गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

क्या दवाइयां वास्तव में एक्सपायर होती हैं?

हम सब जानते हैं कि एक्सपायरी यानि अवधि पार दवाई नहीं लेनी चाहिए। जब भी दवाई खरीदते हैं तो उसकी एक्सपायरी डेट जरूर देखते हैं। सवाल उठता है कि क्या एक्सपायरी डेट के बाद दवाई नहीं लेनी चाहिए? क्या वह जहरीली हो जाती है?

इस बारे में जानकारों का मानना है कि “एक्सपायरी” का अर्थ अक्सर जैसा समझा जाता है, वैसा सीधा नहीं होता। वस्तुतः दवा पर लिखी एक्सपायरी डेट वह तारीख है, जिस तक निर्माता यह गारंटी देता है कि दवा पूरी शक्ति यानि पोटेंसी में होगी, सुरक्षित होगी और अपेक्षित असर देगी। यह तारीख वैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर तय की जाती है। अब सवाल यह कि एक्सपायर होने के बाद दवा का क्या होता है? जानकार कहते हैं कि एक्सपायरी के बाद दवा अचानक जहर नहीं बन जाती, तुरंत बेअसर नहीं होती, लेकिन उसकी ताकत धीरे-धीरे घटने लगती है। कुछ दवाओं में रासायनिक बदलाव हो सकता है। यानी दवा कम असरदार हो सकती है, न कि जरूरी तौर पर खतरनाक।

अब सवाल यह कि क्या सभी दवाएँ एक जैसी होती हैं? तो इसका जवाब है- नहीं। यहां बहुत फर्क पड़ता है। एक्सपायर हो चुकी एंटीबायोटिक, इंसुलिन, हार्ट की दवाइयां, एंटी-एपिलेप्टिक (मिर्गी की) दवाएं और आँखों के ड्रॉप्स (खास कर खुले हुए)

ज्यादा खतरनाक हो सकती हैं। इनमें एक्सपायरी के बाद कम असर भी जानलेवा हो सकता है। दूसरी ओर कम जोखिम वाली दवाइयों में पैरासिटामोल, विटामिन टैबलेट, एलर्जी की कुछ दवाएँ षामिल है। फिर भी नियमित सेवन के लिए इन्हें भी एक्सपायरी के बाद नहीं लेना चाहिए। 

एक दिलचस्प तथ्य भी जान लेते हैं। अमेरिका में सेना पर किए गए षोध में पाया गया कि कई दवाएँ सही स्टोरेज में एक्सपायरी के 5-15 साल बाद भी असरदार थीं। लेकिन यह प्रयोगशाला नियंत्रित स्थितियों में था, घरेलू हालात में नहीं।

कुल मिला का आम आदमी को क्या करना चाहिए? एक्सपायरी डेट को अंतिम सुरक्षा सीमा माने। जानलेवा या क्रॉनिक रोगों की दवाएँ एक्सपायरी के बाद न लें। हल्की समस्या में भी डॉक्टर व फार्मासिस्ट से पूछ ले। दवाएं ठंडी, सूखी और अंधेरी जगह रखे।

कुल मिला कर दवाएँ एक्सपायर होती हैं, लेकिन डराने के लिए नहीं, सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए। 

बुधवार, 1 अप्रैल 2026

कोर्ट में गीता पर ही हाथ क्यों रखा जाता है?

हम सब को जानकारी है कि न्यायालय में गवाही के दौरान गीता पर हाथ रखना होता है। सवाल उठता है कि गीता पर ही क्यों, हिंदुओं के दूसरे बडे ग्रंथ रामायण पर हाथ क्यों नहीं रखवाया जाता?

