बुधवार, 14 जनवरी 2026

दाल-बाटी-चूरमे की खोज कैसे हुई?

राजस्थान की पहचान यदि किसी एक व्यंजन से की जाए, तो दाल-बाटी-चूरमा का नाम सबसे पहले लिया जाएगा। यह केवल भोजन नहीं, बल्कि इतिहास, संघर्ष और लोकबुद्धि का सजीव उदाहरण है। बहुत कम लोग जानते हैं कि बाटी का जन्म किसी रसोई में नहीं, बल्कि रणभूमि की तपती रेत पर हुआ था।

इतिहासकारों और लोकपरंपराओं के अनुसार बाटी का उद्भव लगभग आठवीं सदी में हुआ, जब मेवाड़ में बप्पा रावल ने गुहिलोत वंश की नींव रखी। यह वह दौर था जब राजपूत शासक अपने राज्यों के विस्तार के लिए निरंतर युद्धरत रहते थे। युद्धकाल में हजारों सैनिकों के लिए ताजा भोजन जुटाना एक बड़ी चुनौती था। ऐसे ही एक अवसर पर सैनिकों ने सुबह आटे की लोइयाँ गूंथीं, लेकिन युद्ध छिड़ जाने के कारण वे उन्हें तपती रेत पर छोड़कर रणभूमि में चले गए।

शाम को लौटने पर वे लोइयाँ रेत में दब चुकी थीं। जब उन्हें बाहर निकाला गया तो दिनभर सूर्य और रेत की प्रचंड गर्मी से वे पूरी तरह पक चुकी थीं। थकान से चूर सैनिकों ने जब उन्हें खाया, तो स्वाद और तृप्ति ने सभी को चकित कर दिया। यहीं से जन्म हुआ बाटी का, एक ऐसा भोजन जो बिना बर्तन के, बिना निगरानी के पक जाता था और लंबे समय तक सुरक्षित भी रहता था।

धीरे-धीरे बाटी युद्धकालीन भोजन बन गई। सैनिक सुबह आटे की गोलियाँ बनाकर रेत में दबा देते और लौटकर उन्हें अचार, चटनी तथा ऊंटनी या बकरी के दूध से बने दही के साथ खाते। यह भोजन कम समय में तैयार होता और भरपूर ऊर्जा देता। बाद में बाटी आम जनजीवन में पहुँची और कंडों व अंगारों पर पकाई जाने लगी।

मुगल बादशाह अकबर के राजस्थान आगमन के साथ यह व्यंजन मुगल रसोई तक भी पहुँचा। मुगल खानसामों ने इसे उबालकर फिर सेंकने की विधि विकसित की, जिसे ‘बाफला’ नाम दिया गया। इस रूप में बाटी उत्तर भारत के कई हिस्सों में लोकप्रिय हो गई।

दाल-बाटी का संगम भी इतिहास की देन है। दक्षिण भारत से आए व्यापारियों ने बाटी को दाल के साथ चूर कर खाना शुरू किया। उस समय प्रचलित थी पंचमेल दाल- चना, मूंग, उड़द, तुअर और मसूर का मिश्रण, जिसमें घी या सरसों के तेल का तीखा तड़का लगाया जाता था। यही स्वाद आगे चलकर दाल-बाटी की पहचान बना।

चूरमा का जन्म भी संयोग से ही हुआ। लोककथाओं के अनुसार गुहिलोत कबीले के एक रसोइए से बाटियाँ गलती से गन्ने के रस में गिर गईं। नरम और मीठी बनी बाटियों ने नया स्वाद रच दिया। बाद में इसमें घी, मिश्री और इलायची का समावेश हुआ और बाटी को चूर-चूर कर बनाने के कारण इसका नाम पड़ा, चूरमा।

इस प्रकार दाल-बाटी-चूरमा किसी एक व्यक्ति की खोज नहीं, बल्कि समय, परिस्थिति और लोकजीवन की सामूहिक देन है। यह व्यंजन आज भी राजस्थान की थाली में इतिहास की खुशबू और परंपरा का स्वाद समेटे हुए है। युद्धभूमि से थाली तक का यह सफर, सचमुच अनूठा है।


शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

हम कुछ याद करते वक्त सिर क्यों खुजाते हैं?

आम तौर पर जब भी हम कुछ सोचते या याद करते वक्त सिर खुजाते हैं। यह आदत बहुत साधारण लगती है, लेकिन इसके पीछे दिमाग, शरीर और मनोविज्ञानक, तीनों की मिली-जुली भूमिका होती है। मान्यता है कि जब हम कुछ याद करते या गहराई से सोचने लगते हैं, तो मस्तिष्क में रक्त प्रवाह और तंत्रिका गतिविधि बढ़ जाती है। सिर की त्वचा में हल्की-सी संवेदना पैदा होती है, जिसे हम अनजाने में खुजली या झुनझुनी के रूप में महसूस करते हैं। सिर खुजाना एक तरह का “फोकस जेस्चर” है। जैसे कोई पेन घुमाता है या उंगलियां चटकाता है, वैसे ही यह क्रिया दिमाग को संकेत देती है कि “अब सोचना है”। कुछ याद नहीं आ रहा होता या दिमाग अटका हुआ होता है, तो हल्का तनाव पैदा होता है। सिर खुजाना उस तनाव को निकालने का एक स्वतःस्फूर्त तरीका बन जाता है। सिर पर हल्का-सा स्पर्श दिमाग को एक छोटा “झटका” देता है, जिससे अटकी हुई स्मृति या विचार को निकलने में मदद मिलती है। इसे यूं कहा जा सकता है कि जब “दिमाग के पहिए जाम हो जाएं, तो हाथ जाकर सिर पर लग जाता है, ताकि पहिये चलायमान हों।” आपको यह भी ख्याल में होगा कि सभी लोग सिर नहीं खुजाते, कुछ लोग ठुड्डी सहलाते हैं, कुछ नाक छूते हैं, कुछ आँखें बंद कर लेते हैं। यानि तरीका अलग-अलग, मगर उद्देश्य एक ही कि सोच को सक्रिय किया जाए।

कालजयी आरती ओम् जय जगदीश हरे के रचयिता कौन थे?

