणा का आधार क्या है, इसको लेकर सवाल उठते हैं। ऐसी क्या वजह है कि भगवान अच्छे लोगों की उम्र कम ही रखता है? उसका भला क्या प्रयोजन हो सकता है? यदि इस धारणा को सही मानें तो सवाल ये भी उठता है कि जिनकी उम्र अधिक होती है तो क्या वे बुरे होते हैं? इसके विपरीत हमारे यहां तो अधिक उम्र वालों को सौभाग्यशाली माना जाता है। यदि कोई अपने जीवन में पड़पोता या पड़पोती देखे तो उसे बहुत ही भाग्यवान मानते हैं। अधिक उम्र अच्छी होती है, इसी कारण तो हम लोग चिरायु होने की कामना करते हैं, लंबी उम्र की दुआ करते हैं। हमें पता है कि मनुष्य की अधिकतम उम्र एक सौ साल की होती है, फिर भी हम किसी के जन्मदिन पर तुम जीयो हजारों साल की शुभेच्छा जाहिर करते हैं। कदाचित मृत्यु के बाद भी कीर्ति पताका वर्षों तक फहराने के भाव से ऐसा किया जाता होगा।

शास्त्रों व पुराणों में कई ऋषियों के हजारों साल तक जीने के प्रसंग आते हैं। शास्त्रानुसार यह भी स्थापित तथ्य है कि हनुमानजी चिरंजीवी हैं। बताते हैं कि सीता माता ने हनुमानजी को लंका की अशोक वाटिका में राम का संदेश सुनने के बाद आशीर्वाद दिया था कि वे अजर-अमर रहेंगे। यानि कि वे चिरयुवा भी हैं। मान्यता है कि जहां भी भक्ति-भाव से भगवान राम की पूजा-अर्चना होती है, हनुमानजी वहां विद्यमान होते हैं। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को चिरकाल तक पृथ्वी पर भटकते रहने का श्राप दिया था। वे आज भी पृथ्वी पर अपनी मुक्ति के लिए भटक रहे हैं। इसी प्रकार ऋषि मार्कण्डेय, भगवान वेद व्यास, भगवान परशुराम, राजा बलि, विभीषण और कृपाचार्य भी चिरंजीवी माने जाते हैं।

बहरहाल, अब मौलिक सवाल पर आते हैं। एक ओर हम ये मानते हैं कि भगवान अच्छे लोगों को अपने पास जल्दी बुला लेते हैं तो दूसरी ओर चिरायु होने को अच्छा माना जाता है। है न अजीबोगरीब विरोधाभास। ऐसा प्रतीत होता है कि केवल मन की संतुष्टि के लिए ऐसा कहा जाता है कि अच्छे लोगों के परिजन को सांत्वना देने के लिए यह कहा जाता है कि भगवान अच्छे लोगों को जल्द बुला लेता है। सच तो ये है कि मृत्यु का अच्छे या बुरे होने से कोई ताल्लुक नहीं है। 


-तेजवानी गिरधर

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शनिवार, 12 दिसंबर 2020

गांधीजी को शराबी साधक पर ऐतराज नहीं था!


किसी भी सिक्के के दो पहलु होते हैं। इसी प्रकार हर मसले के दो दृष्टिकोण होते हैं। सकारात्मक व नकारात्मक। यह हम पर निर्भर करता है कि हम किसे चुनते हैं। जितने भी संत हैं, जितने मोटिवेशनल स्पीकर्स हैं, वे जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण अर्थात पॉजिटिव एटिट्यूड अपनाने की सलाह देते हैं। इस सिलसिले में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जीवन से जुड़ा एक प्रसंग ख्याल में आता है। 

एक बार गांधीजी के कुछ अनुयाइयों ने गांधीजी से शिकायत की कि आश्रम का एक साधक शराबी है। वह आश्रम में भी नियमित आता है और रोज शाम को शराब की दुकान पर भी खड़ा दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि हमारा साधक शराबी है, यह देख कर लोग क्या सोचेंगे? इससे हमारे आश्रम की बदनामी होगी कि गांधीजी के अनुयायी भी शराबी हैं। उन्होंने गांधीजी से आग्रह किया कि उस साधक को आश्रम में आने से रोका जाए। इस पर गांधीजी ने उत्तर दिया कि उस साधक को रोकने की कोई जरूरत नहीं है। उसे नियमित आने दिया जाए। आप ये क्यों सोचते हैं कि हमारा साधक शराबी है, ये क्यों नहीं सोचते कि एक शराबी हमारे यहां साधना करने आता है। शराबी होने के बावजूद अगर कोई साधक हमारे यहां नियमित आता है, इसका ये अर्थ है कि उसमें सुधरने की गुंजाइश है। यदि उसमें सुधरने की जरा भी ललक नहीं होती तो वह आश्रम में आता ही नहीं। शराबी होने के बावजूद उसकी रुचि सदाचार में है, इसी कारण आश्रम में आता है। यदि हम उसके प्रति मित्रवत व्यवहार करेंगे तो संभव है वह एक दिन शराब छोड़ दे। यदि उसे आश्रम में आने से रोक देंगे तो बात ही खत्म हो जाएगी और यदि उसके प्रति बुरा बर्ताव करेंगे, तो एक दिन वह आश्रम में आना बंद हो जाएगा। और सुधरने जो भी संभावना होगी, वह भी समाप्त हो जाएगी। इस पर शराबी साधक पर ऐतराज करने वाले साधक चुप हो गए। तभी तो कहा है कि नफरत बुराई से करें, बुरे आदमी से नहीं।

यह प्रसंग किसी गिलास के आधा भरा होने जैसा है। हम ये भी सोच सकते हैं कि गिलास आधा ही भरा हुआ है और सोच का एक आयाम ये भी है कि गिलास आधा खाली है। निष्कर्ष ये है कि हर मसले के दो पहलु होंगे ही। एक अच्छा और दूसरा बुरा। कोई संपूर्ण अच्छा नहीं हो सकता और कोई संपूर्ण बुरा नहीं हो सकता। अच्छे से अच्छे आदमी में भी बुराई मिल जाएगी और बुरे से बुरे इंसान में भी अच्छाई होती है। यह हम पर निर्भर करता है कि हमारा फोकस किस पर है। 

आपको ख्याल में होगा कि मैनेजमेंट गुरू सदैव अपने कर्मचारी या अधीनस्थ की अच्छाई की तारीफ करने की सलाह देते हैं। बेशक बुराई की ओर भी ध्यान आकर्षित करने को कहते हैं, मगर साथ ही सद्गुण की प्रशंसा भी करने पर जोर देते हैं। इससे अधीनस्थ का उत्साह बढ़ता है और सुधार की गुंजाइश बनती है।

यह हमारी मनोवृत्ति का दोष है कि हम अच्छाई की तुलना में बुराई को जल्द स्वीकार करते हैं। जैसे हम अगर किसी की बुराई करते हैं तो लोग उसे तुरंत सच मान लेते हैं, उस पर सहसा यकीन कर लेते हैं, जबकि अगर किसी की प्रशंसा करते हैं तो उसे यकायक मंजूर नहीं करते। यह सोचते हैं कि अमुक आदमी के अमुक आदमी से अच्छे संबंध होंगे, या फिर उससे उसका स्वार्थ सिद्ध हो रहा होगा, इसी कारण वह उसकी तारीफ कर रहा है। इसका एक उदाहरण ये भी है कि हर फिल्म एक अच्छा संदेश देती है। एक भी फिल्म बुरा संदेश देने के लिए नहीं बनती। लेकिन हम अच्छे संदेश को अंगीकार करने की बजाय फिल्म में दिखाई गई बुराइयों को तुरंत स्वीकार कर लेते हैं। कैसा विरोधाभास है कि हम अच्छाई की तारीफ तो करते हैं, मगर बुराई को इसलिए अपना लेते हैं क्योंकि उससे हमारा स्वार्थ सिद्ध होता है।

हमारी सोच किस तरह का है यह इससे पता लगता है कि अगर कोई युवती किसी युवक के साथ जा रही है तो हम तुरंत यह अनुमान लगा लेते हैं कि वे प्रेमी-प्रमिका या पति-पत्नी ही होंगे। हम कभी ये नहीं सोचते कि वे भाई-बहिन भी तो हो सकते हैं।

बहरहाल, समारात्मक दृष्टिकोण अपनाने के लिए गांधीजी से जुड़ा प्रसंग सटीक लगा, इसी कारण साझा करने की इच्छा हुई।


-तेजवानी गिरधर

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सोमवार, 7 दिसंबर 2020

पत्नी को पति का नाम लेने से क्यों रोका गया?


