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सोमवार, 22 मार्च 2021

मूर्ति को प्रसाद चढ़ाते समय पर्दा क्यों किया जाता है?


आप जानते ही हैं कि जब भी भगवान की मूर्ति को प्रसाद चढ़ाया जाता है तो प्रसाद चढ़ाने के बाद पर्दा किया जाता है, ताकि वे प्रसाद ग्रहण कर लें। यदि मंदिर में पर्दे की व्यवस्था नहीं है तो प्रसाद की थाली पर ही कपड़ा ढ़क दिया जाता है। बिना पर्दे के भी तो प्रसाद चढ़ाया जा सकता है, उसमें दिक्कत क्या है? मगर नहीं, पर्दा करते ही हैं। आखिर वजह क्या है?

कल्पना कीजिए कि आपने बिना पर्दे के प्रसाद चढ़ाया और मूर्ति से एक हाथ निकल कर प्रसाद उठाए तो आप पर क्या बीतेगी? या आपकी आंखों के सामने ही प्रसाद कम होता जाए, तो क्या आप उस दृश्य को देख पाएंगे? हम जानते हैं कि भगवान की मूर्ति से हाथ निकल कर प्रसाद ग्रहण करने आने वाला नहीं है। आ सकता होगा तो भी नहीं आएगा, क्योंकि भगवान रहस्य में ही रहना चाहता है। हालांकि पर्दा करने के बाद भी भगवान के प्रसाद ग्रहण करने के बाद प्रसाद का तौल वही रहता है। अर्थात वे सूक्ष्म रूप से प्रसाद ग्रहण करते हैं। उससे भी बड़ा सच ये है कि वे प्रसाद नहीं, बल्कि हमारे भाव ग्रहण करते हैं। फिर भी प्रसाद चढ़ाने के दौरान पर्दा करने की परंपरा है।

आप देखिए कि नागौर जिले बवाल माता मंदिर में देवी मां की प्रतिमा ढ़ाई प्याला शराब पीती है। यह रहस्यपूर्ण और चमत्कार है। मंदिर से श्रद्धालु को इतना दूर रख जाता है कि उसे यह तो पता लगे कि प्याला खत्म हो गया है, मगर खत्म होता दिखाई देता नहीं है। जब पुजारी मूर्ति के होंठों पर प्याला रखता है तो वह उसे देखता नहीं है, बल्कि अपना चेहरा विपरीत दिशा में कर देता है। क्यों? एक तो वह मर्यादा का पालन कर रहा होता है, दूसरा उसमें भी सामथ्र्य नहीं कि वह प्याले को खत्म होता देख सके। आपने लोक देवताओं के परचों की चर्चा भी सुनी होगी। वे चमत्कार करते हैं, मगर प्रत्यक्ष नहीं, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप में। 

एक बात और। जब भी किसी की मृत्यु होती है तो उसका सजीव शरीर निर्जीव हो जाता है। हलचल खत्म हो जाती है। मान्यता है कि उसमें से आत्मा निकल गई है। कल्पना कीजिए कि आत्मा निकलते वक्त दिखाई दे जाए तो हमारा क्या हाल होगा? इसीलिए प्रकृति ने ऐसी व्यवस्था की है। अपने उस रहस्य को छिपा लिया है। ऐसे ही मृत्यु के साथ ही जीवन भर की स्मृति पर ताला जड़ देती है। अगले जन्म में उसे कुछ भी याद नहीं रहता। कल्पना कीजिए कि हर किसी को पिछले जन्म की याद रह जाए तो पूरे संसार में आपाधापी मच जाएगी। इसीलिए प्रकृति ने रहस्य को ओढ़ दिया है।

असल में प्रकृति बहुत रहस्यपूर्ण है। वह रहस्यपूर्ण ही रहेगी। प्रकृति न तो रहस्य को उघाड़ती है और न ही उसने इमें इतनी शक्ति दी है कि हम पूरी तरह से उघाड़ सकें। इस तथ्य को हमने भी उसे स्वीकार कर लिया है। बेशक इंसान ने इसके राज के बहुत पर्दे उठाए हैं, मगर आज भी उसके अधिकतर रहस्य बापर्दा हैं। उन्हें उठाया नहीं जा सकेगा। अलबत्ता संकेत जरूर हासिल किए जा पाए हैं, आगे भी किए जा सकते हैं, मगर प्रकृत्ति को कभी भी नग्न नहीं किया जा सकेगा। अर्थात कोरा सच कभी नहीं देखा जा सकेगा। यदि किसी विरले को दिखाई भी दे जाता है तो उसकी जुबान पर ताला पड़ जाता है। वह जरूरी भी है।

असल में प्रकृति इसलिए रहस्यपूर्ण है, क्योंकि यह हमारी समझ की सीमा से परे है। प्रकृति में इतना कुछ है कि हमारी इंद्रियों की क्षमता उन तक नहीं पहुंच पाती। जैसे ब्रह्मांड में अनेक ध्वनियां विचरण कर रही हैं, मगर हमारे कान उन सब को सुनने की क्षमता नहीं रखते। हमें सीमित फ्रिक्वेंसी की आवाजें ही सुनाई देती है। हां, हमने ऐसे ट्रांसमीटर जरूर बना लिए हैं, जो उन ध्वनियों को पकड़ लेते हैं, मगर हमारे कान सीधे उनको नहीं पकड़ सकते। प्रकृति में और भी अनेक चीजें ऐसी हैं, जो हमारी बुद्धि से परे हैं। इसीलिए वे हमारे लिए रहस्यपूर्ण ही रहेंगी। सच बात तो यह है कि प्रकृति में चारों ओर चमत्कार बिखरे पड़े हैं। कई चमत्कारों की जड़ तक हम पहुंचे भी हैं। जैसे गुरुत्वाकर्षण की शक्ति। जब तक न्यूटन ने इस शक्ति का पता नहीं लगाया, तब तक कोई वस्तु ऊपर फैंकने पर वापस नीचे आ जाना हमारे लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। इसी प्रकार जब तक विज्ञान को यह पता नहीं था कि बारिश होती कैसे है, तब तक वह चमत्कार ही था कि आसमान से पानी कैसे बरस रहा है? विज्ञान बहुत अंदर तक गया है, लेकिन आज भी बहुत कुछ अछूता है। चिकित्सा विज्ञान ने शरीर को बहुत गहरे में जाना है, बीमारियों के इलाज तलाशे हैं, अंग प्रत्यारोपण तक करने में कामयाब हो गया है, मगर आज तक आत्मा नामक तत्व का पता नहीं लगाया जा सका है। शरीर मृत हो पर ऐसी कौन सी चीज है, जो निकल जाती है और कहां चली जाती है, इसका पता विज्ञान नहीं लगा पा रहा है। अलबत्ता, अध्यात्म ने इस पर काम किया है, लेकिन वह भी उसे तर्कपूर्ण तरीके से सिद्ध नहीं कर पाया है। आत्मा भ्रूण मे कब प्रवेश करती है, शरीर को छोडऩे पर उसकी आगे की यात्रा क्या होती है, उसे कर्म के अनुसार कैसे और कहां दंड दिया जाता है, वह सब कुछ शास्त्र बताता है, मगर वह विज्ञान की तरह उसे दो और दो चार की तरह साबित नहीं कर सकता। क्योंकि वह अनुभूति की वस्तु है और सारी अनुभूतियां अभिव्यक्त नहीं की जा सकतीं, क्योंकि प्रकृति की व्यवस्था रहस्यपूर्ण है।

