मंगलवार, 31 मार्च 2020

समझ से परे अजीबोगरीब स्थितियां

हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में ऐसी कई स्थितियां निर्मित होती हैं, जो पूरी तरह से असंगत या अतार्किक कही जा सकती हैं। जरूर उसके पीछे कोई तो तर्क होता ही होगा, मगर समझ में नही आता कि ऐसा होता क्यों है? आइये, इन पर नजर डालते हैं:-
1. आपने देखा होागा कि जब भी हमें किसी जगह नियम समय पर पहुंचना होता है और हम घर से निकलते समय थोड़ा लेट हो जाते हैं तो गंतव्य स्थान पर पहुंचने में अनपेक्षित बाधाएं आती हैं। जितना झल्लाते हैं व जल्दी करते हैं, उतना ही लेट हो जाते हैं, कोई वाहन आगे आ जाएगा, कोई गाय, सुअर, कुत्ता आड़े आ जाएगा। इसके विपरीत जब हम समय पर निकलते हैं या समय से पहले निकलते हैं तो रास्ते में कोई बाधा नहीं आती। रास्ता बिलकुल साफ मिलता है।
2. कई बार ऐसा देखा होगा कि जैसे ही हम लंबी श्वास लेते हैं, ठीक उसी वक्त कोई मच्छर या मक्खी श्वास के साथ नाक में घुस जाती है।
3. अमूमन जब हम कोई ऐसा काम कर रहे होते हैं, जिससे हमारे हाथ गीले या सने हुए होते हैं, तो उसी वक्त नाक या चेहरे के किसी भाग कर खुजली होने लगती है।
4. ये समझ से बाहर है कि फोन नंबर सही मिलाने पर कदाचित एंगेज मिलता है, लेकिन रॉंग नंबर डायल हो जाता है तो वह कभी एंगेज नहीं मिलता, तुरंत मिल जाता है।
5. टेलीफोन, बिजली या पानी का बिल जमा करवाते वक्त जैसे ही हम पास वाली लाइन छोटी देख कर उसमें शामिल होते हैं, वह तो धीरे हो जाती है और पहली वाली लाइन जल्दी-जल्दी आगे बढऩे लगती है। हम पछताते हैं कि क्यों अपनी लाइन छोड़ कर दूसरी लाइन में जुड़े।
6. नहाते वक्त साबुन फिसल कर गिरता है तो वह आसपास गिरने की बजाय हमारी पकड़ से काफी दूर तक चला जाता है और हमें उसे पकडऩे के लिए उठना ही पड़ता है।
7. वाट्स ऐप पर गलती से कोई पोस्ट हो जाए तो उस वक्त नेट तेजी से चलता है और जब तक हम उसे डिलीट करें वह पोस्ट हो ही जाता है, जबकि जरूरी पोस्ट डालने पर नेट धीरे हो जाता है। डमरू घूमता ही रहता है।
8. मक्खन-बेड खाते वक्त यदि गलती से वह गिर जाए तो वही हिस्सा जमीन की ओर होता है, जिस तरफ मक्खन लगा होता है।
9. ध्यान करते वक्त जिस भी दृश्य को हम हटाना या भूलना चाहते हैं, वही बार-बार आता है। इससे जुड़ी एक कहानी भी है कि गुरु ने चेले से कहा कि ध्यान करते वक्त बंदर का ख्याल में मत लाना और होता ये है कि बार-बार बंदर ही ख्याल में आता है।
10. रास्ते में जिस किसी पत्थर या गड्ढे से बचना चाहते हैं तो उसी से भिड़ जाते हैं।
11. ईमानदार आदमी बेईमानों को खुश देख कर गलती से कभी लालच में आ कर थोड़ी सी भी बेईमानी करने लगता है तो तुरंत पकड़ा जाता है।
12. अशुभ काम करने में कोई बाधा नहीं आती, जबकि शुभ काम में अमूमन बाधा आती ही है। तभी तो शुभ काम के आरंभ में विघ्नहर्ता गणेशजी की पूजा की जाती है। शादी के कार्ड पर भी ऊपर ही ऊपर गणेशजी या स्वस्तिक का चित्र लगाते हैं।

-तेजवानी गिरधर
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tejwanig@gmail.com

