शुक्रवार, 9 जनवरी 2026
हम कुछ याद करते वक्त सिर क्यों खुजाते हैं?
कालजयी आरती ओम् जय जगदीश हरे के रचयिता कौन थे?
पं. श्रद्धाराम शर्मा गुरूमुखी और पंजाबी के अच्छे जानकार थे और उन्होंने अपनी पहली पुस्तक गुरूमुखी मे ही लिखी थी परंतु वे मानते थे कि हिन्दी के माध्यम से ही अपनी बात को अधिकाधिक लोगों तक पहुंचाया जा सकता है। हिन्दी के जाने माने लेखक और साहित्यकार पंडित रामचंद्र शुक्ल ने पंडित श्रद्धाराम शर्मा और भारतेंदु हरिश्चंद्र को हिन्दी के पहले दो लेखकों में माना है। उन्होंने 1877 में भाग्यवती नामक एक उपन्यास लिखा था, जो हिन्दी में था। माना जाता है कि यह हिन्दी का पहला उपन्यास है। इस उपन्यास का प्रकाशन 1888 में हुआ था। इसके प्रकाशन से पहले ही पंडित श्रद्धाराम का निधन हो गया, परंतु उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ने काफी कष्ट सहन करके भी इस उपन्यास का प्रकाशन करावाया था।
वैसे पं. श्रद्धाराम शर्मा धार्मिक कथाओं और आख्यानों के लिए काफी प्रसिद्ध थे। वे महाभारत का उद्धरण देते हुए अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जनजागरण का ऐसा वातावरण तैयार कर देते थे, उनका आख्यान सुनकर प्रत्येक व्यक्ति के भीतर देशभक्ति की भावना भर जाती। अंग्रेज सरकार ने 1865 में उनको फुल्लौरी से निष्कासित कर दिया और आसपास के गांवों तक में उनके प्रवेश पर पाबंदी लगा दी। 1870 में उन्होंने एक ऐसी आरती लिखी, जो भविष्य में घर-घर में गाई जाती थी। वह आरती थी ओम जय जगदीश हरे। पं. शर्मा जहां कहीं व्याख्यान देने जाते, ओम जय जगदीश आरती गाकर सुनाते। आज कई पीढियां गुजर जाने के बाद भी यह आरती गाई जाती है और कालजई हो गई है। इस आरती का उपयोग प्रसिद्ध निर्माता निर्देशक मनोज कुमार ने अपनी एक फिल्म में किया था और इसलिए कई लोग इस आरती के साथ मनोज कुमार का नाम जोड़ देते हैं।
पं. शर्मा सदैव प्रचार और आत्म प्रशंसा से दूर रहे थे। शायद यह भी एक वजह हो कि उनकी रचनाओं को चाव से पढने वाले लोग भी उनके जीवन और उनके कार्यों से परिचित नहीं हैं। 24 जून 1881 को लाहौर में पं. श्रद्धाराम शर्मा ने आखिरी सांस ली।
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