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मंगलवार, 11 मई 2021

हिंदू धर्म में छिपकली लक्ष्मी का प्रतीक तो इस्लाम में दुश्मन नंबर वन


यह एक अजीबोगरीब तथ्य है कि छिपकली जहां हिंदू धर्म में लक्ष्मी का प्रतीक मानी जाती है, तो वहीं इस्लाम में उसे इंसान का दुश्मन नंबर वन माना जाता है। विशेष रूप से दीपावली के दिन घर में छिपकली दिखाई दे जाए तो समझा जाता है कि लक्ष्मी आने वाली है। इसके विपरीत हदीस में उसे देखते ही मान डालने का हुक्म है।

आइये, पहले हिंदू मान्यता की बात करते हैं। हिंदू शास्त्रों में प्रचलित शकुन शास्त्र के अनुसार छिपकली का किसी विशेष समय पर दिखना, जमीन पर या शरीर पर गिरना भविष्य की शुभ-अशुभ घटनाओं का संकेत होता है। इसके अलावा छिपकली शरीर के किस खास हिस्से पर गिरी है, इससे भी भविष्य की शुभ-अशुभता जुड़ी होती है। शास्त्रों के अनुसार छिपकली यदि दीपावली की रात घर में दिखाई दे जाए तो इसे लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि उसके आने से वर्षों के लिए वह घर सुख-समृद्धि को प्राप्त कर लेता है। इसीलिए उसे पूजनीय प्राणी माना जाता है। इसका पूजन करने से धन संबंधी समस्याओं का अंत हो जाता है। इसके लिए एक टोटका भी है। आपको घर में दीवार पर छिपकली दिखे तो तुरंत मंदिर में रखा कंकू-चावल ले आएं और इसे दूर से ही छिपकली पर छिड़क दें। ऐसा करते हुए अपने मन की मुराद पूरी हो जाती है। मान्यता ये भी है कि दीपावली के दौरान मरी हुई छिपकली आपके सामने आ जाए तो ये एक अशुभ संकेत माना जाता है। सफाई करते हुए यदि कोई छिपकली या उसका बच्चा मर जाए तो तुरंत उसका संस्कार कर दें। इससे आप हत्या के पाप से बच जाएंगे और मां लक्ष्मी भी नाराज नहीं होगीं। यदि आपको छिपकली का बोलना सुनाई दे तो समझ जाइएगा कि आपको कोई शुभ समाचार सुनाई देने वाला है। छिपकली के विभिन्न अंगों पर गिरने के भिन्न-भिन्न प्रतिफल भी बताए जाते हैं। उस पर चर्चा फिर कभी।

अब बात करत हैं कि इस्लाम छिपकली को किस रूप में देखता है। हदीस में बताया गया है कि जैसे ही घर में छिपकली दिखाई दे तो उसे तुरंत मार डालें। इससे हजारों नेकियां मिलेंगी। अगर पहली बार में नहीं मारा और दुबारा दिखाई देने पर मारा तो कुछ कम नेकी मिलेगी। इसी प्रकार दूसरी बार न मारने व तीसरी बार देखने पर मारा तो और कम नेकी मिलेगी।

इस्लाम के जानकार एक प्रसंग बताते हैं। वो यह कि जब हजरत इब्राहिम अलेहइस्लाम को आग में डाला जा रहा था तो जमीन के जितने भी जीव-जंतु थे वे उनको बचाने के लिए दौड़ पड़े थे, जबकि अकेली छिपकली बचाने की बजाय फूंक मार कर आग को और तेज करने की कोशिश कर रही थी। जो प्राणी हजरत इब्राहिम का दुश्मन हो, वह इंसान का भी दुश्मन ही कहलाएगा।  मान्यता ये भी है कि छिपकली ने शैतान को वादा किया था कि वह इंसान को दुख पहुंचाएगी। छिपकली के खून को नापाक भी बताया गया है।

कुल मिला कर यह तथ्य वाकई अजीबोगरीब व विरोधाभासी है कि अलग- अलग धर्म में छिपकली को भिन्न-भिन्न रूप में देखा जाता है। हिंदू धर्म उसकी पूजा करने की सलाह देता है तो इस्लाम उसे तुरंत मार देने का हुक्म देता है।

-तेजवानी गिरधर

7742067000

tejwanig@gmail.com 

मंगलवार, 27 अप्रैल 2021

रोंगटे क्यों खड़े होते हैं?


आपने कई बार महसूस किया होगा कि अचानक भय, उत्साह, खुशी या भावुकता की तीव्र अवस्था में आपके हाथ-पैरों के बाल खड़े हो जाते हैं। इसे रोंगटे खड़ा होना कहते हैं। अचानक ठंड लगने पर भी हाथ व पैर के बाल खड़े हो जाते हैं। हमारी तरह जानवरों के बाल भी खड़े होते हैं, जो साफ दिखाई देते हैं। उसकी वजह ये है कि उनके बालों का घनत्व अधिक होता है। आपने अचानक संकट आने पर बिल्ली के पूरे शरीर के बाल खड़े हो जाते हैं।

सवाल ये उठता है कि आखिर ऐसा होता क्यों है? वस्तुत: रोंगटे खड़े होने का सीधा संबंध हमारे स्नायु तंत्र है। जब भी हम किसी घटना की वजह से अति संवेदित होते हैं तो उसका सीधा असर स्नायु तंत्र पर पड़ता है। अर्थात जो व्यक्ति जितना संवेदनशील होगा, उसका स्नायु तंत्र भी उतना ही सक्रिय होगा। अचानक किसी कारण से भयभीत होने, संगीत के सुर गहरे तक छू जाने, यकायक खुशी मिलने, किसी वजह से अचानक उत्साहित होने पर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। यानि कि संवेदना की अतिरेक अवस्था में स्नायु तंत्र प्रभावित होता है और त्वचा की निचली सतह में हलचल होती है। विज्ञान की भाषा में समझें तो स्नायु तंत्र सक्रिय होने पर त्वचा के नीचे हेयर फॉलिकल्स पर असर पड़ता ओर उनमें संकुचन होता है। ऐसा होते ही बाल खड़े हो जाते हैं। इसको पाइलोरेक्शन कहा जाता है। 

जरा और गहरे से समझने की कोशिश करते हैं। यकायक खतरा या भय महसूस होता है तो हमारा स्नायु तंत्र उससे निपटने के लिए तैयार हो जाता है। इस दौरान दिल की धड़कन बढ़ जाती है, पसीना आता है और रोंगटे खड़े हो जाते हैं। भीतर का मौलिक मानव जाग जाता है। कुछ जानकारों का मानना है कि रोंगटे इसलिए खड़े होते हैं, ताकि हम संभावित खतरे के सामने बड़े नजर आएं। ये ठीक उस बिल्ली की तरह होता है, जो भय या गुस्से की अवस्था में बड़ी नजर आती है, क्योंकि उसके पूरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

संगीत सुनने के दौरान उसकी विशेष स्वर लहरी अथवा शब्दावली दिल को छू जाती है तो रोम-रोम खड़ा हो जाता है। इसे शरीर विज्ञानियों ने इस तरह से अभिव्यक्त किया है। वे कहते हैं कि दिमाग के दो भाग होते हैं। पहला इमोशनल और दूसरा कॉग्निटिव। इमोशनल भाग अपेक्षाकृत अधिक तेजी से प्रतिक्रिया देता है। वो किसी संगीत को शोर समझता है और रोंगटे खड़े कर सकता है, जबकि कॉग्निटिव भाग संगीत में मौजूद ध्वनि और संगीत को समझ कर हमें अच्छा महसूस कराता है। इस दौरान ऐड्रेनलिन हॉर्मोन के रिलीज होने के कारण आंसू भी आ जाते हैं।  

अचानक ठंड लगने पर रोंगटे खड़े होने के बारे में बताया गया है कि इसका मूल उद्देश्य शरीर को गर्म रखने में मदद करना होता है। जब आपको ठंड लगती है तो रोम छिद्रों के आसपास की मांसपेशियों में संकुचन होता है और रोम खड़े हो जाते हैं। स्नायु तंत्र के सक्रिय होते ही ठंड से मुकाबले के लिए गरमाहट पैदा हो जाती है।


-तेजवानी गिरधर

7742067000

tejwanig@gmail.com

सोमवार, 8 मार्च 2021

आदमी से ज्यादा जीव-जंतु समझते हैं प्रकृति के इशारों को


इसमें कोई दोराय नहीं कि आदमी का दिमाग सुपर कंप्यूटर है। उसी सुपर कंप्यूटर ने अद्भुत वैज्ञानिक अविष्कार किए हैं। प्रकृति के संकेतों को समझने के लिए कई उपकरण भी बनाए हैं। बारिश का पूर्वानुमान लगाने के लिए यंत्र बनाए हैं, मगर वे भी कई बार विफल हो जाते हैं। दूसरी ओर मंद बुद्धि जीव-जंतु प्रकृति के इशारों को आदमी से बेहतर समझते हैं। वस्तुत: प्रकृति ने उन्हें विशेष क्षमता दी है।

आप देखिए हवाई मखलूकात या भूत-प्रेत की मौजूदगी का अहसास आम आदमी को नहीं हो पाता। कदाचित कुछ लोगों को हो भी सकता होगा, लेकिन जानवरों को तो हवाई मखलूकात बाकायदा नजर आती हैं। यह सर्वविदित मान्यता है कि भूत-प्रेत दिखाई देने पर कुत्ता रात में भौंकने लगता है। यदि किसी की मौत सन्निकट हो तो कुत्ते को यमदूत नजर आते हैं और वह उसके घर के बाहर जोर से रोना शुरू कर देता है।

अन्य पशु-पक्षियों को भी प्रकृति के संकेत समझ में आते हैं। यह पुरानी मान्यता है कि कौआ छत की मुंडेर पर कांव-कांव करे तो वह मेहमान के आने का इशारा होता है। इसी प्रकार चिडिय़ा अगर धूल में नहाए तो उसे बारिश के आने का संकेत माना जाता है। यह वैज्ञानिक तथ्य ही है कि बारिश के आगमन से पहले चींटियों सहित अन्य जंतु ऊंचे स्थान पर अपने अंडे शिफ्ट करते हैं। इसी प्रकार मोर भी बारिश के आगमन की पूर्व सूचना देते हैं। नक्षत्र भी बारिश के बारे में संकेत दिया करते हैं। जैसे अगस्त्य नामक तारे का उदय हो तो मान लीजिए कि बारिश समाप्त होने वाली है। कहावत है- अगस्त ऊगा, मेह पूगा। इसी कड़ी में कहावत है कि जे मंडे तो धार न खंडे, अर्थात यदि बारिश फिर भी हो जाए तो मान कर चलिए कि बारिश जम कर होगी, थमेगी ही नहीं।