हम देखते हैं कि आजकल नव दंपत्ति बेहिचक एक-दूसरे को उनके नाम से पुकारते हैं। न तो इसमें उन्हें तनिक शर्म महसूस होती है और न ही ऐसा करने में उनको कुछ आपत्तिजनक लगता है। यहां तक कि अब तो प्यार से रखे गए शॉर्ट नेम का भी उपयोग करने लगे हैं। इसे एक दूसरे के प्रति प्रेम का द्योतक माना जाने लगा है। इसके विपरीत परंपरा ये रही है कि पत्नी पति को न तो नाम से बुलाती है और न ही किसी के सामने पति का जिक्र उसका नाम ले कर करती है। पति ही नहीं, पति के बड़े भाई अर्थात जेठ का नाम लेने से भी परहेज करती हैं। आज भी ऐसी पीढ़ी मौजूद है, जिसमें इस परंपरा का निर्वाह किया जा रहा है। वैसे, कई ऐसे पुरुष भी हैं जो पत्नी को नाम से नहीं पुकारते। वे सुनती हो, ऐसा कह कर बुलाते हैं। इसी प्रकार पत्नी नाम से पुकारने की बजाय अजी सुनते हो, कह कर संबोधित करती हैं।

मैंने ऐसे अनेक प्रसंग देखे हैं, जिनमें किसी सरकारी काम के दौरान महिला से पति का नाम पूछा गया तो उसे नाम लेने में बहुत हिचक हुई और साथ में खड़े अन्य व्यक्ति से कहा कि आप मेरे पति का नाम बता दीजिए। अनपढ़ या कम पढ़ी लिखी महिला की छोडिय़े, पढ़ी लिखी महिलाएं भी कभी अपने पति का जिक्र करती हैं तो मेरे पति या उसके नाम का संबोधन करने से बचती हैं और हमारे ये या हमारे साहब कह कर इंगित करती हैं। 

सवाल ये उठता है कि आखिर किस वजह से पत्नी को पति का नाम न लेने की सीख दी गई। इस बारे में बहुत खोज करने पर यह जानकारी हासिल हुई कि स्कंध पुराण में कहा गया है कि पति का नाम लेने से उनकी उम्र कम होने लगती है। ऐसा करने पर उम्र कम क्यों होती है, इस बारे में कोई जानकारी नहीं मिली। भला नाम लेने या न लेने का उम्र से क्या ताल्लुक? ज्ञातव्य है कि शास्त्रज्ञों के अनुसार श्रीगणेश ने भगवान वेद व्यास के मुख निकली वाणी को स्कंध पुराण में लिखा है। उसी में पतिव्रता स्त्रियों की मर्यादाओं का भी उल्लेख है। इन मर्यादाओं में पति के सोने के बाद सोना, सुबह पति से पहले उठना, पति के भोजन करने के बाद भोजन करना शामिल है। यहां तक कि पति के परदेश जाने पर शृंगार न करने तक की हिदायत दी गई है। जिन भी ऋषि-मुनियों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया, उसके पीछे उनका क्या प्रयोजन था, ये तो पता नहीं, मगर ऐसा प्रतीत होता है कि यह सब पुरुष प्रधान समाज की देन है। उसी पुरुष प्रधान व्यवस्था ने पति को परमेश्वर की संज्ञा दी है। एक तरफ यह कह कर महिला को महत्ता दी गई कि यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, तत्र रंमते देवता, वहीं दूसरी ओर मर्यादा के नाम पर महिलाओं पर अनेक प्रकार के प्रतिबंध लगाए गए। सर्व विदित है कि महिलाएं पति की उम्र लंबी होने की कामना के साथ करवा चौथ का व्रत रखती हैं। मैंने कई  प्रगतिशील महिलाओं तक को करवा चौथ का व्रत करते देखा है। कैसी अजीब बात है कि पत्नी की उम्र बढ़ाने के उद्देश्य से पति के लिए किसी व्रत अथवा आयोजन का प्रावधान नहीं किया गया।

धरातल की सच्चाई है कि आज भी वह पीढ़ी मौजूद है, जो पतिव्रता स्त्रियों के लिए बनाई गई मर्यादाओं का पूरी श्रद्धा से पालन करती है। कई महिलाएं पति के भोजन करने के बाद उसकी जूठी थाली में ही भोजन करती हैं। आज भी कई ऐसे परिवार हैं, जिनमें पहले पुरुषों को भोजन करवाने की व्यवस्था है, महिलाएं बाद में भोजन करती हैं। नॉन वेज खाने वाले परिवारों में पुरुषों को अच्छी बोटियां परोसी जाती है और महिलाएं जो कुछ बच जाता है, उसी को खा कर संतुष्ट रहती हैं।

हालांकि समय के साथ मर्यादाएं क्षीण हो रही हैं। महिलाएं पुरुषों के बराबर में आ कर खड़ी होने लगी हैं। विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं ने पुरुषों से बेहतर परिणाम दिए हैं। महिलाओं के कामकाजी होने के कारण परिवारों में उनकी अहमियत बढ़ रही हैं। लेकिन साथ उसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगे हैं। इस बारे में किसी लेखक ने कहा है कि दुनिया में भी भले ही लोकतंत्र की बड़ी महत्ता हो, मगर परिवार में राजशाही ही पनपती है। अगर घर की बहू को भी समान अधिकार दे दिए जाते हैं तो वह पति व ससुर की बराबरी करने लगेगी, नतीजतन टकराव होगा और सामान्य शिष्टाचार शिथिल हो जाएगा। उनकी बात में दम है। किसी भी इकाई, परिवार हो या दफ्तर, उसमें किसी एक का प्रधान होना जरूरी है, अन्यथा अराजकता फैल जाएगी। 


-तेजवानी गिरधर

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रविवार, 29 नवंबर 2020

आकाशवाणी कहीं आत्मा की आवाज तो नहीं?


हम आकाशवाणी को रेडियो के जरिए सुनी जाने वाली आवाज के रूप में जानते हैं, सुन चुके हैं, लेकिन शास्त्रों-पुराणों में जिस आकाशवाणी का जिक्र आता है, वह हम में से किसी ने नहीं सुनी। न ही हमारी अग्रज पीढ़ी ने। इतिहास में ऐसे अनेक प्रसंग हैं, जिनमें परम सत्ता ने आकाश के जरिए संदेश दिए हैं, उनके विस्तार में जाए बिना हम उस जिज्ञासा पर ध्यान केन्द्रित करते हैं कि आकाशवाणी होती क्या है? क्या वाकई आकाश भी बोल सकता है? क्या परम सत्ता आकाश के माध्यम से बोलती है या बोल सकती है? सवाल कई हैं? आकाशवाणी किस भाषा में होती थी? क्या इंग्लैंड में अंग्रेजी में और भारत में हिंदी में होती होगी? क्या भारत में भी अलग-अलग प्रांतों में भिन्न-भिन्न भाषाओं में होती थी? क्या आकाशवाणी सभी को सुनाई देती थी, या फिर ईश्वर को जिसको संदेश देना होता था, उसी को सुनाई देती थी? ऐसा भी हो सकता है कि किसी जमाने में आकाशवाणी हुआ करती हो, मगर अब नहीं, इसलिए हमें उस पर यकीन नहीं होता।

वस्तुत: धरती पर मनुष्यों में जरूर भिन्न भागों में भिन्न भाषाएं विकसित हुईं, लेकिन आकाश की भी कोई भाषा होती होगी, इस पर सहसा यकीन नहीं होता। कहीं ऐसा तो नहीं कि जिस प्रकार आत्मा की कोई आवाज नहीं होती, उसी प्रकार आकाश की भी कोई आवाज नहीं होती। आप कह सकते हैं कि आत्मा की भाषा होती है, लेकिन वस्तुत: वह आत्मा की नहीं, बल्कि हमारी बुद्धि में फीड हो रखी भाषा की विचार शृंखला होती है। हम विचार जरूर अपनी भाषा में करते हैं, मगर आत्मा की आवाज तो एक अनुभूति है। एक अहसास है। उसकी कोई भाषा नहीं होती। आपने महसूस किया होगा कि जब आप कोई गलत काम करने जा रहे होते हैं तो कम से कम एक बार भीतर से यह अहसास आता है कि वह हमें नहीं करना चाहिए। कई बार हमें ऐसा तीव्र आभास होता है कि हमारा अमुक काम होने वाला है, और वह हो जाता है। वह आत्मा की ही आवाज है। इसे अंग्रेजी में इन्ट्यूशन कहते हैं। इसी को हम छठी इंद्री कह सकते हैं। कभी-कभी इल्यूजन या भ्रम भी हो सकता है।

अब सवाल उठता है कि क्या आत्मा की आवाज भीतर से आती है या कहीं और से, अखिल ब्रह्मांड से। हमारी आत्मा में ऐसी शक्तियां मानी गई हैं, जो ब्रह्मांड के संकेतों को ग्रहण कर लेती हैं। अर्थात हमारी आत्मा ब्रह्मांड से कनेक्टेड है। यूं तो ब्रह्मांड में कई ध्वनियां विचरण कर रही हैं, मगर हमें सिर्फ वहीं सुनाई देती है अथवा अनुभूत होती है, जिसके लिए हमारी आत्मा की फ्रिक्वेंसी मेल खाती है। 

इससे ऐसा प्रतीत होता है कि जिसका नाम आकाशवाणी दिया गया, वह अंतरात्मा में उठी अनुभूति होगी, जिसे परमात्मा की वाणी समझा गया होगा। चूंकि हमारी ऐसी धारणा है कि भगवान ऊपर अर्थात आकाश में रहता है, तभी तो हम उसे ऊपर वाला, नीली छतरी वाला के नाम से संबोधित करते हैं, इस कारण यह मान कर कि उसने कोई संदेश दिया होगा तो उसका नाम आकाशवाणी रख दिया गया। 

आकाशवाणी अथवा ईश्वर का संदेश इस्लाम धर्म की पवित्र पुस्तक कुरान से मेल खाता है। बताया जाता है कि कुरान वह पुस्तक है, जो हजरत मोहम्मद साहब पर किताब उतारी गई है। अल्लाह ने फरिश्तों के सरदार जिब्राइल अलै. के मार्फत पवित्र संदेश सुनाया। वे पहले सबसे ऊपर क्षितिज पर प्रकट हुए और फिर वे मोहम्मद साहब के निकट आ गए। उनके संदेश को ही कुरान में संग्रहित किया गया है। मोहम्मद साहब ने पहाड़ों पर हिरा की गुफा में अपनी इबादत के दौरान अपना पहला प्रकाशन प्राप्त किया था। इसके बाद, उन्हें 23 वर्षों की अवधि में पूरा क़ुरआन का खुलासा प्राप्त हुआ। कुरान के अनुसार मोहम्मद साहब की पहली अनुभूति एक दृष्टि के साथ थी। कुरान शब्द का पहला जिक्र कुरान में ही मिलता है, जहां इसका अर्थ है - उसने पढ़ा या उसने उचारा। यहां उचारा शब्द आकाशवाणी शब्द से मेल खाता है। बेशक इसमें मोहम्मद साहब पर जो कुरान उतरी, वह सीधे आसमान से नहीं उतरी, इसके लिए फरिश्तो के सरदार को माध्यम बनाया है, मगर वह भी आसमान अर्थात आकाश से उतरे हैं।

