सोमवार, 10 मई 2021

शव यात्रा देखने को शुभ क्यों माना जाता है?


हमारे यहां लोग शगुन को बहुत महत्व देते हैं। यदि आप घर से कहीं  जा रहे हैं तो सामने पानी से भरा घड़ा सिर पर रख कर लाती महिला, झाड़ू लगाती हरिजन महिला, गाय आदि आने पर शुभ माना जाता है। मान्यता है कि ऐसा होने पर आप जिस काम से जा रहे हैं, उसके पूर्ण होने की संभावना बढ़ जाती है। कई लोग तो शुभ कार्य के लिए घर से बाहर जाते वक्त बाकायदा घड़ा या कलश सिर पर लिए हुए घर की ही किसी महिला को खड़ा कर देते हैं। इसी प्रकार जाते समय मार्ग में सामने से किसी की शव यात्रा आती दिखाई दे तो भी यह पक्के तौर पर माना जाता है कि हम जिस कार्य के लिए निकले हैं, वह जरूर पूर्ण होगा। रुके हुए काम पूरे होंगे। यह एक ऐसी मान्यता है, जो कि आम तौर पर चलन में भी है। लोग शव यात्रा देखने पर हाथ जोड़ कर खड़े हो जाते हैं। यदि किसी वाहन में हैं तो उससे उतर कर खड़े हो कर हाथ जोड़ते हैं और शव यात्रा के निकल जाने तक रुकते हैं। कदाचित श्रद्धा के भाव से। कई लोग शिव-शिव का उच्चारण करते हैं। इसके साथ ही मृतात्मा की शांति के लिए प्रार्थना भी करते हैं। ज्ञातव्य है कि शिव का मतलब होता है मुक्ति, इसलिए शव को देखकर शिव का नाम लेना अच्छा माना जाता है।

यह तो हुई मान्यता की बात, मगर शव यात्रा सामने से आने पर उसे शुभ क्यों माना जाता है, इस बारे में शास्त्रों बहुत पुख्ता जानकारी उपलब्ध नहीं है। यानि कि यह तथ्य अनुभव के आधार पर स्थापित किया गया है। कुछ जानकार लोग मानते हैं कि शिव शिव का उच्चारण करने और मृत आत्मा की शांति की प्रार्थना करने से वह प्रसन्न होती है और अपने साथ उस प्रणाम करने वाले व्यक्ति के सभी कष्टों, दुखों और अशुभ लक्षणों को अपने साथ ले जाती है।

प्रसंगवश शव यात्रा से जुड़ी यह मान्यता भी ख्याल में आती है कि जब किसी बुजुर्ग का निधन होने पर उसकी शव यात्रा के दौरान उस पर सिक्के उछाले जाते हैं। उन सिक्कों को लोग लूटते हैं या जमीन पर गिर जाने पर उठाते हैं। मान्यता है कि ऐसे सिक्कों को तिजोरी में रखने पर वह सदा भरी रहती है। इसका भी कोई तार्किक आधार मौजूद नहीं है। यह मात्र आस्था है, जो कदाचित अनुभव के आधार पर कायम हुई है।

-तेजवानी गिरधर

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गुरुवार, 6 मई 2021

मूर्ति पर पैसे फैंकना : ऐसे चढ़ाने से तो न चढ़ाएं वो अच्छा


मंदिरों में हमने अक्सर देखा होगा कि लोग चढ़ावे के नाम पर मूर्ति के आगे पैसे फैंकते हैं। विशेष रूप से तब तो यह दृश्य आम होता है, जब लोग रास्ते के मंदिर के सामने अपने वाहन से उतरना नहीं चाहते और बस या कार की खिड़की से ही मंदिर के गेट पर पैसे फैंकते हैं। कुछ पैसे अंदर पहुंच जाते हैं तो कुछ बाहर रह जाते हैं, जिन्हें राह चलते लोग उठा कर चलते बनते हैं।

कभी विचार किया है कि यह कृत्य कितना अशोभनीय और घटिया है। अरे एक भिखारी में यही चाहता है कि कोई उसे पैसे दे तो सम्मान से उसके कटोरे में डाल दे या हाथ में  पकड़ाए। अगर आप उसके कटोरे में दूर से पैसे फैंकगे या उसकी तरफ पैसे उछाल कर देंगे तो उसे बहुत बुरा लगता है। विचार कीजिए कि अगर हमें भी किसी मदद चाहिए और वह हमारी ओर पैसे या रुपए फैंक कर दे तो कैसा महसूस करेंगे। आप यही कहेंगे न कि कितना असभ्य है? मदद देने का ये कैसा तरीका है?

