मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

33 करोड़ न सही, अनगिनत तो जरूर हैं देवी-देवता

आम तौर पर कहा जाता है कि हिंदुओं के 33 करोड़ देवी देवता हैं। यह 33 करोड़ का आंकड़ा वस्तुत: ऋग्वेद से आया है। उसमें 33 कोटि देवता बताए गए हैं। कोटि का एक अर्थ करोड़ है तो दूसरा अर्थ प्रकार होता है। चूंकि आम जन मानस ने पहले वाले अर्थ को आत्मसात कर लिया, इस कारण वह मान कर बैठा है कि देवी-देवता 33 करोड़ होते हैं। चूंकि 33 करोड़ की गिनती करना संभव नहीं है, अर्थात सूची बना कर नहीं बताया जा सकता कि उनके नाम क्या हैं तो इस आंकड़े की सत्यता पर सवालिया निशान बन गया। बाद में विद्वानों ने इस शंका का समाधान यह कह कर किया कि कोटि का दूसरा अर्थ अर्थात प्रकार ही सही है और बाकायदा 33 प्रकार के देवताओं की गितनी करके दिखा दी। अब वे जोर दे कर कहने लगे हैं कि हिंदू समाज 33 करोड़ की मान्यता को छोड़ कर 33 करोड़ को स्वीकार करे।
33 करोड़ व 33 प्रकार की इस मतभिन्नता में पहले हम 33 प्रकार के देवी-देवताओं पर विचार करते हैं। देवताओं की इन 33 कोटि में आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, इंद्र और प्रजापति शामिल हैं। 8 वसुओं में आप, धुव्र, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभाष शामिल हैं। वसु का अर्थ ये है कि हमें वसाने वाली आत्मा का जहां वास होता है। इनके नाम धरती, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चंद्रमा, सूर्य और नक्षत्र भी गिनाए जाते हैं। 12 आदित्य में अंशुमान, आर्यमन, इंद्र, त्वष्टा, धातु, पर्जन्य, पूषा, भग, मित्र, वरुण, वैवस्त और विष्णु हैं। इसकी इस रूप में भी व्याख्या की गई है:-आदित्य सूर्य को कहते हैं। 12 माह को 12 आदित्य कहते हैं। इन्हें आदित्य इसलिए कहते हैं क्योंकि यह हमारी आयु को हरते हैं। 11 रुद्र में मनु, मन्यु, शिव, महत, ऋतुध्वज, महिनस, उम्रतेरस, काल, वामदेव, भव और धृत ध्वज शामिल हैं। 11 रुद्र के नाम शम्भु, पिनाकी, गिरीश, स्थाणु, भर्ग, भव, सदाशिव, शिव, हर, शर्व और कपाली भी बताए गए हैं। इन्हें प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान, नाग, कुर्म, किरकल, देवदत्त और धनंजय आदि के नाम से भी जाना जाता है। पहले पांच प्राण व दूसरे पांच उपप्राण हैं तथां 11वां जीवात्मा हैं। ये 11 जब शरीर से निकल जाते हैं तो शरीर शव हो जाता है कि सगे-संबंधी रोने लग जाते हैं। इसीलिए इन्हें कहते हैं रुद्र, अर्थात रुलाने वाला। 2 अश्विनी में एक अश्विनी तथा दूसरे कुमार। हैं। इन्हें नासत्य और द्स्त्र। भी कहा गया है। कुछ विद्वान इन्द्र और प्रजापति की जगह 2 अश्विनी कुमारों को रखते हैं। प्रजापति ही ब्रह्मा हैं। कुल मिला कर इस तरह से 33 प्रकार के देवी-देवता गिनाए गए हैं।
