शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2020

क्या उम्र बढ़ाई जा सकती है?

मौत अंतिम सत्य है, यह हर आदमी जानता है, मगर मरना कोई नहीं चाहता। मौत से बचना चाहता है। रोज लोगों को मरते देखता है, मगर खुद के मरने की कल्पना तक नहीं करता। इसी से जुड़ा एक सत्य ये भी है कि हर व्यक्ति लंबी उम्र चाहता है। यही जिजीविषा उसे ऊर्जावान बनाए रखती है। दिलचस्प बात ये है कि जन्मदिन पर हमें पता होता है कि हमारी निर्धारित उम्र, यदि है तो, में एक और साल की कमी हो गई है, मगर फिर भी खुशी मनाते हैं। समझ ही नहीं आता कि किस बात की खुशी मनाई जाती है? क्या इस बात की कि इसी दिन हम इस जमीन पर पैदा हुए थे? पैदा तो लाखों-करोड़ों लोग हो रहे हैं, मर भी रहे हैं, उसमें नया या उल्लेखनीय क्या है? मेरा नजरिया ये है कि अगर वाकई हमने इस संसार में आ कर कुछ उल्लेखनीय किया है तो समझ भी आता है कि लोग हमारा जन्मदिन मनाएं, वरना सामान्य जिंदगी में जन्मदिन मनाने जैसा क्या है? या फिर ये भी हो सकता है कि तनाव भरी जिंदगी में जन्मदिन के बहाने हम खुशी का आयोजन करते हैं। इस मौके पर सभी लोग हमारी लंबी उम्र की दुआ करते हैं। सवाल ये उठता है कि क्या वाकई ऐसी दुआओं से उम्र लंबी होती है? यदि हम मानते हैं कि हर आदमी एक निर्धारित उम्र लेकर पैदा हुआ है तो फिर हमारी अधिक जीने की इच्छा या दुआ से क्या हो जाएगा? मन बहलाने से अधिक इसका क्या महत्व है?
किसी व्यक्ति विशेष की उम्र बढ़ाई जा सकती है या नहीं, यह अलग विषय है, मगर यह सच है कि आयुर्वेद सहित जितने भी विज्ञान हैं, वे सार्वजनिक रूप से इस प्रयास में जुटे हैं कि निरोगी रहते हुए उम्र को बढ़ाया जाए। औसत आयु बढ़ी भी है। शिशु मृत्यु दर घटाई जा सकी है। विज्ञान मानता है कि आदमी 14 मैच्योरिटी पीरियड्स तक जी सकता है। एक मैच्योरिटी पीरियड में तकरीबन 20 से 25 साल माने जाते हैं। अर्थात आदमी अधिकतम 350 साल जी सकता है। यह एक बेहद आदर्श स्थिति है। हालांकि हमारी वैदिक परंपरा के अनुसार आदमी की उम्र एक सौ साल मानी जाती है, बावजूद इसके ऐसे अनेक लोग हैं जो एक सौ साल से भी तीस-पैंतीस साल अधिक जीये। आज भी हम सुनते हैं कि अमुख शहर में अमुक व्यक्ति एक सौ पच्चीस साल में उम्र में मरा। यानि शतायु की अवधारणा औसत आयु के रूप में की गई है। यही वजह है कि शतायु होने की दुआ की जाती है।
अब बात करते हैं इस पर कि क्या हम अपनी आयु को बढ़ा सकते हैं? यह एक मौलिक तथ्य है कि अमूमन आदमी की मौत किसी बीमारी की वजह से होती है। या फिर बूढ़े होने के कारण शरीर के विभिन्न अंगों के शिथिल होने पर आदमी अंतत: मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। यदि स्वास्थ्य बरकरार रखा जा सके या बुढ़ापे को रोका जा सके तो और अधिक जीया जा सकता है।
विज्ञान मानता है कि उम्र बढऩे के साथ सेंससेंट सेल बढ़ते हैं। यदि इनको शरीर से हटाया जा सके तो आयु को बढ़ाया जा सकता है। केवल इतना ही काफी नहीं है। उसके लिए यह भी जरूरी है कि विशेष प्रकार का प्रोटीन, जो स्वस्थ सेल में होता है. वह शरीर में बढ़ाया जाए।
धरातल कर सच ये है कि लगभग पचास साल के बाद अमूमन ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, कैंसर जैसी बीमारियां घेरने लगती हैं। हार्ट अटैक व ब्रेन हैमरेज के कारण अचानक मौत हो जाती है। इन बीमारियां से बचने के लिए आदर्श जीवन पद्धति अपनाने की सीख दी जाती है। शुद्ध जलवायु पर जोर दिया जाता है। शुद्ध जल का पान करने की सलाह दी जाती है, क्योंकि लगभग 70 प्रतिशत रोग जल की अशुद्धता से ही होते हैं। इसी शुद्ध वायु की भी महिमा है। वायु प्रदूषण से बचने को कहा जाता है। प्राणायाम करने को कहा जाता है। अच्छी नींद भी स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक मानी जाती है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए ध्यान की भी महिमा बताई गई है।
ध्यान की बात आई तो एक बहुत महत्वपूर्ण बात याद आ गई। आपने सुना होगा कि अमुक ऋषि डेढ़ सौ साल जीये। तीन सौ साल तक जीने की भी किंवदंतियां है। वह कैसे संभव हो सका? जानकारों का मानना है कि भले ही हमारी तथाकथित निर्धारित उम्र वर्षों में गिनी जाती हो, मगर सच ये है कि जन्म के समय ही यह तय हो जाता है कि अमुक व्यक्ति का शरीर कितनी सांसें लेकर मृत्यु को प्राप्त होगा। अर्थात सांस लेने व छोडऩे की अवधि को बढ़ा कर भी उम्र बढ़ाई जा सकती है। जैसे मान लो हम एक मिनट में दस बार सांस लेते हैं, लेकिन यदि एक मिनट में एक ही बार सांस लें तो हमने नौ सांसें बचा लीं। यानि हमारी उम्र नौ सांस बढ़ गई। प्राणायाम में सांस को बाहर या भीतर रोका जाता है। इन दोनों प्रक्रियाओं के पृथक-पृथक लाभ हैं, मगर दोनों में ही एक लाभ ये भी होता है कि सांसों का बचाव हो जाता है व उतनी ही उम्र बढ़ जाती है। हमारे ऋषि-मुनियों-योगियों ने प्राणायाम से ही अपनी उम्र बढ़ाई है। आपको पता होगा कि कछुए व व्हेल मछली की उम्र बहुत अधिक होती है, उसका कारण ये है कि उनकी श्वांस लेने और छोडऩे की गति आदमी से बहुत कम है। वृक्षों में पीपल व बड़ के साथ भी ऐसा ही है। उनकी सांस की गति काफी धीमी है, इसी कारण उनकी उम्र अधिक होती है।
कुल जमा निष्कर्ष ये निकलता है कि प्रकृति हमारी उम्र की गणना दिनों या वर्षों में नहीं करती, बल्कि वह उसका निर्धारण सांसों की गिनती से करती है। योगी बताते हैं कि जब भी हम सांस को रोकते हैं तो उस अवधि में समय स्थिर हो जाता है। रुक जाता है। अर्थात भौतिक उपायों के अतिरिक्त यदि हम नियमित प्राणायाम करें तो अपनी उम्र को बढ़ा सकते हैं।

