शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस शब्द उपयुक्त नहीं है?

इन दिनों आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का बोलबाला है। हर क्षेत्र में इसका उपयोग किया जा रहा है। यकायक ख्याल आया कि क्या आर्टिफिशियल षब्द उपयुक्त है। यह नकली इंटेलिजेंस कैसे हो सकता है। मेरी नजर में यह क्रिएटिव इंटेलिजेंस है, जिसमें इंटेलिजेंसी में क्रिएटिविटी की जाती है। इस सिलसिले में चैट जीपटी से पूछा गया कि उसकी राय क्या है तो उसका जवाब था कि विचार रोचक और विचारोत्तेजक है। “आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस” (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) शब्द वास्तव में मशीन द्वारा निर्मित या मानव-निर्मित बुद्धि पर जोर देता है, जबकि आज की अनेक एआई प्रणालियाँ केवल गणना ही नहीं करतीं, बल्कि लेखन, चित्रकला, संगीत, डिजाइन, शोध-सहायता और नए विचारों का संयोजन भी करती दिखाई देती हैं। इसी कारण आपको “क्रिएटिव इंटेलिजेंस” नाम अधिक उपयुक्त लग रहा है। लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है। “आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस” क्या बताता है?

यह बुद्धि मानव द्वारा बनाई गई है। मशीनें सीख सकती हैं, निर्णय ले सकती हैं, पैटर्न पहचान सकती हैं। इसमें केवल रचनात्मकता ही नहीं, बल्कि तर्क, योजना, भविष्यवाणी, अनुवाद, चिकित्सा विश्लेषण, रोबोट नियंत्रण आदि भी शामिल हैं। “क्रिएटिव इंटेलिजेंस” क्या बताता है?

आपका प्रस्ताव है कि एआई सृजनात्मक क्षमता पर जोर देता है।

कविता, कहानी, संगीत, चित्र, नए विचार उत्पन्न करने वाली प्रणालियों के लिए यह नाम आकर्षक लगता है। लेकिन यह एआई के गैर-रचनात्मक उपयोगों (जैसे मौसम पूर्वानुमान, बैंकिंग धोखाधड़ी पहचान, चिकित्सा निदान) को पूरी तरह नहीं समेट पाता।

दार्शनिक दृष्टि से आपका सुझाव एक गहरे प्रश्न की ओर इशारा करता है, क्या बुद्धि का सर्वोच्च रूप रचनात्मकता है? यदि हम मानें कि केवल गणना करने वाला तंत्र “बुद्धिमान” नहीं कहलाता, बल्कि नया अर्थ, नई कल्पना और नया समाधान उत्पन्न करने की क्षमता ही वास्तविक बुद्धिमत्ता है, तब “क्रिएटिव इंटेलिजेंस” वास्तव में अधिक सार्थक नाम प्रतीत हो सकता है।

यदि पूरे क्षेत्र का नाम बदलना हो तो “आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस” अभी भी अधिक व्यापक शब्द है। लेकिन जनरेटिव एआई (जो कविता, चित्र, संगीत, लेख आदि बनाती है) के लिए “क्रिएटिव इंटेलिजेंस” एक बहुत प्रभावशाली और भविष्यसूचक नाम हो सकता है। 


शनिवार, 25 अप्रैल 2026

नेता बडा या अधिकारी?

अपुन के दिमाग में आया कि सत्ता की गाड़ी को दो ही पहिये चलाते हैं, राजनेता और प्रशासनिक अधिकारी। दोनों में से एक के बिना भी सरकार नहीं चल सकती। मगर सवाल ये उठता है कि इनमें से बड़ा कौन? दोनों में कौन ज्यादा जिम्मेदार है?

एक अधिकारी से गुफ्तगू की तो वे बोले असल में सरकार तो अधिकारी और उसके नीचे का तंत्र चलाता है। राजनेता को तो कानून और नियमों की जानकारी तक नहीं होती। वह तो केवल मौखिक आदेश देता है, उनकी अनुपालना नियमों के अंतर्गत किसी प्रकार की जाए, यह रास्ता तो अधिकारी ही निकालता है। वैसे भी यदि नियम के खिलाफ कुछ हो जाए तो राजनेता का कुछ नहीं बिगड़ता, क्यों कि वह तो केवल जुबानी जमा-खर्च करता है, जबकि रिकार्ड के मुताबिक फंदा को अधिकारी और कर्मचारी के गले में ही पड़ता है। अगर प्रशासनिक तंत्र प्रभावी न हो तो राजनेता जो मन में आए, वही करे और इसके नतीजे में अराजकता ही हाथ आ सकती है। कुल मिला कर अधिकारी नकेल का काम करता है और उसी की वजह से सिस्टम चलता है। इस लिहाज से अधिकारी ही बड़ा और जिम्मेदार माना जाना चाहिए, मगर बावजूद इसके उसे दब कर चलना पड़ता है। इस वजह से, क्यों कि राजनेता चाहे जब उसे उठा कर दूर फिंकवा सकता है।