रविवार, 29 मार्च 2020

श्रीकृष्ण ने ऐसे किए 16 हजार 108 विवाह

आम जनमानस में यह अंकित है कि भगवान श्रीकृष्ण के 16 हजार 108 रानियां थीं, मगर कई लोगों को इसका पता नहीं कि उन्होंने इतनी शादियां कैसे कीं?
जानकारी के अनुसार भौमासुर के कारागार में सोलह हजार एक सौ राजकुमारियां कैद थीं। भगवान श्रीकृष्ण ने भौमासुर का वध करके उसकी कैद से राजकुमारियों को छुड़ाया। उन सुंदर युवतियों की इच्छा अनुसार वे उन्हें अपने साथ ले आये। एक ही मुहूर्त में विभिन्न भवनों में ठहराई गईं उन युवतियों के साथ अपनी माया से उतने ही रूप धारण करके भगवान श्रीकृष्ण ने उन सबका विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया।
अन्य रानियों का विवरण ये बताया जाता है:-
सत्राजित नाम से प्रसिद्ध यादव को साक्षात भगवान सूर्य ने स्यमन्तक मणि दे रखी थी। एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने राजा उग्रसेन के लिए वह मणि मांगी। एक दिन सत्राजित का भाई प्रसेन उस मणि को अपने गले में बांध कर सिन्धुदेषीय अश्व पर आरुढ़ होकर शिकार खेलने के लिए वन में विचरने लगा। वहां एक सिंह ने प्रसेन को मार डाला। उस सिंह को जाम्बवंत ने मारा और उस मणि को लेकर अपनी गुफा में चला गया। इस पर सत्राजित ने दुष्प्रचार किया कि श्रीकृष्ण ने उसके भाई प्रसेन का वध कर मणि छीन ली। इस कलंक से मुक्ति के लिए श्रीकृष्ण वन में गए। वहां उन्होंने घोड़े सहित मरे हुए प्रसेन और सिंह के शव को पड़ा देखा। पद चिन्ह से पता लगाते हुए वे जाम्बवंत की गुफा में गए। वहां उन्होंने देखा कि उसकी पुत्री उस मणि से खेल रही है। उन्होंने उससे मणि देने को कहा तो उसने अपने पिता को पुकारा। जाम्बवंत दौड़े दौड़े आए। श्रीकृष्ण ने मणि ले जाने की जिद की तो जाम्बवंत ने उन्हें युद्ध के लिए ललकारा। दोनों के बीच 28 दिन तक युद्ध हुआ। जाम्बवंत हार गया। उसने कहा कि उसे हराने की शक्ति भगवान राम के अतिरिक्त किसी में नहीं है और पूछा कि आप कौन हो? भगवान श्रीकृष्ण ने अपना परिचय दिया। साथ ही भगवान राम के रूप के दर्शन कराए। इस पर जाम्बवंत नतमस्तक हो गया। उसने कहा कि भगवान राम ने त्रेता युग में उससे द्वापर युग में मिलने का वचन दिया था। वह मुक्ति के लिए उनका ही इंतजार कर रहा था। ऐसा कह कर उसने अपनी पुत्री जाम्बवंती का हाथ श्रीकृष्ण में हाथ में दे दिया। भगवान मणि के साथ उसे लेकर द्वारिका पहुंचे। उधर सत्राजित को अपने कृत्य पर बड़ी आत्म ग्लानि हुई और यादव परिवार में शांति रखने के लिए अपनी पुत्री सत्यभामा तथा उस मणि को भी भगवान के चरणों में अर्पित कर दिया।
इसी प्रकार एक बार भगवान श्रीकृष्ण पांडवों की सहायता के लिए इन्द्रप्रस्थ गये। वे अर्जुन के साथ यमुना के किनाने आखेट करने गए। वहां कालिन्दी देवी भगवान श्रीकृष्ण को पति रूप में प्राप्त करने की इच्छा से तपस्या कर रही थीं। भगवान उन्हें साथ लेकर इन्द्रप्रस्थ आये और वहां से द्वारका में पहुंच कर कालिन्दी के साथ विवाह किया।
अन्य प्रकरण के अनुसर अवन्ती के नरेश की मित्रविंदा नाम एक सुंदर पुत्री थी। भगवान श्रीकृष्ण रुक्मणी की ही भांति मित्रविन्दा को भी स्वयंवर से हर कर लाये। इसी प्रकार राजा नग्नजित के सत्य नामक पुत्री थी। राजा ने यह प्रतिज्ञा की थी कि सात सांडों को जो एक साथ नाथ देगा, उसी वीर के साथ पुत्री का विवाह करूंगा। भगवान श्रीकृष्ण ने सातों सांडों को नाथ कर सत्य के साथ विवाह किया। केकयराज कुमारी भद्रा को भगवान उसकी इच्छा के अनुसार अपने घर ले आये। राजा बश्हत्सेन के लक्ष्मणा नामक पुत्री थी। राजा ने स्वयंवर में मत्स्य वेध की शर्त रखी गयी थी। भगवान ने मत्स्य का भेदन कर लक्ष्मणा का हाथ थामा।
इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण की सोलह हजार एक सौ आठ रानियां थीं। प्रत्येक ने श्रीकृष्ण के दस-दस पुत्र उत्पन्न किये।