अब विचार कीजिए कि जिसे हम भगवान समझते हैं, सर्वशक्तिमान, वह कैसा महसूस करता होगा? अव्वल तो आपके भगवान को आपके पैसे की तनिक भी जरूरत नहीं है। आपके पास जो कुछ भी है, वह उसी का ही तो दिया हुआ है। वह आपसे लेने की कोई अपेक्षा नहीं करता। उसी का दिया हुआ उसी देकर आप कौन सा गौरव हासिल कर रहे हैं? वह तो आपका भाव है कि आप उसे भेंट दे कर रिझाने की कोशिश करते हैं। चंद रुपए चढ़ा कर उससे कई गुना की अपेक्षा करते हैं। कई बार तो वो भी पहले नहीं, बल्कि काम हो जाने पर अमुक रुपए का प्रसाद चढ़ाने का संकल्प लेते हैं। ये श्रद्धा नहीं, बल्कि सौदा है। सरासर व्यापार जैसा है।

चलो, यह मान भी लिया जाए कि भगवान आपकी भेंट से खुश होता है, मगर यदि आप उसकी ओर उछाल कर पैसा फैंकेंगे तो निश्चित ही उसे बुरा महसूस होता होगा। इससे बेहतर तो ये है कि आप पैसे चढ़ाएं ही नहीं। यदि चढ़ाने की वाकई श्रद्धा है तो या तो भेंट पात्र में डालें या फिर पुजारी के हाथ में दें। वैसे भी वह पैसा भगवान के काम नहीं आता, बल्कि पुजारी की आजीविका चलती है। यह अच्छा है कि पूरे दिन मंदिर में सेवा करने वाले की मदद हो जाती है, मगर उछाल कर इस प्रकार की मदद करना बेहद शर्मनाक है।


-तेजवानी गिरधर

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सोमवार, 3 मई 2021

क्या मोरनी मोर के आंसू से गर्भवती होती है?


बचपन में मैने एक प्रसंग सुना था। वो ये कि मोर मोरनी को रिझाते  वक्त अपने खूबसूरत पंखों को देख कर इठलाता है, लेकिन जैसे ही अपने बदसूरत पैर देखता है तो दुखी हो जाता है। उसकी आंखों से आंसू बहने लगते है। मोरनी तुरंत उसके आंसू पी लेती है और उसी से उसके भीतर प्रजनन की प्रक्रिया होती है।

असल में यह एक अवधारणा है। अनेक कथावाचकों को यह प्रसंग सुनाते हुए मैने देखा है। यह अवधारणा कहां से आई, पता नहीं, मगर ऐसा प्रतीत होता है कि भगवान श्रीकृष्ण के सिर पर बंधे मोर पंख की गरिमा को और महिमामंडित करने के प्रयास में ऐसी सोच निर्मित हुई होगी। सोच यह भी रही कि चूंकि मोर अन्य प्राणियों की तरह मादा से संसर्ग नहीं करता, इस कारण वह ब्रह्मचारी है। उसकी इसी विशेषता के कारण उसे राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया गया।

कुछ अरसा पहले राजस्थान हाईकोर्ट के जज श्री महेश शर्मा ने अपने कार्यकाल के आखिरी दिन एक अहम फैसले के दौरान इसी अवधारणा का हवाला दिया तो पूरे देश में खूब हो-हल्ला हुआ। उनकी खिल्ली भी उड़ाई गई कि इतना विद्वान व्यक्ति बिना पुख्ता जानकारी के कैसे ऐसी मिथ्या बात कर सकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि उनके दिमाग में प्रचलित अवधारणा ही थी। गलती सिर्फ ये हुई कि उन्होंने इसका वैज्ञानिक पहलु जानने की कोशिश नहीं की। 

