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शुक्रवार, 14 मई 2021

अफसोस आलेख पर नहीं, टिप्पणी करने वालों पर है


हाल ही मेरे एक ब्लॉग को लेकर फेसबुक पर कई प्रतिक्रियाएं आईं। कुछ तो बेहद आपत्तिजनक व अतार्किक थीं। ब्लॉग का शीर्षक था - हिंदू धर्म में छिपकली लक्ष्मी का प्रतीक तो इस्लाम में दुश्मन नंबर वन। इसमें हिंदू व मुस्लिम धर्म में जो मान्यताएं है, उसको तथ्यात्मक तरीके से बताया गया है। इसमें मैने अपनी ओर से कुछ भी नहीं लिखा। अर्थात उसमें मेरे कोई भी विचार नहीं हैं। सिर्फ मान्यताओं का उल्लेख है। महज जानकारी है। बेशक एक ही विषय पर भिन्न धर्मों में भिन्न मान्यताओं का जिक्र जरूर है, जिससे कुछ लोगों को लग सकता है कि इसमें तुलना की गई है, मगर सच ये है कि वह तुलनात्मक अध्ययन नहीं है। न तो उसमें किसी मान्यता को सही या अच्छा बताया गया है और न ही किसी मान्यता को गलत या खराब। कहीं भी ये नहीं लिखा है कि हिंदू अच्छा करते हैं व मुस्लिम गलत करते हैं। उसके लिए मैं कोई अथॉरिटी हूं भी नहीं। दोनों मान्यताएं अपनी-अपनी जगह ठीक हो सकती हैं। वैसे भी मान्यता तो मान्यता होती है, आस्था तो आस्था होती है, उसे गलत या सही ठहराया भी नहीं जा सकता। 

बावजूद इसके कुछ सज्जनों ने या तो केवल शीर्षक पढ़ कर, या कुछ विघ्र संतोषी लोगों ने पढऩे के बाद उसके गलत निहितार्थ निकालने की कोशिश की। बहुत आपत्तिजनक, तर्कविहीन व भद्दी टिप्पणियां कीं। जब मैने दिलचस्प जानकारी को साझा करने के लिए कलम उठाई थी तो मेरे दिमाग में हिंदू-मुस्लिम कहीं पर भी नहीं था। हो भी नहीं सकता। मैं केवल दिमागी तौर पर धर्मनिरपेक्ष नहीं, बल्कि मेरे खून में धर्मनिरपेक्षता व्याप्त है। मैं भले ही हिंदू परिवार में जन्म लेने के कारण हिंदू रीति-रिवाजों की पालना करता हूं, जो कि मेरा धर्म भी है, मगर असल में मेरे लिए इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है। इस सोच पर मुझे नाज भी है। केवल इतना ही नहीं, अब तक के जीवन में मैने कभी न तो हिंदू-मुस्लिम तरीके से सोचा और न ही ऐसा कोई कृत्य किया।