-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

सोमवार, 17 फ़रवरी 2020

अकेले ओम पर ध्यान केन्द्रित करना खतरनाक हो सकता है

ओम् की बड़ी महिमा है। इस शब्द, जो कि मूलत: ध्वनि मात्र है, के बारे में दुनिया भर के विद्वानों ने भिन्न-भिन्न व्याख्याएं की हैं। जहां तक मेरी समझ है, ओम् के बारे में जितना कहा या लिखा गया है, शायद की किसी अन्य शब्द के बारे में कहा गया हो। चाहे इसकी खोज के बारे में, चाहे इसकी आकृति के बारे में, चाहे इसके अर्थ को लेकर, चाहे इसकी उपयोगिता के संदर्भ में, इतनी जानकारी उपलब्ध है, जिस पर पूरा ग्रंथ बन सकता है। वस्तुत: ओम् के बारे में जितना कुछ जानें, वह अधूरा ही रहेगा। मेरी तो धारणा यह है कि ओम् के बारे में अभी और खोज होनी बाकी है। अभी और नए अनुभव सामने आ सकते हैं।
इस सिलसिले में मुझे स्वर्गीय श्री रामसुखदास जी महाराज की बात याद आती है, जो कि उन्होंने अजमेर के सुभाष उद्यान में श्रीमद्भागवत कथा के दौरान कही थी। उन्होंने कहा था कि गीता पर उन्होंने अनेक बार प्रवचन किए हैं, गीता को बहुत कुछ जाना है, मगर जब भी वे प्रवचन करते हैं तो हर बार नए अर्थ निकल कर आते हैं। ऐसा लगता है कि हर बार कुछ छूट जाता है कहने से। इसे मैं ओम् के संदर्भ में लेता हूं।
हर बार नया अनुभव होने की बड़ी वजह है। इस दुनिया में हर व्यक्ति अनूठा है, हर आदमी अलग है, थोड़ी बहुत शक्ल मिल सकती है, मगर फिर भी यह पक्का है कि किसी भी व्यक्ति की हूबहू कॉपी असंभव है। इसी यूनिकनेस के कारण ही तो अंगूठे की निशानी को व्यक्ति की इकलौती पहचान माना गया, जिसका कि उपयोग आधार कार्ड में किया जाता है। ये तो हुई शक्ल की बात। अंदर से भी हर शख्स की अनुभूति अलग होती है। जितने भी लोगों ने ओम् को जाना है और व्यक्त किया है, बाद में जानने वालों की अनुभूति उनसे अलग ही होगी। यूनिकनेस के कारण। इसी कारण ओम् अनंत है, अनादि है।
खैर, मैं मुद्दे पर आता हूं। मैने जितना जाना, समझा, उसकी बात करता हूं। अव्वल तो ब्रह्मांड में सतत गूंज रही ओम् की ध्वनि का उच्चारण करना हमारे स्वर यंत्र के बस की बात नहीं। अलबत्ता वाद्य यंत्रों से जरूर उससे मिलती-जुलती ध्वनि उत्पन्न की जा सकती है। आप स्वयं भी इसे अनुभव कर सकते हैं। कभी निर्जन स्थान पर एकांत में अंगूठों से दोनों कान बंद कर लीजिए। आपको भिन्न-भिन्न प्रकार की ध्वनियां सुनाई देंगी, जो कि हमारे मस्तिष्क में पहले से संग्रहित हैं। कुछ अभ्यास के बाद गहरे एकाग्र चित्त होने पर आपको ओम् की ध्वनि सुनाई देगी। यही अनहद नाद है। प्रयास करके देखना, आप ठीक उसी प्रकार की ध्वनि का उच्चारण नहीं कर पाएंगे। ठीक वैसी ही ध्वनि पूरे ब्रह्मांड में गूंज रही है। उसकी अनुभूति की जा चुकी है। नासा ने तो उसे रिकार्ड तक किया है। वैसे तो उस ध्वनि को सुनने और उस पर सतत एकाग्रता से आप ध्यान में प्रवेश कर जाएंगे। जिनके लिए यह थोड़ा कठिन है, वे ध्यान करने के लिए स्वयं अपने स्वर यंत्र से उच्चारण करके ब्रह्मांड की ध्वनि से मेल करने की कोशिश कर सकते हैं। एक स्थिति के बाद मुंह से उच्चारण तो बंद हो जाएगा और ब्रह्मांड की ध्वनि ही सुनाई देने लगेगी। इस अवस्था में भय उत्पन्न होने की पूरी संभावना है, क्योंकि जब हम अपने में स्थित हो जाते हैं तो पूरी तरह से अकेले हो जाते हैं। यह अकेलापन भयभीत कर सकता है, क्योंकि हमारा आधार खो जाता है। हम सहारे में जीने के आदी हैं, इस कारण जैसे ही स्वच्छंता की स्थिति आती हो तो डर पैदा हो सकता है।
वैसे भी हम सब जानते हैं कि अकेलेपन में अमूमन हमें डर लगता है। आपने खुद अनुभव किया होगा कि रात के समय यदि हम सन्नाटे से गुजरते हैं तो अकेलापन दूर करने के लिए या तो किसी देवी-देवता के नाम का उच्चारण करते हैं या फिर कोई गाना गुनगुनाते हैं। वह गुनगुनाहट ऐसा महसूस करवाती है, मानो हमारे साथ कोई है, हम अकेले नहीं हैं। इसे समझिये। यह अकेलापन तो भौतिक मात्र है, जो डर पैदा करता है। जरा सोचिए, ध्यान के दौरान का अकेलापन कितना भयभीत कर सकता है। उसमें तो खुद के खो जाने का अंदेशा लग सकता है। मैं स्वयं उस डर से गुजरा हूं। कुछ और अनुभूतियां भी हुई हैं, जिन्हें शब्दों में अभिव्यक्त करना कठिन है। कभी संभव हुआ तो जरूर करूंगा।
फिर मुद्दे पर आते हैं। जानकरों का मानना है कि ओम् पर ध्यान केन्द्रित होने के साथ ही हम भीतर से पूरी तरह से खाली हो जाते हैं। उस खाली स्थान को भरने के लिए ब्रह्मांड में विचरण कर रही नकारात्मक शक्तियां दौड़ कर हमारे पास आ सकती हैं। परिणामस्वरूप नुकसान भी हो सकता है। कल्पनातीत अनुभूतियां हो सकती हैं। विक्षिप्तता का भी खतरा हो सकता है। अमूमन नकारात्मक शक्तियों को रोकने अथवा उनसे बचने की हमारी तैयारी नहीं होती। कदाचित किसी योगी के मार्गदर्शन में ध्यान करने पर कुछ सुरक्षा हो सके। यही वजह है कि अनेक विद्वान सलाह देते हैं कि अकेले ओम् पर ध्यान नहीं करना चाहिए। ओम् के साथ किसी भी मंत्र का उच्चारण कर सकते हैं। ओम् का उच्चारण जहां हमें ब्रह्मांड से जोड़ता है, वहीं मंत्र सहारा बन जाता है, ब्रह्मांड की समग्र शक्ति को आत्मसात करने में। वह हमें प्रोटेक्ट करता है। मंत्र के शुरू में ओम् की ध्वनि का प्रयोजन ही ये है कि पहले हम ब्रह्मांड से कनैक्ट हों और फिर उसकी ऊर्जा मंत्र के साथ जुड़ जाए। भिन्न-भिन्न मंत्रों के भिन्न-भिन्न फल होते हैं, ये तो हम सब जानते ही हैं।
यह सब मेरे स्वाध्याय, अब तक के अनुभव और अध्ययन से संग्रहित जानकारी की निष्पत्ति है। संभव है आपकी अनुभूति कुछ और हो। मेरी अनुभूति में जब भी इजाफा होगा, आपसे फिर साझा करूंगा।