-तेजवानी गिरधर
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इसलिए कई लोग नहीं जलाते अगरबत्ती

हमारे यहां धर्म स्थलों व घर के मंदिरों में अगरबत्ती जलाने का चलन है। यह आम है। मगर कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि ऐसा करना अनुचित है। वे शास्त्रों के हवाले से सवाल खड़ा करते हैं कि जिस बांस की लकड़ी को चिता में भी जलाना वर्जित है, हम उस बांस से बनी अगरबत्ती को मंदिर में कैसे जला सकते हैं। वे कहते हैं कि शव को भले ही बांस व उसकी खपच्चियों से बनी सीढ़ी पर रख कर श्मशान पहुंचाते हैं, उसे जलाते वक्त उसे अलग कर देते हैं, क्यों कि बांस जलाने से पित्र दोष लगता है। उनका तर्क है कि शास्त्रों में पूजन विधान में कहीं पर भी अगरबत्ती का उल्लेख नहीं मिलता। सब जगह धूप करने का ही जिक्र है। ज्ञातव्य है कि जिस प्रकार हिंदू अगर का धूप करते हैं, वैसे ही मुस्लिम लोबान का धूप जलाते हैं। इससे वातावरण शुद्ध होता है और सकारत्मकता आती है।
इस बारे में वैज्ञानिक तर्क ये है कि बांस में सीसा प्रचुर मात्रा में होता है और उसके जलने पर लेड आक्साइड बनता है, जो कि खतरनाक है। इसके अतिरिक्त अगरबत्ती में सुंगध के साथ फेथलेट केमिकल का इस्तेमाल किया जाता है, वह गंध के साथ सांस में प्रविष्ट होता है, जिससे फेफड़ों को नुकसान होता है। सीसे से केंसर व बे्रन स्टॉक का खतरा होता है। लीवर भी इससे प्रभावित होता है। इसी कारण अनेक लोग अगरबत्ती की जगह धूप व विभिन्न प्रकार की धूप बत्तियां काम में लेते हैं।

-तेजवानी गिरधर
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गुरुवार, 26 मार्च 2020

जिसे दुबारा शादी करनी है, वह पत्नी की अंत्येष्टि में भाग नहीं लेता

आम तौर पर जिस भी युवा व्यक्ति की पत्नी की मृत्यु हो जाती है, तो वह दुबारा शादी करने का विचार रखता है। यदि बच्चे न हों तो करता भी है। यदि उसका विचार न भी हो तो भी रिश्तेदार उस पर दबाव बनाते हैं कि वह दुबारा विवाह कर ले। क्या आपको जानकारी है कि पत्नी के निधन पर फिर विवाह करने का इच्छुक पति, पत्नी की अंत्येष्टि में भाग नहीं लेता। समझा जा सकता है कि ऐसा करके वह अपने संबंधियों व परिचितों को यह संदेश देता है कि वह पुन: विवाह करना चाहता है, लिहाजा उसके लिए किसी युवती की तलाश की जाए। हालांकि पत्नी की अंत्येष्टि में भाग न लेना पति के लिए कितना कष्टप्रद है, यह वह ही समझ सकता है, मगर बुजुर्ग उसे सलाह देते हैं कि वह अंतिम संस्कार में न जाए, ताकि फिर शादी का रास्ता खुला रहे, फिर भले ही बाद में वह न करे।
इस सिलसिले मैने ज्योतिष में रुचि रखने कुछ लोगों से चर्चा की तो उन्होंने कुछ अलग ही मत प्रकट किया। उनका कहना था कि यदि किसी व्यक्ति की किस्मत में एक ही शादी लिखी हो तो अंत्येष्टि में भाग लेने पर उसकी पूर्णाहुति हो जाती है। उसके बाद यदि वह चाहे तो भी उसकी दूसरी शादी नहीं हो सकती। बशर्ते उसकी कुंडली में दूसरी शादी न लिखी हो। अगर अंत्येष्टि में भाग नहीं लेता तो वर्तुल अधूरा ही रह जाता है, वैक्यूम रह जाता है और वह दूसरी शादी कर सकता है। उसमें बाधा नहीं आती। हालांकि यह बात गले नहीं उतरी, मगर एक पहलु था, इस कारण आपसे शेयर  किया। एक अन्य जानकार ने अलग ही मिथ बताया। वो यह कि जब पति अंत्येष्टि के दौरान उपस्थित नहीं होता तो देह संस्कार के दौरान पत्नी की आत्मा को पति के न दिखाई देने पर उससे संबंध विच्छेद हो जाता है। ऐसे में जब वह दूसरी शादी करता है तो पूर्व पत्नी की आत्मा उसे परेशान नहीं करती।