ऐसे में कुछ लोगों ने पूर्णत: शोधपरक व तथ्यात्मक आलेख को हिंदू-मुस्लिम नजरिये से देखा तो बहुत दुख हुआ। किसी को गलतफहमी हुई होगी तो कुछ ने जानबूझ कर विषय में गंदगी डालने की कोशिश की। चूंकि मेरे विषय में कहीं भी ऐसा विचार नहीं, जो गलतफहमी पैदा करता हो, इस कारण मुझे न तो कोई अफसोस है और न ही स्पष्टीकरण देने की जरूरत है। अभी जो पंक्तियां लिख रहा हूं, वे कोई स्पष्टीकरण नहीं है। यह एक दर्द है, जिसने पंक्तियों का आकार ले लिया है। दर्द ये कि लोग अपने दिमाग का इस्तेमाल किए बिना कैसे टिप्पणियां करते हैं? साथ ही लोग कैसे अपने दिमाग का इस्तेमाल केवल इसीलिए करते हैं कि किस प्रकार किसी विषय को हिंदू-मुस्लिम किया जाए। मुझे उनकी बुद्धि पर तरस आता है। होना तो यह चाहिए था कि आप मुझे शाबाशी देते कि मैने शोध करके एक जानकारीपूर्ण आलेख लिखा, मगर आपने उलटे मुझे व्यक्तिगत रूप से टारगेट करने की कोशिश की। मेरा विनम्र आग्रह है कि आप एक बार फिर तटस्थ भाव से पूरे आलेख को पढ़ें। किसी के बारे में बिना सोचे-विचारे या बिना उसके बारे में जाने कोई धारणा बनाने या टिप्पणी करने को कत्तई सही नहीं ठहराया जा सकता। अव्वल तो आलेख में ऐसा कुछ नहीं, जैसा आप सोच रहे हैं, दूसरा ये कि आप पहले पता तो करें कि जिसके बारे में आप टिप्पणी कर रहे हैं, उसका पूरा जीवन व पृष्ठभूमि कैसी रही है?

खैर, ताजा वाकये के बाद ऐसा लगता है कि कोई भी पोस्ट सार्वजनिक मंच पर प्रस्तुत करनी ही नहीं चाहिए, क्योंकि कुछ जाहिल लोग उसका सत्यानाश कर देंगे। नतीजतन हम जिस विषय को आम जन तक पेश करने की कोशिश कर रहे हैं, उसका मकसद ही भटक जाएगा। कुछ साल पहले जब मैने फेसबुक अकाउंट खोला था तो कुछ अनुभवी व संभ्रांत महानुभाव ने कहा था कि उन्होंने कहा कि उन्होंने अपना अकाउंट या तो बंद कर रखा है, या फिर बहुत जरूरी या सूचनात्मक पोस्ट ही डाला करते हैं, क्योंकि इस खुले मंच पर कोई भी आ कर गंदगी कर जाता है। आज मुझे उनकी बात अक्षरश: सही दिखाई दे रही है।


-तेजवानी गिरधर

7742067000

tejwanig@gmail.com 

मंगलवार, 16 मार्च 2021

माताश्री को हुआ था मृत्यु का पूर्वाभास


मृत्यु का पूर्वाभास होने की अनेक घटनाएं आपने सुनी होंगी। कुछ पूर्ण सत्य हो सकती हैं तो कुछ आंशिक सत्य। कोई ऐसी घटनाओं को मात्र संयोग मानते हैं तो कोई वास्तविक। मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना।

हाल ही मेरी माताश्री का देहावसान हो गया। उन्होंने पिछले दिनों जिस तरह के संकेत दिए, वे ऐसा आभास देते हैं कि मृत्यु का पूर्वाभास होता है। उन्होंने पिछले कुछ माह के दौरान अपने पास जो भी जमा राशि थी, वह सब अपनी औलादों व उनके बेटे-बेटियों को बांट दी। कदाचित उन्हें पूर्वाभास था कि चंद माह में उनका निधन हो जाएगा, इसलिए जीते-जी जमा राशि बांट दी जाए। मृत्यु से तीन दिन पहले उन्होंने एक सपने का जिक्र किया था। वो यह कि उन्होंने सपने में देखा है कि मेरे पिताश्री ने स्नेहपूर्वक उनके कंधे पर हाथ रखा। इस पर उन्होंने उन्हें टोका कि यह क्या कर रहे हो, सामने ही बेटा खड़ा है। पिताश्री ने कहा कि कोई बात नहीं। उन्होंने बताया कि आज भले ही पति-पत्नि आपस में चिपक कर खड़े हो जाते हैं, पति-पत्नि एक दूसरे के कंधे पर हाथ रख कर फोटो खिंचवाते हैं और उसे फेसबुक तक पर सार्वजनिक कर देते हैं, मगर पुराने समय में ऐसा कत्तई नहीं किया जाता था। न तो ऐसी मुद्रा में अपनी संतान के सामने खड़े होते थे और न ही माता-पिता के सामने।