इसी प्रकार ईसाई धर्म की पवित्र पुस्तक बाइबिल भी ईश्वरीय प्रेरणा से लिखी गई मानी जाती है। हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि ईश्वर ने बाइबिल के विभिन्न लेखकों को इस प्रकार प्रेरित किया है कि वे ईश्वरकृत होते हुए भी उनकी अपनी रचनाएं भी कही जा सकती हैं। ईश्वर ने बोल कर उनसे बाइबिल नहीं लिखवाई। वे अवश्य ही ईश्वर की प्रेरणा से लिखने में प्रवृत्त हुए। अत: बाइबिल को ईश्वरीय प्रेरणा तथा मानवीय परिश्रम दोनों का सम्मिलित परिणाम है माना जाता है। यहां जिस ईश्वरीय प्रेरणा शब्द का उल्लेख है, वह आत्मा की ही तो आवाज है।

हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथ वेदों के बारे में कहा गया है कि वे अनेकानेक ऋषियों की अनुभूतियों व ज्ञान का संकलन है। अर्थात वे भी ईश्वरीय प्रेरणा से ही ऋषियों में उतरी हैं। 

हम जिसे आकाशवाणी जानते हैं, वह वो है, जिसे हम रेडियो के जरिए सुनते हैं। प्रसंगवश यह जिक्र करना अनुचित नहीं होगा कि मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया में उस आकाशवाणी के बारे में जानकारी दी गई है, जिसे हम रेडियो के जरिए सुनते हैं। आकाशवाणी भारत के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन संचालित सार्वजनिक क्षेत्र की रेडियो प्रसारण सेवा है। भारत में रेडियो प्रसारण की शुरुआत मुंबई और कोलकाता में 1927 में दो निजी ट्रांसमीटरों से हुई। 1930 में इसका राष्ट्रीयकरण हुआ और तब इसका नाम भारतीय प्रसारण सेवा अर्थात इंडियन ब्राडकास्टिंग कॉरपोरेशन रखा गया। बाद में 1957 में इसका नाम बदल कर आकाशवाणी रखा गया।


-तेजवानी गिरधर

7742067000

tejwanig@gmail.com

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2020

जिसका राज, उसी के पूत बनिये, खुश रहेंगे


बुद्धिजीवियों में कबीर व उनके पुत्र कमाल का एक प्रसंग खूब चर्चा में रहा है। पहले उस पर बात करते हैं कि वह क्या था और फिर उसके निहितार्थ पर गुफ्तगू करेंगे।

एक बार कबीर व उनके पुत्र कमाल एक चक्की के पास बैठे थे। संसार पर बातचीति कर रहे थे। कबीर ने जो कहा, वह इन दो पंक्तियों में है:-

चलती चक्की देख कर दिया कबीरा रोय,

दो पाटन के बीच में साबुत बचा कोय।

हो ये रहा था कि चक्की के दो पाटों के बीच गेहूं के जो दाने आ रहे थे, पिस कर आटा हो रहे थे। असल में वे यह संदेश देना चाह रहे थे, जिस प्रकार चक्की के दो पाटों के बीच गेहूं साबुत नहीं बचता, वैसे ही आसमान व धरती नामक दो पाटों के बीच जिंदगियां नष्ट हो रही हैं। संसार चूंकि क्षणभंगुर है, इस कारण हर कोई मृत्यु को प्राप्त हो रहा है। इसी पर वे अफसोस जता रहे थे। 

इस पर कमाल ने पलट कर जवाब दिया:-

चलती चक्की देख कर दियो कमाल हंसाय,

कील सहारे जो रहे, सो साबुत बच जाए।

अर्थात चक्की की कील के सहारे जमा हुए गेहूं के दानों का कुछ नहीं बिगड़ रहा था। वस्तुत: वे यह कहना चाह रहे थे कि भले ही दो पाटों के बीच कोई नहीं बच पाता, मगर जो कील का सहारा ले लेता है, वह बच जाता है।  उनका इशारा भगवान की ओर था कि जो भी उनका आश्रय ले लेता है, वह सुरक्षित रहता है। हालांकि मोटे तौर पर उनकी बात में भी त्रुटि है, क्योंकि भगवान का आश्रय न लेने वाला भी मर रहा है और आश्रय लेने वाला भी मृत्यु को उपलब्ध हो रहा है। मगर गूढ़ अर्थ ये है कि जो भगवान का आश्रय नहीं लेता, वह जन्म-मृत्यु के चक्कर में पड़ा रहता है, जबकि ईश्वर का सहारा लेने वाले का कल्याण हो जाता है, यानि मोक्ष को हासिल हो जाता है।

आश्रय का जिक्र आया तो एक प्रसंग याद आ गया। एक बार भगवान श्रीकृष्ण भोजन के बैठे थे। पत्नी रुक्मणी पंखा कर रही थी। भगवान भोजन का पहला ग्रास मुंह के पास लाए और अचानक वह ग्रास थाली में रख कर महल के मुख्य द्वार की ओर दौड़े। कुछ देर तक वे बाहर देखते रहे। फिर वापस आ गए और भोजन शुरू कर दिया। रुक्मणी ने सवाल किया कि स्वामी, आपको क्या हुआ था? इस पर श्रीकृष्ण ने जवाब दिया कि असल में मेरा एक भक्त दुश्मनों से घिर गया था। वे उस पर पत्थर फैंक रहे थे। भक्त अपने आपको असहाय पा कर मुझे पुकार रहा था। मेरा भक्त कष्ट में हो और मुझे पुकारे, मेरा सबसे पहला कर्तव्य ये होता है कि मैं उसको बचाऊं। इसी कारण मैं भागा। मगर कुछ देर बाद जब देखा कि मेरे भक्त ने खुद भी पत्थर उठा लिया है और वह दुश्मनों का मुकाबला कर रहा है, तो मेरी मदद की  जरूरत ही नहीं थी, इस कारण मैं लौट आया। 

इस प्रसंग से भी यही अर्थ निकलता है कि जब तक हमारे भीतर अहम भाव होता है और हम सोचते हैं कि जो कुछ भी हो रहा है, वह हम कर रहे हैं, तब तक भगवान हमारी मदद को नहीं आता। जैसे ही हम सब कुछ उस पर छोड़ देते हैं, तो सारी जिम्मेदारी भगवान अपने ऊपर ले लेता है। 

कुछ इसी आपने एक उक्ति सुनी होगी-

जांको राखे साइयां, मार सके न कोय।

बाल न बांका कर सके, जो जग बैरी होय।

अर्थ यही है कि ईश्वर की शरण में रहने वाले का कुछ नहीं बिगड़ता। 

यह तो हुई आध्यात्मिक दृष्टिकोण, मगर भौतिक जीवन में भी यह फिट बैठता है कि जो भी सत्ता के साथ रहता है, वही सुखी रहता है। जिसने बॉस इज आल्वेज राइट की सूत्र अपना लिया, वह चैन के साथ नौकरी करता है, जबकि तर्क व प्रतिवाद करने वाला हर वक्त तकलीफ में रहता है। 

आपने ये भी सुना होगा कि जिसकी खाओ बाजरी, उसी की बजाओ हाजिरी।

मेरे एक मित्र सता के साथ रहने वालों को राजपूत की संज्ञा देते हैं। असल में राजपूत एक जाति-समुदाय है, जिसे बहादुर व दिलेर कौम माना जाता है, उनकी बहादुरियों की कहानियां इतिहास में भरी पड़ी हैं, विशेष रूप से राजस्थान के संदर्भ में, जिसे राजपूताना भी कहा जाता है। कदाचित यह शब्द राजपतों को राजघराने के वंशज बताने के लिए बना हो। मगर उनका प्रयोजन समुदाय से नहीं, शब्द मात्र से है। इसका अर्थ वे निकालते हैं कि जिसका राज, उसी के पूत बन जाओ, कभी दुखी नहीं रहोगे। आपने व्यवहार में भी देखा होगा कि अधिसंख्य बड़े व्यवसायी सत्ता के साथ रहते हैं। उन्हें इससे कोई प्रयोजन नहीं कि सत्ता किस विचारधारा की है। उन्हें तो अपने व्यवसाय को बढ़ाने से मतलब होता है। इसी कारण किसी राजनीतिक मतभेद में पड़े बिना हर सरकार के साथ खड़े हो जाते हैं।

इस श्रेणी के लोगों के बारे में एक प्रसंग और ख्याल में आता है। एक दिन बादशाह अकबर और बीरबल महल के बागों में सैर कर रहे थे। वे बीरबल से बोले, देखो यह बैंगन, कितनी सुंदर लग रहे हैं। इनकी सब्जी कितनी स्वादिष्ट लगती है। बीरबल, मुझे बैंगन बहुत पसंद हैं। हां महाराज, आप सत्य कहते हैं। यह बैंगन है ही ऐसी सब्जी, जो न सिर्फ देखने में बल्कि खाने में भी इसका कोई मुकाबला नहीं है। भगवान ने भी इसीलिए इसके सिर पर ताज बनाया है। कुछ दिनों बाद अकबर और बीरबल उसी बाग में घूम रहे थे। बादशाह अकबर को कुछ याद आया और मुस्कुराते हुए बोले, बीरबल देखो यह बैंगन कितना भद्दा और बदसूरत है और यह खाने में भी बहुत बेस्वाद है। हां हुजूरे, आप सही कह रहे हैें, बीरबल बोला। इसीलिए इसका नाम बे-गुण है। यह सुन कर बादशाह अकबर को गुस्सा आ गया। उन्होंने झल्लाते हुए कहा, क्या मतलब है बीरबल? मैं जो भी बात कहता हूें, तुम उसे ही ठीक बताते हो। बीरबल ने कहा, हुजूर, मैं आपका नौकर हूें, बैंगन का नहीं।

खुद्दार लोगों यह बात गले नहीं उतरेगी, मगर सच्चाई ये ही है हवा का रुख जिस ओर हो, उसी ओर चलिए, कभी तकलीफ में नहीं रहेंगे। वक्त के खिलाफ चलने वाला सदैव कष्ट ही पाता है।

हालांकि मैं स्वभावत: इस फैक्ट के विपरीत रहा हूं, सदा व्यवस्था में व्याप्त अव्यवस्था के विपरीत बोला, ऐसे में बहुत तकलीफ में रहा। इस कारण इस फैक्ट को मेरा अनुभव सिद्ध तथ्य मानिये।

-तेजवानी गिरधर

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tejwanig@gmail.com

बुधवार, 30 सितंबर 2020

लड़की को एक से अधिक लड़कों के साथ दोस्ती रखने का अधिकार!


