BBC, The Asian Age और The Pioneer जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से जुड़कर उन्होंने पत्रकारिता को वैचारिक गहराई और सामाजिक सरोकारों से जोड़ा। उनकी लेखनी में सत्ता से सवाल करने का साहस था, तो समाज के वंचित और हाशिए पर खड़े लोगों के प्रति गहरी संवेदना भी। वे उन पत्रकारों की परंपरा के प्रतिनिधि थे जिनके लिए निष्पक्षता केवल शब्द नहीं, बल्कि आचरण का मूल मंत्र होती है।
पत्रकारिता के साथ-साथ उन्होंने अकादमिक क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। University of Rajasthan के जनसंचार केंद्र तथा Haridev Joshi University of Journalism and Mass Communication में प्रोफेसर के रूप में उन्होंने अनेक युवा पत्रकारों को न केवल तकनीकी कौशल सिखाया, बल्कि पत्रकारिता की नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी का पाठ भी पढ़ाया। उनके विद्यार्थियों की एक पूरी पीढ़ी आज विभिन्न माध्यमों में सक्रिय है और कहीं न कहीं उनकी सीख को आगे बढ़ा रही है।
जब उन्होंने सूचना आयुक्त का दायित्व संभाला, तब भी उनकी मूल चिंता पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करने की रही। सूचना के अधिकार को उन्होंने लोकतंत्र की आंख और कान माना, जो जनता को शासन से प्रश्न पूछने की ताकत देता है।
नारायण बारेठ का जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि एक वैचारिक परंपरा के विराम जैसा है। उनकी बेबाक कलम, उनकी स्पष्ट दृष्टि और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता लंबे समय तक स्मरण की जाएगी।
पत्रकारिता के इस सजग प्रहरी को विनम्र श्रद्धांजलि। ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें और शोकाकुल परिवार को इस असह्य दुख को सहने की शक्ति दें।

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