-तेजवानी गिरधर
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मंगलवार, 24 मार्च 2020

जब घी बन गया पुष्कर सरोवर का पानी

बताते हैं कि जब मुद्रा चलन में नहीं आई थी, तब वस्तु विनिमय किया जाता था। लोग एक दूसरे की जरूरत की वस्तुओं का आदान-प्रदान किया करते थे। प्रकृति भी इसी व्यवस्था पर काम करती है। वस्तु के बदले वस्तु मिलती है। कहते हैं न कि जो बोओगे, वही काटोगे। यानि कि प्रकृति में इस हाथ दे, उस हाथ ले वाला सिद्धांत काम करता है। दान की महिमा का आधार भी यही है। यज्ञों में समिधा की आहुति से वातावरण में तो सकात्मकता आती ही है, साथ ही अग्नि को समर्पित वस्तु से कई गुना प्राप्ति का भी उल्लेख है शास्त्रों में।
प्रकृति के इस गूढ़ रहस्य का प्रमाण एक बार अजमेर में भी प्रकट हो चुका है। नई पीढ़ी को तो नहीं, मगर मौजूदा चालीस से अस्सी वर्ष की पीढ़ी के अनेक लोगों को जानकारी है कि पुष्कर में एक बंगाली बाबा हुआ करते थे। कहा जाता है कि वे पश्चिम बंगाल में प्रशासनिक सेवा के अधिकारी थे और संन्यास धारण करके तीर्थराज पुष्कर आ गए। वे कई बार अजमेर में मदार गेट पर आया करते थे और बोरे भर कर आम व अन्य फल गायों को खिलाया करते थे। वे कहते थे कि फलों पर केवल हमारा ही अधिकार नहीं है, गाय भी उसकी हकदार है।
बताया जाता है कि बंगाली बाबा के शिष्यों ने कोई पैंतालीस-पचास साल पहले पुष्कर में एक भंडारा आयोजित किया था। रात में देशी घी खत्म हो गया। यह जानकारी शिष्यों ने बाबा को दी और कहा कि रात में नया बाजार से दुकान खुलवा कर देशी घी लाना कठिन है। तब पुष्कर घाटी व पुष्कर रोड सुनसान व भयावह हुआ करते थे। बाबा ने कहा कि पुष्कर सरोवर से चार पीपे पानी के भर लाओ और कढ़ाह में डाल दो। शिष्यों ने ऐसा ही किया तो देखा कि वह पानी देशी घी में तब्दील हो गया। सब ने मजे से भंडारा खाया। दूसरे दिन बाबा के आदेश पर शिष्यों ने चार पीपे देशी घी के खरीद कर पुष्कर सरोवर में डाले। इसके मायने ये कि बाबा ने जो चार पीपे पानी के घी के रूप में उधार लिए थे, वे वापस घी के ही रूप में अर्पित करवा दिए। पानी कैसे घी बन गया, इसे तर्क से तो सिद्ध नहीं किया जा सकता, मगर प्रकृति का सारा व्यवहार लेन-देन का है, यह तो समझ में आता है। इसी किस्म का किस्सा कबीर का भी है, जब उन्होंने अपने बेटे कमाल के हाथों पड़ौस की झोंपड़ी से गेहूं की चोरी करवाई थी। उसकी चर्चा फिर कभी।

-तेजवानी गिरधर
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सोमवार, 23 मार्च 2020

हम क्यों रहना चाहते हैं अमर?