अकाल पडऩे के बारे में नक्षत्र संकेत देते हैं, वो यह कि अक्षय तृतीया पर रोहणी नक्षत्र न हो, रक्षाबंधन पर श्रवण नक्षत्र न हो और पौष की पूर्णिमा पर मूल नक्षत्र न हो तो अनावृष्टि की आशंका होती है। इसको लेकर कहावत है- अक्खा रोहण बायरी, राखी सरबन न होय। पो ही मूल न होय तो, म्ही डूलंती जोय।

मान्यता ये भी है कि आप कहीं जा रहे हैं और अचानक बिल्ली रास्ता काट जाए तो किसी अनिष्ट का सूचक माना जाता है। इसी कारण लोग कुछ समय रुक कर फिर रवाना होते हैं ताकि अनिष्ट के पल टल जाएं।

यदि गिरगिट पेड़ पर उल्टा होकर अर्थात पूंछ ऊपर की ओर करके चढ़े तो समझना चाहिए कि इतनी वर्षा होगी कि पृथ्वी पानी में डूब जाएगी। इसकी कहावत है - उलटे गिरगिट ऊँचे चढै। बरखा होइ भूइं जल बुडै।।

एक कहावत है- अम्मर रातो, मेह मातो, यानि कि अगर आसमान में लालिमा हो तो समझिये बारिश जोरदार पडऩे वाली है। इसी क्रम में कहते हैं- अम्मर हरियो, चूव टपरियो। अर्थात आसमान में हरीतिमा दिखाई दे तो वह सामान्य बारिश होने का संकेत है।

ऐसी मान्यता है कि यदि तीतर के पंख बादल जैसे रंग के हो जाएं तो पक्का जानिये कि बारिश होगी ही, जिसमें कोई संदेह नहीं है। इसकी कहावत है:- तीतर पंखी बादळी, विधवा काजळ रेख, बा बरसै बा घर करै, ई में मीन न मेख। यदि रात में विचरण करते वक्त ऊंटनी को आलस्य आए या वह ऊंघने लगे तो इसका मतलब है कि बारिश की उम्मीद है। एक कहावत है कि अत तरणावै तीतरी, लक्खारी कुरलेह। सारस डूंगर भमै, जदअत जोरे मेह। इसका अर्थ है कि तीतरी जोर से आवाज करे, लक्कारी कुरलाए, सारस ऊंचे स्थान का चयन करे तो तेज बारिश आ सकती है।

इसी प्रकार कहते हैं कि बारिश के मौसम में लोमड़ी ऊंचे स्थान पर खड्डा खोद कर अपना विश्राम स्थल बनाए और उछल-कूद करे तो समझिये अच्छी बारिश होगी। इसकी कहावत है- धुर बरसालै लूंकड़ी, ऊंची घुरी खिणन्त। भेळी होय ज खेल करै, तो जलधर अति बरसन्त।

ऊंटनी भी बारिश का संकेत जमीन पर पैर पटक कर, एक स्थान पर न टिक कर और बैठने से आनाकानी करके यह संकेत देती है कि बारिश जरूर आएगी। इसकी कहावत है- आगम सूझे सांढणी, दौड़े थळा अपार। पग पटकै बैसे नहीं, जद मेह आवणहार।

यूं आदमी में भी प्रकृति के कुछ संकेत पकडऩे की क्षमता होती है। जैसे कहीं जाते वक्त अचानक छींक आ जाए तो उसे अनिष्टकारी माना जाता है और कुछ पल ठहर कर यात्रा आरंभ की जाती है। इसी प्रकार यदि बच्चा झाड़ू लगाए तो माना जाता है कि कोई मेहमान आने वाला है।

ऐसी मान्यता है कि जब हम किसी महत्वपूर्ण कार्य के लिए निकलते हैं तो शव यात्रा, झाडू़ लगाती महिला सफाई कर्मचारी, पानी का घड़ा भर कर लाती महिला आदि के सामने आने को शुभ माना जाता है। अर्थात जिस कार्य के लिए हम जा रहे हैं, उसके संपन्न होने की पूरी संभावना होती है। ठीक इसके विपरीत विधवा महिला, धोबी या स्वर्णकार का सामना होने सहित अन्य कई दृश्य निर्मित होने को अच्छा नहीं माना जाता। यानि कि हमने अनुभव के आधार पर प्रकृति के संकेतों को समझने की कोशिश की है। कई लोग आसमान में वायु व बादलों की हरकतों से यह बता देते हैं कि इस बार बारिश कब आएगी और कितनी आएगी। 

लब्बोलुआब, प्रकृति बहुत रहस्यपूर्ण है और उसके इशारों को समझने में पशु-पक्षी हमसे कहीं अधिक सक्षम हैं।


-तेजवानी गिरधर

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tejwanig@gmail.com

सोमवार, 22 फ़रवरी 2021

बहुत रहस्यपूर्ण है चालीस का अंक


यूं तो हर अंक का अपना महत्व है, लेकिन विशेष रूप से प्रकृति और अध्यात्म में चालीस के अंक की बहुत अधिक अहमियत है। चाहे हिंदू हो या मुसलमान, या फिर ईसाई धर्म, सभी में चालीस का खास योगदान है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि कहीं न कहीं प्रकृति में चालीस का अंक कोई गूढ़ रहस्य लिए हुए है। इसीलिए सभी धर्मों ने इसका उपयोग किया है।

इस्लाम की बात करें तो यह सर्वविदित है कि इबादत चालीस दिन की जाती है। ज्ञातव्य है कि महान सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती जब अजमेर आए तो आनासागर के पास स्थित पहाड़ी पर 40 दिन का चिल्ला किया था। यहां से इबादत करने के बाद जब ख्वाजा साहब ने दरगाह शरीफ वाले स्थान की ओर जाने लगे तो कहते हैं कि उनकी जुदाई में पहाड़ के भी आंसू छलक पड़े थे। उसके निशान आज भी मौजूद हैं। क़ुरआन साफ़-साफ़ बयान करता है कि रोज़ा पिछली उम्मतों पर भी वाजिब था। रोज़ा रखने के कई फायदे हैं। कुरआन में ही अल्लाह फरमाते हैं कि रोज़ा इंसानी रूह को मजबूत करता है।

इसी प्रकार इमाम हुसैन की शहादत पर मुसलमान 40 दिन तक शोक मनाते हैं। जानकार बताते हैं कि हमारे पेट में एक निवाला भी हराम का हो तो चालीस दिन तक इबादत कबूल नहीं होती। चालीस दिन का खेल देखिए कि जो जगह लगातार चालीस दिन सुनसान होती है या आबाद नहीं होती तो वहां पर हवाई मखलूक या प्रेत-आत्माएं डेरा जमा लेती हैं। इसीलिए जिस स्थान का उपयोग नहीं हो रहा होता है, तो भी वहां नियमित रूप से दिया-बत्ती की जाती है। 

चालीस की संख्या का बाइबिल में भी बहुत महत्व है। कहते हैं कि चालीस की संख्या न्याय या परीक्षा से सम्बन्धित सन्दर्भों में अक्सर पाई जाती है, जिसके कारण कई विद्वान इसे परख या परीक्षा की संख्या भी समझते हैं।

बाइबिल के पुराने नियम में जब परमेश्वर ने पृथ्वी को जल प्रलय से नष्ट कर दिया, तो उसने 40 दिन और 40 रात तक वर्षा को आने दिया। मूसा के द्वारा मिस्री को मार कर मिद्यान भाग जाने के पश्चात मूसा ने 40 साल तक रेगिस्तान में पशुओं के झुंड की रखवाली में बिताए थे। मूसा 40 दिन और 40 रात तक सीनै की पहाड़ी पर थे। मूसा ने 40 दिन और 40 रात तक इस्राइलियों की ओर से परमेश्वर के आगे हस्तक्षेप करने के लिए विनती की।

एक व्यक्ति को एक अपराध के लिए प्राप्त होने वाले कोड़ों की अधिकतम संख्या चालीस निर्धारित थी। इसी प्रकार इस्राइल के जासूसों को कनान की जासूसी करने में 40 दिन लगे थे। इस्राएली 40 साल तक जंगल में भटकते रहे। 

नए नियम में, यीशु की परीक्षा 40 दिन और 40 रात तक की गई थी। यीशु के पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण के बीच 40 दिन थे।

हिंदू धर्म की बात करें तो सिंधी समुदाय इष्टदेव झूलेलाल जी की उपासना भी चालीस दिन तक की जाती है। इसे चालीहो कहा जाता है। इस दौरान लगातार चालीस दिन तक व्रत-उपवास रख कर पूजा-अर्चना के साथ सुबह-शाम झूलेलाल कथा का श्रवण किया जाता है। इन दिनों में खास तौर पर मंदिर में जल रही अखंड ज्योति की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और प्रति शुक्रवार को भगवान का अभिषेक और आरती की जाती है। चालीसवें की रस्म कई समुदायों में अदा की जाती है। कुछ लोगों की मान्यता है कि कोई भी मृतात्मा मृत्यु के चालीस दिन बाद आगे की यात्रा करती है।

चालीस का अंक कितना पवित्र और असरकारक है, इसका अंदाजा इस बात से भी लगता है कि हनुमान जी सहित सभी देवी-देवताओं की स्तुति के लिए चालीसाएं बनाई गई हैं।

हिंदू धर्म में छाया पुरुष या कृत्या की साधना और इस्लाम में हमजाद का अमल भी चालीस दिन तक किया जाता है। अनेक प्रकार की सिद्धियों में चालीस दिन तक अनुष्ठान करने का प्रावधान है।

वैज्ञानिक अवधारणा है कि वीर्य शरीर की बहुत मूल्यवान धातु है। भोजन से वीर्य बनने की प्रक्रिया बड़ी लम्बी है। जो भोजन पचता है, उसका पहले रस बनता है। पांच दिन उसका पाचन होकर रक्त बनता है। पांच दिन बाद रक्त से मांस, उसमे से 5-6 दिन बाद मेद बनता है और मेद से हड्डी, और हड्डी से मज्जा, मज्जा से अन्त में वीर्य बनता है। इस पूरी प्रक्रिया में 40 दिन का समय लगता है।

अनेक मामलों में चालीस की महत्ता को देख कर यह लगता है कि किसी भी स्थान की ऊर्जा की उम्र चालीस दिन होती है। उसके बाद वह क्षीण हो जाती है। ऊर्जा अर्जित करने के लिए भी चालीस दिन तक सतत प्रयास करना होता है। अर्थात इबादत की पूर्णाहुति चालीस दिन में होती है। अब ये चालीस का अंक कहां से आया, इस पर गहन शोध की जरूरत है।


-तेजवानी गिरधर

7742067000

tejwanig@gmail.com

मंगलवार, 19 जनवरी 2021

इस्लाम में भी है भूतों से बचाव का उपाय


जिस तरह हिंदू मतावलंबियों में भूत-पिशाच इत्यादि से बचाव के लिए हनुमान चालीसा व रामचरित मानस के सुंदर कांड का पाठ करने की परंपरा है, उसी प्रकार इस्लाम को मानने वाले भी भूत-प्रेत को दूर भगाने का उपाय करते हैं। कदाचित सभी मुस्लिमों को उस उपाय के बारे में जानकारी होगी क्योंकि मदरसे की शुरुआती तालीम में ही इसका रियाज करवाया जाता है, मगर शायद हिंदुओं को इसकी जानकारी न हो।

सर्वविदित है कि जब भी कोई शुभ काम करते हैं तो उसमें बाधा न आने के लिए कई लोग सुंदरकांड का पाठ करवाते हैं। इसी प्रकार जब भी किसी स्थान पर भय प्रतीत हो तो हनुमान चालीसा का पाठ करने की सलाह दी जाती है, ताकि वहां मौजूद दुष्टात्माएं भाग जाएं। हनुमान चालीसा में ही लिखा है कि भूत-पिशाच निकट नहीं आवे, महावीर जब नाम सुनावे। स्वाभाविक रूप से यह आम जिज्ञासा होती होगी कि मुस्लिम ऐसी स्थिति में क्या करते हैं?

