मंगलवार, 8 फ़रवरी 2022
रविवार, 6 फ़रवरी 2022
शनिवार, 5 फ़रवरी 2022
बुधवार, 2 जून 2021
मास्क ने छीन ली चेहरे की खूबसूरती, मुस्कुराहट और भाव-भंगिमा
कोरोना महामारी के चलते घर से बाहर निकलने पर मास्क लगाना बेहद जरूरी है। राजस्थान में तो कानून तक बना कर भारी जुर्माने का प्रावधान कर दिया गया है। जान है तो जहान है के जुमले को अपनाते हुए हम अपनी सुरक्षा भी कर रहे हैं। मगर तस्वीर का दूसरा रुख है कि मास्क ने हमसे बहुत कुछ छीन लिया है।
मास्क ने सबसे बड़ा झटका ये दिया है कि इसने हमारी पहचान छीन ली है। कई बार मास्क में लोग आपको पहचान नहीं पाते और आपको मजबूरी में मास्क हटाना ही पड़ता है। मास्क लगा होने पर अलबत्ता आपके बोलने से भी सामने वाला आपकी आवाज से पहचान लेता है, मगर जब तक आप चुप होते हैं तो पहचानना कठिन हो जाता है। कहते हैं न कि जरा मुस्कुराइये, ताकि सामने वाले को तनिक खुशी मिल सके, मगर प्राणियों में केवल मानव को भगवान की दी हुई वह शानदार व अनुपम भेंट भी अब छिन चुकी है। आप चाह कर भी किसी को स्माइल भेंट नहीं कर सकते। मास्क ने उस पर आवरण लगा दिया है। एक तरह से चेहरे सपाट हो गए हैं। नीरस और भाव विहीन हो गए हैं। उनकी रौनक गायब है। चेहरे की कितनी अहमियत है, इसका अनुमान आप एक फिल्मी गीत की पंक्ति से लगा सकते हैं- दिल को देखो, चेहरा न देखों, चेहरे ने लााखों को लूटा।
कई लोगों को इस बात की भी तकलीफ है कि मास्क ने उनके चेहरे की खूबसूरती छीन ली है। विशेष रूप से महिलाओं को। असल में ये चेहरा ही तो है, जिसकी खूबसूरती पर आप इठलाते हैं। सजते-संवरते हैं। तरह-तरह की दाढ़ी-मूंछ रखते हैं। महिलाएं भांति-भांति की लिपस्टिक लगाती हैं। आखिरकार भगवान की ओर से दी गई सुंदरता का भी महत्व है। माना कि पुरुष सुंदरता के प्रति अपेक्षाकृत कम सजग होते हैं, मगर महिलाएं तो बहुत अधिक ध्यान रखती हैं। तनिक कम सुंदर महिलाएं भी ब्यूटी पॉर्लर जा कर सुंदर हो आती हैं। कई पुरुष आजकल केवल इसी कारण दस-पंद्रह दिन तक शेव नहीं करते कि वह बढ़ी हुई मास्क में ढ़क जाती है।
हम सब जानते हैं कि कुछ भी बोलने के लहजे के साथ चेहरे की भाव-भंगिमा भी भावनाओं की अभिव्यक्ति करती है। हालांकि आंखें भी बोलती हैं, आंखों ही आंखों में बहुत कुछ इशारे किए जा सकते हैं, मगर पूरे चेहरे की भाव-भंगिमा के साथ। अकेले आंखें उतना इजहार नहीं कर पातीं। आप किसी से बात करते हैं अथवा मीटिंग या सभा में भाषण देते हैं तो आपके चेहरे की रेखाएं ही आपके वक्तव्य में जान डालती हैं। लेकिन अब उसका सारा दारोमदार आवाज पर आ गया है। ध्वनि के उतार-चढ़ाव से ही उसमें सोल डाली जा सकती है।
कुल मिला कर कोरोना ने मानव जीवन से बहुत कुछ झपट लिया है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com
शनिवार, 29 मई 2021
कोरोना ने किया पूरी दुनिया को जैन सिद्धांतों पर चलने को मजबूर
चौबीसवें तीर्थंकर भगवाान महावीर के काल में जैन धर्म अपने चरमोत्कर्ष पर था। जैन धर्मावलम्बी भी अनगिनत थे। मगर अकेले कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया को जैन धर्म के सिद्धांतों पर चलने को मजबूर कर दिया है।