बहरहाल, उनके वक्तव्य पर बहस शुरू हो गई और लोग ये सवाल करने लगे कि क्या ये मुमकिन है कि आंसू पीकर मोरनी गर्भवती हो जाए? इस पर पक्षी वैज्ञानिक अपना पक्ष लेकर सामने आए। उनका कहना था कि मोर और मोरनी भी वैसे ही बच्चे पैदा करते हैं, जैसे बाकी पशु-पक्षी। दरअसल वे अपने सुंदर पंख फैला कर मोरनी को मोहित करते हैं। मोरनी जब संसर्ग की सहमति दे देती है तो वे बाकायदा वैसे ही काम क्रीड़ा करते हैं, जैसे अन्य पक्षी। और इस तरह से वह गर्भवति होती है। 

विज्ञान के अनुसार प्रजनन के लिए नर-मादा का मिलाप जरूरी है। जिस समय इनका मिलाप होता है, नर मादा की पीठ पर सवार होता है। दोनों मल विसर्जन करने वाले अंग, जिसे कि क्लोका कहा जाता है, उसे खोलते हैं और इस प्रकार नर पक्षी अपना वीर्य मादा के शरीर में प्रविष्ठ करवाता है।

गूगल सर्च करने पर जानकारी मिली कि प्रोफेसर डॉ. संदीप नानावटी के अनुसार मोर शर्मिला पक्षी है, इसलिए वह एकांत मिलने पर ही सहवास करता है। कदाचित इसी वजह से लोगों में भ्रांति है कि मोर के आंसू पी कर मोरनी गर्भवती होती है। पक्षी विज्ञानी विक्रम ग्रेवाल का भी मानना है कि अन्य पक्षियों की तरह मोरनी से सहवास कर प्रजनन करता है। 

जहां तक मोर को राष्ट्रीय पक्षी घोषित करने का सवाल है तो जानकारी ये है कि मोर पहले भारत में ही पाया जाता था। राष्ट्रीय पक्षी के चुनाव की लिस्ट में मोर के साथ सारस व हंस के नाम थे। 1960 में राष्ट्रीय पक्षी चुनने पर विचार हुआ। उनमें यह एक राय बनी कि उसी पक्षी को राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया जाए जो देश के हर हिस्से में पाया जाता हो, उसे हर आम-ओ-खास जानता हो और वह भारतीय संस्कृति का हिस्सा हो। इन शर्तों पर मोर ही खरा उतरा। और इस प्रकार 26 जनवरी 1963 को मोर को राष्ट्रीय पक्षी घोषित कर दिया गया।

आंसू के जरिए प्रजनन होने के इस प्रसंग के साथ ही इस प्रकार एक प्रसंग और ख्याल में आता है। आपने रामायण सुनी-पढ़ी होगी। उसमें जिक्र आता है कि पवन पुत्र हनुमान जी बाल ब्रह्मचारी थे। अपनी पूंछ से लंका दहन के कारण उनको तीव्र पीड़ा हो रही थी। पूंछ की अग्नि को शांत करने के लिए समुद्र के निकट गए। इस दौरान उनको पसीना आया। उस पसीने की एक बूंद को एक मछली ने पी लिया था। उसी पसीने की बूंद से वह मछली गर्भवती हो गई। बाद में एक दिन पाताल के असुरराज अहिरावण के सेवकों ने उस मछली को पकड़ लिया। जब वे उसका पेट चीर रहे थे, तो उसमें से वानर की आकृति का एक मनुष्य निकला। वे उसे अहिरावण के पास ले गए। अहिरावण ने उसे पाताल पुरी का रक्षक नियुक्त कर दिया। यही वानर हनुमान पुत्र मकरध्वज के नाम से जाना गया। मकरध्वज ने अपने पैदा होने का वृतांत हनुमान जी को सुनाया। हनुमानजी ने अहिरावण का वध कर श्रीराम व लक्ष्मण को मुक्त कराया और उसे पाताल लोक का राजा नियुक्त कर दिया।

यह प्रसंग मोर-मोरनी के प्रसंग से मिलता जुलता है। तर्क ये दिया जा सकता है कि जब पसीने की बूंद से प्रजनन हो सकता है तो आंसू से क्यों नहीं हो सकता? सच्चाई क्या है, कुछ पता नहीं। शास्त्रों में बिना संसर्ग के अन्य तरीकों से प्रजनन के अनेक उदाहरण मौजूद हैं। उन पर विज्ञान ने अब तक कोई काम नहीं किया है।