यूं ते सारी प्राकृतिक शक्तियां अपने आप में चमत्कार ही हैं। क्या सूर्य का रोज उगना और अस्त होना चमत्कार नहीं है? वो तो हम आदी हो गए हैं, इस कारण हमें उसमें कुछ अनोखा नहीं दिखाई देता। क्या हमारा शरीर किसी चमत्कार से कम है? चमड़ी के एक हिस्से को दिखाई देता है, एक को सुनाई देता है, एक स्वाद का पता लगाता है तो एक गंध को महसूस करता है? मगर हमें सब कुछ सामान्य सा लगता है। वजह सिर्फ इतनी है कि कि हम अब उसके अभ्यस्त हो चुके हैं।

लब्बोलुआब, प्रकृति बहुत रहस्यपूर्ण है। कभी पूरी तरह से अनावृत्त नहीं की जा सकेगी। कम से कम सार्वजनिक रूप से तो नहीं। इसीलिए कई सुधि जन कहते हैं कि इसमें मत उलझो की प्रकृति कर रहस्य क्या है, बल्कि प्रकृति को केवल जीयो। उसका आनंद लो।


-तेजवानी गिरधर

7742067000

tejwanig@gmail.com

मंगलवार, 9 मार्च 2021

झूठ बोलने से कोई पाप नहीं लगता?

सत्य की बड़ी महिमा है। इतनी कि उसके लिए बाकयदा एक सूत्र है:- सत्यमेव जयते। अर्थात सत्य की सदा जीत होती है। सत्य को ईश्वर का ही रूप माना जाता है। इसीलिए यह शिक्षा दी जाती है कि सत्य बोलो, झूठ मत बोलो। झूठ बोलने से पाप लगता है। सवाल उठता है कि क्या झूठ बोलने से वाकई पाप लगता है? क्या विधि का कोई विधान है, जिसके तहत झूठ नामक पाप का दंड मिलता हो? बेशक सत्य के मार्ग पर चलने से आत्मशक्ति मजबूत होती है और असत्य के मार्ग पर चलने से न केवल प्रकृति अपितु सामाजिक व्यवस्था में दंड का भागी होना होता है, लेकिन क्या झूठ बोलने से भी कोई अपराध कारित होता है, जिसका प्रकृति दंड देती है? क्या यह सही है कि झूठ बोलने से कौआ काटता है, जैसा कि एक कहावत में कहा गया है। इस पर तो एक फिल्मी गीत भी बना हुआ है:- झूठ बोले कौआ काटे, काले कौए से डरियो।

गहन चिंतन-मनन के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि झूठ बोलने  प्राकृतिक रूप से कोई पाप नहीं लगता। प्रकृति इसका हिसाब भी नहीं लगाने बैठी कि उसे पाप की श्रेणी में डाल कर आपको दंड दे। असल में इसका कोई विधान नहीं है। वस्तुत: होता यह है कि जब भी हम झूठ बोलते हैं तो हमें पता होता है कि सत्य क्या है और हम निहित स्वार्थवश झूठ बोल रहे हैं। चूंकि झूठ बोलने का स्पष्ट भान होता है तो हमारे भीतर ही अपराध बोध जागृत होता है। यह बोध हमारी आत्मशक्ति को कमजोर करता है। आमतौर पर झूठ बोलने वाले के भीतर एक ग्रंथी बन जाती है, जो उसे कचोटती रहती है। उसका सुख-चैन छिन जाता है। कई लोग तो बात-बात में झूठ बोलने की आदी हो जाते हैं। अगर हम प्राकृतिक व्यवस्था में झूठ बोलने को पाप की श्रेणी में डालें तो कह सकते हैं कि झूठ बोलने से पाप लगता है। मगर सच ये है कि ऊपर का कोई विधान नहीं, बल्कि यह हमारे भीतर का विधान है। भीतर की रासायनिक क्रिया है।

झूठ बोलने का परिणाम ये होता है कि कई बार तो एक झूठ बोलने के बाद उसे छिपाने के लिए एक के बाद एक झूठ बोलने पड़ते हैं। इससे अपराध बोध और घनिभूत हो जाता है। दूसरा ये कि झूठ बोले हुए को याद भी रखना पड़ता है। सत्य की चूंकि एक ही होता है, इस कारण वह सदा जेहन में रहता है। अत: यथा संभव सत्य ही बोलना चाहिए। अगर आप सदा सच ही बोलते हैं तो आपको याद रखने की कोई जरूरत नहीं है। झूठ बोलने पर यह ख्याल रखना होता है कि पहले क्या झूठ बोला था। अमूमन वह कठिन हो जाता है और अंतत: वह पकड़ा जाता है। कहने का यही तात्पर्य है कि जब तक बहुत जरूरी न हो, झूठ नहीं बोलना चाहिए। 