लड़के-लड़कियों के बीच संबंधों में कितना नाटकीय बदलाव आने लगा है, इसका अहसास हाल ही एक प्रेंक वीडियो यूट्यूबर के एक शूट में देखने को मिला। उसे उचित अथवा अनुचित ठहराना मूर्खता ही कहलाएगी,  क्योंकि वक्त बदल गया है।

होता ये है कि एक गार्डन में एक लड़का-लड़की आपस में झगड़ रहे होते हैं। यूट्यूबर को क्यों कि रोजाना नया स्पॉट चाहिए होता है, इस कारण वे गार्डन में घात लगा कर बैठे होते हैं। जैसे ही एक यूट्यूबर ने देखा कि लड़के-लड़की के बीच में वाद-विवाद हो रहा है, वह फटे में टांग फंसाने पहुंच जाती है। वह विवाद का कारण पूछती है। इस पर लड़की बताती है कि लड़का उसके रिलेशनशिप में है और परेशान कर रहा है। बार-बार फोन करके मिलने को कहता है। उसे शक है कि वह अन्य लड़कों के भी संपर्क में है। उसके शक करने वाले ऐसे प्रेमी से अब रिश्ता तोडऩा है। वह यहां तक कह डालती है कि हां, उसके सौ लड़कों से संबंध हैं, मगर वह केवल फ्रेंडशिप है और उनसे बात जरूर करूंगी। चाहे प्यार छूट जाए। यदि उसके प्यार को साथ रहना है तो उसे उस पर यकीन करना ही होगा। यूट्यूबर एक महान नारी उद्धारक की तरह प्रवचन देती हुई लड़की का पक्ष लेती है। लड़का उसे बीच में न पडऩे को कहता है तो वह कहती है कि ये मेरी बहन के समान है। वह लड़के को धमकाते हुए कहती है कि यदि लड़की अब रिश्ता नहीं रखना चाहती तो तू क्यों जबरदस्ती पीछे पड़ा हुआ है। तू छोड कर चला जा। मानो, रिश्ता लाइट के बटन की तरह हो, जिसे जब चाहे ऑन किया जाए और जब मर्जी हो ऑफ कर दिया जाए। वह तर्क देती है कि ये तो अपने सभी फ्रेंड्स से बात करेगी, उसमें क्या ऐतराज है? तुम भी तो अन्य कई लड़कियों से बात करते होंगे। लड़की को भी अधिकार है कि वह अपने बहुत सारे पुरुष मित्र रखे और उनसे बात करे। आखिरकार लड़का कोई चारा नहीं देख कर चला जाता है।

इस प्रसंग ने मुझे इस विषय पर लिखने को मजबूर किया। बेशक आज के स्वछंद वातावरण में, जिसे मैं उत्छृंखलता कहता हूं, हर एक लड़के को अनेक लड़कियों से दोस्ती करने अधिकार मिला हुआ है। ठीक इसी तरह लड़कियां भी इस होड़ में अनेक लड़कों से दोस्ती करने का अधिकार जमाती हैं। सवाल ये है कि यदि लड़की बहुत सारे दोस्त रखती है तो उसे प्यार के संबंध वाले की भावना को ताक पर रख देना चाहिए? यदि लड़के को लड़की के अन्य बहुत सारे दोस्तों से बात करने पर ऐतराज है, तो क्या लड़की को केवल अनेक दोस्त रखने के अधिकार की रक्षा के नाते उससे प्यार का संबध तोड़ देना चाहिए? यदि वाकई प्यार है, जो कि मेरी नजर में दुनिया में है ही नहीं, क्या उसे अपने प्रेमी के शक को दूर करने का प्रयास नहीं करना चाहिए? क्य विश्वास कायम रखने की कोशिश नहीं करनी चाहिए? कैसी विडंबना है कि एक समय में प्रेमी-प्रेमिका प्यार की खातिर दुनिया को छोड़ देते थे और आज ऐसा दौर आया है कि दुनिया की खातिर प्यार को ही तिलांजलि दी जा रही है। 

जहां तक मेरी समझ है, पहले होता ये था कि पुरुष एक से अधिक संबंध रखता था तो भी औरत को पता नहीं लग पाता था। असल में वह बाहर निकलती ही नहीं थी, तो पता लगता कैसे? वह एकनिष्ठ ही बनी रहती थी। कुछ हमारी पुरुषवादी संस्कृति ने पति को परमात्मा मान कर चलना सिखाया, इस कारण भी वह उसके अलावा किसी के बारे में सोचने में भी पाप समझती थी। अब जमाना बदल गया है। महंगाई इतनी अधिक है कि अकेले पुरुष के कमाने से काम नहीं चलता। महिला को भी दहलीज से बाहर कदम रखना पड़ा है। जाहिर तौर पर वह बहुत से पुरुषों के संपर्क में आती है। पुरुष भी अपने स्वभाव के कारण कहीं भी लाइन मारने को उत्सुक रहता है। वह येन-केन-प्रकारेण सहकर्मी अथवा संपर्क में आई अन्य महिलाओं को प्रभावित करने की कोशिश करता है, जिसे कि अंग्रेजी में फ्लर्ट करते हैं। पुराने संस्कारों से प्रभावित महिला तो इग्रोर कर देती है, मगर नए युग के संस्कारों से प्रभावित महिला पुरुष की मनोवृत्ति को जानते हुए भी दुनियादारी के नाते पुरुषों से व्यवहार निभाती है। एक जमाना था, जब पुरुष मित्र अथवा महिला मित्र शब्द होते ही नहीं थे। इन शब्दों को पाप माना जाता था। यदि मित्रता थी भी तो उसे भाई-बहिन के शब्दों से संबोधित कर छिपाया जाता था। लेकिन अब ऐसा नहीं है। पुरुष के एक से अधिक महिलाओं के साथ फ्रेंडशिप को तो सामान्य माना ही जाता है, महिला के भी एक से ज्यादा पुरुष मित्र हों तो कोई ऐतराज नहीं करता। महिलाएं इतनी खुले दिमाग की हो गई हैं कि वे बड़ी आसानी से किसी पुरुष को अपना मित्र, अच्छा मित्र, खास मित्र इत्यादि बताने में जरा भी नहीं हिचकती। तुर्रा ये कि केवल मित्र हैं, उससे ज्यादा नहीं, जबकि उससे ज्यादा का रास्ता यहीं से हो कर गुजरता है।

बहरहाल, एक से अधिक महिलाओं के साथ दोस्ती रखने वाले पुरुष को यह बर्दाश्त नहीं होता कि उसके रिलेशन वाली महिला अन्य पुरुषों के संपर्क में नहीं हो। प्रेंक वीडियो वाले पुरुष की भी वही स्थिति है। यह स्थिति उसके रिलेशनशिप वाली महिला को नागवार गुजरती है। उसे अन्य पुरुषों से भी व्यवहार रखने की आजादी चाहिए, कदाचित पुरुष की होड़ में। वह अब  रिलेशनशिप वाले पुरुष को पहले से कम समय ही दे पाती है। इसी कारण विवाद शुरू होता है, जो अंतत: कट ऑफ की स्थिति में आ जाता है। अफसोसनाक है कि महिला दुनिया से संबंधों को रखने के चक्कर में प्यार को भी लात मारने को उतारू हो जाती है। रही सही कसर तथाकथित नारी स्वातंत्र्य की झंडाबरदार महिला के अधिकारों की दुहाई देते हुए महिला के कदम को उचित करार दे कर और हवा देती है।

-तेजवानी गिरधर

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सोमवार, 28 सितंबर 2020

फालतू की बातें बहुत करते हैं हम


हम कई बार फालतू के सवाल करते हैं। जैसे किसी के घर गए और वह खाना खा रहा है तो यकायक हम पूछ बैठते हैं, खाना खा रहे हो। या ये ही पूछ बैठते हैं कि बैठे हो? अव्वल तो ये सवाल ही बेमानी हैं। जो दिख रहा है, उसी के बारे क्या पूछना? दिलचस्प बात ये है कि खाना खाने वाला भी जवाब देता है कि हां, खाना खा रहा हूं, मानो उसके पास ये विकल्प हो कि वह यह कह सके कि नहीं खाना नहीं खा रहा। वह भी जवाब देता है कि हां, बैठा हूं, मानो कुछ और कहने, यथा नहीं, नाच रहा हूं का विकल्प हो उसके पास। हम अगर ये पूछते हैं कि कैसे हो तो फिर भी ठीक है, क्यों हमें पता नहीं कि उसके क्या हालचाल हैं?