-तेजवानी गिरधर

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रविवार, 2 मई 2021

मुझे वाह ड़े सिंधी वाह के नाम से पुकारने वाला चला गया


अरविंद गर्ग। शहर के लिए जाना-पहचाना नाम। शायद ही कोई राजनेता, अफसर, पत्रकार या सोसायटी के विभिन्न तबकों से जुड़ा कोई व्यक्ति उनसे अपिरिचित हो। बेशक उनकी पहचान एक पत्रकार के रूप में थी, मगर उनकी असल पहचान थी, हरदिल अजीज इंसान के रूप में। सदैव सहयोग के तत्पर उत्साही युवक के रूप में। बेहद प्यारा शख्स। दिल का साफ। हंसमुख। अफलातून टाइप की पर्सनल्टी। यायावर व्यक्तित्व। मजाकिया स्वभाव। गुस्से से कोसों दूर। बेबाक बयानी। कोई लाग-लपेट नहीं। साफगोई। सच को सच और झूठ को झूठ कहने का माद्दा। चाहे किसी को बुरा लग जाए। मस्त मौला, इतने कि गई कई बार शर्ट के बटन ऊपर-नीचे होने का भी भान नहीं रहता था। ये थे उनके विलक्षण गुण, जिनकी वजह से उन्होंने अजमेर में अपनी खास पहचान बनाई। उनके व्यक्तित्व की जितनी तारीफ की जाए, कम है। वस्तुत: ऐसे लोग विरले ही पैदा होते हैं।

उन्होंने मेरे साथ दैनिक भास्कर से पहले दिशा दृष्टि सांध्य दैनिक में भी काम किया। समाचार लेखन में सामान्य हिंदी का प्रयोग करते थे, अर्थात साहित्यिक रूप से बहुत पारंगत नहीं थे, मगर थे वे नंबर के वन खबरची। सांध्य दैनिक दिशादृष्टि छाया ही वरिष्ठ पत्रकार सुशील जी और उनकी वजह से। न जाने कहां से खबर खोद कर लाया करते थे। खूब धूम मचाई। बहुचर्चित अश्लील छायाचित्र कांड को प्रारंभिक तौर पर उजागर करने में इस जोड़ी का विशेष योगदान रहा। शहर की शायद ही कोई छोटी-मोटी घटना ऐसी होती थी, जो उनकी जानकारी में तुरंत न आती हो। उसकी वजह थी समाज के सभी तबके के लोगों के साथ उनकी अंतरगता। हर घटना पर पैनी नजर रखना उनके स्वभाव में था। दूसरी वजह थी, उनकी नया बाजारीय पृष्ठभूमि। उनका निवास व पैतृक व्यवसाय नया बाजार में ही है। सब जानते हैं कि नया बाजार में शहर की हर धड़कन स्पंदित होती है। इसी वजह से शहर की संस्कृति से भलीभांति परिचित थे। न्यूज की बीट उनकी चाहे जो रही, मगर दफ्तर में आते ही अन्य बीट के साथी पत्रकारों को बताया करते थे कि आज कहां क्या हुआ। उनकी इसी खासियत की वजह से स्थानीय संपादक डॉ. रमेश अग्रवाल के खास चहेते थे। छेडख़ानी उनकी फितरत में थी। वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रताप सनकत से उनकी खूब पटती थी। दोनों एक दूसरे को खूब छेड़ा करते थे। इसी प्रकार वरिष्ठ फोटोग्राफर सत्यनारायाण जाला के साथ भी उनका जमकर धोल-धप्पा हुआ करता था। अजयमेरु प्रेस क्लब के वे अहम हिस्सा थे। 

राजनीतिक गतिविधियों पर उनकी गहरी पकड़ रहा करती थी। कांग्रेस हो या भाजपा, हर पार्टी के नेता से उनके व्यक्तिगत संबंध थे। विशेष रूप से भूतपूर्व काबीना मंत्री स्वर्गीय श्री किशन मोटवानी के बहुत चहेते थे। दरगाह बादाम शाह में उनकी गहरी आस्था थी।