अपने तर्क के पक्ष में वे ये तर्क देते हैं कि वेदों में जिन देवताओं का उल्लेख किया गया है, उनमें से अधिकतर प्राकृतिक शक्तियों के नाम है, जिन्हें देव कह कर संबोधित किया गया है। दरअसल वे देव नहीं है। उक्त प्राकृतिक शक्तियों को मुख्यत: आदित्य समूह, वसु समूह, रुद्र समूह, मरुतगण समूह, प्रजापति समूह आदि समूहों में बांटा गया है। चूंकि वैदिक ऋषि इन प्राकृतिक शक्तियों की स्तुति करते हैं और साथ ही अपने किसी महान पुरुष की तुलना उनसे करते हुए उनकी भी देव मान कर स्तुति करते हैं, इस कारण 33 करोड़ के आंकड़े की भ्रांति उत्पन्न होती है। वैदिक विद्वानों के अनुसार 33 प्रकार के अव्यय या पदार्थ होते हैं, जिन्हें देवों की संज्ञा दी गई है। उन अव्यवों से ही प्रकृति और जीवन का संचालन होता है।
आइये, अब सिक्के के दूसरे पहलु पर विचार करते हैं। बताते हैं कि स्वामी विवेकानंद के एक कथित कथन में कहा गया है कि देश के सभी 33 करोड़ देशवासियों को देवता मानकर निस्वार्थ भाव से मानवता और देश की सेवा करनी चाहिए। कदाचित इसी को कोटि के करोड़ वाले अर्थ से जोड़ कर मान लिया गया कि 33 करोड़ देवी देवता होते हैं।
यह मान भी लिया जाए कि 33 कोटि का अर्थ 33 प्रकार है। इसका अर्थ ये है कि देवता तो अधिक, मगर उन्हें 33 प्रकारों में बांटा गया है। अब कुछ कितने हैं, इसका कोई हिसाब नहीं। हमारे यहां प्रत्येक तिथि पर किसी न किसी देवी-देवता की पूजा की जाती है। इनकी गिनती करना कठिन है।  अब देखिए न, अकेले आदि शक्ति देवी के ही नौ रूप हैं। सृष्टि के संहारकर्ता के भी अनेक रूप हैं, अवतार हैं। भगवान विष्णु अब तक 10 अवतार ले चुके हैं। उनकी तरह कितने ही देवी-देवताओं के अवतार और रूप हैं।
एक तर्क ये है कि देव योनि में मात्र 33 देव ही नहीं। इनके अतिरिक्त मणिभद्र आदि अनेक यक्ष, चित्ररथ, तुम्बुरु, आदि गंधर्व, उर्वशी, रम्भा आदि अप्सराएं, अर्यमा आदि पितृगण, वशिष्ठ आदि सप्तर्षि, दक्ष, कश्यप आदि प्रजापति, वासुकि आदि नाग, इस प्रकार और भी कई जातियां देवों में होती हैं। अन्य कई देवदूत हैं, जिनके अलग-अलग कार्य हैं। देवताओं के 49 सैनिकों को मरुतगण कहा गया है, कदाचित इन्हें भी देवता मान लिया गया है। हमारे यहां तो कुल देवी-देवता, गुरु तथा पूर्वजों तक को देवता के समान पूजा जाता रहा है। ऐसे में यह कहना कठिन है कि आखिर देवी-देवता कितने हैं।