खैर, उन्होंने सपने में दिखाई दिए जिस प्रसंग का जिक्र किया, वह इस बात का संकेत था कि जल्द ही वे प्रस्थान करने वाली हैं। इस प्रकार का हवाला शास्त्रों में भी आया है कि यदि आपका कोई बहुत निकट संबंधी सपने में आपके बिलकुल करीब आ जाए तो उसका अर्थ ये होता है कि देह त्यागने और उसके साथ जाने का समय आ गया है। मुझे नहीं पता कि उन्होंने सपने का जिक्र इस तथ्य को जानते हुए किया अथवा सहज भाव से, मगर शास्त्रानुसार उन्होंने इशारा कर दिया था कि अब वे छोड़ कर जाने वाली हैं। वैसे वे पहले भी कई बार पिताश्री के सपने में आने का जिक्र करती रहीं। कई बार कहा कि पिताश्री को अमुक चीज खाने की इच्छा है। हम उनकी सपने की बात सुन कर वह चीज बना कर कन्या अथवा गाय को खिला दिया करते थे। पिताश्री उन्हें परिवार में कोई शुभ कार्य होने की भी पूर्व सूचना दिया करते थे।

एक और महत्वपूर्ण बात। वे मृत्यु से एक दिन पूर्व पूर्ण स्वस्थ थीं। खुद का सारा काम खुद ही किया। रात में उनक तबियत कुछ खराब हुई। तकरीबन साढ़े तीन बजे उन्होंने भूख लगने की बात कही। मैंने उन्हें उनकी पसंदीदा खिचड़ी व दही खाने को दी। उन्होंने बाकायदा पालथी मार कर थाली में चम्मच से उसे पूरा खाया। उसके बाद दो-तीन बार पानी भी मांगा। सुबह तबियत ज्यादा खराब होने पर उन्हें अस्पताल ले गए, जहां ऑक्सीजन लेवल कम होने के कारण उनका निधन हो गया। इसका जिक्र मैने अपने मित्र वरिष्ठ पत्रकार श्री सुरेश कासलीवाल से किया तो उन्होंने कहा कि आपको उनके खाना मांगने पर ही समझ जाना चाहिए था। इस सिलसिले में उन्होंने अपने पिताश्री व अन्य के अनेक प्रसंगों का जिक्र किया। इस बारे में अन्य जानकारों से पूछा तो उन्होंने भी यह बताया कि शुद्धत्माएं खाली पेट देह नहीं छोड़तीं। अर्थात तृप्त हो कर ही प्रस्थान करती हैं।

बहरहाल, इन चंद घटनाओं से मुझे ये आभास होता है कि मृत्यु से पूर्व उसका आभास होता है, किसी को कम, किसी को ज्यादा।


-तेजवानी गिरधर

7742067000

tejwanig@gmail.com

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

खबर में संक्षिप्तिकरण के मास्टर थे स्वर्गीय श्री श्याम सुंदर शर्मा


हाल ही प्रदेश के जाने-माने पत्रकार श्री श्याम सुंदर शर्मा का निधन हो गया। मूलत: बीकानेर निवासी श्री शर्मा ने बीकानेर में तो लंबे समय तक पत्रकारिता की ही, दैनिक भास्कर के जयपुर संस्करण में काफी समय तक काम किया। वे अलवर संस्करण के स्थानीय संपादक भी रहे। 