संवेदना से भरपूर यह इंसान किसी भी पत्रकार साथी को किसी संकट में देख कर तुरंत उसका समाधान करने में जुट जाता था। शहर की धड़कन से जुड़ा फागुन महोत्सव हो या कोई खेल गतिविधि या शायद ही कोई ऐसा सार्वजनिक आयोजन हो, जिसमें उनकी सहभागिता नहीं रहती हो। भास्कर के आरंभिक काल में आई समस्याओं के समाधान में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। तत्कालीन विशेष संवाददाता एस. पी. मित्तल के साथ भास्कर को शुरू में स्थापित करने में उन्होंने कंधे से कंधा मिला कर काम किया। प्रबंधन उनके इस ऋण से कभी उऋण नहीं हो पाएगा। उन दिनों का मजाक में गढ़ा गया एक किस्सा मुझे आज भी याद है। मित्तल जी की टीम ने 18-18 घंटे काम किया। हालत ये होती थी कि कई बार एक वक्त ही खाना खा पाते थे। एक बार अरविंद जी को कब्ज की शिकायत हो गई। तीन दिन तक लेट्रिन ही नहीं आई। वे डॉक्टर के पास गए। उन्होंने पूरी जांच करने के बाद पूछा कि आप काम क्या करते हो, वे बोले भास्कर में। इस पर डॉक्टर साहब का कहना था कि ये लो मेरी ओर से दो सौ रुपए। खाना खा लेना। लेट्रिन आ जाएबी। अगर खाना ही नहीं खाओगे तो लेट्रिन आएगी कैसे?


-तेजवानी गिरधर

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शनिवार, 1 मई 2021

ईश्वर पुरुष है या स्त्री?


हालांकि ईश्वर को त्रिगुणातीत और निराकार माना जाता है। उसका कोई लिंग नहीं, अर्थात न तो वह पुरुष है और न ही स्त्री। बावजूद इसके प्रचलन में यही है कि जब ही हम उसके बारे चर्चा करते हैं, जिक्र करते हैं तो उसे पुरुषवाचक के रूप में ही संबोधित करते हैं। कहते हैं न कि ईश्वर भला करेगा, वह सब पर कृपा करता है? जिससे प्रतीत होता है कि वह पुरुष है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर वास्तविकता क्या है? सवाल इसलिए भी स्वाभाविक है क्यों कि हमारी सोच के अनुसार वह पुरुष या स्त्री, कोई एक तो होगा। इन दोनों से इतर जो भी तत्त्व है, उससे हम अनभिज्ञ हैं। सिर्फ कल्पना ही कर सकते हैं।

इस विषय को लेकर विशेष रूप से ईसाई समुदाय में काफी बहस छिड़ी हुई है। चर्च ऑफ इंग्लैंड का एक समूह दैनिक प्रार्थना के दौरान ईश्वर को पुरुषवाचक के साथ ही स्त्रीवाचक के रूप में भी संबोधित करने की मांग कर रहा है। उसकी मांग में दम भी है। लेकिन दिक्कत ये है कि जब भी हम ईश्वर का जिक्र करते हैं तो स्वाभाविक रूप से बिना सर्वनाम के उसके बारे में चर्चा करना कठिन है। यह भाषा की भी समस्या है। या तो हमें उसे पुरुष या स्त्री वाचक शब्द से पुकारना होगा। पुरुषवादी समाज में उसे स्त्री के रूप में संबोधित करना हमें स्वीकार्य नहीं, इसलिए हम उसे पुरुष मान कर ही संबोधित करते हैं।

वस्तुत: ईश्वर एक सत्ता है, एक शक्ति केन्द्र है। वह स्वयंभू है। उसी सत्ता के अधीन संपूर्ण चराचर जगत संचालित हो रहा है। वह कोई व्यक्ति नहीं है। लेकिन चूंकि हम स्वयं व्यक्ति हैं, हमारी सीमित शक्ति है, इस कारण सर्वशक्तिमान की परिकल्पना करते समय हम उसे अपार क्षमताओं से युक्त एक महानतम व्यक्ति के रूप में देखते हैं। और चूंकि पूरी प्रकृति व समाज की व्यवस्था पुरुषवादी है, इस कारण उसके प्रति संबोधन में स्वाभाविक रूप से पुरुषवाचक शब्दों का चलन है। 