इस्लाम के जानकारों का कहना है कि मखलूकात आपको कोई नुकसान न पहुंचा पाएं, इसके लिए कुरान की एक आयत का तीन बार पाठ करना चाहिए। उस आयत का नाम है आयतुल कुर्सी। उसमें दस जुमले हैं। इस्लाम के जानकार बताते हैं कि आयतुल कुर्सी कुरान की सब से अज़ीम तरीन आयत है। हदीस में रसूल स.अ. ने इसको तमाम आयात से अफजल फऱमाया है। हजऱत अबू हुरैरा र.अ. फरमाते हैं कि रसूल स.अ. ने फऱमाया - सूरह बकरा में एक आयत है, जो तमाम कुरान की आयातों की सरदार है, जिस घर में पढ़ी जाये, शैतान वहां से निकल जाता है।

स्वाभाविक रूप से वह आयत मूलत: अरबी लिपी में है। पेश है हिंदी में उसका हूबहू उच्चारण:-

1. अल्लाहु ला इलाहा इल्लाहू

2. अल हय्युल क़य्यूम

3. ला तअ खुज़ुहू सिनतुव वला नौम

4. लहू मा फिस सामावाति वमा फि़ल अजऱ्

5. मन ज़ल लज़ी यश फ़ऊ इन्दहू इल्ला बि इजनिह

6. यअलमु मा बैना अयदी हिम वमा खल्फहुम

7. वला युहीतूना बिशय इम मिन इल्मिही इल्ला बिमा शा..अ

8. वसिअ कुरसिय्यु हुस समावति वल अजऱ्

9. वला यऊ दुहू हिफ्ज़ुहुमा

10. वहुवल अलिय्युल अज़ीम


उसका तर्जुमा इस प्रकार है:-

1. अल्लाह जिसके सिवा कोई माबूद नहीं।

2. वही हमेशा जिंदा और बाकी रहने वाला है।

3. न उसको ऊंघ आती है न नींद।

4. जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है सब उसी का है।

5. कौन है जो बगैर उसकी इजाज़त के उसकी सिफारिश कर सके।

6. वो उसे भी जनता है जो मखलूकात के सामने है और उसे भी जो उन से ओझल है।

7. बन्दे उसके इल्म का जऱा भी इहाता नहीं कर सकते सिवाए उन बातों के इल्म के जो खुद अल्लाह देना चाहे।

8. उसकी ( हुकूमत ) की कुर्सी ज़मीन और असमान को घेरे हुए है।

9. ज़मीनों आसमान की हिफाज़त उसपर दुशवार नहीं।

10. वह बहुत बलंद और अज़ीम ज़ात है।

असल में इस आयत की जानकारी मुझे यूट्यूब पर हॉरर शो चलाने वाले चंद व्लागर के एपीसोड से मिली। इनमें ऊपरी हवाओं से ग्रसित हवेलियों या स्थानों की छानबीन के दौरान वे इस आयत का निरंतर पाठ करते हैं। उनका दावा है कि इससे वे मखलूकात से बचे रहते हैं। इस बारे में विस्तार से जानकारी मुझे मेरी एक परिचित विदूषी डॉ. फरगाना से हासिल हुई। वे अध्यात्म की एक अलग ही दुनिया में विचरण करती हैं। जानकारी काफी दिलचस्प लगी, लिहाजा आप सुधि पाठकों के साथ साझा कर रहा हूं। 

एक बेहद रोचक जानकारी ये भी हुई कि जब व्लॉगर किसी अभिशप्त स्थान पर विजिट करते हैं तो बाकायदा उन मखलूकात से अल्लाह का हवाला देते हुए आग्रह करते हैं कि उन्हें बिना कोई नुकसान पहुंचाते हुए दौरा करने दें। बड़े अदब के साथ ये भी विनती करती हैं कि चूंकि आप अदृश्य हैं, लिहाजा अपने बच्चों को रास्ते से हटा लें, ताकि उनको चोट न लगे। 

इस सिलसिले में आपको जानकारी होगी कि जब भी हम घर से बाहर किसी खुले स्थान पर लघुशंका करते हैं तो कुछ आवाज करते हैं अथवा खंखारते हैं या हनुमान जी का स्मरण करते हैं, ताकि अगर वहां कोई भूत इत्यादि हो तो वह वहां से हट जाए। विशेष रूप से इस बात का ख्याल रखते हैं कि किसी पेड़ या झाड़ी के नीचे लघुशंका नहीं करते, क्योंकि वहां भूत-प्रेत आदि के वास की संभावना होती है।

-तेजवानी गिरधर

7742067000

tejwanig@gmail.com

गुरुवार, 10 दिसंबर 2020

जब भी थके हुए हों तो करें ये प्रयोग, थकावट छूमंतर हो जाएगी


आमतौर पर जब भी हम काम की अधिकता के कारण थक जाते हैं तो कुछ वक्त आराम करते हैं अथवा सो जाते हैं। सोने से थकावट मिट जाती है। लेकिन अगर हमारे पास आराम करने का वक्त नहीं है और फिर से काम करना है तो बहुत दिक्कत हो जाती है। हम अंडर रेस्ट हो जाते हैं।

थकावट से उबरने के लिए वर्षों पहले मुझे एक जैन मुनि ने रोचक व उपयोगी जानकारी दी थी। वह आपसे साझा कर रहा हूं। लाडनूं स्थित जैन विश्व भारती में मेरा नियमित जाना होता था। वहां एक जैन मुनि श्री किशनलाल जी से निकटता हो गई। योग, ध्यान व सम्मोहन के बारे में उनकी गहरी जानकारी थी। उन्होंने मेरे सामने सम्मोहन के अनेक प्रयोग करके दिखाए थे। हां, उनका यह कहना था कि सम्मोहित उसे ही किया जा सकता है, जो उसके लिए सहयोग करे। उनसे कई विषयों पर चर्चा होती थी। एक बार चर्चा के दौरान उन्होंने बताया कि थकावट की स्थिति से आसानी से उबरा जा सकता है। इसके लिए करीब बीस मिनट लेट जाएं और तीन-चार बार अपनी गुदा अर्थात मलद्वार को संकुचित करें। जितना ज्यादा समय तक संकुचन करेंगे, उतना ही जल्दी थकावट मिट जाएगी और पूरे शरीर में ऊर्जा का संचार हो जाएगा। शरीर में स्फूर्ति आ जाएगी। उन्होंने बताया कि गुदा के पास ही मूलाधार चक्र है। गुदा को संकुचित करने से वह शक्ति केन्द्र जागृत हो जाता है और नई ऊर्जा उत्पन्न होती है। मैने उनके बताए इस प्रयोग को कई बार इस्तेमाल किया और पाया कि उन्होंने सही जानकारी दी है। आज इस जानकारी को साझा करते हुए मैं उनको तहेदिल से साधुवाद देता हूं।

आपने पाया होगा कि जब भी हम ज्यादा वजन उठाते हैं, तो उस वक्त भी स्वत: गुदा संकुचित हो जाती है, हालांकि हमें इसका भान नहीं होता। इससे भी सिद्ध होता है कि गुदा संकुचन से ऊर्जा उत्पन्न होती है। इस सिलसिले में मुझे यकायक एक कहावत का ख्याल आ गया। शब्दों में उसका प्रयोग इस प्रकार है- किसी को चुनौति देते वक्त यह कहते हैं न कि लगा ले अपनी गुदा का जोर। या उसने गुदा का पूरा जोर लगा लिया, मगर वह अमुक काम नहीं कर पाया। अर्थात गुदा के पास स्थित मूलाधार चक्र शक्ति का केन्द्र है, इसकी जानकारी हमारी संस्कृति में बहुत पहले से रही है। उसी वजह से यह कहावत बनी है।


-तेजवानी गिरधर

7742067000

tejwanig@gmail.com

बुधवार, 9 दिसंबर 2020

भगवान श्रीकृष्ण की मृत्यु का रोचक तथ्य


भगवान श्रीकृष्ण की मौत के बारे में आम मान्यता है कि जब वे एक वृक्ष के नीचे विश्राम कर रहे थे, तब एक बहेलिये के भ्रमवश तीर चलाने की वजह से उनकी मृत्यु हो गई। भ्रम के बारे यह बताया जाता है कि चूंकि श्रीकृष्ण भगवान के अवतार थे, इस कारण उनके पैर के तलुवे में पद्म मणि थी, उसकी चमक को बहेलिये ने हिरण की आंख समझ लिया और तीर चला दिया।

इस बारे में एक मान्यता ये भी है कि महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद जब युधिष्ठर का राजतिलक हो रहा था तब कौरवों की माता गांधारी ने युद्ध के लिए श्रीकृष्ण को दोषी ठहराते हुए शाप दिया की जिस प्रकार कौरव वंश का नाश हुआ है, ठीक उसी प्रकार यदुवंश का भी नाश होगा। इस पर श्रीकृष्ण द्वारिका लौट कर यदुवंशियों के साथ प्रभास क्षेत्र में आ गए। वहां महाभारत युद्ध की चर्चा के दौरान सात्यकि और कृतवर्मा में विवाद हो गया और सात्यकि ने कृतवर्मा का सिर काट दिया। इससे दोनों पक्षों में युद्ध भड़क उठा। इस लड़ाई में श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न और मित्र सात्यकि समेत लगभग सभी यदुवंशी मारे गए थे, केवल बब्रु और दारूक ही बचे। प्रभास क्षेत्र में एक दिन श्रीकृष्ण पीपल के वृक्ष के नीचे योगनिद्रा में लेटे थे, तभी जरा नामक एक बहेलिए ने उन्हें हिरण समझ कर विषयुक्त बाण चला दिया, जो उनके पैर के तलुवे में जाकर लगा और भगवान श्रीकृष्ण की मृत्यु हो गई। इस बारे में कुछ लोगों का मानना है कि असल में यह श्रीकृष्ण की लीला थी। इसके पीछे एक प्रसंग का जिक्र आता है। वो यह कि त्रेता युग में भगवान के अवतार श्री राम ने बाली को छुप कर तीर मारा था। द्वापर युग में श्रीकृष्ण के समय भगवान ने उसी बाली को जरा नामक बहेलिया बनाया और अपने लिए वैसी ही मृत्यु चुनी, जैसी बाली को दी थी। 

