रविवार, 1 दिसंबर 2024
नेताओं को अफसरों पर गुस्सा क्यों आता है?
शनिवार, 30 नवंबर 2024
चैट जीपीटी पर आंख मूंद कर यकीन नहीं कर सकते?
हाल ही मैने यह जानते हुए भी कि 1992 में अजमेर हुए अश्लील छायाचित्र ब्लैकमेल कांड के वक्त जिला कलेक्टर श्रीमती अदिति मेहता थीं, मैने और जानकारी चाही तो मैं चकित रह गया।
जवाब आया कि अजमेर के कुख्यात अश्लील छायाचित्र ब्लैकमेल कांड (जिसे आमतौर पर अजमेर रेप केस के नाम से भी जाना जाता है) की घटनाएं मुख्यतः 1992 में सामने आई थीं। उस समय अजमेर के जिलाधीश (कलेक्टर) गौरव सिंह थे। यदि आप इस घटना या उससे संबंधित अन्य प्रशासनिक विवरणों पर अधिक जानकारी चाहते हैं, तो आप पूछ सकते हैं।
मैने लिखा कि मेरी जानकारी के अनुसार उस वक्त जिला कलेक्टर श्रीमती अदिति मेहता थीं, तो प्रत्युत्तर आया कि
आपकी जानकारी सही हो सकती है। अजमेर के कुख्यात अश्लील छायाचित्र ब्लैकमेल कांड के समय, जो मुख्य रूप से 1992 में सामने आया, उस वक्त अजमेर की तत्कालीन जिला कलेक्टर अदिति मेहता थीं। अदिति मेहता एक सीनियर आईएएस अधिकारी थीं, और उस दौरान यह मामला न केवल प्रशासन के लिए, बल्कि पूरे राजस्थान के समाज के लिए एक बड़ा संकट बन कर उभरा। इस कांड ने प्रशासन, पुलिस, और समाज के हर स्तर को हिला कर रख दिया था। अगर आप इस केस या उससे जुड़ी प्रशासनिक कार्रवाइयों के बारे में और जानकारी चाहते हैं, तो कृपया बताएं।
तकरीबन तीन घंटे बाद मैंने सवाल दोहराया कि ब्लैकमेल कांड के वक्त जिला कलेक्टर कौन था, इस पर जवाब आया कि 1992 में अजमेर में हुए अश्लील छायाचित्र और ब्लैकमेल कांड के समय अजमेर के कलेक्टर चंद्रशेखर शर्मा थे। मैं तो दंग रह गया। मेरे फीड बैक के बावजूद कलेक्टर का नाम बदल गया। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि इस सर्च इंजन ने जहां से भी जानकारी उठाई है, वहीं पर त्रुटियां हैं। उसका फैक्ट चैक करने का कोई सिस्टम नहीं है। चैट जीटीपी के संचालकों को इस पर ध्यान देना चाहिए, अन्यथा उसकी विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लग जाएगा।
बुधवार, 20 नवंबर 2024
लोकप्रिय नेता कौन?
रविवार, 17 नवंबर 2024
नेता व अफसरों के बीच गहरा अंतर्संबंध
मंगलवार, 5 नवंबर 2024
शरीर के सर्वांग विकास के लिए षट् रस जरूरी
यूं तो अनेक समुदायों व समाजों में शट्रस युक्त भोजन का चलन है, मगर गुजराती थाली व जैन थाली की विषेश चर्चा होती है।
गुजराती थाली में सभी रसों का अद्भुत समावेश होता है। यह थाली बहुत ही विविधतापूर्ण होती है, जिसमें आमतौर पर दाल, कढ़ी, सब्जियां, रोटली (रोटी), भात (चावल) और मीठा होता है। गुजराती खाने में मिठास का विशेष महत्व होता है, इसलिए कई व्यंजन हल्की मिठास लिए होते हैं। साथ ही, इसमें तली हुई चीजें, जैसे फाफड़ा, ढोकला, पापड़ भी शामिल होते हैं, जो अन्य रसों का संतुलन बनाए रखते हैं। खट्टे और मीठे का बेहतरीन मिश्रण गुजराती भोजन को अनोखा बनाता है।
जैन थाली में भी शट् रस का संतुलन देखने को मिलता है, लेकिन इसकी खासियत यह है कि इसमें प्याज, लहसुन और किसी भी प्रकार की जड़ वाली सब्जियों का प्रयोग नहीं होता है। यह थाली सादगी और शुद्धता के लिए प्रसिद्ध है, फिर भी स्वाद से भरपूर होती है। जैन भोजन में सादा और हल्का खाना होता है, जिसमें अनाज, सब्जियाँ, और दालों का संयोजन होता है।
दोनों थालियों में शट् रस का महत्व बहुत अधिक होता है और ये भोजन का एक ऐसा रूप प्रस्तुत करती हैं, जिसमें न केवल स्वाद का ध्यान रखा जाता है, बल्कि सेहत का भी।
मंगलवार, 15 अक्टूबर 2024
राजनेता बडा या अफसर?