अपुन ने एक राजनेता का मन टटोला। उनका तर्क भी दमदार था। बोले- राजनेता ही बड़ा होता है। असल में सरकार बनी ही जनता के लिए है और जनता का दर्द राजनेता से ज्यादा कौन समझ सकता है। वह जनता में से उठ कर आता है, जनता के बीच ही रहता है और जनता के प्रति ही जवाबदेह होता है। आप ही सोचिये, हो भले ही रेलवे ट्रेक के कर्मचारी की वजह से ट्रेन एक्सीडेंट, मगर छुट्टी तो रेल मंत्री हो जाती है। इतना ही नहीं नेेता को हर पांच साल बाद जनता के सामने परीक्षा देने जाना पड़ता है। विपक्षी तो कपड़े फाड़ता ही है, खुद की पार्टी का भी टांग खींचने में लगा रहता है। जनता भी ऐसी है कि कब और किस वजह से फेल कर दे और कब पास, कुछ पता नहीं होता। दूसरी ओर अधिकारी केवल किताबों को रट कर या फिर टीप-टाप कर एक बार परीक्षा पास कर लेता है और ले-दे कर ऊंचे ओहदे पर पहुंच जाता है। फिर ताजिंदगी ए.सी. चेंबर में ऐश करता है। न तो जनता के पास जाने का झंझंट और न ही जनता से मिलने-मिलाने की परेशानी। दरबान ही नहीं घुसने देता। जनता उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती है। हद से हद उसका तबादला कर दो। जहां जाएगा, गाड़ी, बंगला, चपरासी, सब कुछ मिलेगा। अब आप ही बताइये, जिसका ज्यादा समर्पण और ज्यादा जवाबदेही है, वही तो ज्यादा जिम्मेदार हुआ।

दोनों की बातें सुन कर अपना तो सिर ही चकरा गया। कौन बड़ा और कौन ज्यादा जिम्मेदार? अपने लिए तो दोनों ही बड़े हैं। हां, अगर दोनों में से कोई भी गलती करे तो अपनी कलम के वार से बच नहीं सकते। और आप जानते हैं कि तलवार के वार से ज्यादा गहरा घाव करता है शब्द बाण। अरे..... आप कहीं ये तो नहीं समझ रहे कि अपुन  अपने आप को बड़ा साबित करने लगे हैं। अपुन कितने छोटे हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गर किसी नेता से अटके तो कुट जाएंगे और अधिकारी के जंच गई तो वह हमारी रिपोर्ट दर्ज नहीं होने देगा।


गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

क्या दवाइयां वास्तव में एक्सपायर होती हैं?

हम सब जानते हैं कि एक्सपायरी यानि अवधि पार दवाई नहीं लेनी चाहिए। जब भी दवाई खरीदते हैं तो उसकी एक्सपायरी डेट जरूर देखते हैं। सवाल उठता है कि क्या एक्सपायरी डेट के बाद दवाई नहीं लेनी चाहिए? क्या वह जहरीली हो जाती है?

इस बारे में जानकारों का मानना है कि “एक्सपायरी” का अर्थ अक्सर जैसा समझा जाता है, वैसा सीधा नहीं होता। वस्तुतः दवा पर लिखी एक्सपायरी डेट वह तारीख है, जिस तक निर्माता यह गारंटी देता है कि दवा पूरी शक्ति यानि पोटेंसी में होगी, सुरक्षित होगी और अपेक्षित असर देगी। यह तारीख वैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर तय की जाती है। अब सवाल यह कि एक्सपायर होने के बाद दवा का क्या होता है? जानकार कहते हैं कि एक्सपायरी के बाद दवा अचानक जहर नहीं बन जाती, तुरंत बेअसर नहीं होती, लेकिन उसकी ताकत धीरे-धीरे घटने लगती है। कुछ दवाओं में रासायनिक बदलाव हो सकता है। यानी दवा कम असरदार हो सकती है, न कि जरूरी तौर पर खतरनाक।