जिस तीर से श्रीकृष्ण की मृत्यु हुई, उस बारे में कहा जाता है कि एक बार कृष्ण के पुत्र सांब शरारत करते हुए स्त्री वेष में ऋषि विश्वामित्र, दुर्वासा, वशिष्ठ और नारद से मिले गए और कहा कि वह गर्भवती है, वे उसे बताएं कि उसके गर्भ में नर है या मादा। उनमें से एक ऋषि ने अंतर्दृष्टि से यह जान लिया कि वह स्वांग कर रहा है। उन्होंने गुस्से में सांब को श्राप दिया कि वह लोहे के तीर को जन्म देगा, जिससे उनके कुल का विनाश होगा। सांब ने इस श्राप के बारे में उग्रसेन को जानकारी दी तो उन्होंने सलाह दी कि वे तांबे के तीर का चूर्ण बना कर प्रभास नदी में प्रवाहित कर दें, जिससे उन्हें श्राप से छुटकारा मिल जाएगा। सांब ने ऐसा ही किया। लोहे की छड़ का चूर्ण एक मछली ने निगल लिया, जो कि उसके पेट में जाकर धातु का एक टुकड़ा बन गया। जरा नामक बहेलिये ने उस मछली को पकड़ा और उसके शरीर से निकले धातु के टुकड़े से तीर बनाया। उसी तीर से श्रीकृष्ण की मृत्यु हुई।

इन प्रसंगों से यह तो स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण की मृत्यु बहेलिये के तीर से हुई। इस बारे में सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने और भी रोचक जानकारी दी है। एक प्रवचन के दौरान उन्होंने बताया कि पैर के पंजे में टखने के पास अकीलीज नामक स्नायु बिंदु है, जो कि शरीर की ज्यामिति का एक केन्द्र है। बहेलिये ने तीर इसी बिंदु पर मारा था, जिससे श्रीकृष्ण की मृत्यु हुई। वस्तुत: वे एक सवाल का जवाब दे रहे थे कि वे प्रवचन के दौरान एक पैर गुदा के नीचे क्यों रखते हैं। इस पर उनका कहना था कि पैर के अकीलीज बिंदु व गुदा के निकट मूलाधार चक्र के संपर्क में आने से शरीर की ज्यामिति बदल जाती है और अतिरिक्त सजगता आ जाती है। इसी के साथ उन्होंने श्रीकृष्ण की मृत्यु का कारण तीर के अकीलीज पर लगने को बताया है। वैसे यह स्वाभाविक सा सवाल है कि भला पैर पर तीर लगने मात्र से मृत्यु कैसे हो सकती है? संभव है कि सद्गुरू की जानकारी सही हो, मगर इससे सवाल उठता है कि कहीं बहेलिये ने जानबूझ कर श्रीकृष्ण के अकीलीज बिंदु पर तो तीर नहीं मारा। या वह एक संयोग भी हो सकता है। कदाचित श्रीकृष्ण ने इसी प्रकार मृत्यु को चुना हो।

बहरहाल, प्रसंगवश बता दें कि श्रीगणेश की मूर्तियों में उसी प्रकार की मुद्रा होती है, जिसका जिक्र सद्गुरू कर रहे हैं।


-तेजवानी गिरधर

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सोमवार, 30 नवंबर 2020

दूल्हा तोरण क्यों मारता है?


इन दिनों शादियों का सीजन है। विचार आया कि शादी की विभिन्न परंपराओं में एक प्रमुख रिवाज पर चर्चा की जाए। लगभग सभी को जानकारी होगी कि दूल्हा जब दुल्हन के घर पर बारात लेकर पहुंचता है तो वह द्वार पर टंगे तोरण को अपनी तलवार को छुआ कर उसे मारने की रस्म अदा करता है। कुछ लोगों को हो सकता है कि इस परंपरा की वजह पता हो, मगर अधिसंख्य इसके रहस्य से अनभिज्ञ हैं। 

इस सिलसिले में दो किंवदंतियां प्रचलित हैं। पहली इस प्रकार है:-

बताते हैं कि किसी भी शादी के दौरान जब दूल्हा दुल्हन के द्वार पर पहुंचता था तो वहां तोते के रूप में बैठा तोरण नामक एक राक्षस दूल्हे के शरीर में प्रवेश कर स्वयं शादी कर लेता था। एक बार एक राजकुमार जैसे ही दुल्हन के द्वार पर पहुंचा तो उसने वहां बैठे राक्षस रूपी तोते को मार डाला। कहते हैं कि तोरण मारने की परंपरा तभी से आरंभ हुई। ज्ञातव्य है दुल्हन के द्वार पर लकड़ी के बना तोरण लगाया जाता है, जिसमें तोता बना होता है। वह राक्षस का प्रतीक होता है।

दूसरी किंवदंती के अनुसार एक राजकुमारी जब छोटी थी तो उसकी मां कहा करती थी कि मेरी चिडिय़ा जैसी बिटिया, तुमको बड़ी होने पर किसी दिन कोई चिड़ा आ कर तुझे ले जाएगा। पास ही पेड़ पर बैठा चिड़ा यह सुना करता था। एक दिन यह देख कर वह अचंभित रह गया कि राजकुमारी की  शादी होने जा रही है और एक राजकुमार उसके दरवाजे पर खड़ा है। निराश हो कर उसने राजा के सामने फरियाद की। राजा ने रानी से पूछताछ की तो चिड़े की बात सही निकली। इस पर रानी ने कहा कि वह तो यूं ही प्यार में कहा करती थी, इसका अर्थ ये तो नहीं कि सच में किसी चिड़े से शादी करवाएगी। राजा ने जब अपनी बेटी की शादी चिड़े से करवाने से इंकार कर दिया तो वह अपने समुदाय को इकट्टा करके युद्ध पर उतारू हो गया। युद्ध में राजा हार गया। जैसे ही वह राजकुमारी को ले जाने लगा तो देवी-देवताओं में खलबली मच गई। उन्होंने कहा कि राजकुमारी व चिड़े से उत्पन्न संतान कैसी होगी? उन्होंने चिड़े व उसकी सेना को बहुत समझाया। आखिरकार वे मान गए, मगर एक शर्त रख दी। वो यह कि दूल्हे को चिडिय़ा प्रजाति से माफी मांगते हुए उसके नीचे से गुजरना होगा। इसके लिए दुल्हन के द्वार पर तोरण लटकाया जाएगा, जिस पर चिडिय़ाएं बनी होंगी और दूल्हा उनके नीचे से गुजरेगा। बाद में यह परंपरा बन गई। रहा सवाल तलवार टच करने का तो उसका अर्थ ये है कि वह ऐसा करके उनका अभिनंदन कर रहा है।

जिन को इन दोनों किंवदंतियों की जानकारी नहीं है, वे तोरण निर्माता आजकल तोरण पर गणेश जी का चित्र लगा रहे हैं। उनका प्रयोजन  विघ्न विनायक को द्वार पर बैठाना है, ताकि शादी निर्विघ्न संपन्न हो जाए।


-तेजवानी गिरधर

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शुक्रवार, 20 नवंबर 2020

मूर्ति के दर्शन के वक्त आंखें बंद न किया कीजिए

आंख एक खिड़की है, अच्छी व उपयोग चीजें ही अंदर आने दें


आंख हमारे शरीर की एक खिड़की है, जिसके माध्यम से हम बाह्य जगत से जुड़ते हैं। यूं ध्वनि व स्पर्श के जरिए भी हम ब्रह्मांड से संपर्क में हैं, लेकिन दृश्यमान जगत से संबंध का माध्यम तो नेत्र ही हैं। उसी के जरिए हम जगत से जुड़े अनुभव आत्मसात करते हैं, जिसे कि दर्शन कहते हैं। इसकी बड़ी महत्ता है। इसका हम पर सीधे प्रभाव पड़ता है। इसी कारण महात्मा गांधी ने यह स्लोगन दिया कि बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत करो। तात्पर्य ये है कि अगर हम बुरा देखेंगे तो हमारे भीतर बुरे विचार आएंगे। बुरा सुनेंगे तो बुरे ख्याल मन में प्रवेश करेंगे और अंतत: हम बुरा करने लग जाएंगे। कामुक दृश्य देखने को भी इसलिए मना किया जाता है क्योंकि उससे मन काम-वासना से भर जाता है। इसी प्रकार हिंसक फिल्में देखेंगे तो मन में हिंसा का भाव जागृत होगा।

आइये, अब विषय के विस्तार में चलते हैं। शास्त्रों में बताया गया है कि सुबह जागने पर दोनों हथेलियों को जोड़ कर उसके दर्शन करने चाहिए। इससे शुभ दिन की शुरुआत होती है। इसके लिए एक श्लोक सर्वविदित है-

ओम् कराग्रे वसते लक्ष्मी, करमध्ये सरस्वती।

करमूले च गोविंद, प्रभाते कुरुदर्शनम्।।

अर्थात हथेली के सबसे आगे के भाग में लक्ष्मी, मध्य भाग में सरस्वती और मूल भाग में श्रीगोविंद निवास करते हैं। यानि कि जुड़ी हुई हथेलियों को देखने से मां लक्ष्मी, मां सरस्वती व परात्पर परब्रह्म गोविंद के दर्शन होते हैं।

शास्त्रानुसार दोनों हाथों में कुछ तीर्थ भी होते हैं। चारों उंगलियों के सबसे आगे के भाग में देव तीर्थ, तर्जनी के मूल भाग में पितृ तीर्थ, कनिष्ठा के मूल भाग में प्रजापति तीर्थ और अंगूठे के मूल भाग में ब्रह्म तीर्थ माना जाता है। इसी तरह दाहिने हाथ के बीच में अग्नि तीर्थ और बाएं हाथ के बीच में सोम तीर्थ व उंगलियों के सभी पोरों और संधियों में ऋषि तीर्थ है।