इसी प्रकार फालतू के काम भी बहुत किया करते हैं हम। जैसे रास्ते से गुजरते वक्त और कुछ नहीं तो, दुकानों के साइन बोर्ड ही पढ़ते जाते हैं। एक बार नहीं। बार-बार। जब भी गुजरते हैं, फिर पढ़ते हैं। वस्तुत: उसका कोई मतलब नहीं। हां, यह तो ठीक है कि हमने एक बार पढ़ लिया तो वह काम का है। इससे हमको ख्याल रहता है कि अमुक दुकान कहां पर है। वस्तुत: हम अपने मस्तिष्क के स्मरण कक्ष में फालतू का कचरा भरते रहते हैं। वैसे विज्ञान का मानना है कि मस्तिष्क नामक सुपर कंप्यूटर की जितनी रेम है, उसका हम पूरे जीवन में एक प्रतिशत भी उपयोग नहीं कर पाते। मगर फालतू का कचरा भरना तो ठीक नहीं।

मैं अपनी ही बता दूं। जब भी साइन बोर्ड पढ़ता हूं तो संपादन की आदत के कारण उसकी स्पेलिंग मिस्टेक पर ही ध्यान रहता है और व्यर्थ ही कुंठित होता हूं।

फालतू की एक बात का जिक्र कर रहा हूं। गर्मी या सर्दी होने पर अपने पास बैठे व्यक्ति से कहते हैं कि आज तो बहुत गर्मी या सर्दी है। वह भी हामी भरते हुए कहता है कि वाकई बहुत गर्मी या सर्दी है। जब दोनों का पता है कि बहुत गर्मी या सर्दी है, उस पर चर्चा की जरूरत ही नहीं, फिर भी किसी भी अनुभूति को अभिव्यक्त करने के मानव स्वभाव के कारण हम ऐसा करते हैं। 

इस बारे में ओशो ने अपने एक प्रवचन में जिक्र किया है। वे बताते हैं कि एक दार्शनिक प्रात:कालीन सैर किया करते थे। कुछ दिन बाद देखा कि एक अन्य व्यक्ति भी सैर कर रहा है। उन्होंने देख कर अनदेखा कर दिया। दो-तीन दिन ऐसा चलता रहा। फिर उस व्यक्ति ने अभिवादन करना शुरू कर दिया। दार्शनिक भी अनमने मन से प्रत्युत्तर दे देते। फिर उस व्यक्ति ने बातें करना शुरू कर दिया। जैसे आज मौसम कितना सुहावना है, ये फूल कितना खूबसूरत है, आज सर्दी ज्यादा है इत्यादि। दार्शनिक महाशय बहुत परेशान हो गए। आखिर, उनसे रहा नहीं गया और उस व्यक्ति से कहा कि मान्यवर, आप बहुत बातूनी हैं। मेरी सैर का मजा खराब कर रहे हैं। अरे भाई, मौसम सुहावना है, वह मुझे भी महसूस हो रहा है, फूल की खूबसूरती मुझे भी दिखाई दे रही है, सर्दी के ज्यादा होने का अहसास भी मुझे है। क्यों, व्यर्थ ही इनका जिक्र करते हो। बेहतर ये है कि आप भी सुहावने मौसम का आनंद लो। उसका जिक्र करना जरूरी है क्या? न तो वह आपके कहने से कम होना है और न ही ज्यादा। क्यों नहीं हम दोनों ही मौसम, फूल व सर्दी की अनुभूति का मजा अंदर ही अंदर लें। खैर, अगले दिन से उस व्यक्ति ने आना बंद कर दिया।

दार्शनिक अपनी जगह ठीक थे। जो बात दोनों का ज्ञात है, उसके बारे में चर्चा क्या करना? चर्चा तो उस पर होनी चाहिए, जो एक को पता हो और दूसरे को नहीं।

इसी संदर्भ में ओषो ने अपने प्रवचन में एक प्रसंग का जिक्र किया है। एक बार यह तय हुआ कि अमुक दिन अमुक गांव में गुरू नानक व कबीर की मुलाकात होगी। दोनों चेले बहुत प्रसन्न थे कि मुलाकात के दौरान दोनों के बीच ज्ञान की बातें होंगी तो हमें बहुत आनंद आएगा। एक दिन मुलाकात का अवसर आ ही गया। दोनों की मुलाकात हुई। एक दूसरे का अभिवादन किया। और बैठ गए। एक दूसरे को एकटक निहारते रहे। बात कुछ भी नहीं की। मुलाकात का समय समाप्त हुआ। दोनों ने एक दूसरे का अभिवादन किया और अपने-अपने गंतव्य स्थान की ओर प्रस्थान कर गए। दोनों के चेले बहुत निराष हुए। सोचा था कि ज्ञान चर्चा का आनंद लेंगे, मगर इन्होंने तो कोई बात ही नहीं की। दोनों के चेलों ने अपने-अपने गुरू से पूछा कि आपने आपस में कोई बात क्यों नहीं की। दोनों का एक ही उत्तर था। चर्चा करने को कुछ था ही नहीं। जो एक जानता था, वही दूसरा भी जानता था। अर्थात भगवान के बारे में। तो चर्चा किस पर करते।

इस प्रसंग की ऐतिहासिक तथ्यात्मकता भिन्न हो सकती है, मगर सार की बात ये है कि चर्चा उसी पर होती है, जिसके बारे में एक जानता हो और दूसरा नहीं। तभी उसकी सार्थकता है, अन्यथा व्यर्थ है।

अपने पल्ले तो यही आया कि व्यर्थ की बातों में अपनी क्षमता व समय को नहीं गंवाना चाहिए। बात उतनी ही करें, जितनी बहुत जरूरी हो। इससे हमारी ताकत का क्षरण बच जाएगा।

-तेजवानी गिरधर

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रविवार, 27 सितंबर 2020

नमस्ते व नमस्कार में क्या अंतर है?


हाल ही मेरे मित्र जाने-माने फोटो जर्नलिस्ट सत्यनारायण जाला ने एक पोस्ट भेजी, जिसमें बताया गया है कि नमस्ते व नमस्कार पर्यायवाची नहीं हैं। इनका भिन्न अर्थ है। बाद में सोशल मीडिया पर यह पोस्ट अलग शब्दावली में भी पायी। स्वाभाविक है कि उन्होंने किसी अन्य सज्जन की ओर से भेजी गई पोस्ट को कॉपी-पेस्ट किया होगा, मगर मुझे इस पोस्ट ने इस पर चर्चा के लिए प्रेरित किया।

पहले वह पोस्ट, जो कि उन्होंने भेजी:-

कौनसा अभिवादन उचित?

नमस्ते या नमस्कार?

प्राय: लोग अभिवादन के लिए नमस्ते और नमस्कार दोनों शब्दों का प्रयोग करते हैं। कुछ लोग मानते हैं नमस्ते और नमस्कार दोनों का अर्थ एक ही है। दोनों का अर्थ एक तब ही कहा जाएगा, जब ये एक दूसरे के पर्यायवाची हों।  किंतु ये दोनों भिन्न अर्थ वाले शब्द हैं। नमस्कार में अंत में कार धातु लगने से यह क्रियासूचक बन गया।

नम: का अर्थ सम्मान 

ते का अर्थ आप

आपका सम्मान करता हूं

अर्थात मैं आपका सम्मान करता हूं

नमस्कार शब्द जड़ (बिना क्रिया)अर्थात जो जीवित हो कर भी प्रत्यक्ष रूप से आपको अपनी प्रत्यक्षता अनुभव न होने दे, उन वस्तुओं के लिए किया जाता है।

जैसे सूर्य नमस्कार, चन्द्र नमस्कार, सागर नमस्कार इत्यादि, जबकि नमस्ते सम्मानसूचक शब्द है, जो कि चेतन (सजीव) के लिए प्रयोग किया जाता है। इसलिए नमस्कार त्यागें और नमस्ते शब्द का ही प्रयोग करें।

जिन भी सज्जन ने यह पोस्ट बनाई है, उनका मकसद यही प्रतीत होता है कि वे उपयुक्त स्थान पर उपयुक्त शब्द के इस्तेमाल के लिए जोर दे रहे हैं।

इस बारे में जब मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया में देखा तो वहां बताया गया है कि नमस्ते या नमस्कार मुख्यत: हिन्दुओं और भारतीयों द्वारा एक दूसरे से मिलने पर अभिवादन और विनम्रता प्रदर्शित करने हेतु प्रयुक्त शब्द है। इस भाव का अर्थ है कि सभी मनुष्यों के हृदय में एक दैवीय चेतना और प्रकाश है, जो अनाहत चक्र (हृदय चक्र) में स्थित है। यह शब्द संस्कृत के नमस शब्द से निकला है। इस भावमुद्रा का अर्थ है एक आत्मा का दूसरी आत्मा से आभार प्रकट करना। दैनन्दिन जीवन में नमस्ते शब्द का प्रयोग किसी से मिलते हैं या विदा लेते समय शुभकामनाएं प्रदर्शित करने या अभिवादन करने हेतु किया जाता है। नमस्ते के अतिरिक्त नमस्कार और प्रणाम शब्द का प्रयोग करते हैं।

संस्कृत व्याकरण की दृष्टि से इसकी उत्पत्ति इस प्रकार है- नमस्ते= नम:+ते। अर्थात् तुम्हारे लिए प्रणाम। संस्कृत में प्रणाम या आदर के लिए नम: अव्यय प्रयुक्त होता है, जैसे-सूर्याय नम: (सूर्य के लिए प्रणाम है)। इसी प्रकार यहां- तुम्हारे लिए प्रणाम है, के लिए युष्मद् (तुम) की चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है। वैसे तुम्हारे लिए के लिए संस्कृत का सामान्य प्रयोग तुभ्यं है, परन्तु उसी का वैकल्पिक, संक्षिप्त रूप ते भी बहुत प्रयुक्त होता है। यहां वही प्रयुक्त हुआ है। अत: नमस्ते का शाब्दिक अर्थ है- तुम्हारे लिए प्रणाम। इसे तुमको प्रणाम या तुम्हें प्रणाम भी कहा जा सकता है, परन्तु इसका संस्कृत रूप हमेशा तुम्हारे लिए नम: ही रहता है, क्योंकि नम: अव्यय के साथ हमेशा चतुर्थी विभक्ति आती है, ऐसा नियम है।