हां, कई ऐसे भी मौके भी आते हैं, जबकि झूठ बोलना अनिवार्य हो जाता है। इस सिलसिले में एक कहानी आपने सुनी होगी। एक सत्पुरुष के सामने से गाय दौड़ती हुई गुजरी। एक कसाई उसके पीछे भागता हुआ आया और उस सत्पुरुष से पूछा कि गाय किस दिशा में गई है? अगर वह सच बोलता तो कसाई उस गाय तक पहुंच जाता और उसकी मौत सुनिश्चित थी, जिसके पाप का भागी वह भी होता, क्योंकि गाय की मौत में उसकी भी तनिक भूमिका होती। सत्परुष ने कुछ सोच कर झूठ बोला और कसाई को गलत दिशा बता दी। और इस प्रकार गाय मरने से बच गई। हालांकि सत्पुरुष सदा सच ही बोला करते थे, मगर उन्हें दूसरे की भलाई के लिए झूठ बोलना पड़ा। इस प्रसंग में झूठ बोलना उचित ही था। हालांकि सत्परुष को झूठ बोलने से अपराध बोध हुआ, मगर उसके गुरू ने बताया कि तुम्हारे एक छोटे से झूठ से गाय बच गई, इसलिए तुम्हें मलाल नहीं होना चाहिए। झूठ बोलने से तुम्हें जितनी ग्लानी हो रही है, उससे कई गुना अधिक गाय के बच जाने का पुण्य तुम्हें हासिल होगा। अर्थात कभी भलाई के लिए झूठ बोलना पड़ जाए तो झिझकना नहीं चाहिए। तब झूठ बोलना ही धर्म है। 


-तेजवानी गिरधर

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शनिवार, 5 दिसंबर 2020

अपनी गली में कुत्ता भी शेर क्यों होता है?


एक कहावत आपने सुनी होगी- अपनी गली में तो कुत्ता भी शेर होता है। वो इसलिए कि वह खुद को अपनी गली का राजा मानता है। किसी भी अन्य कुत्ते, सूअर, बिल्ली आदि को वह प्रवेश नहीं करने देता। आसन की महत्ता हम इंसान तो जानते ही हैं, एक कुत्ता तक इसका महत्व जानता है। वह गली में निर्माणाधीन मकान के पास डाले गए बजरी के ढ़ेर पर चढ़ कर बैठता है, और यह अहसास करता है मानो किसी सिंहासन पर बैठा हो। आसन ही क्या, वह अपना साम्राज्य अर्थात क्षेत्र तक बिजली के पोल या वृक्ष पर मूत्र विसर्जन करके तय करता है। गलती से वही कुत्ता किसी अन्य गली में पहुंच जाता है तो वहां का कुत्ता उस पर हावी हो जाता है और उसे दुम दबा कर भागना पड़ता है। इसका भावार्थ ये है कि अपने लिए सुरक्षित स्थान पर हर कोई पूरी क्षमता के साथ काम कर सकता है, जबकि असुरक्षित जगह पर वही प्रतिभा सशंकित हो कर कमजोर बनी रहती है। वस्तुत: महत्ता व्यक्ति की नहीं, बल्कि स्थान की होती है।

हम देखते हैं कि जितने भी ज्योतिषी, तांत्रिक आदि हैं, वे अपने नियत स्थान पर ही अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हैं। बेशक कोई ज्योतिषी अपनी विद्या का उपयोग कहीं पर भी बैठ कर कर सकता है, मगर सटीक भविष्यवाणी अपने आसन पर बैठ कर ही कर पाता है। नियत समय पर तो और भी अधिक बेहतर परिणाम देता है। अर्थात स्थान के साथ समय की भी विशेष महत्ता है। अमुक समय में उसकी विद्या पूरी तरह से सक्रिय होती है। इसी प्रकार हम देखते हैं कि तांत्रिक अपने सिद्ध स्थान पर ही तंत्र के प्रयोग करते हैं। सर्वविदित है कि राजा विक्रमादित्य अपने सिंहासन पर बैठ कर ही न्याय किया करते थे। 

श्रीमद्भागवत की कथा करने वाले कथावाचक इसीलिए पूजनीय हो जाते हैं, क्योंकि वे जिस आसन पर बैठ कर कथा करते हैं, उसे व्यास पीठ माना जाता है। व्यास पीठ की मर्यादाएं उच्च कोटि की होती हैं। स्थान का कितना असर पड़ता है, इसका अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि जब किसी जिला कलेक्टर से उसके निवास स्थान पर मिलते हैं तो उसका व्यवहार कुछ भिन्न होता है, जबकि उसके चैंबर में मिलते हैं तो उसका मिजाज कुछ और होता है। वह स्थान का प्रभाव है। तांत्रिक अथवा धर्मगुरू के उनके सिद्ध स्थान पर किए जाने वाले व्यवहार और अन्य स्थान पर किए जाने वाले व्यवहार में भिन्नता आप स्पष्ट महसूस कर सकते हैं। सिद्ध स्थान उनको न केवल मर्यादा में बांधता है, अपितु वही उन्हें शक्ति प्रदान करता है। आपने देखा होगा कि कई उपासक आम जिंदगी जीते हैं, मगर उपासना स्थल पर उनकी महत्ता कई गुना बढ़ जाती है। अजमेर के निकट राजगढ़ धाम की ही बात करें। इस धाम के उपासक श्री चंपालाल जी महाराज जब अपने आसन पर बैठ कर विशेष भाव अवस्था में शराब की अनगिनत बोतलें पी जाते हैं, तो लोग दांतों तले अंगुली दबाने को विवश हो जाते हैं। कैसी विचित्र बात है कि वे अपने ईष्ट को तो उनकी प्रिय मदिरा अर्पित करते हैं, जबकि उसी प्रांगण में हजारों भक्तों को जीवन को नष्ट करने वाली शराब का परित्याग करने की प्रेरणा देते हैं। बताते हैं कि उस स्थान पर शराब छोडऩे का संकल्प लेने वाले बाद में कभी शराब का सेवन नहीं करते। वह उस स्थान का प्रभाव है।