अब सवाल यह कि क्या सभी दवाएँ एक जैसी होती हैं? तो इसका जवाब है- नहीं। यहां बहुत फर्क पड़ता है। एक्सपायर हो चुकी एंटीबायोटिक, इंसुलिन, हार्ट की दवाइयां, एंटी-एपिलेप्टिक (मिर्गी की) दवाएं और आँखों के ड्रॉप्स (खास कर खुले हुए)

ज्यादा खतरनाक हो सकती हैं। इनमें एक्सपायरी के बाद कम असर भी जानलेवा हो सकता है। दूसरी ओर कम जोखिम वाली दवाइयों में पैरासिटामोल, विटामिन टैबलेट, एलर्जी की कुछ दवाएँ षामिल है। फिर भी नियमित सेवन के लिए इन्हें भी एक्सपायरी के बाद नहीं लेना चाहिए। 

एक दिलचस्प तथ्य भी जान लेते हैं। अमेरिका में सेना पर किए गए षोध में पाया गया कि कई दवाएँ सही स्टोरेज में एक्सपायरी के 5-15 साल बाद भी असरदार थीं। लेकिन यह प्रयोगशाला नियंत्रित स्थितियों में था, घरेलू हालात में नहीं।

कुल मिला का आम आदमी को क्या करना चाहिए? एक्सपायरी डेट को अंतिम सुरक्षा सीमा माने। जानलेवा या क्रॉनिक रोगों की दवाएँ एक्सपायरी के बाद न लें। हल्की समस्या में भी डॉक्टर व फार्मासिस्ट से पूछ ले। दवाएं ठंडी, सूखी और अंधेरी जगह रखे।

कुल मिला कर दवाएँ एक्सपायर होती हैं, लेकिन डराने के लिए नहीं, सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए। 

बुधवार, 1 अप्रैल 2026

कोर्ट में गीता पर ही हाथ क्यों रखा जाता है?

हम सब को जानकारी है कि न्यायालय में गवाही के दौरान गीता पर हाथ रखना होता है। सवाल उठता है कि गीता पर ही क्यों, हिंदुओं के दूसरे बडे ग्रंथ रामायण पर हाथ क्यों नहीं रखवाया जाता?

असल में अदालत में किसी भी धार्मिक ग्रंथ पर हाथ रखवाने का उद्देश्य यह होता है कि व्यक्ति ईश्वर या अपने नैतिक विश्वास के प्रति जवाबदेही महसूस करे और सच बोले। यह मनोवैज्ञानिक दबाव सत्य बोलने की संभावना बढ़ाता है। अब सवाल यह कि इसके लिए गीता ही क्यों चुनी गई। दरअसल सारगर्भित और दार्शनिक ग्रंथ गीता में धर्म, कर्तव्य और सत्य पर गहरा जोर है। हिंदू समाज के अधिकतर वर्गों में गीता को सार्वभौमिक सम्मान प्राप्त है। यह अपेक्षाकृत छोटी है, इसलिए शपथ के लिए व्यावहारिक रूप से उपयोगी मानी गई। यूं रामायण अत्यंत पूजनीय ग्रंथ है, फिर भी अदालतों में कम उपयोग के पीछे कुछ कारण जरूर होंगे। रामायण एक महाकाव्य कथा है, जबकि गीता सीधे उपदेशात्मक है। रामायण के कई संस्करण हैं (वाल्मीकि, तुलसीदास आदि), जिससे कौन-सा संस्करण? का प्रश्न उठ सकता है। इसके अतिरिक्त अंग्रेजी शासनकाल में जो प्रथा शुरू हुई, उसमें गीता को प्राथमिकता मिली और वही चलन बन गया। ब्रिटिश काल में जब भारतीय न्याय प्रणाली विकसित की गई, तब अंग्रेजों ने हिंदुओं के लिए एक प्रतीकात्मक धार्मिक ग्रंथ के रूप में गीता को चुना, जैसे ईसाइयों के लिए बाइबिल। यह चयन धीरे-धीरे परंपरा बन गया।

असल में आज भारतीय कानून में किसी विशेष ग्रंथ पर हाथ रखना अनिवार्य नहीं है। भारतीय शपथ अधिनियम 1969 के अनुसार व्यक्ति ईश्वर की शपथ ले सकता है या सिर्फ “सत्य कहने की प्रतिज्ञा” भी कर सकता है।

मंगलवार, 17 मार्च 2026

दवाइयां सिरहाने नहीं रखनी चाहिए

दवाइयां सिरहाने रखने से बीमारी से मुक्ति कठिन होती है, यह मान्यता भारत के कई हिस्सों में लोकविश्वास के रूप में मिलती है। यह धारणा मुख्यतः धार्मिक-सांस्कृतिक सोच, प्रतीकात्मक अर्थ और थोड़े-बहुत व्यावहारिक कारणों से बनी है।