आइये, जरा हमारी पुरुष प्रधान व्यवस्था पर जरा चर्चा कर लें। असल में प्रकृति की गति नर व नारी की संयुक्त भूमिका से है। न तो आदमी अपेक्षाकृत बेहतर है और न ही औरत तुलनात्मक रूप से कमतर। बावजूद इसके समाज की संरचना में आरंभ से पुरुष की प्रधानता रही। यही वजह है कि धार्मिक, सामाजिक व पारिवारिक रूप से पुरुष अग्रणी रहा। आप देखिए, बेशक, नाम स्मरण करते हुए राधे-श्याम, सीता-राम, लक्ष्मी-नारायण कहा जाता है, अर्थात पहले स्त्री का नाम लिया जाता है, स्त्री तत्त्व को विशेष सम्मान दर्शाया जाता है, मगर सच्चाई ये है कि प्रधानता पुरुष की ही रही है। सारे भगवान पुरुष हैं। चित्रों में भगवान विष्णु शेष नाग पर लेटे होते हैं और माता लक्ष्मी उनके चरणों में बैठी दिखाई जाती है। अन्य भगवानों व देवी-देवताओं में भी पुरुष की ही प्रधानता है। धर्म की पुरस्र्थापना के लिए अवतार लेने वाले सभी भगवान पुरुष हैं। सारे आश्रमों के प्रमुख ऋषि रहे हैं। लगभग सारे मठाधीश पुरुष ही रहे हैं। सभी शंकराचार्य पुरुष हैं। अधिसंख्य मंदिरों में पुजारी पुरुष हैं। तीर्थराज पुष्कर में पवित्र सरोवर की पूजा-अर्चना पुरुष पुरोहित ही करवाते हैं। 

जैन धर्म की बात करें। जैन समाज के सभी तीर्थंकर पुरुष हैं। जैन मुनियों के नाम के आगे 108 व जैन साध्वियों के नाम के आगे 105 लिखा जाता है। उसके पीछे बाकायदा तर्क दिया जाता है जैन साध्वियों में जैन मुनियों की तुलना में तीन गुण कम हैं।

इस्लाम की बात करें तो पैगम्बर हजरत मुहम्मद साहब पुरुष है। सारे मौलवी पुरुष हैं। मस्जिदों में नमाज की इमामत पुरुष करते हैं। यहां तक कि सार्वजिनक नमाज के दौरान महिलाओं की सफें पुरुषों से अलग लगती हैं। अजमेर की विश्व प्रसिद्ध दरगाह ख्वाजा साहब की दरगाह में खिदमत का काम पुरुष खादिम करते हैं। दरगाह स्थित महफिलखाने में महिलाएं पुरुषों के साथ नहीं बैठ सकतीं। उनके लिए अलग से व्यवस्था है। जानकारी तो ये भी है कि दरगाह परिसर में महिला कव्वालों को कव्वाली करने की इजाजत नहीं है। इसी प्रकार इसाई धर्म में भी ईश्वर के दूत ईसा मसीह पुरुष हैं। गिरिजाघरों में प्रार्थना फादर करवाते हैं।

सामाजिक व्यवस्था में भी पुरुषों की प्रधानता है। अधिसंख्य समाज प्रमुख पुरुष ही होते हैं। पारिवारिक इकाई का प्रमुख पुरुष है। वंश परंपरा पुरुष से ही रेखांकित होती है। स्त्रियां ब्याह कर पुरुष के घर जाती हैं, न कि पुरुष स्त्री के घर। हमारे यहां तो पत्नी से अपेक्षा की जाती है कि वह पति को भगवान माने। पति की लंबी आयु के लिए पत्नियां करवा चौथ का व्रत करती हैं। इस तरह की धारणा चलन में हैं कि महिला यदि कोई पुण्य करे तो उसका आधा फल पुरुष को मिलता है, जबकि पुरुष को उसके पुण्य का पूरा फल मिलता है।

कुल मिला कर अनादि काल से पुरुष तत्व की प्रधानता रही है। सामाजिक व धार्मिक परंपराओं का ढ़ांचा बनाने वाले पुरुष हैं। यही वजह है कि लिंगातीत, निर्गुण, निराकार ईश्वर का जिक्र पुरुष वाचक शब्दों से करते हैं।

आखिर में एक बात पर गौर कीजिए। ईश्वर के बारे हम चाहे जितनी टीका-टिप्पणियां कर लें, लेकिन वह हमारी कल्पनाओं व अवधारणों से कहीं बहुत आगे है। उसका पार पाना कठिन ही नहीं, नामुमकिन है। वेद भी व्याख्या करते वक्त आखिर में नेति-नेति कह कर हाथ खड़े कर देते हैं।

-तेजवानी गिरधर

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मंगलवार, 27 अप्रैल 2021

रोंगटे क्यों खड़े होते हैं?