ओम् जय जगदीश हरे, आरती आज हर हिन्दू घर में गाई जाती है। इस आरती की तर्ज पर अन्य देवी-देवताओं की आरतियां बन चुकी है और गाई जाती है, परंतु इस मूल आरती के रचयिता कौन हैं, इस बारे में भिन्न भिन्न धारणाएं हैं। कुछ लोग बताते हैं कि यह आरती तो पौराणिक काल से गाई जाती है, तो कुछ इस आरती को वेदों का एक भाग बताते हैं। किसी ने कहा कि सम्भवतः इसके रचयिता अभिनेता मनोज कुमार हैं। कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि इस आरती के रचयिता थे पंडित श्रद्धाराम शर्मा या श्रद्धाराम फिल्लौरी। पंडित श्रद्धाराम शर्मा का जन्म पंजाब के जिले जालंधर में स्थित फिल्लौर शहर में हुआ था। वे सनातन धर्म प्रचारक, ज्योतिषी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, संगीतज्ञ तथा हिन्दी और पंजाबी के प्रसिद्ध साहित्यकार थे। उन्होंने वैसे तो किसी प्रकार की औपचारिक शिक्षा हासिल नहीं की थी परंतु उन्होंने सात साल की उम्र तक गुरुमुखी में पढाई की और दस साल की उम्र तक वे संस्कृत, हिन्दी, फ़ारसी भाषाओं तथा ज्योतिष की विधा में पारंगत हो चुके थे। उन्होने गुरूमुखी में सिक्खां दे राज दी विथियां और पंजाबी बातचीत जैसी पुस्तकें लिखीं। सिक्खां दे राज दी विथियां में उन्होने सिख धर्म की स्थापना और इसकी नीतियों के बारे में बहुत सारगर्भित रूप से बताया था। यह पुस्तक लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय साबित हुई थी और अंग्रेज सरकार ने तब होने वाली आईसीएस परीक्षा के कोर्स में इस पुस्तक को शामिल किया था।

पं. श्रद्धाराम शर्मा गुरूमुखी और पंजाबी के अच्छे जानकार थे और उन्होंने अपनी पहली पुस्तक गुरूमुखी मे ही लिखी थी परंतु वे मानते थे कि हिन्दी के माध्यम से ही अपनी बात को अधिकाधिक लोगों तक पहुंचाया जा सकता है। हिन्दी के जाने माने लेखक और साहित्यकार पंडित रामचंद्र शुक्ल ने पंडित श्रद्धाराम शर्मा और भारतेंदु हरिश्चंद्र को हिन्दी के पहले दो लेखकों में माना है। उन्होंने 1877 में भाग्यवती नामक एक उपन्यास लिखा था, जो हिन्दी में था। माना जाता है कि यह हिन्दी का पहला उपन्यास है। इस उपन्यास का प्रकाशन 1888 में हुआ था। इसके प्रकाशन से पहले ही पंडित श्रद्धाराम का निधन हो गया, परंतु उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ने काफी कष्ट सहन करके भी इस उपन्यास का प्रकाशन करावाया था।

वैसे पं. श्रद्धाराम शर्मा धार्मिक कथाओं और आख्यानों के लिए काफी प्रसिद्ध थे। वे महाभारत का उद्धरण देते हुए अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जनजागरण का ऐसा वातावरण तैयार कर देते थे, उनका आख्यान सुनकर प्रत्येक व्यक्ति के भीतर देशभक्ति की भावना भर जाती। अंग्रेज सरकार ने 1865 में उनको फुल्लौरी से निष्कासित कर दिया और आसपास के गांवों तक में उनके प्रवेश पर पाबंदी लगा दी। 1870 में उन्होंने एक ऐसी आरती लिखी, जो भविष्य में घर-घर में गाई जाती थी। वह आरती थी ओम जय जगदीश हरे। पं. शर्मा जहां कहीं व्याख्यान देने जाते, ओम जय जगदीश आरती गाकर सुनाते। आज कई पीढियां गुजर जाने के बाद भी यह आरती गाई जाती है और कालजई हो गई है। इस आरती का उपयोग प्रसिद्ध निर्माता निर्देशक मनोज कुमार ने अपनी एक फिल्म में किया था और इसलिए कई लोग इस आरती के साथ मनोज कुमार का नाम जोड़ देते हैं।

पं. शर्मा सदैव प्रचार और आत्म प्रशंसा से दूर रहे थे। शायद यह भी एक वजह हो कि उनकी रचनाओं को चाव से पढने वाले लोग भी उनके जीवन और उनके कार्यों से परिचित नहीं हैं। 24 जून 1881 को लाहौर में पं. श्रद्धाराम शर्मा ने आखिरी सांस ली।

दाल-बाटी-चूरमे की खोज कैसे हुई?

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