एक समय वह भी था, जब हम जैन धर्म के श्वेतांबर पंथीय मुनि, श्रावक और श्राविकाओं को देखा करते थे कि वे अपने मुंह पर सफेद पट्टी बांधते हैं, तो कौतुहल होता था, मगर आज जब पूरी दुनिया मुंह पर पट्टी बांधने को मजबूर है तो इसे स्वीकार करना पड़ता है कि करीब ढ़ाई हजार साल पहले मुंह पट्टी अर्थात मास्क का इजाद करने वाले इस धर्म की सोच कितनी गहरी थी। आज जब कोरोना महामारी ने पूरे विश्व को झकझोड़ कर रख दिया है तो अहसास होता है जैन दर्शन प्रांसगिक ही नहीं, बल्कि आवश्यक हो गया है।
ज्ञातव्य है कि मुख पट्टिका लगाने की परंपरा भगवान महावीर स्वामी ने शुरू की थी। इसका उल्लेख विभिन्न जैन आगमों में मिलता है। श्वेतांबर जैन संप्रदाय के स्थानकवासी, अमूर्तिपूजक और तेरापंथ में मुंह पर पट्टी बांधने की परंपरा है। यह 4 इंच चौड़ी व 7 इंच लंबी होती है। इसे कपड़े को चार तह करके बनाया जाता है। इसलिए इसमें कीटाणु जाने का खतरा बिल्कुल नहीं होता। उल्लेखनीय है कि वर्तमान में मास्क के बारे में वैज्ञानिक मान्यता है कि वायरस को रोकने के लिए कम से कम थ्री लेयर मास्क जरूरी है।
वस्तुत: जैन धर्म में मुंह पट्टी, जिसे हम आज मास्क के रूप में जानते हैं, उसका उपयोग सांस की गरमाहट से सूक्ष्मतम जीवों की हिंसा को रोकने और वाणी पर संयम के लिए किया जाता है। आज हम जानलेवा सूक्ष्मतम जीवाणु अर्थात कोरोना वायरस से बचने के लिए इसका उपयोग करने लगे हैं। हालत ये है कि कोरोना वायरस से बचने के लिए अब तक कोई दवाई का इजाद नहीं होने के कारण यह कहा जाने लगा है कि जब तक दवाई नहीं, तब तक मास्क ही दवाई है। हालांकि कोरोना से बचने के लिए वैक्सीन की खोज की जा चुकी है, मगर वह केवल रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए है, ताकि हमारा शरीर से उससे लड़ सके। कोरोना से ग्रस्त होने के बाद उससे मुक्ति के लिए परफैक्ट दवाई अभी तक नहीं खोजी जा सकी है। ऐसे में मुंह पट्टी बनाम मास्क ही कोरोना से जंग लडऩे के लिए सबसे बड़ा शस्त्र माना जा रहा है। कोरोना ने पूरी दुनिया को मुंह पट्टी बांधने को मजबूर कर दिया है। राजस्थान में तो मास्क पहनना कानूनन जरूरी कर दिया है। अमरीका में वैक्सीन के दो डोज लगा चुके लोगों को मास्क पहनने से छूट दे दी गई है, मगर उसके पीछे वहां के स्थानीय राजनीतिक कारण हैं।
अकेले मुंह पट्टी ही नहीं, बल्कि जैन धर्म के संघेटा, अलगाव, सम्यक् एकांत सहित शाकाहार जैसे सिद्धांतों को भी अपनाने को हम मजबूर हैं।
अब बात करते हैं, कोराना से बचने के लिए किए जा रहे दूसरे उपाय की। विश्व स्वास्थ्य संगठन की गाइड लाइन के अनुसार कोरोना से बचने के लिए सोशियल डिस्टेंसिंग को अपनाना जरूरी है। वैसे यह शब्द उचित नहीं है, क्योंकि सामाजिक दूरी नहीं बल्कि शारीरिक दूरी की जरूरत है, अर्थात फिजिकल डिस्टेंसिंग। दो व्यक्तियों के बीच कम से कम दो गज की दूरी होना जरूरी है। वजह ये कि खांसने या सांस लेने से कोरोना एक से दूसरे में फैलता है, इसलिए एक दूसरे से दूर रहने की हिदायत दी गई है। जैन धर्म में इसी सोशल डिस्टेंसिंग को संघेटा कहा जाता है। मास्क के अतिरिक्त पूरा जोर इसी पर दिया जा रहा है।
तीसरा जैन सिद्धांत है सम्यक एकांत, जिसका अंग्रेजी में समानार्थी शब्द है आइसोलेशन। कोरोना के संक्रमण के डर से डब्ल्यूएचओ की ओर से जारी आइसोलेशन के नियमों को सारी दुनिया मान रही है। आइसोलेशन की पालना की जाए तो कोरोना संक्रमण का खतरा बिलकुल नहीं रहेगा।