-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2020

हमारी छाया में भी छिपे हुए हैं राज

पिछले एक ब्लॉग में हमने आइने में दिखने वाले प्रतिबिंब के बारे में चर्चा की थी कि हालांकि उसका अपना कोई अस्तित्व नहीं है, फिर भी उसकी महत्ता है। अब हम चर्चा कर रहे हैं छाया की। छाया अर्थात सूर्य अथवा रोशनी के सामने आने वाली वस्तु के पीछे बनने वाली आकृति की। हम यही जानते और समझते हैं कि छाया का अपना कोई अलग अस्तित्व नहीं। उसका भला क्या महत्व हो सकता है? बात ठीक भी लगती है। मगर हमारी संस्कृति में इस पर भी बहुत काम हुआ है। हमारे शरीर की छाया के बारे में बात करने से पहले हम चर्चा कर लेते हैं छाया के कारण से होने वाले सूर्य ग्रहण व चंद्र ग्रहण की। हम सब जानते हैं कि ये छाया की ही परिणाम स्वरूप घटित होते हैं। इस पर बड़े वैज्ञानिक प्रयोग हुए हैं और हो भी रहे हैं, लेकिन भारतीय संस्कृति में बहुत पहले ही खोज हो चुकी है कि इनका मानव सहित चराचर जगत पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। यही वजह है कि ज्योतिष विज्ञानी बताते हैं कि सूर्य ग्रहण व चंद्र ग्रहण के दौरान कौन कौन से काम नहीं करने चाहिए।
आपको यह भी जानकारी होगी कि किसी व्यक्ति में असामान्य लक्षण पाए जाने पर कहा जाता है कि उस पर किसी की छाया पड गई है। अमूमन यह बात किसी भूत-प्रेत आदि के संदर्भ में कही जाती है। परियों की छाया पड जाने के बारे में भी आपने सुना होगा। किसी व्यक्ति के विचारों या आचारण पर किसी व्यक्ति का प्रभाव दिखाई देने पर भी कहा जाता है कि उस पर उस अमुक व्यक्ति की छाया पड गई है। जिन लोगों ने तंत्र विद्या के बारे में पढ़ा अथवा सुना है, उनकी जानकारी में होगा कि तांत्रिकों ने भी लक्षित परिणाम पाने के लिए छाया का प्रयोग किया है।
खैर, अब चर्चा करते हैं हमारे शरीर की छाया की। इस बारे में मुझे जो जानकारी मिली है, वह आपसे साझा करना चाहता हूं। छाया के महत्व के बारे में शिव स्वरोदय में विस्तार से चर्चा की गई है। शिव स्वरोदय भारतीय प्राकृतिक विज्ञान है। इसमें भगवान शिव प्रकृति के रहस्यों के बारे में माता पार्वती को जानकारी देते हैं।
शिव स्वरोदय में बताया गया है कि एकान्त निर्जन स्थान में जाकर और सूर्य की ओर पीठ करके खड़ा हो जाएं या बैठ जाएं। फिर अपनी छाया के कंठ भाग को देखे और उस पर मन को थोड़ी देर तक केन्द्रित करें। इसके बाद आकाश की ओर देखते हुए ह्रीं परब्रह्मणे नम: मंत्र का 108 बार जप करना चाहिए अथवा तब तक जप करना चाहिए, जब तक आकाश में भगवान शिव की आकृति न दिखने लगे। छह मास तक इस प्रकार अपनी छाया की उपासना करने पर साधक को शुद्ध स्फटिक की भांति आलोक युक्त भगवान शिव की आकृति का दर्शन होता है। यदि वह रूप (भगवान शिव की आकृति) कृष्ण वर्ण का दिखाई पड़े, तो साधक को समझना चाहिए कि आने वाले छह माह में उसकी मृत्यु सुनिश्चित है। यदि वह आकृति पीले रंग की दिखाई पड़े, तो साधक को समझ लेना चाहिए कि वह निकट भविष्य में बीमार होने वाला है। लाल रंग की आकृति दिखने पर भयग्रस्तता, नीले रंग की दिखने पर उसे हानि, दुख तथा अभावग्रस्त होने का सामना करना पड़ता है। यदि आकृति बहुरंगी दिखाई पड़े, तो साधक पूर्णरूपेण सिद्ध हो जाता है।
यदि चरण, टांग, पेट और बाहें न दिखाई दें, तो साधक को समझना चाहिए कि निकट भविष्य में उसकी मृत्यु निश्चित है। यदि छाया में बायीं भुजा न दिखे, तो पत्नी और दाहिनी भुजा न दिखे, तो भाई या किसी घनिष्ट मित्र अथवा समबन्धी एवं स्वयं की मृत्यु निकट भविष्य में निश्चित है। यदि छाया का सिर न दिखाई पड़े, तो एक माह में, जंघे और कंधा न दिखाई पड़ें तो आठ दिन में और छाया न दिखाई पड़े, तो तुरन्त मृत्यु निश्चित है। यदि छाया की उंगलियां न दिखाई पड़ें, तो तुरन्त मृत्यु समझना चाहिए। कान, सिर, चेहरा, हाथ, पीठ या छाती का भाग न दिखाई पड़े, तो भी समझना चाहिए कि मृत्यु एकदम सन्निकट है। लेकिन यदि छाया का सिर न दिखे और दिग्भ्रम हो, तो उस व्यक्ति का जीवन केवल छ: माह समझना चाहिए।
हालांकि मैने इस तथ्य की गहराई को अभी तक नहीं जाना है, न ही मेरा कोई अनुभव है, लेकिन शिव स्वरोदय में जिस प्रकार लिखा गया है, उससे यह तो समझ में आता ही है कि हमारे ऋषियों ने छाया का गहन अध्ययन किया है और उसका अपना विशेष महत्व है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
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गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020