स्थान की महत्ता के बारे में एक श्लोक है:-

जानामि नागेश तव प्रभावम 

कण्ठस्थित गर्जसि शंकरस्य 

स्थानम प्रधानम, न च बलम प्रधानम 

द्वारस्थित को अपि न सिंघ:

स्थानं प्रधानम, न बलं प्रधानम।

इसका प्रसंग इस प्रकार है:-

एक बार भगवान विष्णु अपने वाहन गरुड़ पर बैठ कर शिवजी से मिलने कैलाश पर्वत पर पहुंचे। शिवजी के गले में पड़ा सर्प, गरुड़ को देख कर फूंकार मारता रहा। इस पर मन मसोस कर गरुड़ ने कहा- स्थानं प्रधानम न बलं प्रधानम। तेरा मेरा बैर हर कोई जानता है, लेकिन इस समय तू शिवजी के गले में है, इसलिए फूंकार मार रहा है। ये तेरे बल की नहीं, स्थान की प्रधानता है।

स्थान के महत्व को बताने वाली एक पोस्ट वाट्स ऐप पर देखी। पेश है:- 

आदमी की पोजीशन,

उसके व्यवहार में स्पष्ट दिखाई देती है

सुहागरात को दुल्हन बनी गधी भी इतराती है

गरीब से गरीब आदमी भी,

जब घोड़ी चढ़ता है, दूल्हा राजा बन जाता है

कुर्सी पर बैठा, छोटा सा जज भी,

बड़े-बड़े लोगों को जेल भिजवाता है

अदना सा ट्रेफिक हवालदार हाथ के इशारे से

सड़क के चौराहे पर बड़े-बड़े लोगों की गाडिय़ां रोक देता है

बाल जब सर पर उगते हैं

तो कुंतल बन लहराते, संवारे जाते हैं

वो ही बाल जब गालों पर उगने का दुस्साहस करते हैं,

रोज-रोज शेविंग कर काट दिए जाते हैं


एक लेखक श्री मदन मोहन बाहेती ने इस स्थिति की व्याख्या कुछ इस प्रकार की है:-

काजल जो लागे कहीं, तो कालिख कहलाय।

गौरी की आंखों अंजे, दूनो रूप बढ़ाय।।

बीस तीस की माखनी, दाल मिले जो आम।

पहुंची होटल मौर्या, हुए आठ सौ दाम।।

गौरी की गोदी रहे श्वान लिपट इतराय।

देख गली के कूकरे,भौंक भौंक चिल्लाय।।

रोड़ा पत्थर राह का हर कोई देय हटाय।

मंदिर में सिन्दूर लग निशदिन पूजा जाय।।

लब्बोलुआब ये कि स्थान की बड़ी महिमा है और हमें सदैव उसकी मर्यादाओं का पालन करना चाहिए। उस स्थान पर बैठे व्यक्ति को साधारण नहीं मान कर विशिष्ट समझना चाहिए।

-तेजवानी गिरधर

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बुधवार, 2 दिसंबर 2020

कुत्ते के छोटे पिल्ले अच्छे क्यों लगते हैं?