संपादक शब्द के सीधे-सीधे मायने हैं, जो संपादन करता है। सारे संपादक यही करते हैं, लेकिन संपादन की बारीक पराकाष्ठा के दर्शन मैंने उनमें किए। हालांकि वे मुझ से बहुत अधिक सीनियर नहीं थे, मगर जब मेरा तबादला जयपुर हुआ तो मुझे उनके साथ राजस्थान पेज पर काम करने का सौभाग्य मिला। जब तक मैं अजमेर में रहा, मुझे भ्रम था कि संपादन में मैं पूर्णत: पारंगत हूं, मगर जयपुर में श्री शर्मा के साथ काम करने से अहसास हुआ कि संपादन के बारे में मैं जितना जानता हूं, उससे भी कहीं ज्यादा सीखना बाकी है। वस्तुत: संपादन में संक्षिप्तिकरण की विधा मैंने उनसे सीखी। किसी खबर को कितना कम से कम शब्दों में लिखा जा सकता है कि उसका कंटेंट भी प्रभावित न हो, मैंने यह उनसे जाना। 

असल में होता ये था कि राजस्थान पेज पर संपादक की ओर से जितनी खबरें असाइन की जाती थीं, उन्हें लगाना संभव ही नहीं था, चूंकि विज्ञापन भी पर्याप्त मात्रा में हुआ करते थे। दिलचस्प बात ये है कि विज्ञापन युक्त पेज की डमी ऐन वक्त पर मिलती थी और सीमित समय में असाइन्ड खबरें उस पर लगानी होती थीं। स्वाभाविक रूप से खबरों का संक्षिप्तिकरण जरूरी हो जाता था, वह भी फटाफट। नियत समय पर एडीशन जारी करने  के लिए बहुत ही तेज गति से सारी खबरें पूरी पढ़ कर उनको संक्षिप्त करना होता था। यदि खबरों को पूरा न पढ़ते तो संक्षिप्तिकरण के दौरान आवश्यक कंटेंट कट जाने का खतरा रहता था। खबर में से गैर जरूरी कंटेंट, अनावश्यक वाक्य व फालतू शब्द काटना वाकई कठिन, मगर दिलचस्प था। एक चुनौती सी थी। बेशक एक से एक बढ़ कर निष्णात संपादक हैं पत्रकार जगत में, मगर मैंने संक्षिप्तिकरण की विधा के जो दर्शन श्री शर्मा में किए, वह अन्य किसी में नजर नहीं आए। उन से मिल कर लगा कि अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है। मैने जल्द ही काम समझ लिया और उनकी ही इंचार्जशिप में स्वंतत्र रूप से करना आरंभ कर दिया। वे मुझ से बहुत प्रसन्न थे। स्थिति ये हो गई कि सारा का सारा काम मैं अकेले ही करने लगा गया। इस पर उन्होंने कहा कि आपने तो मुझे निठल्ला ही कर दिया है। जब मैने भास्कर से इस्तीफा दिया, तो उनकी प्रतिक्रिया ये थी कि आपने तो मुझे आलसी बना दिया, मेरी आदत खराब कर दी, आपके जाने के बाद अब मुझे फिर से लग कर काम करना पड़ेगा। यह मेरे लिए बहुत सुखद कॉम्प्लीमेंट था। कुछ इसी प्रकार का कॉम्प्लीमेंट एक बार दैनिक न्याय के भूतपूर्व प्रधान संपादक स्वर्गीय श्री विश्वदेह शर्मा ने भी दिया कि तुम इतना डूब कर काम करते हो कि तुम्हारा सीनियर निठल्ला हो जाता है।

खैर, हालांकि श्याम जी के साथ मैने कोई ज्यादा समय तक काम नहीं किया, क्योंकि बीच में सिटी के पेजों पर भी लगया गया, मगर उनके साथ रह कर जो कुछ नया सीखा, वह बहुत सुखद रहा। खबर में संक्षिप्तिकरण की बारीक विधा, जो मैंने उनसे सीखी, उसका ऋण कभी नहीं चुका पाऊंगा। अब तो वे इस फानी दुनिया में भी नहीं रहे। यदि उस विधा को नए पत्रकारों को सिखाने का कभी मौका मिला तो समझूंगा कि वह ऋण मैंने चुका दिया है। कभी अवसर मिला तो किसी अखबार की कोई खबर उठा कर उसे संक्षिप्त करने का डेमो जरूर प्रस्तुत करूंगा। 