असल में अदालत में किसी भी धार्मिक ग्रंथ पर हाथ रखवाने का उद्देश्य यह होता है कि व्यक्ति ईश्वर या अपने नैतिक विश्वास के प्रति जवाबदेही महसूस करे और सच बोले। यह मनोवैज्ञानिक दबाव सत्य बोलने की संभावना बढ़ाता है। अब सवाल यह कि इसके लिए गीता ही क्यों चुनी गई। दरअसल सारगर्भित और दार्शनिक ग्रंथ गीता में धर्म, कर्तव्य और सत्य पर गहरा जोर है। हिंदू समाज के अधिकतर वर्गों में गीता को सार्वभौमिक सम्मान प्राप्त है। यह अपेक्षाकृत छोटी है, इसलिए शपथ के लिए व्यावहारिक रूप से उपयोगी मानी गई। यूं रामायण अत्यंत पूजनीय ग्रंथ है, फिर भी अदालतों में कम उपयोग के पीछे कुछ कारण जरूर होंगे। रामायण एक महाकाव्य कथा है, जबकि गीता सीधे उपदेशात्मक है। रामायण के कई संस्करण हैं (वाल्मीकि, तुलसीदास आदि), जिससे कौन-सा संस्करण? का प्रश्न उठ सकता है। इसके अतिरिक्त अंग्रेजी शासनकाल में जो प्रथा शुरू हुई, उसमें गीता को प्राथमिकता मिली और वही चलन बन गया। ब्रिटिश काल में जब भारतीय न्याय प्रणाली विकसित की गई, तब अंग्रेजों ने हिंदुओं के लिए एक प्रतीकात्मक धार्मिक ग्रंथ के रूप में गीता को चुना, जैसे ईसाइयों के लिए बाइबिल। यह चयन धीरे-धीरे परंपरा बन गया।

असल में आज भारतीय कानून में किसी विशेष ग्रंथ पर हाथ रखना अनिवार्य नहीं है। भारतीय शपथ अधिनियम 1969 के अनुसार व्यक्ति ईश्वर की शपथ ले सकता है या सिर्फ “सत्य कहने की प्रतिज्ञा” भी कर सकता है।

मंगलवार, 17 मार्च 2026

दवाइयां सिरहाने नहीं रखनी चाहिए

दवाइयां सिरहाने रखने से बीमारी से मुक्ति कठिन होती है, यह मान्यता भारत के कई हिस्सों में लोकविश्वास के रूप में मिलती है। यह धारणा मुख्यतः धार्मिक-सांस्कृतिक सोच, प्रतीकात्मक अर्थ और थोड़े-बहुत व्यावहारिक कारणों से बनी है।

भारतीय परंपराओं में सिर को शरीर का पवित्र और ऊर्जात्मक केंद्र माना जाता है। इसलिए सिरहाने ऐसी चीजें रखने से मना किया जाता है जो रोग, पीड़ा या नकारात्मकता का प्रतीक हों। दवा बीमारी का प्रतीक मानी जाती है। लोकमान्यता कहती है कि अगर दवा सिरहाने रखी हो तो रोग की “ऊर्जा” वहीं बनी रहती है, इसलिए रोग जल्दी नहीं जाता। यह धारणा धार्मिक ग्रंथों में स्पष्ट नियम के रूप में नहीं मिलती, बल्कि लोकपरंपरा में अधिक प्रचलित है।

कुछ लोग इसे वास्तु शास्त्र से भी जोड़ते हैं। वास्तु के अनुसार सोने के स्थान पर दवाइयां, जूते, लोहे की चीजें या बीमारी से जुड़ी वस्तुएं कम से कम रखनी चाहिए, क्योंकि इससे मानसिक रूप से रोग की स्मृति बनी रहती है। हालांकि विज्ञान में यह नहीं कहा गया कि सिरहाने दवा रखने से रोग ठीक नहीं होगा, लेकिन कुछ व्यावहारिक कारण जरूर हैं। कई दवाइयों को ठंडी और सूखी जगह में रखने की जरूरत होती है। सिरहाने रखने से बच्चों द्वारा गलती से खा लेने का भी खतरा रहता है। इसके अतिरिक्त कुछ दवाओं की गंध या रसायन नींद में असुविधा दे सकते हैं। अगर सोते समय दवा सामने दिखती रहे तो व्यक्ति को लगातार अपनी बीमारी की याद आती रहती है। इससे अवचेतन में रोग की चिंता बनी रहती है, जो स्वास्थ्य पर असर डाल सकती है। कुल जमा दवाइयों को सिरहाने रखने से बीमारी ठीक नहीं होगी, ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। यह मुख्यतः लोकविश्वास, वास्तु और मनोवैज्ञानिक कारणों से बनी परंपरा है।

बेहतर है कि दवाइयां अलग डिब्बे या अलमारी में सुरक्षित रखी जाएं।

शनिवार, 7 मार्च 2026

नाराजण बारेठ : पत्रकारिता जगत का निर्भीक स्वर हमेशा के लिए मौन हो गया

वरिष्ठ पत्रकार, प्रखर चिंतक, राजनीतिक विश्लेषक और राजस्थान के पूर्व सूचना आयुक्त Narayan Bareth के निधन के साथ ही पत्रकारिता जगत का एक निर्भीक और जनपक्षधर स्वर हमेशा के लिए मौन हो गया। वे उन पत्रकारों में थे जिन्होंने खबर को केवल पेशा नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रक्षा का माध्यम माना।