मुंडे-मुंडे मतिभिन्ना। जितने मुंह, उतनी बातें।

एक सज्जन ने सोशल मीडिया पर व्याख्या की है कि संस्कृत शब्द नमस्कार को मिलते वक्त किया जाता है और नमस्ते को जाते वक्त। कुछ लोग इसका उल्टा भी करते हैं। उनकी यह व्याख्या समझ में नहीं आई।

एक सज्जन बताते हैं कि कुछ विद्वानों के अनुसार नमस्कार सूर्य उदय के पश्चात्य और नमस्ते सूर्यास्त के पश्चात किया जाता है। इसके पीछे के तर्क का उन्होंने उल्लेख नहीं किया है।

मैंने एक व्याख्या बहुत पहले यह भी सुनी है- समान स्टेटस के व्यक्ति को नमस्ते कहा जाता है, जबकि अपने से उच्च पदस्थ को नमस्कार कहा जाता है।

यदि श्री जाला की पोस्ट पर नजर डालें तो उसमें बताया गया है कि नमस्कार शब्द जड़ (बिना क्रिया)अर्थात जो जीवित हो कर भी प्रत्यक्ष रूप से आपको अपनी प्रत्यक्षता का अनुभव न होने दे, उन वस्तुओं के लिए किया जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की प्रार्थना का आरंभ नमस्ते सदा वस्तले मातृभूमे कहा गया है। यदि नियम के तहत नमस्कार शब्द सूर्य को प्रणाम करने के लिए कहा जाता है तो यह नियम मातृभूमि पर लागू क्यों नहीं हुआ। मातृभूमि को नमस्ते क्यों कहा गया है? वह भी तो जीवित होते हुए भी अपनी प्रत्यक्षता का अनुभव नहीं देती।

खैर, मूल बात ये है कि दोनों शब्द नम धातु से ही बने हैं। दोनों का मूल भाव नमन करना है। नमस्ते का अर्थ है, तुमको प्रणाम या तुमको नमन। और नमस्कार चूंकि क्रियावाचक है, इसलिए इसका अर्थ हुआ मैं तुमको नमन करता हूं। अब तुमको नमन व तुमको नमन करता हूं में क्या फर्क है?

बहरहाल, ऐसा प्रतीत होता है कि जिस भी शब्दविद् ने नमस्ते अथवा नमस्कार शब्द का प्रयोग किया है तो या तो उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि उन्होंने समानार्थी का निकट समानार्थी शब्दों का इस्तेमाल भिन्न-भिन्न स्थान पर क्यों किया या उन्होंने स्पष्ट किया भी हो, मगर वह व्याख्या उपलब्ध नहीं है। इसी कारण हम माथापच्ची कर रहे हैं। 

कुल मिला कर भले ही दोनों शब्दों में बारीक अंतर हो, मगर भाव नमन करने से ही है। दिलचस्प बात ये है कि गूगल पर यदि आप इन शब्दों का अंग्रेजी अनुवाद करेंगे तो दोनों के लिए हेलो शब्द ही आएगा।

चलते-चलते एक बात आपसे साझा करना चाहता हूं। नमस्ते व नमस्कार तो फिर भी भिन्न शब्द हैं, मगर एक शब्द को विपरीत स्थितियों में प्रयुक्त किया जाता है। राजस्थान में किसी के आने पर भी पधारो सा कहा जाता है और विदा होने पर भी पधारो सा कहा जाता है। मेरी एक पत्रकार साथी डॉ राशिका महर्षि तो मिलते समय और विदा होते समय अथवा फोन पर बात करते समय आरंभ व अंत में एक ही शब्द नमस्ते का का इस्तेमाल किया करती है। है न दिलचस्प बात।

-तेजवानी गिरधर

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गुरुवार, 24 सितंबर 2020

प्रेंक वीडियो के नाम पर परोसी जा रही है अश्लीलता

 


इन दिनों यूट्यूब पर प्रेंक वीडियो खूब चलन में हैं। प्रेंक का मतलब होता है शरारत या मजाक। कई लड़के-लड़कियों ने इसे धंधा बना रखा है। वे इसमें विज्ञापन डाल कर कमा रहे हैं। धंधे तक तो ठीक है, मगर इनमें से कई ने इसे अश्लीलता परोसने का जरिया बना लिया है, जिसे देख कर नए युवक-युवतियां आकर्षित होती है। कुछ ने अपने लाखों फॉलोअर्स के नाम ब्लैकमेलिंग का कारोबार भी कर रखा है।   

यूं प्रेंक वीडियो मनोरंजन के लिहाज से ठीक है। कोई बुराई नहीं। मगर अधिसंख्य प्रेंक वीडियो प्रेम प्रसंग, ब्रेक अप व शरीर बेचने पर बनाए जा रहे हैं। यह सच है कि ब्वॉय फ्रेंड व गर्ल फ्रेंड की कल्चर पाश्चात्य संस्कृति की देन है, जिसने हमारे महानगरीय परिवेश को बुरी तरह से प्रभावित कर रखा है। इसमें प्रेम के नाम पर शारीरिक शोषण के अलावा कुछ भी नहीं। आए दिन ब्वॉय फ्रेंड्स व गर्ल फ्रेंड्स के नए जोड़े बनते हैं, लीव इन रिलेशन तक पहुंचते हैं और बेक अप भी हो जाता है, मानो गुड्डे-गुड्डियों का खेल हो। हो सकता है कि प्रेंक वीडियो बनाने वालों का यह तर्क हो कि वे तो दर्पण की भांति हमारी संस्कृति का दिग्दर्शन मात्र करवा रहे हैं, मगर सच्चाई ये है कि यह संस्कृति अभी महानगरों तक ही सीमित है, उसे ये वीडियो के जरिए गांव-गांव तक अभी परोस रहे हैं। अर्थात इस कुसंस्कृति को गांवों तक स्वाभाविक रूप से पहुंचने में संभव है दस-बीस साल लगें, मगर ये उसे अभी से सर्व कर रहे हैं, जिसका कुप्रभाव पड़े बिना नहीं रह सकता। जगजाहिर है कि नए युवक-युवतियां अच्छाई की बजाय बुराई को जल्द अपनाती हैं। दिखाने को भले ही यह इस रूप में गिनाई जा रही हो कि वे तो समाज की इस बुराई को उजागर कर रहे हैं, मगर वस्तुत: वे इसका प्रचार कर रहे हैं। कई प्रेंक तो इतने घटिया व अश्लील होते हैं कि उन्हें देख कर घिन आने लगती है। भाभी, साली, चाची व दोस्त की बीवी जैसे मर्यादित रिश्तों को इतने घटिया तरीके से पेश किया जा रहा है, मानो इन रिश्तों में अश्लीलता व यौन शोषण एक स्वाभाविक बात हो। मगर वीडियो बनाने वाले लड़के-लड़कियां बड़ी बेशर्मी से इनको शूट कर यूट्यूब पर डाल रहे हैं। ऐसे कई वीडियो तो पोर्न की श्रेणी के होते हैं, मगर उन पर कोई नियंत्रण नहीं। अनेकानेक वीडियो ऐसे हैं, जो गार्डन में शूट किए जाते हैं और उनमें किसी भी अनजान लड़के या लड़की को मजाक व शरारत का शिकार बनाया जाता है। शरारत जब मार-पिटाई तक पहुंच जाती है तो उसे मजाक बता कर इतिश्री कर ली जाती है। कानूनी पेच से बचने के लिए वे प्रेंक के शिकार लड़के-लड़की को इस बात के लिए रजामंद कर लेते हैं कि उन्हें वीडियो यूट्यूब पर डाउनलोड करने में कोई ऐतराज नहीं। कुल मिला कर यह दर्शाया जा रहा है, मानो लड़कियां केवल यौनेच्छा पूर्ति का साधन हों। मजाक के नाम पर बदचलन लड़कियां भी ऐसा ही दर्शाती हैं कि प्रकृति ने उन्हें जो विशेष शारीरिक संरचना दी है, उसका आजीविका के लिए उपयोग करने में कोई बुराई नहीं है।

यूट्यूब पर लाखों फॉलोअर्स वाले प्रेंक वीडियो मेकर खुले आम धमकी देते भी दिखाई दे जाएंगे। एक तरह से वे ब्लैकमेल कर रहे होते हैं। संभव है इस गोरखधंधे में ऐसे प्रकरण भी हों, जो लाइव आने की बजाय अंदर ही अंदर ब्लैकमेल की वजह बन रहे हों। मगर हमारे कानून की मजबूरी ये है कि जब तक कोई शिकायतकर्ता न हो, कोई कार्यवाही नहीं होती। आपको अजमेर का बहुचर्चित अश्लील छायाचित्र ब्लैकमेल कांड याद होगा, जिसमें काफी समय तक इसलिए कार्यवाही नहीं हो पा रही थी, क्योंकि यौन शोषण की शिकार लड़कियां लोकलाज व बदनामी के डर से सामने ही नहीं आ रही थीं।

मजाकिया वीडियो का चलन मारवाड़ी, हरयाणवी व पंजाबी भाषा में भी आ गया है। उनमें से कुछ तो नैतिकता की सीख के लिए होते हैं, मगर अधिसंख्य में वही घटियापन दिखाई देता है। एक-दो ऐसे वीडियो मेकर ऐसे हैं, जिनका काम ही है, जहां लड़की दिखी, वहीं लाइन मारना और अश्लील शरारत करना। समझ में ही नहीं आता कि आखिर मनोरंजन के नाम पर किस प्रकार खुलेआम कुसंस्कृति की ओर धकेला जा रहा है।