भारतीय परंपराओं में सिर को शरीर का पवित्र और ऊर्जात्मक केंद्र माना जाता है। इसलिए सिरहाने ऐसी चीजें रखने से मना किया जाता है जो रोग, पीड़ा या नकारात्मकता का प्रतीक हों। दवा बीमारी का प्रतीक मानी जाती है। लोकमान्यता कहती है कि अगर दवा सिरहाने रखी हो तो रोग की “ऊर्जा” वहीं बनी रहती है, इसलिए रोग जल्दी नहीं जाता। यह धारणा धार्मिक ग्रंथों में स्पष्ट नियम के रूप में नहीं मिलती, बल्कि लोकपरंपरा में अधिक प्रचलित है।

कुछ लोग इसे वास्तु शास्त्र से भी जोड़ते हैं। वास्तु के अनुसार सोने के स्थान पर दवाइयां, जूते, लोहे की चीजें या बीमारी से जुड़ी वस्तुएं कम से कम रखनी चाहिए, क्योंकि इससे मानसिक रूप से रोग की स्मृति बनी रहती है। हालांकि विज्ञान में यह नहीं कहा गया कि सिरहाने दवा रखने से रोग ठीक नहीं होगा, लेकिन कुछ व्यावहारिक कारण जरूर हैं। कई दवाइयों को ठंडी और सूखी जगह में रखने की जरूरत होती है। सिरहाने रखने से बच्चों द्वारा गलती से खा लेने का भी खतरा रहता है। इसके अतिरिक्त कुछ दवाओं की गंध या रसायन नींद में असुविधा दे सकते हैं। अगर सोते समय दवा सामने दिखती रहे तो व्यक्ति को लगातार अपनी बीमारी की याद आती रहती है। इससे अवचेतन में रोग की चिंता बनी रहती है, जो स्वास्थ्य पर असर डाल सकती है। कुल जमा दवाइयों को सिरहाने रखने से बीमारी ठीक नहीं होगी, ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। यह मुख्यतः लोकविश्वास, वास्तु और मनोवैज्ञानिक कारणों से बनी परंपरा है।

बेहतर है कि दवाइयां अलग डिब्बे या अलमारी में सुरक्षित रखी जाएं।

शनिवार, 7 मार्च 2026

नाराजण बारेठ : पत्रकारिता जगत का निर्भीक स्वर हमेशा के लिए मौन हो गया

वरिष्ठ पत्रकार, प्रखर चिंतक, राजनीतिक विश्लेषक और राजस्थान के पूर्व सूचना आयुक्त Narayan Bareth के निधन के साथ ही पत्रकारिता जगत का एक निर्भीक और जनपक्षधर स्वर हमेशा के लिए मौन हो गया। वे उन पत्रकारों में थे जिन्होंने खबर को केवल पेशा नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रक्षा का माध्यम माना।

BBC, The Asian Age और The Pioneer जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से जुड़कर उन्होंने पत्रकारिता को वैचारिक गहराई और सामाजिक सरोकारों से जोड़ा। उनकी लेखनी में सत्ता से सवाल करने का साहस था, तो समाज के वंचित और हाशिए पर खड़े लोगों के प्रति गहरी संवेदना भी। वे उन पत्रकारों की परंपरा के प्रतिनिधि थे जिनके लिए निष्पक्षता केवल शब्द नहीं, बल्कि आचरण का मूल मंत्र होती है।

पत्रकारिता के साथ-साथ उन्होंने अकादमिक क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। University of Rajasthan के जनसंचार केंद्र तथा Haridev Joshi University of Journalism and Mass Communication में प्रोफेसर के रूप में उन्होंने अनेक युवा पत्रकारों को न केवल तकनीकी कौशल सिखाया, बल्कि पत्रकारिता की नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी का पाठ भी पढ़ाया। उनके विद्यार्थियों की एक पूरी पीढ़ी आज विभिन्न माध्यमों में सक्रिय है और कहीं न कहीं उनकी सीख को आगे बढ़ा रही है।

जब उन्होंने सूचना आयुक्त का दायित्व संभाला, तब भी उनकी मूल चिंता पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करने की रही। सूचना के अधिकार को उन्होंने लोकतंत्र की आंख और कान माना, जो जनता को शासन से प्रश्न पूछने की ताकत देता है।

नारायण बारेठ का जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि एक वैचारिक परंपरा के विराम जैसा है। उनकी बेबाक कलम, उनकी स्पष्ट दृष्टि और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता लंबे समय तक स्मरण की जाएगी।

पत्रकारिता के इस सजग प्रहरी को विनम्र श्रद्धांजलि। ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें और शोकाकुल परिवार को इस असह्य दुख को सहने की शक्ति दें।

बुधवार, 14 जनवरी 2026

दाल-बाटी-चूरमे की खोज कैसे हुई?