ईश्वर वाकई अव्याख्य है

पूरी कायनात सुव्यवस्थित तरीके से चल रही है। निश्चित रूप से यह कहीं न कहीं से संचालित हो रही है। कोई न कोई तो इसे चला ही रहा है। वह भले ही हमारी तरह कोई मानव या महामानव न हो, मगर एक केन्द्र बिंदु जरूर है, एक पावर सेंटर जरूर है, जिसके इर्द-गिर्द पूरा संसार फैला हुआ है, जहां से पूरा सिस्टम गवर्न हो रहा है। उसी को हम ईश्वर या खुदा कहते हैं। जिन भी ऋषियों-मुनियों, साधु-संन्यासियों, विद्वानों व दार्शनिकों ने स्वयं को जाना है और उस परम सत्ता को जानने की कोशिश की है, वे उसे अभिव्यक्त करने की कोशिश करते रहे हैं। असल में अभिव्यक्ति हमारा मौलिक स्वभाव है। हम जो कुछ भी अनुभव करते हैं, उसे अभिव्यक्त करने की कोशिश करते हैं। उसे अन्य को शेयर करना चाहते हैं। उसकी व्याख्या करने का प्रयास करते हैं। ईश्वर को भी अभिव्यक्त करने के भरपूर प्रयास हुए हैं। मगर उसे पूरा अभिव्यक्त नहीं किया जा सका है। वेद भी उसकी व्याख्या करते करते आखिर में नेति-नेति कह कर हाथ खड़े कर देते हैं। यानि कि वह अव्याख्य है। तभी तो कहा है कि हरि अनंत, हरि कथा अनंता। अंत ही नहीं है। न आदि है, न अंत है।
वह वाकई अव्याख्य है। संभव ही नहीं है उसकी व्याख्या करना। जरा सोचिए जिस हवा के स्पर्श को हम अनुभव करते हैं, उस तक की व्याख्या नहीं कर पाते। जैसे गुड़ को चखने पर हम उसे मीठा कहते हैं। हर किसी ने उसे चखा है, इस कारण वह भी मानता है कि गुड़ मीठा है। गुड़ का जो स्वाद है, उसका नामकरण हमने मीठा कर दिया है। कुछ और नाम दे देते तो वह हो जाता। मगर यदि कोई आपसे कहे कि जरा गुड़ की मिठास की व्याख्या कीजिए कि मीठा माने क्या तो क्या हम उसे अभिव्यक्त कर सकते हैं? क्या शब्दों में बता सकते हैं? नहीं। क्योंकि मिठास अनुभव तो की जा सकती है, मगर उसकी व्याख्या संभव नहीं है। अब सोचिए कि एक भौतिक पदार्थ, जो कि दिखाई भी देता है, अपना स्वाद भी महसूस कराता है, उस तक की व्याख्या नहीं कर पाते तो भला जिसे हमने देखा नहीं, जाना नहीं, उसकी व्याख्या कैसे की जा सकती है? अगर जान भी लिया है तो भी उसे शब्दों में ठीक-ठीक नहीं बता सकते। बताने की कोशिश करेंगे तो विफल हो जाएंगे। उसकी एक वजह ये भी है कि हमने जैसा और जितना जाना, उसे यदि हमने शब्दों में पिरो भी लिया हो तो भी अन्य व्यक्ति उसे समझ नहीं पाएगा, क्योंकि उसने उसे वैसा नहीं जाना-समझा, जैसा कि हमने जाना-समझा है। हां, इशारा मात्र हो सकता है। जैसे सभी को दिखाई देने वाले चांद को हम हाथ में पकड़ कर यह नहीं बता सकते कि यह रहा चांद। हम उस ओर इशारा मात्र कर पाते हैं। अर्थात ईश्वर की जितनी व्याख्याएं हैं, वे सब की सब इशारा मात्र हैं। संपूर्ण नहीं हैं।
इस सिलसिले में मुझे ओशा के प्रवचन में कहे गए एक प्रसंग का ख्याल आता है। हमें पता है कि महाकवि रविन्द्र नाथ ठाकुर ने गीतांजलि लिखी। ईश्वर की व्याख्या करने वाली इस पुस्तक पर उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला था। ओशो बताते हैं कि रविन्द्र नाथ रोजना जब मॉर्निंग वाक पर निकलते थे तो गली के नुक्कड पर अपने घर के बाहर बैठा एक बुजुर्ग उन्हें रोकता और आंख में आंख डाल कर पूछता कि क्या आपने ईश्वर को देखा है, ईश्वर को अनुभव किया है, आपने तो गीतांजलि लिखी है, इस पर वे उसका कोई जवाब नहीं दे पाते थे। हो सकता है कि वे जवाब दे भी पाते होंगे तो भी उस बजुर्ग को नहीं बताते हों कि उसे समझ में नहीं आएगा।
खैर, एक दिन जब रविन्द्र नाथ समुद्र किनारे सैर करने गए तो क्षितिज पर उगते सूर्य की लालिमा देख कर, लहरों पर अठखेलियां करती हवा की सरसराहट व पक्षियों की चहचहाहट सुन कर उस मंजर में यकायक स्तब्ध रह गए। ठहर गए। अचानक उन्हें ईश्वर का साक्षात्कार हो गया। जब वे सैर करके लोट रहे थे तो उनकी मदमस्त चाल और आंखों की चमक देख कर बुजुर्ग जान गया कि आज जरूर रविन्द्र नाथ ईश्वर का साक्षात्कार करके लौट रहे हैं। आज उस बुजुर्ग की हिम्मत नहीं हुई कि वह उनकी आंखों में आंखें गढ़ा कर ये पूछ सके कि क्या तुमने ईश्वर देखा है। वह बुजुर्ग दौड़ कर घर के अंदर भाग गया।
इस प्रसंग का अर्थ ये है कि जब तक रविन्द्र नाथ ने गीतांजलि लिखी, तब तक उनका ईश्वर से साक्षात्कार नहीं हो पाया था। भले ही ईश्वर को उन्होंने बहुत कुछ जान लिया होगा और उसे अपनी रचना में अभिव्यक्त किया होगा, मगर पूरा तो बाद में ही जाना। बताते हैं कि ईश्वर से साक्षात्कार के बाद उनकी स्थिति विक्षिप्त सी हो गई थी। वे पेड़ों से लिपट कर रोया करते थे। हर जगह उन्हें ईश्वर की दिखाई देने लगा। यानि वे ईश्वरमय हो गए, मगर अपनी उस अवस्था के बारे में बताने के लायक नहीं रहे।
इस प्रसंग के मायने ये हैं कि ईश्वर से साक्षात्कार से पहले की सारी व्याख्या अधूरी है। जिस दिन जान लिया, उस दिन उसकी व्याख्या करना असंभव हो गया। इसे कहते हैं गूंगे का गुड़, यानि कि वह गुड़ की मिठास का आनंद तो ले रहा है, मगर बता नहीं सकता कि गुड़ कैसा है?