BBC, The Asian Age और The Pioneer जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से जुड़कर उन्होंने पत्रकारिता को वैचारिक गहराई और सामाजिक सरोकारों से जोड़ा। उनकी लेखनी में सत्ता से सवाल करने का साहस था, तो समाज के वंचित और हाशिए पर खड़े लोगों के प्रति गहरी संवेदना भी। वे उन पत्रकारों की परंपरा के प्रतिनिधि थे जिनके लिए निष्पक्षता केवल शब्द नहीं, बल्कि आचरण का मूल मंत्र होती है।

पत्रकारिता के साथ-साथ उन्होंने अकादमिक क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। University of Rajasthan के जनसंचार केंद्र तथा Haridev Joshi University of Journalism and Mass Communication में प्रोफेसर के रूप में उन्होंने अनेक युवा पत्रकारों को न केवल तकनीकी कौशल सिखाया, बल्कि पत्रकारिता की नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी का पाठ भी पढ़ाया। उनके विद्यार्थियों की एक पूरी पीढ़ी आज विभिन्न माध्यमों में सक्रिय है और कहीं न कहीं उनकी सीख को आगे बढ़ा रही है।

जब उन्होंने सूचना आयुक्त का दायित्व संभाला, तब भी उनकी मूल चिंता पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करने की रही। सूचना के अधिकार को उन्होंने लोकतंत्र की आंख और कान माना, जो जनता को शासन से प्रश्न पूछने की ताकत देता है।

नारायण बारेठ का जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि एक वैचारिक परंपरा के विराम जैसा है। उनकी बेबाक कलम, उनकी स्पष्ट दृष्टि और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता लंबे समय तक स्मरण की जाएगी।

पत्रकारिता के इस सजग प्रहरी को विनम्र श्रद्धांजलि। ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें और शोकाकुल परिवार को इस असह्य दुख को सहने की शक्ति दें।

बुधवार, 14 जनवरी 2026

दाल-बाटी-चूरमे की खोज कैसे हुई?

राजस्थान की पहचान यदि किसी एक व्यंजन से की जाए, तो दाल-बाटी-चूरमा का नाम सबसे पहले लिया जाएगा। यह केवल भोजन नहीं, बल्कि इतिहास, संघर्ष और लोकबुद्धि का सजीव उदाहरण है। बहुत कम लोग जानते हैं कि बाटी का जन्म किसी रसोई में नहीं, बल्कि रणभूमि की तपती रेत पर हुआ था।

इतिहासकारों और लोकपरंपराओं के अनुसार बाटी का उद्भव लगभग आठवीं सदी में हुआ, जब मेवाड़ में बप्पा रावल ने गुहिलोत वंश की नींव रखी। यह वह दौर था जब राजपूत शासक अपने राज्यों के विस्तार के लिए निरंतर युद्धरत रहते थे। युद्धकाल में हजारों सैनिकों के लिए ताजा भोजन जुटाना एक बड़ी चुनौती था। ऐसे ही एक अवसर पर सैनिकों ने सुबह आटे की लोइयाँ गूंथीं, लेकिन युद्ध छिड़ जाने के कारण वे उन्हें तपती रेत पर छोड़कर रणभूमि में चले गए।

शाम को लौटने पर वे लोइयाँ रेत में दब चुकी थीं। जब उन्हें बाहर निकाला गया तो दिनभर सूर्य और रेत की प्रचंड गर्मी से वे पूरी तरह पक चुकी थीं। थकान से चूर सैनिकों ने जब उन्हें खाया, तो स्वाद और तृप्ति ने सभी को चकित कर दिया। यहीं से जन्म हुआ बाटी का, एक ऐसा भोजन जो बिना बर्तन के, बिना निगरानी के पक जाता था और लंबे समय तक सुरक्षित भी रहता था।

धीरे-धीरे बाटी युद्धकालीन भोजन बन गई। सैनिक सुबह आटे की गोलियाँ बनाकर रेत में दबा देते और लौटकर उन्हें अचार, चटनी तथा ऊंटनी या बकरी के दूध से बने दही के साथ खाते। यह भोजन कम समय में तैयार होता और भरपूर ऊर्जा देता। बाद में बाटी आम जनजीवन में पहुँची और कंडों व अंगारों पर पकाई जाने लगी।