शिव स्वरोदय में बताया गया है कि सुबह उठने पर नासिका में जिस तरफ का स्वर चल रहा हो, उसी तरफ के हाथ से सबसे पहले धरती पर स्पर्श करना चाहिए। उसी के दर्शन करने चाहिए। चूंकि धरती को माता माना गया है, इसलिए सुबह उठते ही धरती पर अपने पैर रखने से पहले माता से क्षमा याचना इन शब्दों में करनी चाहिए-

ओम् विष्णुपत्नी नमस्तुभ्यं पाद स्पर्श क्षमश्वमेव।


दर्शन से हम कितने प्रभावित होते हैं, इसका एक उदाहरण देखिए। किसी अनजान व्यक्ति को देखने मात्र से सुखद अनुभूति होती है, जबकि किसी के दर्शन से मत वितृष्णा से भर जाता है। ऐसा क्यों? क्योंकि हर व्यक्ति का अपना आभा मंडल होता है। जैसी उसकी आभा होगी, वैसी ही अनुभूति होगी। इसी सिलसिले में दर्शन से जुड़े एक श्लोक को भी अपने संज्ञान में लीजिए-

साधूनां दर्शनं पुण्यं तीर्थभूता हि साधव:।

कालेन फलते तीर्थं सद्य: साधुसमागम:।।

अर्थात संत-महात्माओं के दर्शन मात्र से ही पुण्य की प्राप्ति हो जाती है, क्यों कि वे तीर्थों के समान पवित्र होते हैं। तीर्थवास करने का सुपरिणाम तो कुछ समय के पश्चात ही प्राप्त होता है, परन्तु संतों की सत्संगति का सुपरिणाम तुरन्त ही प्राप्त होता है।

दर्शन कितना असर डालता है, इसका अंदाजा हमारे यहां प्रचलित मान्यता से होता है। बुरा दिन बीतने पर कहा जाता है कि आज सुबह न जाने किसका मुंह देख लिया? घर से बाहर प्रस्थान करने पर पानी से भरा घड़ा लिए हुए स्त्री, झाडू लगाती सफाई कर्मचारी, शव यात्रा आदि के दर्शन को शुभ माना जाता है।

दर्शन का एक बारीक तथ्य समझिए। हनुमान जी तो एक हैं, मगर उनकी अनेक मुद्राएं हैं। आप जिस मुद्रा पर ध्यान एकाग्रचित्त होंगे, वैसे ही गुण आपके भीतर प्रविष्ट करेंगे। 

वास्तुशास्त्री बताते हैं कि घर में बने मंदिर में एक ही भगवान की एकाधिक मूर्तियां नहीं रखनी चाहिए। विशेष रूप से अगर दोनों मूर्तियां आसपास या आमने-सामने हों तो उनके दर्शन करने से घर में क्लेश होता है।  इसी प्रकार खंडित मूर्ति के दर्शन करने को अच्छा नहीं माना जाता। खंडित दर्पण में स्वयं को देखने, खंडित पात्र में खान-पान को वर्जित माना गया है। 

एक महत्वपूर्ण बात। कई लोग मंदिर जाने पर मूर्ति के आगे खड़े हो कर आंखें बंद करके प्रार्थना करते हैं, वह गलत है। सदैव मूर्ति के दर्शन करते हुए प्रार्थना करनी चाहिए, तभी सुफल मिलता है। उसके सतत दर्शन करते रहिए और उसकी ऊर्जा को भीतर प्रवेश करने दीजिए। सीधी सी बात है कि दर्शन के जिस प्रयोजन से हम मंदिर गए हैं तो मूर्ति के सामने आंखें बंद करने से वह प्रयोजन ही बेकार हो जाएगा।

ऐसा नहीं कि केवल दृश्य ही हम प्रभाव डालता है। हमारे भाव पर भी निर्भर करता है कि हम किसी दृश्य को किस भाव से देखते हैं। कोई सज्जन किसी स्त्री को देख कर उसमें मां या बहिन का रूप देखता है तो कोई दुर्जन किसी पर स्त्री को देख कर वासना से ग्रसित हो जाता है। तभी तो कहा जाता है कि कोई सुरूप है या कुरूप, यह हमारी दृष्टि पर निर्भर करता है।

-तेजवानी गिरधर

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गुरुवार, 19 नवंबर 2020

भगवान शिव की परिक्रमा आधी क्यों की जाती है?


धर्मस्थलों में गर्भग्रह में स्थापित मूर्ति और मजारों की परिक्रमा करने की परंपरा है। यह भी सर्वविदित तथ्य है कि परिक्रमा की दिशा घड़ी की सुई की तरह दक्षिणावृत होती है। लेकिन यह बेहद रोचक तथ्य है कि अकेले भगवान शिव अथवा शिव लिंग ही ऐसे हैं, जिनकी परिक्रमा पूरी नहीं की जाती। परिक्रमा जहां समाप्त होती है, वहीं से फिर घड़ी की सुई की विपरीत दिशा में लौटा जाता है। जहां तक भगवान शिव का प्रश्न है तो सब जानते हैं कि उनकी जटा से गंगा का प्रवाह होता है, जो कि अति विशाल है। यह मान कर कि उसे पार नहीं किया जा सकता, परिक्रमा वहीं रोक पर वापस लौट जाते हैं। इसे चंद्राकार परिक्रमा कहा जाता है। इसी प्रकार शिव लिंग पर भी चूंकि विभिन्न प्रकार के अभिषेक किए जाते हैं, जिनका निकास गोमुख से होता है, जिसे कि सोमसूत्र कहा जाता है, उसे उलांघना भी धार्मिक विधि के विपरीत माना जाता है। शास्त्रानुसार सोमसूत्र शक्ति-स्रोत है। उसे लांघते समय पैर फैलाने से वीर्य निर्मित और 5 अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे देवदत्त और धनंजय वायु के प्रवाह में रुकावट पैदा हो जाती है, जिससे शरीर और मन पर बुरा असर पड़ता है। जानकारी ये भी है कि तृण, काष्ठ, पत्ता, पत्थर, ईंट आदि से ढंके हुए सोमसूत्र का उल्लंघन करने से दोष नहीं लगता है।

ऐसी मान्यता है कि सनातन धर्म में परिक्रमा करने का चलन गणेश जी के मां पार्वती की परिक्रमा करने से शुरू हुआ। इससे जुड़ा प्रसंग ये है कि एक बार मां पार्वती ने अपने पुत्रों कार्तिकेय तथा गणेश को सांसारिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए पृथ्वी का एक चक्कर लगा कर आने का आदेश दिया गया।  कार्तिकेय अपनी सवारी मोर पर रवाना हुए, लेकिन गणेश अपने वाहन चूहे को देख विचार में पड़ गए कि वे इस प्रतियोगिता में कैसे प्रथम आएं? उन्होंने एक युक्ति निकाली और मां पार्वती के चक्कर लगाना आरंभ कर दिया। जब कार्तिकेय पृथ्वी का पूरा चक्कर लगा कर लौटे तो देखा कि गणेश वहां पहले से मौजूद हैं तो वे चकित रह गए। इस पर गणेश ने कहा कि मां पार्वती ही संसार हैं। ज्ञान प्राप्ति के लिए उनकी परिक्रमा ही पर्याप्त है, उसके लिए पृथ्वी की परिक्रमा की जरूरत नहीं। 

धार्मिक मान्यता के अनुसार केवल शिव जी की आधी परिक्रमा की जाती है, जबकि मां दुर्गा की एक, हनुमानजी व गणेशजी की तीन-तीन, भगवान विष्णु की चार, पीपल के वृक्ष की एक सौ आठ परिक्रमा का विधान है। वैसे सामान्य: तीन परिक्रमा का चलन है।

अब आते हैं इस तथ्य पर कि परिक्रमा आखिर क्यों की जाती है? ऐसी मान्यता है कि पवित्र स्थान, मूर्ति, वृक्ष, पौधा आदि की परिक्रमा से उनके इर्द-गिर्द मौजूद आभा मंडल से सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। हमारी संस्कृति में मंदिर, नदि, पर्वत, तीर्थ, वृक्ष आदि की परिक्रमा का चलन है। दिलचस्प बात है कि पाणिग्रहण संस्कार में वर-वधू अग्नि की परिक्रमा करते हैं। 

जरा और गहरे में जाएं तो देखिए, सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं और सभी ग्रहों को साथ लेकर हमारा सूर्य महासूर्य की परिक्रमा कर रहा है। इतना ही नहीं, बल्कि सभी ग्रह अपनी धूरि पर भी कर रहे हैं। अर्थात यह केवल मान्यता का मसला नहीं है, बल्कि परिक्रमा या चक्र में ब्रह्मांड का गहरा रहस्य छुपा हुआ है। हर छोटा बड़े की परिक्रमा कर रहा है। समय की सूचक घड़ी में भी सुइयां चक्राकार घूम रही हैं। चक्र ही परिवर्तन व प्रगति का द्योतक है। निष्कर्ष यही कि परिक्रमा से केन्द्र तुष्ट होता है, वहीं से ऊर्जा प्राप्त होती है।

-तेजवानी गिरधर

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रविवार, 8 नवंबर 2020

कानूनन सज्जादानशीन तो दरगाह दीवान ही हैं


हाल ही में मैने एक फेसबुक पेज व एक वेबसाइट के उस दावे की जानकारी दी थी, जिसमें दर्शाया गया है कि ख्वाजा साहब के ऑरीजिनल सज्जादानशीन तो पाकिस्तान में हैं, जबकि सच्चाई ये है कि महान सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती के वर्तमान सज्जादानशीन दरगाह दीवान सैयद जैनुल आबेदीन अली खान हैं और उन्होंने अपने पुत्र को अपना उत्तराधिकारी भी घोषित कर दिया है। इस पर कुछ प्रतिक्रियाएं आई हैं।

जनाब पीरजादा फिरोज ने फेसबुक पर जो प्रतिक्रिया दी है, उसे हूबहू देखिए:-

पाकिस्तान माइग्रेशन पर उनकी सिविल डेथ हो चुकी है, मतलब भारतीय संविधान और कानून के तहत मिलने वाले उनके समस्त अधिकार समाप्त। भारत में यह पद खाली हो गया था और इस पद पर ख्वाजा साहब के वंशज ही विराजमान होते हैं जो उनके पाकिस्तान चले जाने पर खानदान के अन्य व्यक्ति को हस्तानांतरित हो गया। मतलब कोई अमेरिका, पाकिस्तान, लंदन, या कहीं भी चला गया तो यह पद समाप्त नहीं होगा, एक शाख से दूसरी शाख में अर्थात एक भाई के दूसरे देश माइग्रेशन पर यह पद दूसरे भाई या उसके परिवार (खानदान) के अन्य सदस्यों को हस्तानांतरित हो जाएगा। मतलब पहली शर्त यह कि ख्वाजा साहब का वंशज हों, और दूसरी यह कि वह भारत का नागरिक हो। तभी वो इस पद पर पदासीन हो सकता है।