-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

सोमवार, 3 फ़रवरी 2020

दर्पण में दिखाई देने वाले प्रतिबिंब का वजूद क्या है?

क्या आपने कभी सोचा है कि आइने अर्थात दर्पण में दिखाई देने वाले प्रतिबिंब का वजूद क्या है? वह आखिर है क्या? जब तक हम दर्पण के सामने खड़े रहते हैं, तब तक वह दिखाई देता है और हटते ही वह भी हट जाता है। तो जो दिखाई दे रहा था, वह क्या था? हटते ही वह कहां खो जाता है? यह सही है कि उसका अपने आप में कोई वजूद नहीं, मगर वह कुछ तो है। वस्तुत: प्रतिबिंब के वजूद में प्रकाश का ही महत्व है। जैसे ही हमारे चेहरे पर प्रकाश पड़ता है, तो आइने में उसका प्रतिबिंब बनता है और जैसे ही प्रकाश हटता है व अंधेरा होता है तो वह भी दिखाई देना बंद हो जाता है। विज्ञान की भाषा में यह रिफ्लेक्शन अर्थात किरणों परावर्तन है। हमारे चेहरे पर पडऩे वाली किरणें चमकीली सतह से रिफ्लेक्ट हो कर वापस लौटती हैं, और हमें अपना प्रतिबिंब दिखाई देता है। प्रतिबिंब क्या, हमारा बिंब भी किरणों के परावर्तन के कारण दिखाई देता है। प्रकाश का यही खेल छाया भी बनाता है। प्रकाश के सामने खड़े होने पर हमारे पीछे छाया दिखाई देती है। छाया यानि वह दृश्य जो कि प्रकाश की किरणें रुकने की वजह से बनती है। उसका अपने आप में कोई वजूद नहीं। हम हैं तो वह है, अन्यथा नहीं। हम सब को जानकारी है ही कि सिनेमा के पर्दे पर दिखाई देने वाले चित्र भी प्रकाश व अंधेरे का ही खेल हैं।
खैर, हम बात कर रहे थे प्रतिबिंब की। भले ही इसका स्वतंत्र वजूद नहीं, मगर इसका भी महत्व है। आपको जानकारी होगी कि ज्योतिषी व तांत्रिक बताते हैं कि तेल, विशेष रूप से सरसों के तेल में अपना प्रतिबिंब देख कर उस तेल को दान करने से शनि का प्रकोप कम होता है। जिन पर शनि की साढ़े साती का प्रभाव है, उनको ये उपाय बताया जाता है। अर्थात प्रतिबिंब अपने साथ हमारी कुछ ऊर्जा, जिसे नकारात्मक ऊर्जा कह सकते हैं, ले जाता है। प्रतिबिंब का कितना महत्व है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सामुद्रिक शास्त्र में बताया जाता है कि अगर पानी में हमारा प्रतिबिंब दिखाई देना बंद हो जाए तो जल्द ही मृत्यु हो जाती है। अर्थात मृत्यु से पहले प्रतिबिंब बनना बंद हो जाता है।
दर्पण में बनने वाले प्रतिबिंब का उपयोग वास्तु शास्त्रानुसार भी किया जाता है। वास्तु दोष समाप्त करने के लिए स्थान विशेष पर दर्पण लटकाया जाता है। चूंकि दर्पण सिर्फ सामने का प्रतिबिंब दिखाता है, पीछे का नहीं, इस कारण आपने देखा होगा कि कटिंग पीछे कैसी हुई है, उसे दिखाने के लिए ब्यूटीशियन आगे व पीछे दर्पण रख कर वह हमें प्रतिबिंब का भी प्रतिबिंब दिखाता है।
वस्तुत: प्रतिबिंब एक भ्रम है। चूंकि हमको तो पता होता है कि वह हमारा प्रतिबिंब है, इस कारण भ्रमित नहीं होते, मगर अक्सर चिडिय़ा भ्रमित हो जाती है। आपने देखा होगा कि आइने के सामने खड़ी हो कर चिडिय़ा दिखाई देने वाले प्रतिबिंब को चोंच मारती है, चूंकि उसे भ्रम हो जाता है कि सामने कोई और चिडिय़ा है।
हमारे यहां तो परंपरा है कि छोटे बच्चे को उसका चेहरा दर्पण में नहीं दिखाया जाता। मुंडन के बाद ही बच्चे को उसका चेहरा दर्पण में दिखाने की छूट होती है। इसकी वजह क्या है, यह खोज का विषय है। ऐसी भी परंपरा है कि दूल्हा जब तोरण मारने आता है तो उसे दुल्हन को सीधे नहीं दिखाया जाता। उनको एक दूसरे के दर्शन पहले दर्पण में कराए जाते हैं। इसका भी कारण जाना चाहिए।
आपने ऐसा सुना होगा कि ऐसे दर्पण को बनाया जा चुका है, जिसके सामने जाने पर वस्त्र ओझल हो जाते हैं और हम पूरे नग्न दिखाई देते हैं। यह कितना सच है, पता नहीं। कदाचित एक्स-रे जैसी कोई तकनीक होगी।
दुनिया में ऐसे लोग भी हैं जो आइने में अपना प्रतिबिंब नहीं देखते। उसके पीछे उनकी धारणा ये है कि प्रतिबिंब से हमें अपनी पहचान दिखाई देती है कि लोगों कैसे दिखाई देते हैं। यदि हमारे चेहरे प्रतिबिंब हम देख लेते हैं तो उससे हमारा अटैचमेंट हो जाता है। हमें आभास होता है कि हम कैसे दिखते हैं। वह मोक्ष प्राप्ति में बाधक बनता है। मोक्ष का अर्थ ही ये है कि अपनी आइडेंटिटि मिटाना। अहम को समाप्त करना।
आज हम बड़ी आसानी से दर्पण में अपना चेहरा देख पाते हैं, लेकिन जब इसका अविष्कार नहीं हुआ था, तब ठहरे हुए पानी में चेहरा देखा जाता था। ऐसा लगता है कि दर्पण की खोज का पहला बिंदु ही पानी में चेहरा दिखाई देना रहा होगा। जानकारी के अनुसार आज से तकरीबन 8 हजार साल पहले ओब्सीडियन नाम के एक पत्थर के ऊपर पोलिश करके शीशा बनाया गया था। यह पत्थर एक ज्वालामुखीय प्रदार्थ था, जो एक कांच की तरह होता था। बताया जाता है कि लगभग 6 हजार ईसा पूर्व के आसपास एनोटोलिया अर्थात तुर्की में लोग इस पत्थर का इस्तेमाल करते थे इसी प्रकार चार हजार साल पहले मेसोपोटामिया में पॉलिश किए गए तांबे का इस्तेमाल दर्पण के रूप में किया जाता था। बाद में मिस्र वासियों ने भी इसका उपयोग किया। करीब 2 हजार ईसा पूर्व से चीन और भारत में भी तांबा, कास्य और मिश्रित धातु के द्वारा शीशे का उत्पादन किया गया। बाद में चीन में चांदी और पारे को मिला कर धातु पर कोटिंग करके दर्पण बनाना शुरू किया। सोलहवीं सदी में वेनिस शीशे के उत्पादन करने का एक केंद्र बन गया। पहले आधुनिक शीशे का आविष्कार जर्मन केमिस्ट जस्टस वॉन लाईबिग ने किया। 1835 में जर्मन केमिस्ट जस्टस वॉन लाईबिग को चांदी और गिलास से निर्मित दर्पण का आविष्कारक माना जाता है।

