एक महत्वपूर्ण बात यह है कि नौकरी के दौरान व्यक्ति की पहचान उसके काम, पद या जिम्मेदारी से जुड़ी होती है। रिटायरमेंट के बाद अचानक वह पहचान समाप्त हो जाती है, जिससे अब मेरी जरूरत नहीं रही जैसी भावना पैदा होती है। वह हीन भावना से ग्रसित हो जाता है। इसके अतिरिक्त सेवानिवृत्ति के बाद अकेलापन व उदासी छा सकती है। कार्यस्थल के साथी, दिनचर्या और सामाजिक संपर्क कम हो जाते हैं। यह अवसाद और निराशा को जन्म दे सकता है। साथ ही जीवन में कोई निश्चित लक्ष्य न रहने पर मनुष्य की जीने की प्रेरणा घट जाती है। जब तक लक्ष्य बना रहेगा, तब तक जीवनी शक्ति कायम रहेगी। लक्ष्य विहीन होते ही, निठल्लतापन आते ही, शरीर व मन शिथिल होने लगता है।
सेवानिवृत्ति के बाद शारीरिक सक्रियता घट जाती है। इससे रक्त-संचार, मेटाबॉलिज्म और हृदय स्वास्थ्य पर असर पड़ता है। मनोवैज्ञानिक तनाव और निष्क्रियता के कारण कॉर्टिसोल और अन्य हार्मोन असंतुलित हो जाते हैं। सोने-जागने, खाने और व्यायाम का समय बिगड़ने से शरीर की जैविक घड़ी प्रभावित होती है।
सामाजिक कारण भी महत्वपूर्ण कारक हैं। पहले परिवार के निर्णयों में प्रमुख भूमिका रहती थी, अब वह सीमित हो जाती है। यदि पेंशन या बचत पर्याप्त न हो तो चिंता बढ़ जाती है। धीरे-धीरे दोस्तों का दायरा छोटा होता जाता है, जिससे मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है।
सेवानिवृत्ति के बाद उम्र जल्द न ढले, इसके लिए सलाह दी जाती है कि आप सदैव सक्रिय रहें। कुछ न कुछ सकारात्मक करिये। व्यस्तता से शारीरिक व मानसिक सक्रियता बनी रहती है। अतः अपने समय का नया अर्थ खोजने की कोशिश करें और समाजसेवा, बागवानी, लेखन, अध्यापन, कला के प्रति दिलचस्पी जागृत करें। नियमित व्यायाम और ध्यान को दिनचर्या का हिस्सा बनाएं। परिवार और मित्रों से जुड़े रहें। नई चीजें सीखने या मस्तिष्क को सक्रिय रखने वाली गतिविधियां करें। जब सेवानिवृत्ति का समय नजदीक हो, उसी समय आगे क्या करना है, इसकी प्लानिंग कर लेनी चाहिए।
कुल जमा बात यह है कि सेवानिवृत्ति के बाद जीवन में उद्देश्य, गतिविधि और सामाजिक जुड़ाव की कमी ही धीरे-धीरे जीवन-ऊर्जा को कम करती है। अतः रिटायर होना चाहिए नौकरी से, जीवन से नहीं।
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