-तेजवानी गिरधर

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रविवार, 20 सितंबर 2020

खुद हमने ही कर रखी है हिंदी की ‘हिंदी‘


हिंदी दिवस हर साल मनाया जाता है। इस साल भी मनाया गया। बड़ी-बड़ी बातें की गईं। मगर नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात। हिंदी को अधिकाधिक उपयोग में लेने के नाम पर लाखों, करोड़ों रुपए के बजट स्वीकृत होते हैं, कदाचित उसका कुछ प्रभाव हुआ भी है, हिंदी का मान्यता बढ़ी है, मगर शुद्ध हिंदी लिखने के लिए कुछ नहीं किया गया है। कितने अफसोस की बात है कि दुर्गति शब्द के लिए कुछ लोग मजाक में ‘हिंदी‘ शब्द में लिया करते हैं। जैसे कम से कम हिंदी की ‘हिंदी‘ तो मत करो। मगर खुद हमने ही कर रखी है हिंदी की ‘हिंदी‘। 

कैसी विडंबना है कि यदि अंग्रेजी में हम किसी शब्द की स्पेलिंग गलत लिख देते हैं तो उसकी खिल्ली उड़ाई जाती है, हेय दृष्टि से देखा जाता है, जबकि हिंदी में हम कई गलतियां करते हैं, मगर उन पर कोई गौर ही नहीं करता। मुझे अफसोस होता है कि जिस भाषा को हमने सीखा है, उसके प्रति तो गंभीर हैं, मगर अपनी मातृ भाषा की सुध ही नहीं है। ऐसा नहीं है कि केवल आम आदमी, जिसकी हिंदी के बारे में समझ कम है, वही वर्तनी व व्याकरण की गलतियां करता है, पढ़े लिखे लोग भी धड़ल्ले से त्रुटियां करते हैं। आप देखिए, दुकानों पर लगे साइन बोर्ड्स में कितनी गलतियां होती हैं। चलो, वे तो कम पढ़े लिखे आर्टिस्ट बनाते हैं तो गलतियां स्वाभाविक हैं, मगर साइन बोर्ड बनवाने वालों को तो जानकारी होनी चाहिए। सरकार से अच्छी खासी तनख्वाह लेने वाले भी खूब गलतियां करते हैं। चाहे पुलिस की तहरीर हो, या फिर कोई सरकारी आदेश, उनमें ढ़ेरों त्रुटियां मिल जाएंगी। अखबारों तक में आपको गलतियां मिल जाएंगी। 

कहने का निहितार्थ ये है कि हिंदी के बढ़ावे की तो बात की जाती है, मगर शुद्ध हिंदी की दुर्गति की जा रही है। सरकार व अखबारों तक ने प्रचलित हिंदी शब्दों की जगह अंग्रेजी के शब्द काम में लेने की स्टाइल शीट बना रखी है। आम पाठकों के लिए सुग्राह्य भाषा के नाम पर ऐसा किया जा रहा है। जैसे पहले पुलिस अधीक्षक शब्द प्रचलन में था, मगर उसकी जगह एसपी शब्द को केवल इसीलिए काम में लेने को कहा जाता है, क्योंकि वह आम आदमी को आसानी से समझ में आ जाता है। जिला रसद अधिकारी की जगह डीएओ, जिला परिवहन अधिकारी की जगह डीटीओ, यातायात निरीक्षक की जगह टीआई या ट्रेफिक इंस्पैक्टर शब्द काम में लिया जाता है। इसी प्रकार अभियंता शब्द की जगह इंजीनियर शब्द काम लिया जा रहा है।

आपको जानकारी होगी कि पहले जिलाधीश शब्द काम में लिया जाता था, उसकी जगह सरकार ने ही जिला कलेक्टर शब्द काम में लेने के आदेश दे रखे हैं, क्योंकि जिलाधीश शब्द में अधिनायकवाद की बू आती है। पिछले कुछ समय से देखने में आ रहा है कि अखबारों में शीर्षक को आकर्षक बनाने के नाम पर अंग्रेजी के शब्द घुसेड़े जा रहे हैं।

यह ठीक है कि पूरी शुद्ध हिंदी लिखना तनिक कठिन है। अंग्रेजी के अनेक शब्दों का ठीक-ठीक अनुवाद उपलब्ध नहीं है, इस कारण अंग्रेजी के शब्दों का हिंदी भाषा में उपयोग किया जाता है। जैसे रेलवे, ट्रेन, सिगरेट इत्यादि अनेक ऐसे शब्द हैं, जिनका हिंदी रूपांतरण हुआ ही नहीं है। कुछ साहित्यकारों ने प्रयास किया भी है, मगर वह किताबों में ही दफ्न है। जैसे ट्रेन के लिए लोह पथ गामिनी शब्द गढ़ा गया, मगर उसका उपयोग करता कौन है? इसी प्रकार सिगरेट के लिए श्वेत धूम्रपान दंडिका शब्द बनाया गया, मगर वह कोई भी काम में नहीं लेता। 

कई लोग तो हिंदी बोलते वक्त विशेष रूप से अंग्रेजी के शब्द काम में लेने में अपनी शान समझते हैं। चलो, जो शब्द सहज रूप में हिंदी में शामिल हो गए हैं, उनका उपयोग करने में करने में कोई दिक्कत नहीं है, मगर कई लेखक अपनी लेखनी में अलग तरह का फ्लेवर देने के लिए अंग्रेजी व उर्दू के शब्दों का उपयोग करने लगे हैं। हालांकि यह बहस का मसला है कि ऐसा करना उचित है या नहीं।

एक दिलचस्प तथ्य ये है कि संभवत: हिंदी ही अकेली ऐसी भाषा है, जिसमें जैसा बोला जाता है, वैसा ही लिखा जाता है। उसके बावजूद लोग ठीक से हिंदी नहीं लिख पाते। अंग्रेजी जैसी अंतरराष्ट्रीय भाषा की हालत ये है कि उसमें बी यू टी बट होता है, जबकि पी यू टी पुट बोला जाता है। इसके अतिरिक्त कई ऐसे शब्द हैं, जिनमें कोई अक्षर साइलेंट होता है। वह शब्द में होता तो है, मगर बोला नहीं जाता। 

एक ऐसी गलती की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं, जो आम है। जैसे वर्तनी को लोग वतर्नी लिख देते हैं। अंतर्निहित को अंतनिर्हित लिख देते हैं। ऐसे ही अनेक शब्द हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि प्राथमिक कक्षाओं में ये सिखाया ही नहीं जाता कि आधा र कैसे काम में लिया जाए। जैसे जहां भी उच्चारण में किसी अक्षर से पहले आधा र आता है, तो वह उस अखर के ऊपर लगता है। जैसे वर्तनी। इसी प्रकार उच्चारण में जिस अक्षर के बाद में आधा र आता है तो वह उस अक्षर के नीचे लगाया जाता है। जैसे प्रकार। यह मूलभूत सिद्धांत है, मगर कई लोगों को इसका ज्ञान ही नहीं है। 

शब्दों के गलत इस्तेमाल के भी अनेक उदाहरण मिल जाएंगे। जैसे- बेफालतू। अब ये शब्द है ही नहीं। शब्द है फालतू। इसका मतलब ये है कि व्यर्थ। मगर कई लोग बेफालतू शब्द का इस्तेमाल किया करते हैं। इसी प्रकार कई लोग ‘बावजूद भी‘ शब्द का इस्तेमाल करते हैं, जबकि बावजूद में ‘भी‘ शब्द अंतर्निहित है। बावजूद का अर्थ होता है, उसके बाद भी, ऐसे में ‘भी‘ जोडऩा वाकई गलत है।

इसी प्रकार इस नियम की भी जानकारी कई लोगों को नहीं होती कि वर्णमाला के किसी अक्षर के साथ अनुस्वार का आधा अक्षर जोडऩे पर उसी पंक्ति के अंतिम अक्षर को काम में लिया जाता है। जैसे टण्डन, सम्पन्न, हिन्दी। हालांकि अब अनुस्वार के लिए केवल बिंदी को मान्यता दे दी गई है। जैसे टंडन, संपन्न, हिंदी। 

एक शब्द के बारे में तो मुझे लंबे समय बाद जानकारी हुई। संस्कृत की जानकार व आर्य समाजी श्रीमती ज्योत्सना, जब भास्कर में कॉपी डेस्क पर काम करती थीं तो उन्होंने बताया कि आम तौर पर ‘ज्ञान‘ शब्द का उच्चारण हम ‘ग्यान‘ की तरह करते हैं, जबकि असल में उसका उच्चारण ‘ज्यान‘ की तरह होना चाहिए। शब्द की संरचना में भी दिख रहा है कि य के साथ ‘ज्‘ जोड़ा गया है, न कि ‘ग्‘। अब ये ‘ज्यान‘ की जगह ‘ग्यान‘ कब हो गया, पता नहीं। इसी प्रकार धरती के लिए हम पृथ्वी शब्द काम में लेते हैं, जो कि गलत है, असल में वह शब्द है पृथिवी। कुछ इसी तरह हम शमशान शब्द काम में लेते हैं, जबकि वह है श्मशान।

मुझे ख्याल आता है कि दैनिक भास्कर में नौकरी के दौरान नागौर जिले के एक संवाददाता ने एक शब्द विन्यास काम में लिया कि लापरवाही का शीलशीला बदसूरत जारी है। उसकी खूब खिल्ली उड़ी। सवाल ये है कि हिंदी पत्रकारिता में हिंदी भाषा के अल्पज्ञ कैसे प्रवेश पा जाते हैं? एक और प्रसंग याद आता है। भोपाल से संपादन शाखा के एक वरिष्ठ अधिकारी अजमेर इकाई में काम करने वालों का परीक्षण आए थे। एक पत्रकार साथी जब साक्षात्कार देने गए तो स्थानीय संपादक जी ने कहा कि ये शामिल बाजा है। यह सुन कर अधिकारी हंस पड़े। उन्होंने उससे कुछ भी नहीं पूछा। जब वे साथी बाहर आए तो उनसे हमने पूछा कि क्या सवाल किए गए, इस पर उसने कहा कि कुछ नहीं पूछा, केवल स्थानीय संपादक जी ने यह कहा कि यह शामिल बाजा है। हमें उसका अर्थ समझ में नहीं आया। बाद में अकेले में मैने संपादक जी से शामिल बाजा का अर्थ पूछा तो उन्होंने बताया कि बैंड कंपनी में शामिल बाजा उसे कहते हैं, जो अकेले कुछ नहीं बजा पाता, सभी अपने-अपने वाद्य यंत्र बजाते हैं तो वह भी उनके साथ हो जाता है। यानि कि वह किसी भी वाद्य यंत्र को बजाने में पारंगत नहीं होता, केवल सहायक की भूमिका अदा करता है। मैने अपने साथियों को यह नई जानकारी दी तो वे खूब हंसे।

खैर, हिंदी भाषा के बारे में मेरी जो भी जानकारी है, उसमें से कुछ उपयोगी टिप्स पर फिर कभी बात करेंगे।

-तेजवानी गिरधर

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tejwanig@gmail.com

रविवार, 16 अगस्त 2020

मां-बहिन पर गालियां क्यों?