-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

सोमवार, 27 जनवरी 2020

क्या अंतर्ध्यान, अदृश्य या गायब होना संभव है?

तेजवानी गिरधर
अंतर्ध्यान शब्द के मायने है, अदृश्य होना। इसका उल्लेख आपने शास्त्रों, पुराणों आदि में सुना होगा। अनेक देवी-देवताओं, महामानवों व ऋषि-मुनियों से जुड़े प्रसंगों में इसका विवरण है कि वे आह्वान करने पर प्रकट भी होते हैं, साक्षात दिखाई देते हैं और अंतध्र्यान भी हो जाते हैं। मौजूदा वैज्ञानिक युग में यह वाकई अविश्वनीय है। विज्ञान आज तक भी इस पुरातन कला को समझ नहीं पाया है। हालांकि कुछ वैज्ञानिकों ने पर इस पर काम किया है और सिद्धांतत: यह मानते हैं कि ऐसा संभव है, मगर कोई भी ऐसा कर नहीं पाया है। बताते हैं कि ओशो ने दुनिया के चंद शीर्ष वैज्ञानिकों की टीम बना कर इस पर काम किया था और उन्हें पूरी उम्मीद थी कि कामयाबी मिल जाएगी।
इस बारे में उपलब्ध जानकारी के अनुसार वैज्ञानिक नैनो किरणों पर काम कर रहे हैं। इस सिलसिले में एक लबादा बनाने की कोशिश की जा रही है, जिसे पहनने के बाद उस पर नैनो किरणें डालने पर दिखाई देना बंद हो जाता है। कुछ वैज्ञानिक इस पर भी काम कर रहे हैं कि विशेष तापमान व दबाव यदि मनुष्य के आसपास क्रियेट किया जाए तो वह अदृश्य हो सकता है।
गूगल पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार एक उपकरण बनाया जा चुका है, जिसके भीतर रखी वस्तु एक दिशा से तो दिखाई देती है, मगर दूसरी दिशा से नहीं दिखाई देती। एक उपकरण, जिसका नाम फोटोनिक क्रिस्टल बताया गया है, वह वस्तुओं को दिखाई देने में बाधक बनता है, अर्थात अदृश्य कर देता है। प्रसंगवश एक शब्द ख्याल में आता है- मृग मरीचिका। कहते हैं न कि रेगिस्तान में तेज धूप में किरणों की तरंगों में दूर से हिरण को ऐसा आभास होता है कि वहां समुद्र है या पानी है, जबकि वास्तव में ऐसा होता नहीं है। अर्थात हिरण को दृष्टि भ्रम होता है। हो सकता है कि कल इसी प्रकार का दृष्टि भ्रम बना कर आदमी को अदृश्य किया जा सके।
बताते हैं कि हिमालयों की पहाडिय़ों में एक जड़ी पाई जाती है, जिसे मुंह में रखने पर आदमी दिखाई देना बंद हो जाता है। मगर इसके भी प्रमाणिक उदाहरण हमारे संज्ञान में नहीं हैं। इसी प्रकार जनश्रुति है कि एक पक्षी विशेष का पंख अपने पास रखने वाला व्यक्ति दूसरों को दिखाई नहीं देता, मगर इसके भी पुख्ता सबूत नहीं मिले हैं।
इसी से संबधित एक जानकारी ये भी है कि देवी देवता सशरीर प्रकट हो सकते हैं, जो कि पंचमहाभूत से बना है, मगर अन्य आत्माएं वायु अथवा प्रकाष के रूप में विचरण करती हैं और उसका आभास भी करवा सकती हैं। आपने सुना होगा कि अनेक लोगों को उनके दिवंगत गुरू याद करने पर गंध के रूप में अपनी उपस्थिति का आभास कराते हैं। इसी प्रकार भूत छाया के रूप में दिखाई देते हैं। मेरे एक मित्र का यकाीन है कि रात कि समय उनके स्वर्गीय पिताश्री एक पक्षी की आवाज से अपनी उपस्थिति का आभास करवाते हैं।
वस्तुओं के गायब हो जाने के किस्से भी आम हैं। आप के साथ भी ऐसा हो चुका होगा। जैसे किसी स्थान विशेष पर रखी वस्तु आप लेने जाते हैं तो वह वहां नहीं मिलती। आपको अचरज होता है कि वह कहां गायब हो गई। कुछ समय बाद जब फिर देखते हैं तो वह वहीं मिल जाती है। ऐसा प्रतीत होता है कि वह कुछ समय के लिए गायब हो जाती है। ऐसा भ्रम की वजह से भी हो सकता है।
आपने ऐसे मदारियों को भी करतब दिखाते हुए देखा होगा कि वे गुलाब जामुन या कोई मिठाई मांगने पर हवा में हाथ धुमा कर वह वस्तु पेश कर देते हैं। हालांकि यह ऐसे जादू के रूप में माना जाता है, जिसके पीछे कोई तकनीक काम करती है, जबकि आम मान्यता है कि मदारी कुछ समय के लिए मांगी गई वस्तु किसी दुकान या ठेले से मंगवाते हैं और कुछ समय बाद वह वस्तु वापस वहीं पहुंच जाती है, जहां से मंगाई गई है।
गायब हो जाने के संबंध में कुछ रहस्यमयी किस्से जानकारी में आए हैं। बताते हैं कि एक महिला क्रिस्टीन जांसटन और उनके पति एलन जांसटन 1975 की गर्मियों में उत्तरी ध्रुव की यात्रा पर गए थे। वहां एलन अचानक गायब हो गए। बाद में पुलिस तेज घ्रांण शक्ति वाले कुत्ते ले कर खोजने गई तो जिस स्थान से एलन गायब हुए थे, वहां पर आ कर कुत्ते रुक गए।
एक किस्सा ये भी है। अमेरिका के टेनेसी स्थित गैलेटिन के निवासी डेविड लांग 23 सितम्बर, 1808 को दोपहर में घर से बाहर निकले। उनकी मुलाकात उनके एक न्यायाधीश मित्र आगस्टस पीक से हुई। शिष्टाचार के बाद जैसे ही डेविड लांग आगे बढ़ा तो वह अचानक गायब हो गया।
इसी प्रकार पूरी बस्ती ही गायब होने का भी किस्सा है। घटना अगस्त 1930 की बताई जाती है। कनाडा के चर्चिल थाने के पास अंजिकुनी नामक एस्किमो की बस्ती थी। एक दिन अचानक पूरी बस्ती के लोग न जाने कहां गायब हो गए।
इसी प्रकार 1885 में वियतनाम में सैनिकों की छह सौ सैनिकों की एक टुकड़ी ने सेगॉन शहर की ओर कूच किया। कोई एक मील दूर जाने पर वह पूरी टुकड़ी गायब हो गई। आज तक उस रहस्य से पर्दा नहीं उठ पाया है। अनुमान यही लगाया गया कि धरती से इतर कोई और ग्रह है, जहां के प्राणी लोगों को पकड़ कर ले जाते हैं।
कुल जमा बात ये है कि पौराणिक काल में जिस विधा से अथवा जिस शक्ति से देवी-देवता अंतध्र्यान हो जाते थे, वह भले ही इस युग में संभव न हो, मगर उम्मीद की जा रही है कि विज्ञान किसी दिन गायब होने की कोई न कोई तकनीक खोज ही लेगा।

-तेजवानी गिरधर
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बुधवार, 22 जनवरी 2020

क्या कलंदर व झूलेलाल एक ही हैं?