जैन धर्म के चौथे सिद्धांत अलगाव को वर्तमान में क्वारेंटाइन के नाम से अपनाया जा रहा है। वस्तुत: जैन धर्म में ध्यान लगाने के लिए अलगाव के सिद्धांत का भी पालन किया जाता है। यदि किसी व्यक्ति में कोरोना के सामान्य लक्षण दिखते हैं, तो उसे 14 दिन के लिए क्वारेंटाइन कर दिया जाता है। ज्ञातव्य है कोरोना गाइड लाइन की अवहेलना करने वालों को तुरंत क्वारेंटाइन सेंटर्स भेजा जाता है, भले ही उनमें कोरोना के सामान्य लक्षण न हों। उन सेंटर्स में जांच के बाद नेगेटिव पाए जाने पर ही छोड़ा जाता है।
सर्वविदित है कि अहिंसा के मूल मंत्र को मानने वाले जैन धर्मावलम्बी पूर्णत: शाकाहार का पालन करते हैं। यहां तक कि जमीन के भीतर उगने वाली सब्जियों का भी उपयोग नहीं करते। वर्तमान में कोरोना के डर से शाकाहार अपनाने पर जोर दिया जा रहा है। कोरोना की पृष्ठभूमि में जाएं तो इस वायरस की शुरुआत चीन के वुहान शहर से हुई। वहां सी फूड का मार्केट है। बताया जाता है कि जानवरों व पक्षियों के इस मार्केट से ही कोरोना वायरस पनपा है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि अन्य वायरल बीमारियों बर्ड फ्लू व स्वाइन फ्लू की उत्पत्ति भी अन्य जीवों से फैलती है।
कुल मिला कर कोरोना ने पूरी दुनिया को जैन धर्म के सिद्धांतों पर चलने को मजबूर कर दिया है। इससे साबित होता है कि जैन धर्म के सिद्धांतों में कितनी दूर दृष्टि रही है। इन सिद्धातों की स्थापना उस काल में हुई, जब विज्ञान बिलकुल भी उन्नत नहीं था।
-तेजवानी गिरधर
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गुरुवार, 20 मई 2021
मैंने त्रिशूल नहीं बांटे, बच्चों के हाथ में दिए हैं-माउस और की-बोर्ड
राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के भूतपूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय डॉ. पी. सी. व्यास के इस जुमले की गूंज दिल्ली तक सुनाई दी थी
यह शीर्षक है राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के भूतपूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय डॉ. पी. सी. व्यास के उस बेबाक साक्षात्कार का, जो दैनिक भास्कर के अजमेर लाइव पेज पर जवाब-तलब कॉलम के अंतर्गत 20 जनवरी 2003 को प्रकाशित हुआ था। ज्ञातव्य है कि हाल ही उनका निधन हो गया। जैसे ही यह खबर सुनी तो यकायक लगा कि वे आज भी मेरे सामने साक्षात बैठे हैं। साथ ही वह साक्षात्कार भी फिल्म की भांति मेरी आंखों के आगे तैरने लगा। जवाब-तलब कॉलम में मैंने अजमेर की अनेक हस्तियों के साक्षात्कार लिए, मगर इस साक्षात्कार की गूंज दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में सुनाई दी थी।
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| डॉ. पी. सी. व्यास |
वस्तुत: साक्षात्कार में सवाल इतने तीखे थे कि आज जब 18 साल बाद उसको पढ़ा तो सहसा यकीन ही नहीं हुआ कि मेरे जैसे सदाशयी पत्रकार ने नश्तर की तरह चुभते निर्मम सवाल कैसे कर डाले थे? एक तरह से इस साक्षात्कार में व्यास जी का पूरा व्यक्तित्व व कृतित्व उभर कर आ गया था। सकारात्मक भी और नकारात्मक भी। राजनीतिक भी, गैर राजनीतिक भी। यह कितना तीखा था, इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि उसका आरंभ ही इन शब्दों से हुआ था- कम्प्यूटर युग में नवाचार के जरिये स्कूली शिक्षा को नए आयाम देकर बोर्ड अध्यक्ष डॉ. पी. सी. व्यास ने जितनी शोहरत पाई, कमोबेश उतनी आलोचना के शिकार हुए, अपनी कांग्रेसी कार्यशैली के कारण। कभी वे प्रगतिशील व दूरदृष्टा शिक्षाविद् की झलक देते हैं तो कभी उनके भीतर मौजूद घाघ राजनीतिज्ञ छिपाए नहीं छिपता। इन दो सर्वथा विपरीत व्यक्तित्वों के बीच पैंडुलम बने डॉ. व्यास अपनी हरकतों से सदैव सुर्खियों में बने रहते हैं।