मंगलवार, 17 मार्च 2026

दवाइयां सिरहाने नहीं रखनी चाहिए

दवाइयां सिरहाने रखने से बीमारी से मुक्ति कठिन होती है, यह मान्यता भारत के कई हिस्सों में लोकविश्वास के रूप में मिलती है। यह धारणा मुख्यतः धार्मिक-सांस्कृतिक सोच, प्रतीकात्मक अर्थ और थोड़े-बहुत व्यावहारिक कारणों से बनी है।

भारतीय परंपराओं में सिर को शरीर का पवित्र और ऊर्जात्मक केंद्र माना जाता है। इसलिए सिरहाने ऐसी चीजें रखने से मना किया जाता है जो रोग, पीड़ा या नकारात्मकता का प्रतीक हों। दवा बीमारी का प्रतीक मानी जाती है। लोकमान्यता कहती है कि अगर दवा सिरहाने रखी हो तो रोग की “ऊर्जा” वहीं बनी रहती है, इसलिए रोग जल्दी नहीं जाता। यह धारणा धार्मिक ग्रंथों में स्पष्ट नियम के रूप में नहीं मिलती, बल्कि लोकपरंपरा में अधिक प्रचलित है।

कुछ लोग इसे वास्तु शास्त्र से भी जोड़ते हैं। वास्तु के अनुसार सोने के स्थान पर दवाइयां, जूते, लोहे की चीजें या बीमारी से जुड़ी वस्तुएं कम से कम रखनी चाहिए, क्योंकि इससे मानसिक रूप से रोग की स्मृति बनी रहती है। हालांकि विज्ञान में यह नहीं कहा गया कि सिरहाने दवा रखने से रोग ठीक नहीं होगा, लेकिन कुछ व्यावहारिक कारण जरूर हैं। कई दवाइयों को ठंडी और सूखी जगह में रखने की जरूरत होती है। सिरहाने रखने से बच्चों द्वारा गलती से खा लेने का भी खतरा रहता है। इसके अतिरिक्त कुछ दवाओं की गंध या रसायन नींद में असुविधा दे सकते हैं। अगर सोते समय दवा सामने दिखती रहे तो व्यक्ति को लगातार अपनी बीमारी की याद आती रहती है। इससे अवचेतन में रोग की चिंता बनी रहती है, जो स्वास्थ्य पर असर डाल सकती है। कुल जमा दवाइयों को सिरहाने रखने से बीमारी ठीक नहीं होगी, ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। यह मुख्यतः लोकविश्वास, वास्तु और मनोवैज्ञानिक कारणों से बनी परंपरा है।

बेहतर है कि दवाइयां अलग डिब्बे या अलमारी में सुरक्षित रखी जाएं।

शनिवार, 7 मार्च 2026

नाराजण बारेठ : पत्रकारिता जगत का निर्भीक स्वर हमेशा के लिए मौन हो गया

वरिष्ठ पत्रकार, प्रखर चिंतक, राजनीतिक विश्लेषक और राजस्थान के पूर्व सूचना आयुक्त Narayan Bareth के निधन के साथ ही पत्रकारिता जगत का एक निर्भीक और जनपक्षधर स्वर हमेशा के लिए मौन हो गया। वे उन पत्रकारों में थे जिन्होंने खबर को केवल पेशा नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रक्षा का माध्यम माना।

BBC, The Asian Age और The Pioneer जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से जुड़कर उन्होंने पत्रकारिता को वैचारिक गहराई और सामाजिक सरोकारों से जोड़ा। उनकी लेखनी में सत्ता से सवाल करने का साहस था, तो समाज के वंचित और हाशिए पर खड़े लोगों के प्रति गहरी संवेदना भी। वे उन पत्रकारों की परंपरा के प्रतिनिधि थे जिनके लिए निष्पक्षता केवल शब्द नहीं, बल्कि आचरण का मूल मंत्र होती है।

पत्रकारिता के साथ-साथ उन्होंने अकादमिक क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। University of Rajasthan के जनसंचार केंद्र तथा Haridev Joshi University of Journalism and Mass Communication में प्रोफेसर के रूप में उन्होंने अनेक युवा पत्रकारों को न केवल तकनीकी कौशल सिखाया, बल्कि पत्रकारिता की नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी का पाठ भी पढ़ाया। उनके विद्यार्थियों की एक पूरी पीढ़ी आज विभिन्न माध्यमों में सक्रिय है और कहीं न कहीं उनकी सीख को आगे बढ़ा रही है।

जब उन्होंने सूचना आयुक्त का दायित्व संभाला, तब भी उनकी मूल चिंता पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करने की रही। सूचना के अधिकार को उन्होंने लोकतंत्र की आंख और कान माना, जो जनता को शासन से प्रश्न पूछने की ताकत देता है।

नारायण बारेठ का जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि एक वैचारिक परंपरा के विराम जैसा है। उनकी बेबाक कलम, उनकी स्पष्ट दृष्टि और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता लंबे समय तक स्मरण की जाएगी।

पत्रकारिता के इस सजग प्रहरी को विनम्र श्रद्धांजलि। ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें और शोकाकुल परिवार को इस असह्य दुख को सहने की शक्ति दें।

दवाइयां सिरहाने नहीं रखनी चाहिए

दवाइयां सिरहाने रखने से बीमारी से मुक्ति कठिन होती है, यह मान्यता भारत के कई हिस्सों में लोकविश्वास के रूप में मिलती है। यह धारणा मुख्यतः धा...