जिस गीत दमा दम मस्त कलंदर को गा और सुन कर सिंधी ही नहीं, अन्य समुदाय के लोग भी झूम उठते है, उस पर यह सवाल बना हुआ है कि क्या कलंदर व सिंधियों के आराध्य देवता झूलेलाल एक ही हैं? पाकिस्तान की मशहूर गायिका रेश्मा व बांग्लादेश की रूना लैला की जुबान से थिरक कर लोकप्रिय हुआ यह गीत किसकी महिमा या स्मृति में बना हुआ है, इसको लेकर विवाद है।
यह सर्वविदित है कि आम तौर सिंधी समुदाय के लोग अपने विभिन्न धार्मिक व सामाजिक समारोहों में इसे अपने इष्ट देश झूलेलाल की प्रार्थना के रूप में गाते हैं, लेकिन भारतीय सिंधू सभा ने खोज-खबर कर दावा किया है कि यह गीत असल में हजरत कलंदर लाल शाहबाज की तारीफ में बना हुआ है, जिसका झूलेलाल से कोई ताल्लुक नहीं है। सभा ने एक पर्चा छाप कर इसका खुलासा किया है।
पर्चे के अनुसार आम धारणा है कि यह अमरलाल, उडेरालाल या झूलेलाल अवतार की प्रशंसा या प्रार्थना के लिए यह गीत बना है। उल्लेखनीय बात है कि पूरे गीत में झूलेलाल से संदर्भित प्रसंगों का कोई जिक्र नहीं है, जैसा कि आम तौर पर किसी भी देवी-देवता की स्तुतियों, चालीसाओं व प्रार्थनाओं में हुआ करता है। सिर्फ झूलेलालण शब्द ही भ्रम पैदा करता है कि यह झूलेलाल पर बना हुआ है। असल में यह तराना पाकिस्तान स्थित सेहवण कस्बे के हजरत कलंदर लाल शाहबाज की करामात बताने के लिए बना है।
पर्चे में बताया गया है कि काफी कोशिशों के बाद भी कलंदर शाहबाज की जीवनी के बारे में कोई लिखित साहित्य नहीं मिलता। पाकिस्तान में छपी कुछ किताबों में कुछ जानकारियां मिली हैं। उनके अनुसार कलंदर लाल शाहबाज का असली नाम सैयद उस्मान मरुदी था। उनका निवास स्थान अफगानिस्तान के मरुद में था। उनका जन्म 573 हिजरी यानि 1175 ईस्वी में हुआ। उनका बचपन मरुद में ही बीता। युवा अवस्था में वे हिंदुस्तान चले आए। सबसे पहले उन्होंने मंसूर की खिदमत की। उसके बाद बहाउवलदीन जकरिया मुल्तानी के पास गए। इसके बाद हिजरी 644 यानि 1246 ईस्वी में सेवहण पहुंचे। हिजरी 650 यानि 1252 ईस्वी में उनका इंतकाल हो गया। इस हिसाब से वे कुल छह साल तक सिंध में रहे।
कुछ किताबों के अनुसार आतताइयों के हमलों से तंग आ कर मुजाहिदीन की एक जमात तैयार हुई, जो तबलीगी इस्लाम का फर्ज अदा करती थी। उसमें कलंदरों का जिक्र आता था। आतताइयों में से विशेष रूप से चंगेज खान, हलाकु, तले और अन्य इस्लामी सुल्तानों पर चढ़ाई कर तबाही मचाई थी। इसमें मरिवि शहर का जिक्र भी है, जो शाहबाज कलंदर का शहर है। कलंदर शाह हमलों के कारण वहां से निकल कर हिंदुस्तान आए। वे मुल्तान से होते हुए 662 हिजरी में सेवहण आए और 673 में उनका वफात हुआ। यानि वे सेवहण में 11 साल से ज्यादा नहीं रहे। इस प्रकार उनके सेहवण में रहने की अवधि और वफात को लेकर मत भिन्नता है। पर्चे के अनुसार सेवहण शहर पुराना है। कई संस्कृतियों का संगम रहा। वहीं से सेवहाणी कल्चर निकल कर आया, जिसकी पहचान बेफिक्रों का कल्चर के रूप में थी। यह शहर धर्म परिवर्तन का भी खास मरकज रहा। इसी सिलसिले में बताया जाता है कि वहां एक सबसे बड़े शेख हुए उस्मान मरुंदी थे, जिन्हें लाल शाहबाज कलंदर के नाम से भी याद किया जाता है।