यह तो हुई संपादन की बात। अब जरा उनके व्यक्तित्व के बारे में। वे सुसंस्कृत ब्राह्मण परिवार से थे। अत्यंत सहज, सरल, मिलनसार, कोमल हृदय, विद्वान और मर्यादित। इतने सारे गुण एक साथ किसी व्यक्ति में होना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल जरूर हैं। ऐसे पारंगत संपादक व चुंबकीय व्यक्तित्व को मेरा प्रणाम, अश्रुपूरित श्रद्धांजलि।

बीकानेर से प्रकाशित थार एक्सप्रेस में उनके बारे जानकारी छपी है, साझा किए देता हूं।

बीकानेर के वरिष्ठ पत्रकार श्याम शर्मा का कोरोना से जयपुर में निधन हो गया। उनकी पुत्री ने बताया कि वे पिछले कुछ दिन से कोरोना से पीडि़त थे और जयपुर के अस्पताल में भर्ती थे। पिछले कुछ महीनों से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के कार्यालय में कार्यरत थे। बीकानेर में दोनों बड़े समाचार पत्रों की  शुरुआत के समय साथ थे। चार दशक पूर्व राजस्थान पत्रिका से अपना कैरियर प्रारम्भ करके श्याम शर्मा तीन वर्ष पूर्व  ही दैनिक भास्कर से रिटायर होकर बीकानेर आ गए थे। बीकानेर आने के बाद पुन: पंजाब केसरी से जुड़ गए थे। कुछ माह बाद ही मुख्यमंत्री के कार्यालय में जनसंपर्क का कार्य शुरू किया था। उन्होंने पत्रकारिता में रहते हुए राजस्थान पत्रिका, पंजाब केसरी, दैनिक नवज्योति, दैनिक भास्कर व बीकानेर से प्रकाशित एक सांध्य दैनिक  में काम किया था। बीकानेर में जार के अध्यक्ष पद पर रह कर पत्रकारों को एकजुट करने का प्रयास किया। पिछले वर्ष  में  जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ राजस्थान (जार) को पुनस्र्थापित करने में बड़ा योगदान रहा। श्याम शर्मा ने पिछले साल संपन्न बीकानेर प्रेस क्लब के चुनाव में भी महत्ती भूमिका निभाई थी।