उनकी यह प्रतिक्रिया बिलकुल सटीक है। उनका यह तर्क अकाट्य है कि पाकिस्तान माइग्रेशन पर उनकी सिविल डेथ हो चुकी है, मतलब भारतीय संविधान और कानून के तहत मिलने वाले उनके समस्त अधिकार समाप्त हो चुके हैं।

कुछ अन्य ने मुझे फोन करके प्रतिक्रिया दी कि जो भी सज्जन पाकिस्तान में रह कर अपने आप को ख्वाजा साहेब का सज्जादानशीन जाहिर कर रहे हैं, उसके पीछे जो भी तर्क हो, मगर चूंकि ख्वाजा साहब की दरगाह अजमेर में है, और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के तहत जनाब जेनुल आबेदीन अली साहब बतौर दीवान अपने कर्तव्यों को अंजाम दे रहे हैं, इस कारण सज्जादानशीन वे ही कहलाएंगे। ज्ञातव्य है कि कोर्ट ने दीवान को मान्यता उनके ख्वाजा साहब के निकटतम संबंधी होने के नाते ही दी है। भारतीय संविधान के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट का फैसला अंतिम है, उससे ऊपर कोई नहीं है। यदि कोई विदेश जा कर स्वयं को उत्तराधिकारी करार देता है तो उसका भारतीय संविधान व सुप्रीम कोर्ट के फैसले की रोशनी में कोई महत्व नहीं है। 

कुल जमा प्रतिक्रियाओं का निष्कर्ष ये है कि उन्हें पाकिस्तान में रहने वाले सज्जन को सज्जादानशीन कहलाने पर ऐतराज है। उनका तर्क ये है कि यदि उनके पूर्वज सज्जादानशीन पद पर रहना चाहते थे, दीवान रह कर ख्वाजा साहब की दरगाह में जरूरी रसूमात अंजाम देना चाहते थे, तो उन्हें भारत में रहना चाहिए था, पाकिस्तान क्यों चले गए? पाकिस्तान जाने के साथ ही भारतीय संविधान के मुताबिक उनका दावा समाप्त हो गया था। 

वस्तुत: यह मसला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया जाना चाहिए था, मगर संभवत: ख्वाजा साहब की महानता और उनके प्रति करोड़ों लोगों की श्रद्धा को ख्याल में रख कर महत्वपूर्ण दीवान पद की गरिमा का ख्याल में रखते हुए व्यर्थ का विवाद आरंभ करने से बचा गया है, मगर इसका परिणाम ये है कि पाकिस्तान में ख्वाजा साहब के सज्जादानशीन होने का सम्मान पाया जा  रहा है। 

इस मसले के दो पहलु हो सकते हैं। एक धार्मिक आस्था और दूसरा कानून। किसी की भी धार्मिक आस्था का सम्मान किया जाना चाहिए, मगर कानून सबसे ऊपर है। यहां मैं यह साफ करना वाजिब समझता हूं कि ये मुद्दा उठाने के पीछे दीवान साहेब या खुद्दाम हजरात की शान में गुस्ताखी करना नहीं, बल्कि एक पहलु को सामने लाना मात्र था।

-तेजवानी गिरधर

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tejwanig@gmail.com

शुक्रवार, 6 नवंबर 2020

एक प्रेत ने बताया कि जहां भी रामायण पाठ होता है, वहां हनुमानजी उपस्थित हो जाते हैं?


यह आम धारणा है कि जहां पर भी रामायण अथवा रामचरित मानस का पाठ होता है, वहां भगवान के परम भक्त हनुमानजी अदृश्य रूप में उपस्थित हो जाते हैं। बड़ी दिलचस्प बात है कि पूरी दुनिया में कई अवसर ऐसे आते होंगे, जहां एक साथ एक ही समय में रामायण पाठ होता होगा, तो यह भी मान्यता है कि वे उन सभी स्थानों पर एक साथ उपस्थित रह सकते हैं। अर्थात सर्वव्यापक व कालतीत हैं। उनके लिए समय व स्थान की कोई भी बाधा नहीं है।

शास्त्रानुसार यह भी स्थापित तथ्य है कि हनुमानजी चिरंजीवी हैं। बताते हैं कि सीता माता ने हनुमानजी को लंका की अशोक वाटिका में राम का संदेश सुनने के बाद आशीर्वाद दिया था कि वे अजर-अमर रहेंगे। यानि कि वे चिरयुवा भी हैं। चूंकि वे अब भी मौजूद हैं व भगवान राम के  अनन्य भक्त हैं, तो इससे यह बात जुड़ती है कि वे हर रामायण पाठ में मौजूद रह सकते हैं और रहते ही हैं। प्रसंगवश बता दें कि हनुमानजी के अतिरिक्त सात अन्य भी चिरंजीवी माने गए हैं। उनमें ऋषि मार्कण्डेय, भगवान वेद व्यास, भगवान परशुराम, राजा बलि, विभीषण, कृपाचार्य व अश्वत्थामा शामिल हैं।


जहां तक राम कथा का सवाल है तो यह मान्यता है कि वह अनादि काल से जारी है। सर्वप्रथम श्रीराम की कथा शंकर भगवान ने माता पार्वती को सुनाई थी। उस कथा को एक कौवे ने भी सुन लिया। उसका पुनर्जन्म कागभुशुण्डि के रूप में हुआ। काकभुशुण्डि ने वह कथा अपने शिष्यों को सुनाई। कहा जाता है कि गरुढ़ भगवान को भी उन्होंने यह कथा सुनाई। स्वयं हनुमानजी ने यह कथा एक पाषाण पर लिखी। बाद में ऋषि वाल्मीकि ने यह कथा लिखी। एक प्रसंग यह भी है कि रामचरित मानस के रचियता तुलसीदास जी काशी में राम कथा किया करते थे। उन्हें एक प्रेत ने बताया कि जहां भी रामकथा होती है, हनुमानजी वहां उपस्थित हो जाते हैं। तुलसीदास जी ने एक बार राम कथा के दौरान एक वृद्ध के रूप में हनुमानजी के दर्शन किए। इस पर उन्होंने भगवान राम के दर्शन करवाने को कहा तो हनुमानजी ने कहा कि आपको चित्रकूट में दर्शन होंगे। तुलसीदासजी ने चित्रकूट में ही भगवान राम के दर्शन किए।

राम कथा के दौरान हनुमान जी की उपस्थिति की मान्यता के चलते ही जहां भी रामायण पाठ होता है, तो वहां हनुमानजी के लिए आसन बना कर उस पर उनको आमंत्रित किया जाता है।

-तेजवानी गिरधर

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गुरुवार, 5 नवंबर 2020

पाकिस्तान में हैं ख्वाजा साहेब के असली सज्जादानशीन?

 

यह सर्वविदित है कि महान सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती के वर्तमान सज्जादानशीन दरगाह दीवान सैयद जैनुल आबेदीन अली खान हैं और उन्होंने अपने पुत्र को अपना उत्तराधिकारी भी घोषित कर दिया है।  दीवान साहब का खुद को ख्वाजा साहेब का सज्जादानशीन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक बिलकुल जायज भी है। दूसरी ओर वहीं एक फेसबुक पेज व वेबसाइट ये दावा करती है कि ख्वाजा साहब के ऑरीजिनल सज्जादानशीन तो पाकिस्तान में हैं। बेशक भारत में यहां के संविधान के मुताबिक जरूर दरगाह दीवान का दावा ही सही माना जाएगा। इसकी वजह ये भी है कि ख्वाजा साहेब की मजार शरीफ अजमेर में ही है, मगर दुनिया को ग्लोबल विलेज बना रहा इंटरनेट अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तो यही जता रहा है कि ख्वाजा साहेब के असली सज्जादानशीन तो पाकिस्तान में हैं।

जनाब शैखुल मशायख दीवान सैयद इनायत हुसैन साहब के विसाल के बाद 21 सितम्बर 1959 से 8 जुलाई 1975 तक 35 वें दीवान रहे सैयद सोलत हुसैन साहब के साहबजादे सैयद नजम चिश्ती ने बताया कि आप जरा आप फेसबुक पेज Original Sajjada Nasheen of Hazrat Khawaja Syed Moin Uddin Chishti Ajmairi Public Figure पर भी गौर फरमाइये, जिसमें बताया गया है कि असल सज्जादानशीन तो पाकिस्तान में हैं। इस पर मैने न केवल उस फेसबुक पेज पर गौर किया, बल्कि उसमें दिए गए साइट के लिंक पर जा कर वह साइट भी देखी। इसमें साफ तौर पर बताया गया है कि हिंदुस्तान के विभाजन के वक्त ख्वाजा साहब के सज्जादानशीन हजरत दीवान सैयद आले रसूल अली खान पाकिस्तान चले गए। उनके 1973 में विसाल के बाद हजरत दीवान सैयद आले मुज्तबा अली खान सज्जादानशीन बने। उनके विसाल के बाद 2001 में शेखउल मशायख हजरत दीवान सैयद आले हबीब अली खान सज्जादानशीन बने। बहरहाल, उस फेसबुक पेज पर दी गई जानकारी को हूबहू यहां पेश किया जा रहा है:-

Short Description
DEDICATE TO OUR BELOVED SUFFI SAINT HAZRAT KHWAJA SYED MOEIN U DIN HASAN (RA) AND HIS DESCENDANT ,SAJJADA NASHEEN DARGAH AJMER

Long Description
Sheikh Ul Mushaikh Hazrat Dewan Syed Aalay Rasool Ali Khan (R A) has hold the Position of Sajjada Nashin Ajmer sharif in 1923 1973.After the Creation of Pakistan The Descendant of Hazrat Khawaja Ghareb Nawaz (R.A) migrated to the Pakistan. In Pakistan their stay Was With sheikh UL Islam Hazrat Qamar Ud Din Sialvi (R A) (sargodha) till 1960. After that the Descendants of khawaja sahab shifted to Peshawar. The last Dewan Who Migrated from Ajmer Sharif was Died in Peshawar in 1973 Where after the death of Hazrat Dewan Sayed Alley Rasool Ali Khan (R A) his son Hazrat Dewan Syed Aalay Mujtaba Ali Khan (R A) was appointed as Sajjada Nashin Ajmer Sharif.He followed the footstep of his great father. His services have been admitted national and international level .
A foundation store was laid down for a complex with the name Gulshan e Sultan UL hind Ajmeri complex, in 1992. Astana-e-Aaliya Moinia Chishtiya is now became the Holy Place for All chishtis as two of the descendants of Khawaja Gharib Nawaz Are Buried here .He died at the age of 81 year when he was reciting the Holy Quran.


after the death of Hazrat Dewan Syed Aalay Mujtaba Ali Khan (R A) ,his son hazrat Dewan Syed Aalay Habib Ali Khan appointed as Sajjada nashin Ajmer sharif. He has done MA (Arabic) from the University of Peshawar.He was awarded Gold Medal in MA Arabic. Genealogically he linked with Hazrat Muhammad Salalhu Alaihay Wa Ala Aalayhi Wasalam at 37 generation and at 39 with sisila e tareeqat.
The work ancestor of Hazrat Khawaja Gharib Nawaz (R A) is a golden chapter of our history.His descendants has also been working on his mission.All Pakistanis especially the people of Attock Rawalpindi and Islamabad are lucky that the descendant of Hazrat Khawaja Gharib Nawaz (R A) is among them. They proved that they are real descendants of the Hazrat Khawaja Gharib Nawaz (R A) by showing an excellent management administration and people of spiritual qualities of highest order before the creation of Pakistan.