आपने कई बार महसूस किया होगा कि अचानक भय, उत्साह, खुशी या भावुकता की तीव्र अवस्था में आपके हाथ-पैरों के बाल खड़े हो जाते हैं। इसे रोंगटे खड़ा होना कहते हैं। अचानक ठंड लगने पर भी हाथ व पैर के बाल खड़े हो जाते हैं। हमारी तरह जानवरों के बाल भी खड़े होते हैं, जो साफ दिखाई देते हैं। उसकी वजह ये है कि उनके बालों का घनत्व अधिक होता है। आपने अचानक संकट आने पर बिल्ली के पूरे शरीर के बाल खड़े हो जाते हैं।

सवाल ये उठता है कि आखिर ऐसा होता क्यों है? वस्तुत: रोंगटे खड़े होने का सीधा संबंध हमारे स्नायु तंत्र है। जब भी हम किसी घटना की वजह से अति संवेदित होते हैं तो उसका सीधा असर स्नायु तंत्र पर पड़ता है। अर्थात जो व्यक्ति जितना संवेदनशील होगा, उसका स्नायु तंत्र भी उतना ही सक्रिय होगा। अचानक किसी कारण से भयभीत होने, संगीत के सुर गहरे तक छू जाने, यकायक खुशी मिलने, किसी वजह से अचानक उत्साहित होने पर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। यानि कि संवेदना की अतिरेक अवस्था में स्नायु तंत्र प्रभावित होता है और त्वचा की निचली सतह में हलचल होती है। विज्ञान की भाषा में समझें तो स्नायु तंत्र सक्रिय होने पर त्वचा के नीचे हेयर फॉलिकल्स पर असर पड़ता ओर उनमें संकुचन होता है। ऐसा होते ही बाल खड़े हो जाते हैं। इसको पाइलोरेक्शन कहा जाता है। 

जरा और गहरे से समझने की कोशिश करते हैं। यकायक खतरा या भय महसूस होता है तो हमारा स्नायु तंत्र उससे निपटने के लिए तैयार हो जाता है। इस दौरान दिल की धड़कन बढ़ जाती है, पसीना आता है और रोंगटे खड़े हो जाते हैं। भीतर का मौलिक मानव जाग जाता है। कुछ जानकारों का मानना है कि रोंगटे इसलिए खड़े होते हैं, ताकि हम संभावित खतरे के सामने बड़े नजर आएं। ये ठीक उस बिल्ली की तरह होता है, जो भय या गुस्से की अवस्था में बड़ी नजर आती है, क्योंकि उसके पूरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

संगीत सुनने के दौरान उसकी विशेष स्वर लहरी अथवा शब्दावली दिल को छू जाती है तो रोम-रोम खड़ा हो जाता है। इसे शरीर विज्ञानियों ने इस तरह से अभिव्यक्त किया है। वे कहते हैं कि दिमाग के दो भाग होते हैं। पहला इमोशनल और दूसरा कॉग्निटिव। इमोशनल भाग अपेक्षाकृत अधिक तेजी से प्रतिक्रिया देता है। वो किसी संगीत को शोर समझता है और रोंगटे खड़े कर सकता है, जबकि कॉग्निटिव भाग संगीत में मौजूद ध्वनि और संगीत को समझ कर हमें अच्छा महसूस कराता है। इस दौरान ऐड्रेनलिन हॉर्मोन के रिलीज होने के कारण आंसू भी आ जाते हैं।  