यह अटपटा शीर्षक सिर्फ आपको आकृष्ठ करने के लिए है। शीर्षक यह भी हो सकता था, होना चाहिए था, कि बच्चे अच्छे क्यों लगते हैं, मगर तब कदाचित आप शीर्षक देख कर ही छोड सकते थे। हालांकि यह भी इस आलेख का हिस्सा है, मगर डुबकी कुछ गहरी लगाने की कोशिश गई है। मेरे एक मित्र इन दिनों कुत्ते के दो पिल्लों को बड़े प्यार से पाल रहे हैं। वे इसका जिक्र करते रहते हैं। इसी प्रकार एक अन्य मित्र हाल ही ठाकुर जी का छोटा सा विग्रह ले कर आए हैं और उसका जिक्र करते वक्त बेहद अभिभूत हो जाते हैं। इन दो प्रसंगों से यह आलेख लिखने को प्रवृत्त हुआ हूं।
यह उस परम सत्ता की ही मेहरबानी है कि कुत्ते का पिल्ला भी कुछ लिखने को प्रेरित कर सकता है। 
आइये, असल बात पर आते हैं। हमें इंसान का बच्चा बहुत अच्छा लगता है। यह ठीक है, क्योंकि वह हमारी ही छोटी इकाई हैं। मगर आश्चर्य कि हर जानवर, यथा कुत्ता, बिल्ली, गाय, बंदर आदि के बच्चे भी अच्छे लगते हैं। नवजात और भी प्यारे लगते हैं। सजीव ही नहीं, निर्जीव भी छोटे अच्छे लगते हैं। बहुत छोटी कटोरी-थाली कितनी प्यारी लगती है? बहुत छोटी मूर्ति कितना आकर्षित करती है? क्या आपने इस पर कभी विचार किया है कि सामान्य से छोटी हर वस्तु हमें अच्छी क्यों लगती है?
जहां तक मनुष्य के बच्चे का सवाल है तो आमतौर पर वह इस कारण अच्छा लगता है, क्योंकि वे अबोध है, निर्विकार है। उसे दुनिया की चालबाजियां छू तक नहीं पाई हैं। इसी कारण हम उसे भगवान का रूप भी कह देते हैं। बच्चे की भौतिक जगत की यात्रा आरंभ हुई है। अभी वह सच्चा है, इस कारण हमें अच्छा लगता है। वही बच्चा जब बड़ा हो जाता है, चालाक हो जाता है, तब हमें अच्छा नहीं लगता। इसी प्रकार जानवरों के बच्चे भी मासूम व अबोध होने के कारण पसंद आते हैं। 
निर्विकार भाव के प्रति श्रद्धा के कारण ही हम गृहस्थ साधु-संत को सम्मान देते हैं, उनके आगे सिर झुकाते हैं, क्योंकि उसने इंद्रियों पर विजय हासिल कर ली है। अर्थात हम विकारयुक्त हैं, यह स्वीकार भी करते हैं, लेकिन साथ ही पसंद निर्विकार को करते हैं। खुद जमाने भर की बेईमानी करते हैं, मगर पसंद ईमानदार नौकर को करते हैं। हम झूठ बोलते हैं, मगर पसंद सच बोलने वाले को करते हैं। इसका क्या मतलब है? इसका मतलब है कि हमारा मौलिक रूप निर्विकार है और सारी चालाकी, बेईमानी सीखी हुई है। हमारा मौलिक स्वरूप सत्य है, असत्य तो हमने स्वार्थ के कारण सीख लिया है। हमें पता है कि वह ठीक नहीं, फिर भी उसे ही अपनाए हुए हैं। भौतिक जगत में जीने के लिए।
जरा गहरे में विचार करते हैं। अध्यात्म में कहा जाता है कि शून्य व पूर्ण एक ही हैं। जो पूर्ण है, उसे भगवान कहते हैं और चूंकि हम अपूर्ण हैं, इसलिए इंसान की श्रेणी में हैं। इसी प्रकार शून्य को भी ईश्वर का रूप माना जाता है। वहीं से यात्रा आरंभ होती है और पूर्णता को प्राप्त होती है। वह एक वर्तुल है। यानि शून्य कहें या पूर्ण, बात एक ही है। कैसी विरोधाभासी, मगर दिलचस्प बात है। चूंकि पूर्णता हासिल करना कठिन लगता है, इस कारण शून्य की ओर लौटना हमें पसंद है। यही भाव हमें हर छोटी, अति सूक्ष्म के प्रति आकर्षित करता है, चूंकि हर छोटा सजीव प्राणी शून्य के करीब है। अभी उसकी यात्रा आरंभ हुई ही है। वह शुद्ध है। जैसे-जैसे वह बड़ा होगा, उसमें विकार आना शुरू हो जाएंगे। छोटे के प्रति आकर्षण का यह भाव स्थूल वस्तुओं के प्रति भी आ जाता है। जैसे किसी भी देवी-देवता का छोटा सा विग्रह हमें खींचता है।
अब बात करते हैं पूर्णता की। दुनिया में बड़ा, और बड़ा, और और बड़ा होने व वस्तुओं को बनाने का भाव वस्तुत: पूर्णता को हासिल करने का भाव है। बहुत बड़ी इमारतें, बहुत विशाल मूर्तियां बनाने की होड़ क्या है, वही पूर्णता की ओर अग्रसर होने की कामना। लेकिन पूर्णता की ओर अग्रसर होने से हमारा अहम और घनीभूत हो जाता है। हालांकि पूर्ण हो चुकने पर भी अहम तिरोहित हो जाता है, मगर पूर्णता की ओर अग्रसर यात्रा के दौरान ऐसा प्रतीत होता है कि अहंकार बढ़ रहा है। पूर्ण होते ही ईश्वर से साक्षात्कार हो जाता है। अहम ब्रह्म में विस्तीर्ण हो जाता है। तभी ऋषि के मुंह से निकलता है- अहम ब्रह्मास्मि। मैं ही ब्रह्म हूं। यही उद्घोषणा अनलहक कह कर सूफी मंसूर-बिन-हल्लाज करता है। अर्थात मैं ही खुदा हूं। चूंकि इस प्रकार की घोषणा करने वाले में हमें दंभ नजर आता है, इस कारण शून्य, अहंकार मुक्त होना बेहतर माना जाता है। इसी कारण शून्य को पूर्ण से बेहतर माना जाता है। इसी क्रम में यह श्लोक भी प्रासंगिक है:-
ओम पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
भावार्थ - परमात्मा सभी प्रकार से सदा सर्वदा परिपूर्ण है। यह जगत भी उस परब्रह्म से पूर्ण ही है, क्योंकि यह पूर्ण उसी पूर्ण से ही उत्पन्न हुआ है। उस पूर्ण में से पूर्ण को निकाल देने पर भी वह पूर्ण ही शेष रहता है।
सूक्ष्म से सूक्ष्म होने व विशालतम होने की इच्छा का ही परिणाम है कि योगी अणिमा व महिमा की सिद्धि चाहता है। वह ईश्वर के करीब होने का उपाय है। आपको जानकारी होगी कि श्रीराम भक्त हनुमान को आठ सिद्धियां व नौ निधियां हासिल थीं। हनुमान चालीसा में उसका उल्लेख इस पंक्ति में आता है:- अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता, असवर दीन जानकी माता। आठ में से दो सिद्धियां बहुत महत्वपूर्ण हैं। एक अणिमा। यह पहली सिद्धि है। इसका अर्थ अपनी देह को एक अणु के समान सूक्ष्म करने की शक्ति से है।  वह शून्य की दिशा में ले जाती है।
दूसरी है महिमा। यह अणिमा के ठीक विपरीत प्रकार की सिद्धि है। महिमा सिद्धि हासिल होने पर साधक जब चाहे अपने शरीर को असीमित विशाल करने में सक्षम होता है। वह अपने शरीर को किसी भी सीमा तक फैला सकता है। जिस प्रकार ब्रह्मांड असीमित है, निरंतर विस्तीर्ण होता जा रहा है। महिमा ब्रह्मस्वरूप हो जाने की दिशा में बढ़ा कदम है।
अब आते हैं छोटे और बड़े के हमारे जीवन में महत्व का। किसी भी देवी-देवता अथवा ईष्ट का विग्रह जितना छोटा होगा, वह हमें अधिक एकाग्रता प्रदान करेगा। उसकी सेवा-पूजा में ध्यान अधिक केन्द्रित करने के कारण चित्त की एकाग्रता बढ़ेगी। इसी प्रकार विशाल से विशाल मूर्ति का जब हम दर्शन करेंगे तो उसके समक्ष हमारी तुच्छता का भान होगा। यह अवस्था हमारे अहम भाव को तिरोहित करेगी।

-तेजवानी गिरधर

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tejwanig@gmail.com

सोमवार, 12 अक्टूबर 2020

शुक्रिया कहीं उऋण होने की कीमिया तो नहीं?