कोई भी मरना नहीं चाहता। हर व्यक्ति अमर रहना चाहता है। और दिलचस्प बात ये है कि हर आदमी ये भी जानता है कि अमर होना संभव नहीं है। जो आया है, उसे जाना ही होगा। मृत्यु अवश्यंभावी है। उसे
टाला नहीं जा सकता है। हद से हद जीवन को दीर्घ किया जा सकता है। जिन  भी ऋषि-मुनियों, सुरों-असुरों ने कठोर तप करके अमर होने का वरदान मांगा है, वह खाली गया है। अजेय होने के वरदान दिए हैं, अधिक से अधिक शक्ति संपन्न होने के वरदान दिए गए हैं, मगर यह कह कर अमरता के लिए इंकार किया गया है कि यह विधि के विरुद्ध है।
सवाल ये उठता है कि जब अमर हुआ ही नहीं जा सकता तो हमारे भीतर अमरता का भाव आता कहां से है? जब भी हम किसी की अंत्येष्टि में जाते हैं तो जीवन व संसार की नश्वरता से प्रत्यक्ष साक्षात्कार होता है, फिर भी यह भाव रहता है कि मैं तो अभी नहीं मरूंगा। कुछ पल के लिए जरूर संसार से विरक्ति का भाव आता है, जिसे कि श्मशानिया वैराग्य कहा गया है, मगर श्मशान से बाहर आते ही वह तिरोहित हो जाता है। श्मशान में रहते अवश्य जीवन की आपाधापी निरर्थक लगती है, सोचते हैं कि जब एक दिन मरना ही तो क्यों बुरे कर्म करें, लेकिन बाहर आते ही हम जस के तस हो जाते हैं।  राग-द्वेष में प्रवृत्त हो जाते हैं। कल्पना कीजिए कि अगर श्मशान में जाने पर उत्पन्न होने वाला अनासक्ति का भाव स्थाई हो जाए तो हम बाहर निकलते ही बदले हुए इंसान हो जाएं। मगर ऐसा होता नहीं है। क्यों नहीं होता है ऐसा?
वस्तुत: जिस चित्त में अमरता का अहसास पैठा हुआ है, वह हमारी जीवनी शक्ति की अमरता की वजह से ही है। वह तत्त्व, जिसे हम आत्मा कहते हैं, वह अमर है। शास्त्र भी यही समझाता है कि आत्मा अजर-अमर है। न उसे पानी में भिगोया जा सकता है, न उसे आग में जलाया जा सकता है, न उसे हवा में सुखाया जा सकता है, उसे नष्ट नहीं किया जा सकता। पंच महाभूत से बना शरीर जरूर नष्ट हो जाता है, जो कि मृत्यु होने की निशानी है, मगर आत्मा कायम रहती है। इसे इस रूप में समझाया गया है कि शरीर एक चोला है। जैसे हम वस्त्र बदलते हैं, वैसे ही आत्मा जन्म लेती है और फिर पुन: जन्म लेती है। हमें शास्त्र की इस समझाइश से बड़ा सुकून मिलता है। बहुत संतुष्टि होती है। लगता है कि वह ठीक ही कह रहा है। वो इसलिए कि वह हमारे चित्त में बैठे अमरता के भाव पर ठप्पा लगाती है। उसकी पुष्टि करती है। हमारे मनानुकूल है। जब हमारा कोई निकटस्थ व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त होता है तो यही समझाया जाता है चिंता न करें, मरना तो सुनिश्चित है, मगर मृत व्यक्ति की आत्मा अमर है। हमें इससे भी संतुष्टि होती है कि चलो शरीर नष्ट हो गया, मगर उसकी आत्मा का वजूद तो कायम है। इसी मिथ के आधार पर पुनर्जन्म की अवधारणा बनी हुई है। इसी आधार पर मान्यता बनी हुई है कि पिछले जन्मों के कर्म हमारी आत्मा के साथ आते हैं और उसी के अनुरूप हमें सुख-दुख मिलता है। अमरता का अहसास ही पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका अगले जन्म में भी मिलने, जन्मों-जन्मों तक साथ निभाने की कसम दिलवाता है। कई लोग तो अपने बुजुर्ग के अगले जन्म में अपने ही परिवार में जन्म लेने की कामना करते हैं। सपने में हुई अनुभूति या लक्षणों के आधार पर हम यह भी यकीन कर लेते हैं हमारे अमुक संबंधी ने फिर हमारी संतान के रूप में जन्म लिया है।