Bio
Sheikh ul Mashaikh Hazrat Dewan Syed Aalay Habib Ali Khan appointed as Sajjada nashin Ajmer sharif in 2001. He has done MA (Arabic) from the University of Peshawar.He was awarded Gold Medal in MA Arabic. Genealogically he linked with Hazrat Muhammad Salalhu Alaihay Wa Ala Aalayhi Wasalam at 37 generation and at 39 with sisila e tareeqat.

Personal Information
Hazrat Dewan Syed Aalay Habib Ali Khan appointed as Sajjada nashin Ajmer sharif in 2001. He has done MA (Arabic) from the University of Peshawar.He was awarded Gold Medal in MA Arabic. Genealogically he linked with Hazrat Muhammad Salalhu Alaihay Wa Ala Aalayhi Wasalam at 37 generation and at 39 with sisila e tareeqat.

Phone
+923005300822

Website
http://sajjadanasheenajmer.wix.com/dargah


उनकी वेब साइट पर ख्वाजा साहेब के सिलसिले और पाकिस्तान में उनके बाद रहे सज्जादानशीन के बारे में और उनके अलावा बहुत सारी और मालूमात भी दी गई हैं।

खैर, बताया जाता है कि पाकिस्तान के लोग भले ही अजमेर में मौजूद दरगाह शरीफ की जियारत करने को आते हैं, मगर साथ ही उनके देश में मौजूद असली सज्जादानशीन की भी पूरी इज्जत करते हैं।

गौरतलब है कि जब भी कोई खादिम अपने आप को सज्जादानशीन जाहिर करता है तो दरगाह के दीवान उस पर ऐतराज करते हैं। यदि सज्जादानशीन शब्द पर गौर करें तो इसका मतलब औलाद व वश्ंाज से होता है। और जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश से दीवान ख्वाजा साहब के निकटतम उत्तराधिकारी घोषित किए जा चुके हैं तो जाहिर है जब भी कोई अपने आपको ख्वाजा साहब का सज्जादानशीन बताने की कोशिश करेगा तो उस पर दरगाह दीवान का ऐतराज आएगा ही। मगर सवाल ये है कि क्या वे इंटरनेट पर मौजूद असली सज्जादानशीन की जानकारी पर भी सवाल खड़ा कर सकते हैं। यहां मैं यह साफ करना वाजिब समझता हूं कि ये मुद्दा उठाने के पीछे दीवान साहेब या खुद्दाम हजरात की शान में गुस्ताखी करना नहीं, बल्कि एक पहलु को सामने लाना मात्र है।

-तेजवानी गिरधर

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tejwanig@gmail.com

शनिवार, 26 सितंबर 2020

ढ़ाई प्याला शराब पीती है देवी मां


ये सुनी-सुनाई बात नहीं। आंखों देखी है। काली माता की एक मूर्ति ढ़ाई प्याला शराब पीती है। यह नागौर जिले में मुख्यालय से 105 किलोमीटर दूर, रियां तहसील में, मेड़ता से जैतारण जाने वाले मार्ग पर स्थित गांव भंवाल के एक मंदिर में है। इसकी गिनती राजस्थान के प्रसिद्ध शक्तिपीठों में होती है। इसकी बहुत मान्यता है। मंदिर तक जाने के लिए मेड़ता रोड में हर वक्त वाहन उपलब्ध रहते हैं।

तकरीबन बीस साल पहले मैंने स्वयं ने इस मंदिर के दर्शन किए थे। कुछ मित्रों के साथ एक जीप में मुझे वहां जाने का मौका मिला। वहां के नियम के मुताबिक, जिन भी मित्रों के पास बीड़ी-सिगरेट या तम्बाकू था, उसे मंदिर के बाहर ही रख दिया। चमड़े के बेल्ट व पर्स भी बाहर ही रखे। हमने शराब की एक बोतल के साथ मंदिर में प्रवेश किया। जब हमारा नंबर आया तो पुजारी ने हमसे बोतल लेकर उसे खोला और उनके पास मौजूद चांदी एक प्याले में शराब भरी। वह प्याला उन्होंने मूर्ति के होठों पर रखा। देखते ही देखते प्याला खाली हो गया। फिर दूसरा प्याला पेश किया। वह भी खाली हो गया। तीसरे प्याले में से आधा ही खाली हुआ। विशेष बात ये थी कि हम तो इस नजारे को थोड़ी दूर से देख रहे थे, मगर जब भी पुजारी प्याला मूर्ति के होंठों पर रखता तो खुद का मुंह हमारी ओर कर लेता। अर्थात वह स्वयं इस दृश्य को नहीं देख रहा था। कदाचित यह परंपरा रही हो कि पुजारी इस चमत्कार को बेहद नजदीक से नहीं देखता हो। हमारे लिए यह वाकई चमत्कार ही था। हमने जब पुजारी से इस बाबत पूछा कि यह कैसा चमत्कार है, तो उसने बताया कि कुछ बुद्धिजीवी और विज्ञान के विद्यार्थियों ने इसका रहस्य जानने की कोशिश की कि कहीं कोई तकनीक तो नहीं, मगर उन्हें भी चमत्कार को देख कर दातों तले अंगुली दबाने को विवश होना पड़ा। 

ऐसा नहीं कि मूर्ति हर व्यक्ति की शराब की बोतल ग्रहण कर रही हो। कुछ ऐसे भी थे, जिनकी बोतल देवी ने स्वीकार नहीं की। उनके बारे में बताया गया कि या तो अपनी जेब में चमड़े का पर्स या तम्बाकू पदार्थ लेकर गए थे, या फिर उनकी श्रद्धा में कहीं कोई कमी थी। इसे इस रूप में भी लिया जा रहा था कि देवी मां जिनकी मनोकामना पूर्ण करना चाहती हैं, केवल उनके हाथों लाई शराब ही ग्रहण करती हैं। 

मंदिर के इतिहास के बारे में जानकारी पता करने पर बताया गया कि भंवाल माता की मूर्ति खेजड़ी के एक पेड़ के नीचे प्रकट हुई थी। बताया जाता है कि इस स्थान पर राजा की फौज ने लूट के माल के साथ डाकुओं की घेराबंदी कर ली थी। इस पर उन्होंने काली मां को याद किया तो मां ने स्वयं प्रकट हो कर डाकुओं को भेड़-बकरियों के झुंड में तब्दील कर दिया। इस तरह से डाकू बच गए। उन्होंने ही लूट के माल से यहां मंदिर बनवाया था। वहां मौजूद शिलालेख के अनुसार मंदिर का निर्माण विक्रम संवत 1119 में हुआ था। यह पुरातन स्थापत्य कला से पत्थरों को जोड़ कर बनाया गया था। 

यात्रियों के विश्राम के लिए बैंगाणी परिवार ने मंदिर के पास ही एक धर्मशाला बनवा रखी है।


-तेजवानी गिरधर

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tejwanig@gmail.com

रविवार, 13 सितंबर 2020

कॉर्नर का मकान सबसे खराब

शहर के सुपरिचित बुद्धिजीवी श्री कमल गर्ग ने एक बहुत महत्वपूर्ण जानकारी दी है। आपके समक्ष प्रस्तुत है:-

सभी लोग कॉर्नर का मकान लेना चाहते हैं ,या प्लॉट लेना चाहते हैं, मेरे हिसाब से सबसे ज्यादा खराब होता है| इसी प्रकार तिराहे का प्लॉट या *टी* पर स्थित प्लाट होते हैं इसकी वजह इस तरह से बता सकता हूं कि कार्नर प्लॉट पर दो तरफ से प्रदूषण होगा(हवा, धूल एवं आवाज) ट्रैफिक न्यूसेंस दो तरफ रहेगा, दो तरफ बिजली की लाइनें और पानी की लाइन होगी ,उनके वॉल्व, उनके पोल और पोल कें स्टे आदि लगे होंगे इसके अलावा सीवरेज लाइन उनके चेम्बर,नाली / नाला दोनों तरफ बने होने से सीलन- बदबू दोनों और रहेंगे, केवल दोनों और ही नहीं बल्कि तीन से चार गुना क्योंकि प्लाट चोडाई से दो गुना या ज्यादा लम्बाई के होते हैं। टेलीफोन की लाइन या टेलीफोन केबल,अब गेस (ईंधन)की लाईन आदि आदि। कभी इधर मरम्मत तो कभी उधर मरम्मत। मोड़ पर कोई रैम्प या गेट बनाने की स्थिति में हमेशा दुर्घटना का अंदेशा रहेगा, दो तरफ एलिवेशन का सुधार करके अतिरिक्त व्यय करना होगा, दो तरफ गेट देकर उनकी सुरक्षा भी महंगी होगी, इस प्रकार कई ऐसे मसले हैं जो कॉर्नर के प्लॉट के लिए होते हैं । यदि आपका मकान टी पोजिशन पर है तो आने वाले वाहन की हेड लाइट से तेज रोशनी बार बार ओर लगातार आपके मकान पर आयेगी टी पर लेफ्ट या राइट मुडने वाला हार्न बजायगें जो प्रदूषण का कारण बनेगा।कार्नर के मकान पर टर्न करने वाला हार्न बजायगें यदि ट्रेन फगक सिडनल हुआ तो सिगनल पर रुकने से प्रदूषण बढेगा इसके अतिरिक्त मेन रोड पर रिहायशी मकान घातक होता है उसकी वजह प्रदूषण (हवा ,धूल और आवाज का ) हमेशा बना रहता है आपकी प्राइवेसी, आपके मकान के सामने चुनाव जलूस या अन्य समय लाउडस्पीकर एवं डी.जे की तेज आवाज, पार्किगं (अनधिकृत रूप से करने ) की समस्या रहती है। दोनों स्थितियों मे ।इन सब के अलावा इनकी कीमत ज्यादा देनी होती है, पंजीकरण का खर्चा 10% अधिक होता है । तथ्य और भी हैं,जैसे सेटबैक अधिकांश मामले मे चारों ओर छोडना पडता है जिससे कवर एरिया कम मिलता है वास्तु के अनुसार भी यदि सामना पूर्व मे है तो 50% स्थिति मे एक साइड दक्षिण दिशा मे होगी। यदि पश्चिम दिशा मे है तो भी एक साइड 50% मामले में दक्षिण दिशा होगी। यह पिछले 58 वर्षों के मेरे अनुभव पर आधारित हैं *कमलगर्ग* आर्किटेक्ट वास्तु विद पुलिस लाइन अजमेर श्री गर्ग जाने-माने श्रमिक नेता रहे हैं। प्रथम वर्ष कला इंटर ड्राइंग मुम्बई, जी. डी. आर्च, फोटोग्राफी में रीजनल कॉलेज से विशेष प्रशिक्षण प्राप्त और औद्योगिक प्रशिक्षण केन्द्र से सिविल नक्शा नवीस डिप्लोमा किए हुए हैं। उन्होंने जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग को सन् 1963 से सेवाएं दीं और जुलाई 2000 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर नगर निगम व नगर सुधार न्यास के अधिकृत तकनीकी विज्ञ (नक्शा स्वीकृत करने हेतु) के रूप में काम शुरू किया। वर्तमान में अनुपम आर्कीटेक्चुरल वक्र्स का संचालन कर रहे हैं।  लेखन के प्रति भी उनका रुझान रहा है और उन्होंने अनेक संगठनों की स्मारिकाओं का संपादन किया। उनसे 9414725669 पर संपर्क किया जा सकता है।