किसी ने अगर हमारी मदद की है तो उसका शुक्रिया अदा करना और धन्यवाद देने का चलन है। इसी प्रकार कोई त्रुटि होने पर सॉरी कहने का भी रिवाज है। यह शिष्टाचार का अंग है। क्या शिष्टाचार के इतर भी इनका कोई महत्व है? कहीं ये ऋण से उऋण होने की कीमिया तो नहीं? यह सवाल अर्से से दिमाग में कुलबुलाता रहा है।

जैसे हिंदू धर्म में भी कोई मनौति पूरी होने पर भगवान को धन्यवाद  देने के लिए छोटा-मोटा अनुष्टान करने की प्रथा है, उसी प्रकार इस्लाम में तो बाकायदा शुक्राने की नमाज अदा की जाती है या शुक्राने की फातेहा दी जाती है। मैने ऐसे प्रकरण देखे हैं कि पुत्र के परीक्षा में उत्तीर्ण होने जैसे प्रसंग में भी मुस्लिम परिवार शुक्राने की फातेहा देते हैं। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे जैन दर्शन में कर्म का बंधन होने का प्राकृतिक विधान है, तो शुक्रिया अदा करना उस बंधन से मुक्त होने की दिशा में उठाया गया कदम है।

यह ठीक है कि आम जीवन में किसी को धन्यवाद देना शिष्टाचार की श्रेणी में आता है, मगर क्या भगवान के साथ भी औपचारिक शिष्टाचार निभाया जाता है। हो सकता है कि आम आदमी कोई उपकार करने की एवज में धन्यवाद की अपेक्षा करता हो। हो सकता है धन्यवाद देने के बाद आगे भी उपकार हासिल होने का मार्ग खुला रखने की अपेक्षा से ऐसा किया जाता हो। लेकिन क्या ईश्वर के साथ भी ऐसा है? क्या भगवान को भी अपेक्षा रहती है? क्या इससे उसको कोई फर्क पड़ता है? मुझे लगता है कि ऐसा नहीं है। अहोभाव प्रकट करना हमारा अपना विषय है। अहोभाव जागना ही चाहिए। दुआ भी तो उसी का रूप है। हम मानते हैं न कि अपने से बड़े का सम्मान करने अथवा उनकी सेवा करने पर बड़े के मन से दुआ निकलती है। यानि कि यह क्रिया की प्रतिक्रिया है। साथ ही इससे किसी भी काम का वर्तुल पूरा होता है। अनुष्ठान में भी यही होता है। बाकायदा पूर्णाहुति दी जाती है। आपने देखा होगा कि कई बुजुर्ग महिलाएं कोई काम होने की कामना से अपनी चुन्नी के कोने पर गांठ बांधती हैं। काम पूरा हो जाने पर ही गांठ खोलती हैं और प्रसाद चढ़ाती हैं। वह भी धन्यवाद देने की प्रक्रिया है।

नहीं पता कि शुक्रिया अदा करने से हम उऋण होते हैं या नहीं, मगर  मुझे लगता है कि ऐसा करने से हम एक किस्म के मानसिक बोझ से तो मुक्त होते ही हैं। जैसे कोई गलती होने पर सॉरी कहने से कहीं न कहीं हम उस दोष से मुक्त सा महसूस करते हैं, कि हमने माफी मांग ली और सामने वाले सॉरी स्वीकार कर ली।

परायों का शुक्रिया अदा करना व सॉरी फील करना सामान्य शिष्टाचार है, लेकिन यह शिष्टाचार मित्रता में करने की जरूरत नहीं मानी जाती। कहते हैं कि दोस्ती में न थैंक यू और न ही सॉरी। इसका अर्थ हुआ कि दोस्ती में किया गया उपकार व अनजाने में हुई चूक की गिनती नहीं की जाती। वैसे भी कहा जाता है न कि दोस्ती अर्थात जहां दो अस्त हो गए, एक ही हो गए। तो फिर हिसाब-किताब कैसा?

मेरा ऐसा मत है कि शुक्रिया अदा करना या धन्यवाद या साधुवाद देना सदाचरण में विनम्रता का प्रतीक है। विनम्रता अपने आप में बहुत बड़ा गुण है। यह अहम भाव से मुक्त कराता है। साथ ही इससे ऋण से उऋण होने की भाव अवस्था बनती है। उससे मानसिक शांति मिलती है। मेरा सुझाव है कि हर काम के साथ शुक्रिया अदा करना चाहिए। भोजन कर चुकने पर अन्न देवता का, पानी पी चुकने पर जल देवता का, फल खा चुकने पर वृक्ष देवता का, किसी पुष्प की गंध का आनंद लेने के बाद पुष्प का, किसी वृक्ष की छाया का लाभ लेने के बाद उस वृक्ष का मन ही मन धन्यवाद करना चाहिए। यह बहुत सुकून देगा। आपके जीवन में आनंद भर जाएगा। करके देखिए। 

-तेजवानी गिरधर

7742067000

tejwanig@gmail.com

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2020

एक बटन की गैर मौजूदगी ने हरवा दिया बेरिस्टर को


नियम की बड़ी महत्ता है। इस जगत में अनियामक कुछ भी नहीं। सभी विद्वान नियम की पालना पर जोर देते हैं। हम तो फिर भी अखिल ब्रह्मांड की बहुत छोटी, बहुत ही छोटी सी इकाई हैं, मगर स्वयं प्रकृति भी नियम की पालना करती है। बेशक उसमें भी कभी विक्षोभ होता है, मगर अमूमन वह भी नियम से बंधी हुई है। ऊर्जा व जीवन का स्रोत सूर्य भी नियम की पालना करता है। हजारों साल से नियत समय पर उगता है और अस्त होता है। सारे ग्रह नियम से सूर्य की परिक्रमा करते हैं। पृथ्वी भी परिक्रमा के साथ-साथ अपनी धूरि पर भी नियम से घूमती है, जिससे ऋतुएं भी नियमानुसार परिवर्तित होती हैं और दिन-रात होते हैं।