पर्चे में बताया गया है कि शाह कलंदर का आस्ताना सेवहण में जिस जगह है, वहां पहले शिव मंदिर था। वहां पर हर वक्त अलाव जलता रहता था, जिसे मुसलमान अली साईं का मच कहते थे। यह शहर जब सेवहण में शाह कलंदर का वफात हुआ तो हिंदुओं ने उनको अपने मुख्य मंदिर में दफन करने की इजाजत दी। बाद में वहां के पुजारी भी उनके मलंग हो गए। इस पर्चे के जरिए यह साबित करने की कोशिश की गई है कि कलंदर शाहबाज इस्लाम के प्रचारक थे। इसी को आधार बना कर सिंधी समुदाय को आगाह किया गया है कि भला इस्लाम के प्रचारक और धर्म परिवर्तन की खिलाफत करने वाले झूलेलाल एक कैसे हो सकते हैं। एक और शंका ये है कि यदि दोनों एक हैं तो इस गीत को केवल सिंधी ही क्यों गाते हैं, मुस्लिम क्यों नहीं? क्या इसकी वजह केवल इतनी है कि यह सिंधी भाषा में है?
अलबत्ता परचे में इसे जरूर स्वीकार किया गया है कि दमा दम मस्त कलंदर अकीदत से गाने से मुरादें पूरी होती हैं। आम धारणा है कि सात वर्ष की उम्र में उन्होंने कुरआन को जुबानी याद कर लिया था। यह भी पक्का है कि उनको अरबी व फारसी के साथ उर्दू जीनत जुबान भी बोलते थे। पूरी उम्र उन्होंने शादी नहीं की। उनके मन को जर और जमीन भी मैला नहीं कर पाए। अन्य दरवेश तो बादशाहों के नजराने कबूल कर लेते थे, मगर शाह कलंदर उस ओर आंख उठा कर भी नहीं देखते थे।
पर्चे में यह स्पष्ट नहीं है कि दमा दम मस्त कलंदर गीत में झूलेलालण शब्द कैसे शामिल हो गया, जिसकी वजह से सिंधी समुदाय के लोग इसे श्रद्धा के साथ गाते हैं। बहरहाल यह इतिहासविदों की खोज का विषय है कि शाहबाज कलंदर को झूलेलाल क्यों कहा गया है।
इस सिलसिले में अजमेर में भी असमंजस हो चुका है। बात थोड़ी पुरानी है, मगर चूंकि इसी विवाद से जुड़ी हुई है, इस वजह से यहां जिक्र कर रहा हूं। मौलाई कमेटी के कन्वीनर सैयद अब्दुल गनी गुर्देजी की ओर से पिछले कई साल से चेटीचंड के मौके पर सिंधी समुदाय का हार्दिक अभिनंदन करने के लिए एक पर्चा जारी करते रहे हैं। इसमें उल्लेख था कि सिंधी समाज के आराध्यदेव झूलेलाल जी को ही मुसलमान सखी शाहबाज कलंदर या लाल शाहबाज कलंदर कहते हैं। इस पर 23 नवंबर 2004 को दैनिक भास्कर में मेरी बाईलाइन खबर के अनुसार जब उनसे पूछा गया कि वे किस आधार पर दोनों को एक बताते हैं तो उनका कहना था कि उन्हें कोई जानकारी नहीं है कि दोनों में कोई फर्क है या गाने को लेकर कोई विवाद है। न ही किसी सिंधी भाई ने कभी ऐतराज किया। वे तो महज भाईचारे के लिए पर्चा छपवाते हैं।

आपकी सुविधा के लिए इस पोस्ट के साथ रूना लैला की ओर से गाए गए गीत की लिंक, जो कि यूट्यूब पर मौजूद है, साझा कर रहा हूं
https://www.youtube.com/watch?v=OPLHEkHXRwg

-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

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