शीर्षक पढ़ कर आप कहेंगे ये भी कोई लेख है। ये भी कोई लिखने का विषय है। मगर मुझे लगा कि इस लगभग अछूते विषय का भी छिद्रान्वेषण करना चाहिये, क्योंकि इससे हमारी गंदी सोच का पता चलता है। आत्मावलोकन करना कोई बुरी बात नहीं।

एक जमाना था, जब गुस्सा आने पर श्राप दिया जाता था। वह फलित भी होता था। यहां तक कि मानव योनि में अवतार धारण करने वाले भगवान श्रीकृष्ण तक को गांधारी का श्राप भुगतना पड़ा था। उस जमाने में वरदान भी फलित होता था। इसका वैज्ञानिक आधार तलाशेंगे तो नहीं मिलेगा, मगर ऐसा विश्वास है कि श्राप व वरदान हुआ करते थे।

अब जमाना बदल गया है। अब वरदान व श्राप का चलन नहीं है। असल में अब वह क्षमता ही नहीं रही। अब किसी पर गुस्सा आने पर उसको अपशब्द कहे जाते हैं। अपने मन के क्रोध को तुष्ट करने के लिए गाली दी जाती है। गाली के माध्यम से सामने वाले को अपमानित किया जाता है। मगर अफसोसनाक व शर्मनाक बात ये है कि दो व्यक्तियों के झगड़े में एक-दूसरे की मां-बहिन को घसीटा जाता है, उनका संबोधन करते हुए गाली दी जाती है, जबकि उनका विवाद से कोई लेना-देना नहीं होता। उन्हें जबरन घसीटा जाता है। हालांकि गाली बाप-दादा व खानदान तक को भी दी जाती है, जातिसूचक अपशब्द भी कहे जाते हैं, मगर अमूमन दी जाने वाली गालियां मां-बहिन पर बनी हुई हैं। यह और भी अधिक शर्मनाक है कि ये यौन-उत्पीडऩ से जुड़ी हुई हैं। इससे आदमी की  मानसिकता का पता लगता है कि उसकी सोच कितनी कुत्सित है। और उसने मां-बहिन को क्या समझ रखा है। यानि नारी को वह यौनेच्छा पूर्ति करने वाली वस्तु समझता है। 

हमारे यहां सर्वाधिक प्रचलित गाली साला, जिसमें अब किसी को अश्लीलता नजर नहीं आती, वह भी साफ तौर पर महिला के प्रति गंदी सोच से बनी हुई है। यदि हम किसी को साला गाली देते हैं, इसका मतलब है कि हम जबरन उसकी बहन को अपनी पत्नी बता रहे हैं। हद हो गई। जानकारी के मुताबिक सेंसर बोर्ड ने हिंदी सिनेमा में इस गाली को प्रतिबंधित कर रखा है। साले का जिक्र आया है तो साली से जुडी एक बात भी साझा किए देता हूं। हम कितने गंदे हैं, इसका एक उदाहरण देखिए। यह न जाने कहां से चलन में आ गया कि साली यानि आधी घरवाली। संभव है जिसने पहली बार यह जुमला उपयोग में लिया होगा तो यह सोच कर कि साली चूंकि पत्नी की बहिन है, इस कारण हमारे स्वभाव, जरूरतों आदि के बारे में बहुत कुछ जानती है,  चूंकि बहिनें आपस में बहुत गुप्त बातें भी करती हैं। ऐसे में वह आधी घरवाली जैसी हो गई। इसमें कोई अश्लीलता नहीं, मगर बाद में इस जुमले के अर्थ बदल गए। वैसे साली बहिन के समान होती है, उसे इसी नजर से देखना चाहिए। अंग्रेजी में तो उसे सिस्टर इन लॉ ही कहा गया है। हो सकता है ऐसे लोग भी हों, जो साली को बहिन ही मानते हों, मगर यह एक कडवी सच्चाई है कि कई लोग उसे बहिन के नजरिये से नहीं देखते। कुछ और भाव ही रखते हैं। कम से कम ठीक वह भाव तो कत्तई नहीं होता, जो बहिन के प्रति होता है। जरा सोचिये कि अगर आपके आपके साढू आपकी पत्नी को आधी घरवाली कह कर पुकारें तो आपको कैसा लगेगा?

अश्लील शब्दों का प्रयोग किए बिना गाली देने के अनेक उदाहरण हैं। जैसे जब हम किसी को यह कहते हैं कि अगर असली बाप की औलाद है तो ये कर के बता, तो इसका मतलब ये कि हम उसकी मां पर गंदा लांछन लगाने की कोशिश कर रहे हैं। गालियों के मनोविज्ञान पर काम कर चुके एक विद्वान ने रामायण का जिक्र करते हुए आवरण में छिपी गाली का उल्लेख किया है कि वशिष्ट मुनि ने केकयी को ऐसा कहा कि अगर भरत दशरथ की औलाद है तो वह राजगद्दी स्वीकार नहीं करेगा। यह भी एक भद्दी गाली है, भले ही इसमें किसी अश्लील शब्द का प्रयोग नहीं किया गया हो। 

केवल मां-बहिन ही नहीं, समलैंगिता वाली गालियां भी चलन में हैं। अर्थात गाली देने के लिए यौन व्यवहार को इंगित करते हुए अपशब्द कहे जाते हैं। 

हालांकि यह सही है कि जैसे हम सामान्य तौर पर भगवान का नाम लेते हैं तो अमूमन जेहन में भगवान नहीं होता, कोरे शब्द होते हैं, उसी प्रकार मां-बहिन की गाली देते वक्त वैसा भाव नहीं होता, केवल शाब्दिक प्रहार ही होता है। सच तो ये है कि गाली ने अब तकिया कलाम का रूप धारण कर लिया है। बात-बात में बिना प्रयोजन के गाली। मैंने ऐसे लोग देखे हैं जिनके हर वाक्य में गाली होती है, जबकि उनका ऐसा कोई भाव नहीं होता। हम इतने आदी हो चुके हैं कि दुश्मन की तो छोडिय़े, मित्र से बात करते हुए भी गालियां बकते हैं और मित्र बुरा नहीं मानता, क्योंकि वह जानता है कि यह केवल बकी गई है, कही नहीं गई। 

हालांकि जब औरतें आपस में लड़ती हैं तो कुछ अलग किस्म की गालियां बकती हैं, यथा वैधव्य को लेकर, मगर अधिसंख्य यौनाचार को लेकर ही होती हैं। अंग्रेजी में जैसे बिच शब्द के संबोधन से गाली दी जाती है, ठीक उसी प्रकार हिंदी में वैश्या सूचक शब्द इस्तेमाल किए जाते हैं। यह कितना हास्यास्पद है कि कई ऐसी औरतें भी हैं, जो पुरुषों द्वारा उपयोग में ली जाने वाली गालियों का इस्तेमाल करती है। उन्हें समझ ही नहीं होती कि वे कर क्या रही हैं। भले ही वे प्रचलित गालियों का उपयोग गुस्से का इजहार करने के लिए कर रही हों, मगर उन्हें ये ख्याल ही नहीं होता कि वे नारी होते हुए भी नारी जाति को अपमानित करने वाला कृत्य कर रही हैं।

जरा गहराई में जाएं तो यह ख्याल में आता है कि मां-बहिन की गालियां पुरुष प्रधान समाज की देन है। बेशक हमने नारी को बहुत सम्मान का दर्जा दिया हुआ है, शक्ति स्वरूपा मानते हैं, मगर ऐसा प्रतीत होता है कि वह मात्र दिखावा है। मौलिक बात ये है कि पुरुष ने महिला को भोग की वस्तु समझ रखा है। कहीं न कहीं पुरुष यौनाचरण को अपनी बहादुरी मान कर बैठा है।

ऐसा तो है नहीं कि किन्हीं भाषा विज्ञानियों ने बैठ कर गालियों का निर्माण किया हो, वो तो आम बोलचाल में प्रयुक्त की जाने लगी हैं। लेकिन इससे यह तो पता लगता ही है कि आम पुरुष की अपनी मां और बहिन के अतिरिक्त अन्य महिलाओं के प्रति वास्तव में उसके मन में सम्मान कितना है। वस्तुत: यह पुरुष का विद्रूप चेहरा है। मुझे यह घोर विसंगति लगती है कि हम सभ्य समाज कहलाते हैं, मगर हमारा पुरुष सैक्स में इतना डूबा हुआ है कि अपशब्द के लिए सैक्स को इंगित करने वाली गालियों का उपयोग करता है। 

प्रसंगवश बता दें कि भाषा विज्ञान की दृष्टि से जोधपुर की मारवाड़ी भाषा सर्वाधिक शिष्ट मानी जाती है। उसमें गाली भी बहुत सभ्य तरीके से दी जाती है। यथा- थे म्हारी बात कोनी मानी तो म्हारी जूती थांके सिर पर बिराजेला। अर्थात वह साफ तौर पर जूते मारने की चेतावनी दे रहा है, मगर सभ्यता के आवरण में।

-तेजवानी गिरधर

7742067000

tejwanig@gmail.com

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