मैने नियम को जिस रूप में जाना है, उसे साझा करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा। मेरा अनुभव है कि जैसे हम यदि प्रकृति के नियमों के विरुद्ध कृत्य करते हैं तो अनेक तरह की आपदाओं को झेलते हैं, जैसे शासन-प्रशासन के नियम की अवहेलना करने पर दंड के भागी होते हैं, वैसे ही हम हमारे ही बनाए हुए नियम की ठीक से पालना न करने पर भी कष्ट के भागी होते हैं। जिस नियम के निर्माता हम स्वयं हैं, या जो नियम हमने अपने ऊपर खुद ओढ़ा है, हम उससे भी बंध जाते हैं। इसलिए सदैव वही नियम बनाएं, जिसकी पालना कर सकें।

नियम कुछ उदाहरण देखिए। प्रकृति ने हमारे शरीर को कुछ ऐसा बनाया है कि जैसे नियमों में उसे ढ़ालते हैं, वैसा ही हो जाता है। जैसे यदि हमने सुबह चार बजे उठने का नियम बनाया है तो वह शरीर की आदत बन जाता है। फिर अलार्म क्लॉक की जरूरत नहीं होती। खुदबखुद चार बजे नींद खुल जाती है। असल में शरीर के भीतर की घड़ी काम कर रही होती है। ठीक इसी प्रकार भोजन के साथ है। जितने बजे हमने खाने की आदत बनाई है, ठीक उसी समय पेट में चूहे दौडऩे लगते हैं। शरीर की घड़ी खाने को पचाने के लिए लीवर को सक्रिय कर देती है और उससे पित्त रस निकलने लगता है। शरीर ने अपना काम शुरू कर दिया, मगर यदि हमने व्यस्तता अथवा किसी ओर वजह से ध्यान नहीं दिया तो एसिडिटी हो जाती है।

एक और एंगल देखिए। विद्वान कहते हैं न कि जैसे भोजन समय पर करना चाहिए, वैसे ही भगवान की पूजा भी नियत समय पर करनी चाहिए। हालांकि हम किसी भी वक्त भगवान को याद कर सकते हैं, उसमें कोई बंदिश नहीं, मगर नियत समय पर पूजा करने का महत्व अलग है। उस वक्त चित्त की एकाग्रता अधिक हो जाती है। योग व ध्यान के साथ भी ऐसा है। निर्धारित समय पर ध्यान करने से जल्द ही ध्यान की अवस्था में आ जाते हैं। आपने देखा होगा कि यदि हमने किसी वार पर किसी मंदिर के दर्शन करने का नियम बनाया है, मगर किसी वजह से किसी दिन हम दर्शन करने नहीं जा पाते तो उस दिन एक अभाव सा छाया रहता है। मन में नियम की अवहेलना का भाव कचोटता रहता है। नियम से रोज सुबह टहलने वाला व्यक्ति किसी दिन टहलने नहीं जा पाता तो पूरे दिन सुस्ती सी छायी रहती है।

नियम की महत्ता बताने के लिए सुधिजन एक कहानी कहा करते हैं। आपने भी सुनी होगी। एक सज्जन गांव से दूर जंगल में स्थित एक मंदिर में प्रतिदिन दीया जलाने जाया करता था। एक दुष्ट ने भी नियम बना रखा था। वह दीया बुझा कर आता था। एक बार बहुत आंधी-तूफान आया। सज्जन की हिम्मत ने जवाब दे दिया। सुस्ती में नागा कर गया। मगर दुष्ट की कटिबद्धता अधिक प्रबल थी। वह ठीक समय पर दीया बुझाने पहुंच गया। इस पर उस मंदिर के देवता ने उसे अशीर्वाद दिया। इसलिए कि वह नियम का पक्का निकला। सवाल ये नहीं कि वह गलत काम कर रहा था, बल्कि ये कि गलत काम भी नियम से कर रहा था। ये कहानी काल्पनिक भी हो सकती है, मगर संदेश यही है कि नियमितता का जीवन में बहुत महत्व है। 

नियम, जो कि आदत जाता है, उसका एक और उदाहरण देखिए। एक  सुप्रसिद्ध बेरिस्टर के बारे में मान्यता थी कि उन्हें हराना आसान नहीं है। एक वकील ने तय किया कि वह उन्हें हरा कर ही मानेगा। उसने बेरिस्टर के लौंड्री वाले से सेटिंग की और उनके कोट का एक बटन हटवा दिया। बेरिस्टर ने जैसे ही कोर्ट में जिरह शुरू की तो उनकी जुबान लडख़ड़ाने लगी। वजह ये कि उनकी एक आदत थी कि बहस करते वक्त एक हाथ से बटन पर अंगुलियां घुमाया करते थे। आदत के मुताबिक बार-बार उनका हाथ बटन पर जा रहा था, मगर वहां पर बटन नहीं था। उनका माइंड सेट गड़बड़ा गया और वे ठीक से जिरह नहीं कर पाए व केस हार गए। है न दिलचस्प किस्सा।  एक छोटी सी आदत भी हमें कितना प्रभावित करती है।

कुल जमा बात ये कि प्रकृति के नियम तो हम पर लागू होते ही हैं, खुद अपने बनाए नियम भी लागू हो जाते हैं। उन्हें तोडऩे पर उतना की कष्ट होता है, जितना प्रकृति के नियम तोडऩे पर होता है।

-तेजवानी गिरधर

7742067000

tejwanig@gmail.com

मंगलवार, 15 सितंबर 2020

लड़कों की तुलना में लड़कियां अधिक धोखा देती हैं?


