इस बारे में जानकारों का मानना है कि “एक्सपायरी” का अर्थ अक्सर जैसा समझा जाता है, वैसा सीधा नहीं होता। वस्तुतः दवा पर लिखी एक्सपायरी डेट वह तारीख है, जिस तक निर्माता यह गारंटी देता है कि दवा पूरी शक्ति यानि पोटेंसी में होगी, सुरक्षित होगी और अपेक्षित असर देगी। यह तारीख वैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर तय की जाती है। अब सवाल यह कि एक्सपायर होने के बाद दवा का क्या होता है? जानकार कहते हैं कि एक्सपायरी के बाद दवा अचानक जहर नहीं बन जाती, तुरंत बेअसर नहीं होती, लेकिन उसकी ताकत धीरे-धीरे घटने लगती है। कुछ दवाओं में रासायनिक बदलाव हो सकता है। यानी दवा कम असरदार हो सकती है, न कि जरूरी तौर पर खतरनाक।
अब सवाल यह कि क्या सभी दवाएँ एक जैसी होती हैं? तो इसका जवाब है- नहीं। यहां बहुत फर्क पड़ता है। एक्सपायर हो चुकी एंटीबायोटिक, इंसुलिन, हार्ट की दवाइयां, एंटी-एपिलेप्टिक (मिर्गी की) दवाएं और आँखों के ड्रॉप्स (खास कर खुले हुए)
ज्यादा खतरनाक हो सकती हैं। इनमें एक्सपायरी के बाद कम असर भी जानलेवा हो सकता है। दूसरी ओर कम जोखिम वाली दवाइयों में पैरासिटामोल, विटामिन टैबलेट, एलर्जी की कुछ दवाएँ षामिल है। फिर भी नियमित सेवन के लिए इन्हें भी एक्सपायरी के बाद नहीं लेना चाहिए।
एक दिलचस्प तथ्य भी जान लेते हैं। अमेरिका में सेना पर किए गए षोध में पाया गया कि कई दवाएँ सही स्टोरेज में एक्सपायरी के 5-15 साल बाद भी असरदार थीं। लेकिन यह प्रयोगशाला नियंत्रित स्थितियों में था, घरेलू हालात में नहीं।
कुल मिला का आम आदमी को क्या करना चाहिए? एक्सपायरी डेट को अंतिम सुरक्षा सीमा माने। जानलेवा या क्रॉनिक रोगों की दवाएँ एक्सपायरी के बाद न लें। हल्की समस्या में भी डॉक्टर व फार्मासिस्ट से पूछ ले। दवाएं ठंडी, सूखी और अंधेरी जगह रखे।
कुल मिला कर दवाएँ एक्सपायर होती हैं, लेकिन डराने के लिए नहीं, सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए।
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