राजस्थान की पहचान यदि किसी एक व्यंजन से की जाए, तो दाल-बाटी-चूरमा का नाम सबसे पहले लिया जाएगा। यह केवल भोजन नहीं, बल्कि इतिहास, संघर्ष और लोकबुद्धि का सजीव उदाहरण है। बहुत कम लोग जानते हैं कि बाटी का जन्म किसी रसोई में नहीं, बल्कि रणभूमि की तपती रेत पर हुआ था।

इतिहासकारों और लोकपरंपराओं के अनुसार बाटी का उद्भव लगभग आठवीं सदी में हुआ, जब मेवाड़ में बप्पा रावल ने गुहिलोत वंश की नींव रखी। यह वह दौर था जब राजपूत शासक अपने राज्यों के विस्तार के लिए निरंतर युद्धरत रहते थे। युद्धकाल में हजारों सैनिकों के लिए ताजा भोजन जुटाना एक बड़ी चुनौती था। ऐसे ही एक अवसर पर सैनिकों ने सुबह आटे की लोइयाँ गूंथीं, लेकिन युद्ध छिड़ जाने के कारण वे उन्हें तपती रेत पर छोड़कर रणभूमि में चले गए।

शाम को लौटने पर वे लोइयाँ रेत में दब चुकी थीं। जब उन्हें बाहर निकाला गया तो दिनभर सूर्य और रेत की प्रचंड गर्मी से वे पूरी तरह पक चुकी थीं। थकान से चूर सैनिकों ने जब उन्हें खाया, तो स्वाद और तृप्ति ने सभी को चकित कर दिया। यहीं से जन्म हुआ बाटी का, एक ऐसा भोजन जो बिना बर्तन के, बिना निगरानी के पक जाता था और लंबे समय तक सुरक्षित भी रहता था।

धीरे-धीरे बाटी युद्धकालीन भोजन बन गई। सैनिक सुबह आटे की गोलियाँ बनाकर रेत में दबा देते और लौटकर उन्हें अचार, चटनी तथा ऊंटनी या बकरी के दूध से बने दही के साथ खाते। यह भोजन कम समय में तैयार होता और भरपूर ऊर्जा देता। बाद में बाटी आम जनजीवन में पहुँची और कंडों व अंगारों पर पकाई जाने लगी।

मुगल बादशाह अकबर के राजस्थान आगमन के साथ यह व्यंजन मुगल रसोई तक भी पहुँचा। मुगल खानसामों ने इसे उबालकर फिर सेंकने की विधि विकसित की, जिसे ‘बाफला’ नाम दिया गया। इस रूप में बाटी उत्तर भारत के कई हिस्सों में लोकप्रिय हो गई।

दाल-बाटी का संगम भी इतिहास की देन है। दक्षिण भारत से आए व्यापारियों ने बाटी को दाल के साथ चूर कर खाना शुरू किया। उस समय प्रचलित थी पंचमेल दाल- चना, मूंग, उड़द, तुअर और मसूर का मिश्रण, जिसमें घी या सरसों के तेल का तीखा तड़का लगाया जाता था। यही स्वाद आगे चलकर दाल-बाटी की पहचान बना।

चूरमा का जन्म भी संयोग से ही हुआ। लोककथाओं के अनुसार गुहिलोत कबीले के एक रसोइए से बाटियाँ गलती से गन्ने के रस में गिर गईं। नरम और मीठी बनी बाटियों ने नया स्वाद रच दिया। बाद में इसमें घी, मिश्री और इलायची का समावेश हुआ और बाटी को चूर-चूर कर बनाने के कारण इसका नाम पड़ा, चूरमा।

इस प्रकार दाल-बाटी-चूरमा किसी एक व्यक्ति की खोज नहीं, बल्कि समय, परिस्थिति और लोकजीवन की सामूहिक देन है। यह व्यंजन आज भी राजस्थान की थाली में इतिहास की खुशबू और परंपरा का स्वाद समेटे हुए है। युद्धभूमि से थाली तक का यह सफर, सचमुच अनूठा है।


आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस शब्द उपयुक्त नहीं है?

इन दिनों आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का बोलबाला है। हर क्षेत्र में इसका उपयोग किया जा रहा है। यकायक ख्याल आया कि क्या आर्टिफिशियल षब्द उपयुक्त है...