मुगल बादशाह अकबर के राजस्थान आगमन के साथ यह व्यंजन मुगल रसोई तक भी पहुँचा। मुगल खानसामों ने इसे उबालकर फिर सेंकने की विधि विकसित की, जिसे ‘बाफला’ नाम दिया गया। इस रूप में बाटी उत्तर भारत के कई हिस्सों में लोकप्रिय हो गई।

दाल-बाटी का संगम भी इतिहास की देन है। दक्षिण भारत से आए व्यापारियों ने बाटी को दाल के साथ चूर कर खाना शुरू किया। उस समय प्रचलित थी पंचमेल दाल- चना, मूंग, उड़द, तुअर और मसूर का मिश्रण, जिसमें घी या सरसों के तेल का तीखा तड़का लगाया जाता था। यही स्वाद आगे चलकर दाल-बाटी की पहचान बना।

चूरमा का जन्म भी संयोग से ही हुआ। लोककथाओं के अनुसार गुहिलोत कबीले के एक रसोइए से बाटियाँ गलती से गन्ने के रस में गिर गईं। नरम और मीठी बनी बाटियों ने नया स्वाद रच दिया। बाद में इसमें घी, मिश्री और इलायची का समावेश हुआ और बाटी को चूर-चूर कर बनाने के कारण इसका नाम पड़ा, चूरमा।

इस प्रकार दाल-बाटी-चूरमा किसी एक व्यक्ति की खोज नहीं, बल्कि समय, परिस्थिति और लोकजीवन की सामूहिक देन है। यह व्यंजन आज भी राजस्थान की थाली में इतिहास की खुशबू और परंपरा का स्वाद समेटे हुए है। युद्धभूमि से थाली तक का यह सफर, सचमुच अनूठा है।


शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

हम कुछ याद करते वक्त सिर क्यों खुजाते हैं?

आम तौर पर जब भी हम कुछ सोचते या याद करते वक्त सिर खुजाते हैं। यह आदत बहुत साधारण लगती है, लेकिन इसके पीछे दिमाग, शरीर और मनोविज्ञानक, तीनों की मिली-जुली भूमिका होती है। मान्यता है कि जब हम कुछ याद करते या गहराई से सोचने लगते हैं, तो मस्तिष्क में रक्त प्रवाह और तंत्रिका गतिविधि बढ़ जाती है। सिर की त्वचा में हल्की-सी संवेदना पैदा होती है, जिसे हम अनजाने में खुजली या झुनझुनी के रूप में महसूस करते हैं। सिर खुजाना एक तरह का “फोकस जेस्चर” है। जैसे कोई पेन घुमाता है या उंगलियां चटकाता है, वैसे ही यह क्रिया दिमाग को संकेत देती है कि “अब सोचना है”। कुछ याद नहीं आ रहा होता या दिमाग अटका हुआ होता है, तो हल्का तनाव पैदा होता है। सिर खुजाना उस तनाव को निकालने का एक स्वतःस्फूर्त तरीका बन जाता है। सिर पर हल्का-सा स्पर्श दिमाग को एक छोटा “झटका” देता है, जिससे अटकी हुई स्मृति या विचार को निकलने में मदद मिलती है। इसे यूं कहा जा सकता है कि जब “दिमाग के पहिए जाम हो जाएं, तो हाथ जाकर सिर पर लग जाता है, ताकि पहिये चलायमान हों।” आपको यह भी ख्याल में होगा कि सभी लोग सिर नहीं खुजाते, कुछ लोग ठुड्डी सहलाते हैं, कुछ नाक छूते हैं, कुछ आँखें बंद कर लेते हैं। यानि तरीका अलग-अलग, मगर उद्देश्य एक ही कि सोच को सक्रिय किया जाए।

कालजयी आरती ओम् जय जगदीश हरे के रचयिता कौन थे?