बात आगे बढ़ाने से पहले यह बताना उचित समझूंगा कि दैनिक भास्कर में जवाब-तलब कॉलम तत्कालीन स्थानीय संपादक व सुप्रसिद्ध पत्रकार श्री अनिल लोढ़ा ने आरंभ करवाया था। उन्होंने स्थानीय संपादक रहते स्थानीय संस्करण में पत्रकारिता को अनेक नए आयाम दिए। असल में वर्षों पहले वे जवाब-तलब शीर्षक के नाम से एक साप्ताहिक निकाला करते थे। बाद में दैनिक समाचार पत्रों में काम करने के कारण वह अखबार बंद हो गया। जैसा उसका शीर्षक था, वैसा ही उसका मिजाज था। वे चाहते थे उसी मिजाज का यह कॉलम बने और शहर की टॉप की हस्तियों से तीखे अंदाज में सवाल-जवाब किए जाएं।
खैर, डॉ. व्यास के साक्षात्कार की बात चल रही थी। छपने के बाद वह उनको इतना भाया कि कांग्रेस हाईकमान और दिल्ली व जयपुर के राजनीतिक गलियारों तक प्रचारित किया, हालांकि उसके सारे सवाल उनको बुरी तरह से छीलने वाले थे। स्वाभाविक रूप से भास्कर की इतनी प्रतियां जुटाना संभव नहीं था, इस कारण उन्होंने हजारों फॉटो कॉपियां निकलवा कर उन्हें बंटवाया था। वस्तुत: शीर्षक इतना मारक था कि वह जहां कांग्रेस हाईकमान को बहुत अच्छा लगा, वहीं हिंदूवादियों पर सीधा हमला कर रहा था। यह वह दौर था, जब विश्व हिंदू परिषद के दिग्गज नेता श्री प्रवीण भाई तोगडिय़ा देशभर में त्रिशूल बांटने के लिए निकले थे और उसका आगाज उन्होंने राजस्थान से किया था। अजमेर में त्रिशूल वितरण कार्यक्रम के बाद जयपुर जाते समय रास्ते में तत्कालीन अशोक गहलोत सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था।
स्पष्ट है कि शीर्षक के जरिए उन्होंने जो कटाक्ष किया था, वह एक तरह से विहिप की मुहिम पर कड़ा प्रहार था। कांग्रेस पृष्ठभूमि का होने के कारण ही उन्हें बोर्ड अध्यक्ष बनाया गया और उसी मानसिकता व विचारधारा को पुष्ट करने के लिए उन्होंने यह जुमला गढ़ा था।
खैर, बाद में वे जब भी अजमेर आते थे, तो मुझे जरूर याद करते थे और मिलने पर यही कहते थे कि आपने तो मुझे दिल्ली तक लोकप्रिय कर दिया।
उनकी एक आदत, जो मैंने नोट की, वो यह कि वे बातचीत के दौरान कई बार सवालियां अंदाज में आंखों की पुतलियों को तब तक ऊपर-नीचे किया करते थे, जब तक कि उनके सवाल का जवाब न दे दिया जाए। यानि कि उनकी बात पर प्रतिक्रिया न दे दी जाए। उनके निकटस्थ रहे लोगों ने यह जरूर पाया होगा।
प्रयास रहेगा कि उनका पूरा साक्षात्कार साझा करूं, ताकि आप भी समझ सकें कि एक जुमले की खातिर वे कितने धारदार सवाल झेलने को राजी थे। मैंने पूछा भी कि क्या आपका जुमला साक्षात्कार का शीर्षक बना दूं, तो वे बोले यही तो मुझे संदेश देना है।
ज्ञातव्य है कि हाल ही उनका बेंगलूरु में निधन हो गया। वे 85 वर्ष के थे। डॉ. व्यास बोर्ड में 1999 से 2004 तक अध्यक्ष रहे और राजीव गांधी स्टडी सर्किल की स्थापना के साथ बोर्ड में कई नए प्रयोग किए। उनमें प्रमुख रूप से प्रदेश के विद्यालयों में कंप्यूटर शिक्षा का आरंभ करना रहा, जिस पर विवाद भी हुआ। वे देश के सभी राज्यों के शिक्षा बोर्डों के समूह कोब्से के अध्यक्ष भी रहे थे।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
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शनिवार, 15 मई 2021
सवाये का क्या महत्व है?