शनिवार, 12 सितंबर 2020

क्या फ्रिज में आटे का लोया रखने पर उसे भूत खाने को आते हैं?


आजकल की व्यस्त जिंदगी में आमतौर पर गृहणियां आटे को गूंथ कर उसका लोया फ्रिज में रख देती हैं, ताकि जब खाने का वक्त हो तो उसे तुरंत निकाल कर गरम रोटी बनाई जा सके। यह आम बात है। इसको लेकर संस्कृति की दुहाई देते हुए सोशल मीडिया में यह जानकारी फैलाई रही है कि यह उचित नहीं है। वो इसलिए कि आटे का लोया पिंड का रूप ले लेता है, जिसे ग्रहण करने के लिए भूत-प्रेत आ जाते हैं और अनेक प्रकार के अनिष्ट कर देते हैं। 

शास्त्रों का हवाला देते हुए कहा जाता है कि आटे के ये पिंड भूतों-प्रेतों को निमंत्रण देते हैं। ये उन अतृप्त आत्माओं को आकर्षित करते हैं, जिनके पिंड दान नहीं किए गए हैं । इस आटे पर उनकी नकारात्मक ऊर्जा का वास हो जाता है। इस आटे को खाने से पूरे परिवार पर इसका असर पड़ता है। प्रसंगवश बता दें कि इस तथ्य को इस बात से जोड़ा जाता है कि हिंदुओं में पूर्वजों एवं मृत आत्माओं को संतुष्ट करने के लिए पिंड दान की विधि बताई गई है। पिंडदान के लिए आटे का लोया, जिसे पिंड कहते हैं, बनाया जाता है। 

इसी संदर्भ में कहा जाता है कि आटे का लोया गोल होता है, वही मृतात्माओं को आमंत्रित करता है। यदि उस पर कुछ अंकित कर दिया जाए तो प्रेतात्माएं उस ओर आकर्षित नहीं होतीं। इस कारण कई महिलाएं आटे का लोया बनाने के बाद उस पर अंगुलियों के निशान अंकित कर देती हैं। यह निशान इस बात का प्रतीक होता है कि रखा हुआ पिंड पूर्वजों के लिए नहीं, बल्कि आम इंसानों के लिए है। जानकारी में ऐसा भी है कि महिलाएं आटा गूंथने के बाद उस पर अगुलियों के निशान बना कर उसमें पानी भर देती हैं। कुछ देर ऐसा करके रख देने से रोटियां मुलायम बनती हैं।

सवाल ये है कि सच क्या है? क्या वाकई भूत-प्रेत की धारणा के पीछे कोई वैज्ञानिक आधार है? या यूं ही प्रचलित मान्यता? 

जहां तक वैज्ञानिक तथ्य का सवाल है, ऐसा बताया जाता है कि आटा पानी के संपर्क में आने के बाद उसमें कई रासायनिक बदलाव आते हैं। ज्यादा समय तक रखने पर वे नुकसानदायक हो जाते हैं। अगर उसे फ्रिज में रख दिया जाए तो हानिकारक किरणों पर भी प्रभाव पड़ता है। उस आटे से बनी रोटी खाने से कई तरह की बीमारियां होने का खतरा रहता है।

दूसरी ओर जो लोग भूत-प्रेत का अस्तित्व ही नहीं मानते, वे उनके आकर्षित होने को सिरे से नकार देते हैं। जो भूत-प्रेत का अस्तित्व मानते भी हैं, तो उनका मानना है कि आटा गूंथ कर फ्रिज में रखने से भले ही बीमारी का खतरा हो, मगर उसका भूत-प्रेत के आकर्षण से कोई भी सम्बन्ध नहीं है। किसी भी भौतिक वस्तु का सेवन करने के लिए इन्द्रियों की आवश्यकता होती है। बिना इन्द्रियों के भौतिक वस्तुओं का सेवन नहीं किया जाता सकता। मृत्यु के बाद मनुष्य का सूक्ष्म शरीर, जिसे अक्सर भूत-प्रेत समझ लिया जाता है, केवल महसूस कर सकता है, भोग करने के लिए उसे इन्द्रियों की आवश्यकता होती है, जो कि उसके पास नहीं होतीं।

असल में दिक्कत ये है कि आटे के लोये को खाने के लिए भूत-प्रेतों के आने जैसे सवालों का सवाल है, उसका प्रचार करने वाले उसे शास्त्रोक्त तो बता देते हैं, मगर कभी जिक्र नहीं करते कि किस शास्त्र में ऐसा लिखा हुआ है। वे इस बात का भी जिक्र नहीं करते कि अमुक ऋषि ने इतने हजार लोगों पर प्रयोग करके यह तथ्य सिद्ध किया है। इसी कारण ऐसी बातें अंध विश्वास की श्रेणी में गिनी जाती हैं। बावजूद इसके भय के कारण कई उसे मान भी लेते हैं कि मानने में हर्ज ही क्या है? सच तो ये है कि कई लोग प्रचलित धार्मिक मान्यताओं से सहमत नहीं, मगर फिर भी उसकी पालना इसलिए कर देते हैं कि उससे नुकसान तो कुछ है नहीं। दिलचस्प बात ये है कि पिंड को खाने के लिए मृतात्माओं के आने वाली बात को जानते हुए भी अधिसंख्य महिलाएं व्यस्त जिंदगी में समय को बचाने के लिए अथवा आलस्य के कारण आटे का लोया बना कर फ्रिज में रखती हैं। 

हो सकता है कि भूत-प्रेत वाली बातें सच हों, मगर ऐसी बातें करने वालों को बाकायदा उस शास्त्र का हवाला देना चाहिए, अन्यथा लोग उसे अंध विश्वास ही करार देंगे। उनका मकसद भले ही संस्कृति को बचाना हो, मगर उनके बिना आधार के, केवल शास्त्र शब्द का हवाला देते हुए ऐसी बातें करने से उलटा संस्कृति का नुकसान ही होने वाला है। वे संस्कृति का बचाव नहीं, बल्कि उसका नुकसान कर रहे हैं।

-तेजवानी गिरधर

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गुरुवार, 10 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत कथा में तोता क्यों रखा जाता है?


हालांकि आकाश में स्वछंद विचरण करने वाले किसी पक्षी को पिंजरे में कैद रखना उचित प्रतीत नहीं होता, लेकिन हमारे यहां तोते को पालने का प्रचलन रहा है। उसे शुभ माना जाता है। चूंकि तोते की आवाज मीठी होती है और वह राम-राम जैसे कुछ शब्द आसानी से सीख लेता है, इस कारण कुछ लोग मनोविनोद के कारण उसे पालते हैं। शौक में कई लोग रंग-बिरंगी चिडिय़ाएं यथा लव बर्ड्स भी पालते हैं।

आपने देखा होगा कि जहां भी श्रीमद्भागवत कथा होती है तो वहां पर तोता रखा जाता है। अगर तोता उपलब्ध न हो तो कथा स्थल के मुख्य द्वार पर कार्ड बोर्ड का बना तोता टांगा जाता है। मैने स्वयं ने कई जगह ऐसा देखा है। स्वाभाविक रूप से यह जिज्ञसा होती है कि आखिर ऐसा क्यों किया जाता है?

पौराणिक जानकारी के अनुसार जैसे बंदर में हनुमान जी की उपस्थिति मानी जाती है, उसी प्रकार तोते को शुकदेव जी का प्रतिनिधि माना जाता है। ज्ञातव्य है कि शुकदेव जी ने राजन परीक्षित को श्रीमद्भागवत कथा सुनाई थी। शुकदेवजी का जन्म व्यासजी की पत्नी पिंगला के गर्भ से हुआ था, जिनके पेट में वह तोता 12 साल तक रहा था। उसने हिमालय की गुफा में उस वक्त  कथा सुन ली थी, जब भगवान शंकर पार्वतीजी को यह कथा सुना रहे थे और इस दौरान पार्वती जी को निद्रा आ गई। स्वयं भगवान शंकर के श्रीमुख से कथा के दस स्कंध सुनने के कारण तोते की महिमा हो गई। तोते को शुक भी कहा जाता है।

ऐसी मान्यता है कि तोते की मौजूदगी के बिना व्यास कथा का महत्व नहीं रहता। तोते को आसन दे कर उसकी पूजा किए बिना श्रीमद्भागवत कथा मान्य ही नहीं है। हालांकि कथा करने वाले को कथा व्यास की पदवी होती है, मगर तोते की मौजूदगी के बिना वह कथा फल प्रदान नहीं करती।

प्रसंगवश बता दें कि पक्षियों में तोता ऐसा पक्षी है, जो कि मनुष्य की तरह बोल सकता है, अगर उसे प्रशिक्षित किया जाए। वैज्ञानिकों के अनुसार तोते के मस्तिष्क का सेरीब्रम पार्ट काफी विकसित होता है, इसी कारण उसे मनुष्य की बोली का प्रशिक्षण दिया जा सकता है। 


-तेजवानी गिरधर

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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस शब्द उपयुक्त नहीं है?

इन दिनों आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का बोलबाला है। हर क्षेत्र में इसका उपयोग किया जा रहा है। यकायक ख्याल आया कि क्या आर्टिफिशियल षब्द उपयुक्त है...