-तेजवानी गिरधर

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tejwanig@gmail.com

सोमवार, 14 सितंबर 2020

फेसबुक पर लड़कियों ने बना रखा है लूट का धंधा

शातिर लड़कियों ने फेसबुक व अन्य सोशल साइट्स पर लूट का धंधा बना रखा है। हालांकि इस बारे में फेसबुक एडमिनिस्ट्रेशन सजग है, फिर भी उन पर पूरी तरह से अंकुश नहीं लगाया जा सका है। होता ये है कि ये लड़कियां किसी को भी फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजती हैं। ओके होने पर सीधे उसके मेसेंजर पर आ जाती हैं और हाय-हेलो के बाद उसकी उम्र पूछती हैं। वैवाहिक स्थिति की जानकारी मांगती हैं। स्वाभाविक रूप से लड़के उनकी ओर आकर्षित होते हैं, जैसा कि लड़कों का स्वभाव होता है। लड़का पटता देख, कोई न कोई डिमांड रख देती हैं। जैसे मोबाइल का रिजार्च करवाने, मोबाइल देने अथवा माली हालत खराब बता कर सीधे बैंक अकाउंट में रुपए डालने को कहती हैं। मनचले लड़के उनके झांसे में आ जाते हैं। वसूली के बाद लड़कियां अपना अकाउंट बंद कर देती हैं। ऐसा नहीं है कि केवल लड़कियां ही ऐसा करती हैं, बल्कि कई लड़के भी लड़की के नाम से अकाउंट बना कर ये धंधा कर रहे हैं। वस्तुत: फेसबुक एडमिन बहुत सतर्क हैं, फिर भी उस पर अनेकानेक फर्जी अकाउंट बने हुए हैं। एक-एक आदमी के पांच-पांच अकाउंट हैं। वे उन्हें मैंटेन भी नहीं कर पाते, मगर अकाउंट जारी रखे हुए हैं। दिलचस्प बात ये है कि कई लड़कियों ने लड़कों के नाम से अकाउंट बना रखे हैं और वे लड़कों से ठिठोली करते हैं। विदेशी महिलाओं का तो पूरा रैकेट है। रोचक बात ये है कि उन्होंने अपने आधे नाम भारतीय रख रखे हैं। वे कनेक्ट तो फेसबुक पर होती हैं, मगर मेसेंजर में अनुरोध करती हैं कि उनकी ईमेल आईडी अथवा वाट्स ऐप पर आएं। वहां वे खुद के इकलौते होने व पिता के निधन के बाद लाखों रुपए होने की जानकारी देती हैं। अपने खूबसूरत मुद्रााओं के फोटोज भी भेजती हैं। साथ ही बताती हैं कि अगर उनका साथ दें तो भारत में आ कर रहेंगी व सारा रुपया उनके खाते में डलवा देंगी। एक-दो मामलों में मैने जर्नलिस्टिक अप्रोच के नाते तह में जाने की कोशिश की है। होता ये है कि बात आगे बढऩे पर कोई विदेशी बैंक ईमेल भेजता है व भारतीय बैंक की डिटेल मांगता है। साथ ही पूरा पैसा ट्रांसफर करने के लिए निर्धारित अग्रिम राशि भेजने को कहते हैं। अगर कोई बंदा झांसे में आ गया तो वह रुपए भेज देता है, मगर उसका वह रुपया डूब जाता है। ऐसे अनेक प्रकरण पब्लिक डोमेन भी हैं। मैने गूगल पर भी सर्च किया तो पाया कि वाकई यह माफिया गिरोहों का काम है। कुछ लोगों ने तो अपने साथ हुई चोट का भी पूरा ब्यौरा दे रखा है। धन की लूट के अतिरिक्त सैक्स रैकेट का भी जाल बिखरा पड़ा है। होमो सैक्स करने वाले लड़के भी साथी की तलाश के लिए फेसबुक का इस्तेमाल कर रहे हैं। कई लड़के मसाज के नाम पर झांसा देने की कोशिश करते हैं। फेसबुक पर फर्जीवाड़े की ऐसी ही बहुत सी जानकारियां मुझे इस कारण मिल पाई क्योंकि मुझे अपनी वेबसाइट को प्रमोट करने के लिए अधिक से अधिक फें्रडशिप करने का लालच रहता है। जैसे ही कोई रिक्वेस्ट आती है, बिना देखे मैं मंजूर कर लेता हूं। दो फेसबुक अकाउंट्स में पांच-पांच हजार मित्र हैं। इन दस हजार में ऐसे अनेक प्रसंग आए। यह बात दीगर है कि मैं तुरंत भांप जाता हूं और ब्लॉक कर देता हूं। फरेब से बचने के लिए होना ये चाहिए कि जब भी कोई आपको रिक्वेस्ट भेजे, तो पहले उसका स्टेटस चैक करें। आपके अनुकूल हो तभी रिक्वेस्ट ओके करें। इससे कम से कम धोखे होंगे। -तेजवानी गिरधर 7742067000 tejwanig@gmail.com

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस शब्द उपयुक्त नहीं है?

इन दिनों आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का बोलबाला है। हर क्षेत्र में इसका उपयोग किया जा रहा है। यकायक ख्याल आया कि क्या आर्टिफिशियल षब्द उपयुक्त है...