अचानक ठंड लगने पर रोंगटे खड़े होने के बारे में बताया गया है कि इसका मूल उद्देश्य शरीर को गर्म रखने में मदद करना होता है। जब आपको ठंड लगती है तो रोम छिद्रों के आसपास की मांसपेशियों में संकुचन होता है और रोम खड़े हो जाते हैं। स्नायु तंत्र के सक्रिय होते ही ठंड से मुकाबले के लिए गरमाहट पैदा हो जाती है।


-तेजवानी गिरधर

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मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

यूट्यूब पर ज्योतिष के नाम पर फैलाई जा रही है भयावहता


6 अप्रैल, 2021 को देव गुरू वृहस्पति का कुंभ राशि में गोचर हो गया। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस प्रमुख ग्रह के स्थान परिवर्तन से सभी राशियों की मौजूदा स्थितियों में काफी बड़ा बदलाव आने वाला है। विशेष रूप से कुंभ राशि वालों पर इसका व्यापक प्रभाव बताया जा रहा है। ऐसी स्थिति में स्वाभाविक रूप से सारे ज्योतिषी अपनी-अपनी जानकारी को बढ़-चढ़ कर यूट्यूब पर साझा कर रहे हैं। गृह परिवर्तन की वजह से बनने वाले योग को लेकर भिन्न-भिन्न भविष्यफल का यूट्यूब बड़ा हल्ला है।

एक ओर जहां स्थापित भविष्यवक्ता बाकायदा विस्तृत विश्लेषण के साथ पूरी विवेचना कर रहे हैं, वहीं ज्योतिष के क्षेत्र में नए-नए आए युवक अपने अधूरे ज्ञान को बघार कर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए घटिया हथकंडे अपना रहे हैं। न तो उनकी भाषा मर्यादित है और न ही ज्योतिष ज्ञान की गहरी समझ। सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण बात ये है कि वे अपने चैनल के व्यूअर बढ़ाने के लिए चवन्नी छाप हैडिंग लगा रहे हैं। उनके वीडियो को लोग ज्यादा से ज्यादा देखें, इसके लिए बहुत ही डरावनी हैडिंग व स्लोगन का इस्तेमाल कर रहे हैं। कोई हैडिंग में लिख रहा है कि अगले दो-तीन दिन में बर्बाद हो जाओगे तो कोई कह रहा है कि मौत आपका पीछा कर रही है।

आइये, ऐसी कुछ रोचक हैंडिंग्स पर नजर डालते हैं:-

कुंभ राशि वालों 6 अप्रैल के दिन घर जला देंगे दुश्मन, बचा लो। लड़कियां इस वीडियो को न देखें।

कुंभ राशि वालों, 6 अप्रैल को पुलिस का चक्कर लगेगा। 

कुंभ राशि वालों खेल खत्म होने वाला है।

कुंभ राशि वालों न चाह कर भी शारीरिक संबंध बनेंगे, अगले 48 घंटें में, सावधान रहें।

कुंभ राशि वालों, हो जाओ तैयार, अगले 3 दिन में जो होगा, सह नहीं पाओगे।

कुंभ राशि वालों, 6 और 7 अप्रैल को शरीरिक संबंध बनेंगे।

कुंभ राशि वालों, हो जाओ सावधान, अगले 3 दिन के अंदर सारी गर्मी उतर जाएगी।

कुंभ राशि वालों, न चाह कर भी मिलेगा दोबारा धोखा, अगले 48 घंटे सावधान।

कुंभ राशि वालों, 6 अप्रैल को बहुत बड़ी वारदात होने वाली है, मौत के कुएं में गिरोगे।

चलों, यह मान भी लिया जाए कि इन हैंडिंग्स की तरह का कुछ होने भी जा रहा है, मगर आप पूरा वीडियो देख लें, हैडिंग्स का एक भी कंटेंट आपको पूरे वीडियो में नहीं दिखाई देगा। तब आप अपना सिर पीट लेंगे। ऐसा नहीं है कि व्यूअर ऐसे विडियो देख कर चुप है, वह बाकायदा कड़ी प्रतिक्रिया कर रहा है, मगर इन यूट्यूबर पर इसका कोई असर नहीं है।


-तेजवानी गिरधर

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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस शब्द उपयुक्त नहीं है?

इन दिनों आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का बोलबाला है। हर क्षेत्र में इसका उपयोग किया जा रहा है। यकायक ख्याल आया कि क्या आर्टिफिशियल षब्द उपयुक्त है...