आजकल या तो दूध थैलियों में आता है या दूध वाला नाप कर भी देता है तो पूरा उतना ही, जितना उसे कहा जाता है। एक समय था, जब दूध वाले से एक या दो किलो, जो भी उसे कहा जाता था, तो वह उतना दूध देने के बाद ऊपर से थोड़ा अलग से दूध दिया करता था। यह लोगों की आदत में शुमार था। हो सकता है, गांवों में इसका चलन अब भी हो। इतना ही नहीं, आम तौर पर हम देखते हैं कि सब्जी वाला भी कहे गए तोल से कुछ ज्यादा, भले ही दस-बीस ग्राम ही सही, मगर देता है। हमारी भी यही अपेक्षा होती है कि सामान वाला पलड़ा थोड़ा भारी रहे। इतना ही नहीं सब्जी के साथ ऊपर से फ्री में थोड़ा धनिया या मिर्ची देने का भी चलन है। इसे सवाया कहा जाता है। असल में इसका मतलब इससे नहीं है कि हम मांगी गई वस्तु से कुछ ज्यादा की अपेक्षा करते हैं। अपितु इस का मतलब सवाये है, जिसे कि शुभ माना जाता है।
आप देखिए न कि हम यदि भगवान को प्रसाद चढ़ाने का संकल्प लेते हैं या प्रसाद चढ़ाते हैं तो तब भी सवाये का ख्याल रखते हैं। अब तो पचीस पैसे अर्थात चवन्नी चलन से बाहर हो गई, मगर किसी जमाने में सवा रुपया या सवाल ग्यारह रुपए चढ़ाए जाते थे। जब चवन्नी बंद हो गई तो भी राउंड फिगर से एक रुपया ज्यादा का चलन आया। ग्यारह, इक्कीस, इक्यावन। लेकिन चूंकि कई बार एक रुपए का सिक्का जेब में नहीं होता है, इस कारण गिफ्ट वाले ऐसे लिफाफे आ गए हैं, जिनमें एक रुपया पहले से चिपका हुआ होता है। मकसद सिर्फ ये है यदि हम उसमें सौ रुपये या दो सौ रुपए डालें तो एक रुपया स्वत: जुड़ जाए। यह भी सवाये का ही रूप है। अर्थात हम पूर्णांक से एक अंक ज्यादा को प्राथमिकता देते हैं।
वस्तुत: सनातन धर्म में सवा (एक और एक चौथाई) का महत्व है और इसी क्रम में सवा, ग्यारह, इक्कीस, इक्यावन को शुभ माना जाता है। अर्थात् सबसे छोटी प्राकृत संख्या जो शुभ मानी जाती है, वह 11 ही है। इसी से जुड़े तथ्य रोचक हैं। जैसे अपोलो 11, चन्द्रमा पर भेजा गया पहला मानवयुक्त अन्तरिक्ष यान था। बहुत से खेलों में 11 खिलाड़ी मैदान पर उतरते हैं, जैसे क्रिकेट, फुटबॉल आदि।
शायद आपकी जानकारी में हो कि ज्योतिषी कोई भी काम करते वक्त सवाये की सलाह देते हैं। जैसे नौ, दस, ग्यारह बजे, या जो भी, वे कहते हैं कि पूर्णांक की बजाय कुछ ज्यादा मिनट होने पर ही काम की शुरुआत करनी चाहिए। वे पौने से बचने की राय देते हैं, अर्थात पौ नौ, पौने दस या पौने ग्यारह बजे काम शुरू करने से बचने की कहते हैं, क्योंकि वह पूर्ण से कम है, इस कारण उस वक्त शुरू किए गए काम के पूर्ण होने में संशय हो सकता है।
कुल मिला कर यह स्थापित तथ्य है कि हमारे जीवन में सवाये का बड़ा महत्व है। लेकिन तथ्य स्थापित होने के पीछे क्या कारण है, इसके बारे में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। जहां तक मेरी समझ है, इसके पीछे कहीं न कहीं अध्यात्म है। दर्शन को गहराई जानने वाले कहते हैं कि पूर्ण और शून्य में कोई अंतर नहीं। दोनों एक ही सिक्के के पहलु हैं। जैसे ही पूर्णता आती है, उसी के साथ शून्य आ कर खड़ा हो जाता है। कदाचित इसीलिए पूर्णांक की बजाय उसमें सवाया जोड़ा जाता है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस शब्द उपयुक्त नहीं है?
इन दिनों आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का बोलबाला है। हर क्षेत्र में इसका उपयोग किया जा रहा है। यकायक ख्याल आया कि क्या आर्टिफिशियल षब्द उपयुक्त है...
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