भारतीय परंपराओं में सिर को शरीर का पवित्र और ऊर्जात्मक केंद्र माना जाता है। इसलिए सिरहाने ऐसी चीजें रखने से मना किया जाता है जो रोग, पीड़ा या नकारात्मकता का प्रतीक हों। दवा बीमारी का प्रतीक मानी जाती है। लोकमान्यता कहती है कि अगर दवा सिरहाने रखी हो तो रोग की “ऊर्जा” वहीं बनी रहती है, इसलिए रोग जल्दी नहीं जाता। यह धारणा धार्मिक ग्रंथों में स्पष्ट नियम के रूप में नहीं मिलती, बल्कि लोकपरंपरा में अधिक प्रचलित है।
कुछ लोग इसे वास्तु शास्त्र से भी जोड़ते हैं। वास्तु के अनुसार सोने के स्थान पर दवाइयां, जूते, लोहे की चीजें या बीमारी से जुड़ी वस्तुएं कम से कम रखनी चाहिए, क्योंकि इससे मानसिक रूप से रोग की स्मृति बनी रहती है। हालांकि विज्ञान में यह नहीं कहा गया कि सिरहाने दवा रखने से रोग ठीक नहीं होगा, लेकिन कुछ व्यावहारिक कारण जरूर हैं। कई दवाइयों को ठंडी और सूखी जगह में रखने की जरूरत होती है। सिरहाने रखने से बच्चों द्वारा गलती से खा लेने का भी खतरा रहता है। इसके अतिरिक्त कुछ दवाओं की गंध या रसायन नींद में असुविधा दे सकते हैं। अगर सोते समय दवा सामने दिखती रहे तो व्यक्ति को लगातार अपनी बीमारी की याद आती रहती है। इससे अवचेतन में रोग की चिंता बनी रहती है, जो स्वास्थ्य पर असर डाल सकती है। कुल जमा दवाइयों को सिरहाने रखने से बीमारी ठीक नहीं होगी, ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। यह मुख्यतः लोकविश्वास, वास्तु और मनोवैज्ञानिक कारणों से बनी परंपरा है।
बेहतर है कि दवाइयां अलग डिब्बे या अलमारी में सुरक्षित रखी जाएं।