यह जानते हैं कि हमारा अमुक संबंधी मर कर कहीं अन्य जन्म ले चुका है, लौट कर नहीं आएगा, फिर भी उससे नाता बनाए रखते हैं। यानि कि उसके भी अमर होने का विश्वास है। उसके लिए बाकायदा 15 तिथियों की श्राद्ध की व्यवस्था की हुई है। जिस तिथी पर संबंधी की मृत्यु हुई थी, उस पर ब्राह्मण को भोजन करवाते हैं। यह मान कर हमारे संबंधी की आत्मा उसके शरीर में आ कर भोजन कर रही है।
कुल जमा यह धारणा यह है कि आत्मा अमर है। भीतर भी यही विश्वास है कि हम अमर हैं। अमरता की चाह भी वहीं से पैदा होती है। पर चूंकि भौतिक जगत में विधि का विधान इसकी अनुमति नहीं देता, इस कारण शरीर नष्ट हो जाने पर भी हम अमर रहेंगे, यह यकीन बहुत आत्मिक संतुष्टि देता है।
अमरता की इस आस्था के कारण ही यह सीख दी जाती है कि अच्छे कर्म करें, ताकि अगले जन्म में सुख मिले। इसी विश्वास के कारण सद्कर्म करने का उपदेश दिया जाता है, ताकि उसे बाद की पीढिय़ां याद करें और हमारा नाम अमर बना रहे। बेशक, हमें याद किया जा रहा है या नहीं, इसे देखने को हम मौजूद नहीं रहने वाले हैं, मगर अमरता की चाह हमें सुकर्म करने को प्रेरित करती रहती है।
प्रसंगवश यहां उन आठ चिरंजीवियों का भी जिक्र कर लेते हैं, जिनके बारे में शास्त्रों में बताया गया है कि वे हजारों साल से जीवित हैं।
इनमें से भगवान रुद्र के 11 वें अवतार व भगवान श्रीराम के परम सेवक श्रीहनुमान के चारों युगों में होने की महिमा को हनुमान चालीसा में चारों युग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा कह कर गाते हैं। बाकी 7 काल विजयी दिव्य आत्माओं का विवरण इस प्रकार है:- महामृत्युंजय सिद्धि प्राप्त शिव भक्त ऋषि मार्कण्डेय, चारों वेदों व 18 पुराणों के रचनाकार भगवान वेद व्यास, जगतपालक भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम, भक्त प्रह्लाद के वंशज व भगवान वामन को अपना सब कुछ दान करने वाले राजा बलि, लंकापति रावण के साथ युद्ध में भगवान राम का साथ देने वाले विभीषण, कौरवों और पाण्डवों के कुल गुरु परम तपस्वी ऋषि कृपाचार्य, कौरवों और पाण्डवों के ही गुरु द्रोणाचार्य के सुपुत्र अश्वत्थामा।
इसी सिलसिले में एक श्लोक का भी जिक्र भी अप्रासंगिक नहीं रहेगा-
अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषण:।
कृप-परशुरामश्च सप्तएतै चिरजीविन:।।
सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टम।
जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।
अर्थात इन आठ लोगों (अश्वथामा, दैत्यराज बलि, वेद व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम और मार्कण्डेय ऋषि) का स्मरण सुबह-सुबह करने से सारी बीमारियां समाप्त होती हैं और मनुष्य 100 वर्ष की आयु को प्राप्त करता है।