अव्वल तो दुनिया में सच्चा व नि:स्वार्थ प्यार दुर्लभ है। श्रीकृष्ण-राधा के बाद गिनाने भर के लिए हमारे पास लैला-मजनूं, शीरीं-फरहाद, रोमियो-जूलियट, सोनी-महिवाल, ढ़ोला-मरवण जैसे कुछ किस्से ही हैं। तभी तो एक फिल्मी गीत में यह पंक्ति लिखी गई है- किताबों में छपते हैं, चाहत के किस्से, हकीकत की दुनिया में चाहत नहीं है। बावजूद इसके लोग सच्चे प्यार के दावे करते हैं, तो हंसी आती है। चालीस-पचास साल पहले की बात फिर भी और थी, तब प्यार के इजहार के अवसर ही कम मिला करते थे। बंधन भी कई प्रकार के थे, इस कारण प्रेम संबंध उजागर भी कम ही होते थे। अलबत्ता उनमें निभाने जज्बा होता था। मगर अब हालात बदल चुके हैं। सामान्य सजातीय तो बहुत आम बात है, बल्कि अंतर्धामिक व अंतरजातीय प्रेम संबंध भी खुल कर सामने आने लगे हैं। कोई पेरामीटर तो तय नहीं किया जा सकता, मगर फिर भी आज जो प्रेम विवाह हो रहे हैं, उनमें अमूमन समझदार प्रेमी-प्रेमिका शादी से पहले हिसाब-किताब लगा लेते हैं। अर्थात स्टेटस का ख्याल रखने लगे हैं। वैसे यह है उचित, क्योंकि यदि समान आर्थिक हालात नहीं होंगे तो आगे जा कर विसंगति ही उत्पन्न हो सकती है। प्यार में जोड़-बाकी-गुणा-भाग करने के बाद भी ब्रेक अप की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। भारत जैसे विकासशील देशों में अलबत्ता इनकी संख्या कम है, मगर अमरीका जैसे विकसित देशों में हालात बहुत खराब हैं।

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इसकी वजह क्या है? कदाचित ऐसा इस कारण कि शादी से पहले ही इतनी करीबी हो जाती है कि एक-दूसरे की छोटी-छोटी कमियां भी दिखने लग जाती हैं और शादी की स्थिति आने से पहले ही एक दूसरे से विरक्ति के हालात उत्पन्न हो जाते हैं। जहां तक अरेंज मैरिज का सवाल है, उसमें छोटी-छोटी आदतें शादी के बाद पता लग पाती हैं, जिन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता है। सामाजिक दबाव भी इतना अधिक रहता है कि पति-पत्नी संबंध को निभाते हैं। 

जहां तक संबंध विच्छेद या ब्रेक अप का सवाल है, उसमें यह विचारणीय है कि उसकी पहल किस ओर से होती है। हमारी संस्कृति में ऐसा पाया जाता है कि वैवाहिक संबंधों में महिलाएं अमूमन एकनिष्ट होती हैं, जबकि पुरुष अपने आपको इस मर्यादा से मुक्त ही मानता है। परिस्थितियां भी महिलाओं को दायरे से बाहर निकलने की सुविधा कम देती हैं, जबकि पुरुष के मनोनुकूल रहती हैं। एक जमाना था, जबकि किसी लड़की का कोई मित्र भी होता था, तो वह उस संबंध को छिपा कर अपना भाई बताया करती थी। लड़के व लड़की के बीच दोस्ती को अच्छा नहीं माना जाता था। मगर स्वछंद माहौल में फेसबुक जैसी सोशल साइट्स ने काम बहुत आसान कर दिया है। अब लड़कियों को यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं होता कि अमुक लड़का उसका ब्वॉय फ्रेंड है। एकाधिक फेसबुक फ्रेंड होना भी आम बात हो चुकी है। मजे की बात ये है कि कुछ लड़कियां दस मित्रों में से सभी को अलग-अलग यही बताती हैं कि वे ही उनके वास्तविक प्रेमी हैं, बाकी के नौ केवल सिंपल फ्रैंड हैं।

खैर, महिला-पुरुष संबंधों पर मेरे एक परिचित ने कुछ भिन्न राय ही प्रकट की है, जो कबीर की उलटबांसी सी लगती है। पेशे से वे व्यवसायी हैं। कई देशों में घूम चुके हैं, अर्थात रह चुके हैं। अनेक महिलाओं के संपर्क में रहे हैं। उनका शौक भी है। उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर एक बहुत दिलचस्प जानकारी साझा की है।

उनका मानना है कि आपसी संबंधों में महिलाएं पुरुषों की तुलना में अधिक धोखा देती हैं। धोखा देने में माहिर भी अधिक होती हैं। उनके मन की थाह पाना बहुत मुश्किल होता है। हमारे यहां तो कहा भी गया है कि स्त्री का चरित्र और पुरुष का भाग्य देवता भी नहीं जान सकते। ऋषि-मुनि तक त्रिया चरित्र को नहीं समझ पाते थे।

एक बात और कही। वह यह कि कोई महिला अगर किसी पर पुरुष के संपर्क में है तो वह उस संबंध की पूरी वसूली करती है। वह जानती है कि जब पुरुष उसका दोहन ही करने आया है, तो उसकी एवज में पूरी वसूली करने में क्या हर्ज है।

बहरहाल, मैं न तो मेरे परिचित की बात से पूरी तरह से सहमत हूं और न ही पूरी तरह से असहमत। तटस्थ हूं, चूंकि अपनी दिमागदानी में बात ठीक से बैठी नहीं। हो सकता है, यह उनका निजी अनुभव हो। अगर उन्होंने इन संबंधों की गहराई में जाने की कोशिश की हो, तो शायद उनकी राय इसलिए बनी हो, क्योंकि पूर्व में अमूमन लड़के ही धोखा देते थे, लड़कियां निभाने की कोशिश करती थीं, जबकि अब वे भी समझदार हो गई हैं, इस कारण उनकी ओर से धोखा देने की घटनाएं बढऩे लगी हैं। स्वाभाविक रूप से यह बहस का विषय हो सकता है। आप ही निर्णय कीजिए। मेहरबानी करके कोई टिप्पणी करें तो उसका मकसद निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए होना चाहिए, न कि बकवास करने के लिए।

-तेजवानी गिरधर

7742067000

tejwanig@gmail.com

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस शब्द उपयुक्त नहीं है?

इन दिनों आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का बोलबाला है। हर क्षेत्र में इसका उपयोग किया जा रहा है। यकायक ख्याल आया कि क्या आर्टिफिशियल षब्द उपयुक्त है...