एक अधिकारी से गुफ्तगू की तो वे बोले असल में सरकार तो अधिकारी और उसके नीचे का तंत्र चलाता है। राजनेता को तो कानून और नियमों की जानकारी तक नहीं होती। वह तो केवल मौखिक आदेश देता है, उनकी अनुपालना नियमों के अंतर्गत किसी प्रकार की जाए, यह रास्ता तो अधिकारी ही निकालता है। वैसे भी यदि नियम के खिलाफ कुछ हो जाए तो राजनेता का कुछ नहीं बिगड़ता, क्यों कि वह तो केवल जुबानी जमा-खर्च करता है, जबकि रिकार्ड के मुताबिक फंदा तो अधिकारी और कर्मचारी के गले में ही पड़ता है। अगर प्रशासनिक तंत्र प्रभावी न हो तो राजनेता जो मन में आए, वही करे और इसके नतीजे में अराजकता ही हाथ आ सकती है। कुल मिला कर अधिकारी नकेल का काम करता है और उसी की वजह से सिस्टम चलता है। इस लिहाज से अधिकारी ही बड़ा और जिम्मेदार माना जाना चाहिए, मगर बावजूद इसके उसे दब कर चलना पड़ता है। इस वजह से, क्यों कि राजनेता चाहे जब उसे उठा कर दूर फिंकवा सकता है।
अपुन ने एक राजनेता का मन टटोला। उनका तर्क भी दमदार था। बोले- राजनेता ही बड़ा होता है। असल में सरकार बनी ही जनता के लिए है और जनता का दर्द राजनेता से ज्यादा कौन समझ सकता है। वह जनता में से उठ कर आता है, जनता के बीच ही रहता है और जनता के प्रति ही जवाबदेह होता है। आप ही सोचिये,
हो भले ही रेलवे ट्रेक के कर्मचारी की वजह से ट्रेन एक्सीडेंट, मगर छुट्टी तो रेल मंत्री पर इस्तीफे का दबाव बनता है। इतना ही नहीं नेेता को हर पांच साल बाद जनता के सामने परीक्षा देने जाना पड़ता है। विपक्षी तो कपड़े फाड़ता ही है, खुद की पार्टी का भी टांग खींचने में लगा रहता है। जनता भी ऐसी है कि कब और किस वजह से फेल कर दे और कब पास, कुछ पता नहीं होता। दूसरी ओर अधिकारी केवल किताबों को रट कर या फिर टीप-टाप कर एक बार परीक्षा पास कर लेता है और ले-दे कर ऊंचे ओहदे पर पहुंच जाता है। फिर ताजिंदगी एसी चेंबर में ऐश करता है। न तो जनता के पास जाने का झंझंट और न ही जनता से मिलने-मिलाने की परेशानी। दरबान ही नहीं घुसने देता। जनता उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती है। हद से हद उसका तबादला कर दो। जहां जाएगा, गाड़ी, बंगला, चपरासी, सब कुछ मिलेगा। अब आप ही बताइये, जिसका ज्यादा समर्पण और ज्यादा जवाबदेही है, वही तो ज्यादा जिम्मेदार हुआ।
शुक्रवार, 30 अगस्त 2024
अगर बच्चा बुहारी लगाए तो मेहमान आता है?
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस शब्द उपयुक्त नहीं है?
इन दिनों आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का बोलबाला है। हर क्षेत्र में इसका उपयोग किया जा रहा है। यकायक ख्याल आया कि क्या आर्टिफिशियल षब्द उपयुक्त है...
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अजमेर। आम आदमी पार्टी की संभाग प्रभारी श्रीमती कीर्ति पाठक को आखिर अजमेर उत्तर के लिए ढ़ंग का प्रत्याशी मिल ही गया। हालांकि यह अभी दू...
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एक पारंगत संपादक अच्छा लेखक नहीं हो सकता। उसके भीतर मौजूद लेखक लगभग मर जाता है। यह बात तकरीबन पच्चीस साल पहले एक बार बातचीत के दौरान राजस...
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भारतीय संस्कृति में सभी कार्य शुभ मुहूर्त में ही करने की परंपरा है। ऐसा कार्य की सफलता के लिए किया जाता है। इसके प्रति लोगों में गहरी आस्था ...