-तेजवानी गिरधर
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आरंभ से रहा है असत्य का बोलबाला

आज के युग में अमूमन सभी को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि आजकल झूठ का बोलबाला है। असत्य का साम्राज्य है। उससे ऐसा प्रतीत होता है कि पुराने जमाने में ऐसा नहीं होता था। हमारे बुजुर्गों और उनके भी बुजुर्गों के काल में लोग सच बोला करते थे। लेकिन ऐसा है नहीं। वैदिक काल में भी असत्य का अस्तित्व था। यदि ऐसा नहीं होता तो मुण्डकोपनिषद में यह नहीं कहा जाता कि सत्यमेव जयते। सत्यमेव जयते का अर्थ है कि सत्य की ही जीत होती है। अर्थात उस काल में भी यह धारणा थी कि असत्य मजे में है, वही जीतता प्रतीत होता था, तभी तो किसी ऋषि को यह कहना पड़ा कि नहीं सत्य की ही जीत होती है। यह बात दीगर है कि जब तक सत्य जीतता है, तब तक वह बहुत पीडि़त हो चुका होता है। और यही वजह है कि हमें असत्य बेहतर स्थिति में नजर आता है।
आपकी जानकारी के लिए यहां उल्लेख करना जरूरी है कि मुण्डकोपनिषद में से लिए आदर्श वाक्य सत्यमेव जयते का पूर्ण मंत्र इस प्रकार है:-
सत्यमेव जयते नानृतम सत्येन पंथा विततो देवयान:।
येनाक्रमंत्यृषयो ह्याप्तकामो यत्र तत् सत्यस्य परमम् निधानम।।
अर्थात अंतत: सत्य की ही जय होती है, न कि असत्य की। यही वह मार्ग है, जिससे होकर आप्तकाम (जिनकी कामनाएं पूर्ण हो चुकी हों) मानव जीवन के चरम लक्ष्य को प्राप्त करते हैं।
ज्ञातव्य है कि भारत सरकार के राजकीय चिह्न अशोक चक्र के नीचे यह वाक्य अंकित है। जहां तक प्रतीक का प्रश्न है, वह उत्तर प्रदेश में वाराणसी के निकट सारनाथ में 250 ई. पू. में सम्राट अशोक द्वारा बनवाये गए सिंह स्तम्भ के शिखर से लिया गया है, परंतु उसमें यह आदर्श वाक्य नहीं है। जानकारी के अनुसार इस आदर्श वाक्य को राष्ट्रीय क्षितिज पर लाने में अहम भूमिका सन् 1918 में पंडित महन मोहन मालवीय की है।
भारत ही नहीं बल्कि चेक गणराज्य और इसके पूर्ववर्ती चेकोस्लोवाकिया का आदर्श वाक्य प्रावदा वीत्येजी सत्यमेव जयते का समानार्थी है। उसका भी अर्थ है सत्य जीतता है।
सच तो ये है कि सत्य व असत्य मानव सभ्यता के आरंभ से ही अस्तित्व में रहे हैं। तभी तो हम भगवान श्रीराम की रावण पर जीत को असत्य पर सत्य की विजय कहते हैं। पूरे भारत में दशहरा पर्व पर रावण का पुतला जला कर इस वाक्य का शंखनाद करते हैं। इससे इतर कुछ विद्वान तो असत्य के अस्तित्व को महत्वपूर्ण बताते हुए यहां तक कहते हैं कि राम की महिमा भी रावण के वजूद पर टिकी हुई है। अगर रावण न हो तो भला राम उभार कैसे मिल सकता है? अर्थात सत्य की महिमा का महल असत्य की जमीन पर खड़ा होता है।
इसी प्रकार महाभारत में भी श्रीकृष्ण व पांच पांडवों की सौ कोरवों पर जीत को सत्य की असत्य पर जीत की उपमा दी जाती है। ज्ञातव्य है कि धृतराष्ट्र, दुर्योधन, दु:शासन सहित कौरवों को असत्य व अधर्म का प्रतीक माना गया है। गीता में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:, अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानम सृजाम्यहम। अर्थात जब जब भी धर्म की हानि होती है, मैं अधर्म का नाश करने के लिए धरती पर आता हूं। इसका भी यही तात्पर्य है कि असत्य व अधर्म सृष्टि के आरंभ से मौजूद रहे हैं, जिनसे निपटने के लिए सत्य के रूप में भगवान अवतार लेते हैं।
सत्य की इतनी महिमा है कि वेद और पुराण के विरोधियों ने भी सत्य को पंचशील व पंचमहाव्रत का प्रमुख अंग माना है।
महात्मा गांधी ने तो सत्य को ईश्वर की उपमा दी है। वे ऐसे महापुरुष हैं, जिन्होंने सत्य पर व्यावहारिक प्रयोग किए। आजादी के आंदोलन में समय सत्याग्रह के बल पर उन्होंने अंग्रेजों को भारत छोडऩे को विवश किया।

-तेजवानी गिरधर
7742067000
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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस शब्द उपयुक्त नहीं है?

इन दिनों आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का बोलबाला है। हर क्षेत्र में इसका उपयोग किया जा रहा है। यकायक ख्याल आया कि क्या आर्टिफिशियल षब्द उपयुक्त है...