ओम् जय जगदीश हरे, आरती आज हर हिन्दू घर में गाई जाती है। इस आरती की तर्ज पर अन्य देवी-देवताओं की आरतियां बन चुकी है और गाई जाती है, परंतु इस मूल आरती के रचयिता कौन हैं, इस बारे में भिन्न भिन्न धारणाएं हैं। कुछ लोग बताते हैं कि यह आरती तो पौराणिक काल से गाई जाती है, तो कुछ इस आरती को वेदों का एक भाग बताते हैं। किसी ने कहा कि सम्भवतः इसके रचयिता अभिनेता मनोज कुमार हैं। कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि इस आरती के रचयिता थे पंडित श्रद्धाराम शर्मा या श्रद्धाराम फिल्लौरी। पंडित श्रद्धाराम शर्मा का जन्म पंजाब के जिले जालंधर में स्थित फिल्लौर शहर में हुआ था। वे सनातन धर्म प्रचारक, ज्योतिषी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, संगीतज्ञ तथा हिन्दी और पंजाबी के प्रसिद्ध साहित्यकार थे। उन्होंने वैसे तो किसी प्रकार की औपचारिक शिक्षा हासिल नहीं की थी परंतु उन्होंने सात साल की उम्र तक गुरुमुखी में पढाई की और दस साल की उम्र तक वे संस्कृत, हिन्दी, फ़ारसी भाषाओं तथा ज्योतिष की विधा में पारंगत हो चुके थे। उन्होने गुरूमुखी में सिक्खां दे राज दी विथियां और पंजाबी बातचीत जैसी पुस्तकें लिखीं। सिक्खां दे राज दी विथियां में उन्होने सिख धर्म की स्थापना और इसकी नीतियों के बारे में बहुत सारगर्भित रूप से बताया था। यह पुस्तक लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय साबित हुई थी और अंग्रेज सरकार ने तब होने वाली आईसीएस परीक्षा के कोर्स में इस पुस्तक को शामिल किया था।

पं. श्रद्धाराम शर्मा गुरूमुखी और पंजाबी के अच्छे जानकार थे और उन्होंने अपनी पहली पुस्तक गुरूमुखी मे ही लिखी थी परंतु वे मानते थे कि हिन्दी के माध्यम से ही अपनी बात को अधिकाधिक लोगों तक पहुंचाया जा सकता है। हिन्दी के जाने माने लेखक और साहित्यकार पंडित रामचंद्र शुक्ल ने पंडित श्रद्धाराम शर्मा और भारतेंदु हरिश्चंद्र को हिन्दी के पहले दो लेखकों में माना है। उन्होंने 1877 में भाग्यवती नामक एक उपन्यास लिखा था, जो हिन्दी में था। माना जाता है कि यह हिन्दी का पहला उपन्यास है। इस उपन्यास का प्रकाशन 1888 में हुआ था। इसके प्रकाशन से पहले ही पंडित श्रद्धाराम का निधन हो गया, परंतु उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ने काफी कष्ट सहन करके भी इस उपन्यास का प्रकाशन करावाया था।

वैसे पं. श्रद्धाराम शर्मा धार्मिक कथाओं और आख्यानों के लिए काफी प्रसिद्ध थे। वे महाभारत का उद्धरण देते हुए अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जनजागरण का ऐसा वातावरण तैयार कर देते थे, उनका आख्यान सुनकर प्रत्येक व्यक्ति के भीतर देशभक्ति की भावना भर जाती। अंग्रेज सरकार ने 1865 में उनको फुल्लौरी से निष्कासित कर दिया और आसपास के गांवों तक में उनके प्रवेश पर पाबंदी लगा दी। 1870 में उन्होंने एक ऐसी आरती लिखी, जो भविष्य में घर-घर में गाई जाती थी। वह आरती थी ओम जय जगदीश हरे। पं. शर्मा जहां कहीं व्याख्यान देने जाते, ओम जय जगदीश आरती गाकर सुनाते। आज कई पीढियां गुजर जाने के बाद भी यह आरती गाई जाती है और कालजई हो गई है। इस आरती का उपयोग प्रसिद्ध निर्माता निर्देशक मनोज कुमार ने अपनी एक फिल्म में किया था और इसलिए कई लोग इस आरती के साथ मनोज कुमार का नाम जोड़ देते हैं।

पं. शर्मा सदैव प्रचार और आत्म प्रशंसा से दूर रहे थे। शायद यह भी एक वजह हो कि उनकी रचनाओं को चाव से पढने वाले लोग भी उनके जीवन और उनके कार्यों से परिचित नहीं हैं। 24 जून 1881 को लाहौर में पं. श्रद्धाराम शर्मा ने आखिरी सांस ली।

क्या दवाइयां वास्तव में एक्सपायर होती हैं?

हम सब जानते हैं कि एक्सपायरी यानि अवधि पार दवाई नहीं लेनी चाहिए। जब भी दवाई खरीदते हैं तो उसकी एक्सपायरी डेट जरूर देखते हैं। सवाल उठता है कि...