-तेजवानी गिरधर
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tejwanig@gmail.com

सोमवार, 6 अप्रैल 2020

क्यों जरूरी है इष्ट देवता?

यह सर्वविदित है कि इस्लाम एकेश्वरवाद के तहत केवल खुदा में ही यकीन रखता है। हिंदू दर्शन में भी एके साधे, सब सधे की मान्यता है, मगर  बहुदेववाद चलन में है। हिंदू मान्यता के अनुसार देवी-देवता तैंतीस करोड़ हैं। उनमें वे प्रचलित देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना किया करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण, भगवान राम, विष्णु, ब्रह्मा, महेश के अतिरिक्त दुर्गा, सरस्वती, हनुमान, गणेश सहित अनेक देवी-देवताओं के साथ लोक देवता यथा बाबा रामदेव, तेजाजी महाराज, भैरों जी महाराज आदि की आराधना की जाती है। इसी प्रकार ग्राम देवता, कुल देवता भी होते हैं। जिस देवी-देवता के प्रति निजी आस्था होती है, उसे इष्ट देवता कहते हैं।
इष्ट देवता क्या है, हमारा इष्ट देवता कौन होना चाहिए, इस विषय पर चर्चा से पहले एक प्रचलित कहानी की बात करते हैं। कहते हैं कि एक बार एक नाव में एक हिंदू व एक मुसलमान सवार थे। अचानक तूफान आया। दोनों अपने-अपने भगवान को याद करने लगे। मुसलमान ने केवल खुदा को ही याद किया, तो वह बच गया। हिंदू ने कभी हनुमान जी को याद किया तो कभी दुगा मां को पुकारा, कभी गणेश जी का स्मरण किया तो कभी श्रीकृष्ण को और वह डूब गया। यह कहानी बहुदेववाद पर तंज कसती है। कहानी का प्रयोजन ये है कि सफलता के लिए एकनिष्ट होना चाहिए। एकनिष्ट होने से एकाग्रता बढ़ती है, जबकि भिन्न देवी-देवताओं को एक साथ इष्टदेव मान लेने से एकाग्रता भंग होती है। भले ही कोई देवी या देवता सर्वशक्तिमान भगवान या ईश्वर नहीं हैं, मगर वे भगवान की ही शक्ति से संचालित हैं। देवता भिन्न-भिन्न है और उनकी प्रकृति भी अलग-अलग है, मगर उनमें मौजूद शक्ति एक ही है। जैसे दीपक, मोमबत्ती, चूल्हा, यज्ञ आदि में स्थित अग्रि एक ही है। भिन्न-भिन्न देवी-देवता की आराधना का अलग-अलग फल है, मगर मनुष्य को इष्ट देव का सर्व प्रथम व सर्वाधिक ध्यान करना चाहिए। जब भी विपत्ति आए तो केवल इष्ट देव का ही ध्यान करना चाहिए। जैसे कहते हैं न कि जीवन में गुरु होना जरूरी है, वैसे ही इष्ट भी उतना ही जरूरी है।
आइये, जरा विस्तार में जाते हैं। हर इंसान किसी एक देवी या देवता की ओर सबसे ज्यादा आकर्षित होता है और वही देवी या देवता उसका इष्ट देव होता है। कुछ लोग इष्ट देव या देवी का निर्धारण कुंडली में अंकित जन्म नक्षत्र के आधार पर करते हैं, जबकि कुछ की मान्यता ये है कि इष्ट देव का संबंध ग्रह-नक्षत्रों से नहीं होता। वे मानते हैं कि इष्ट देव पिछले जन्मों के संस्कारों से तय होता है। वस्तुत: जो देव स्वत: पसंद हो, वही इष्ट देव होता है। इस बारे में ज्योतिष कहता है कि आपका जन्म जिस नक्षत्र में होता है, उसी के देवता आपको आकर्षित करते हैं।
जो लोग मानते हैं कि ज्योतिष हमारे इष्ट देव का निर्धारण करता है, उनके अनुसार आप अपनी जन्म तारीख, जन्म दिन, बोलते नाम की राशि या अपनी जन्म कुंडली की लग्न राशि के अनुसार जान सकते हैं। जिनका जन्म जनवरी या नवंबर माह में हुआ हो वे शिव या गणेश की पूजा करें। फरवरी में जन्मे शिव की उपासना करें। मार्च व दिसंबर में जन्मे व्यक्ति विष्णु की साधना करें। अप्रेल, सितंबर, अक्टूबर में जन्मे व्यक्ति गणेशजी की पूजा करें। मई व जून माह में जन्मे व्यक्ति मां भगवती की पूजा करें। जुलाई माह में जन्मे व्यक्ति विष्णु व गणेश का घ्यान करें।
जिनको वार का पता हो, परंतु समय का पता न हो, तो वार के अनुसार इष्ट देव इस प्रकार होंगे- रविवार- विष्णु, सोमवार- शिवजी, मंगलवार- हनुमान जी, बुधवार- गणेश जी, गुरुवार- शिव जी, शुक्रवार- देवी, शनिवार- भैरव जी।
इसी प्रकार पंचम स्थान में स्थित राशि के आधार पर आपके इष्ट देव इस प्रकार होंगे- मेष:- सूर्य या विष्णु जी की आराधना करें। वृष:-गणेशजी। मिथुन:- सरस्वती, तारा, लक्ष्मी। कर्क:- हनुमानजी। सिंह:- शिवजी। कन्या:- भैरव, हनुमान जी, काली। तुला:- भैरव, हनुमान जी, काली। वृश्चिक:- शिवजी, धनु:- हनुमान जी। मकर:- सरस्वती, तारा, लक्ष्मी। कुंभ:- गणेश जी, मीन:- दुर्गा, राधा, सीता या कोई देवी।
जिनको जन्म समय ज्ञात हो, उनके लिए जन्म कुंडली के पंचम स्थान से पूर्व जन्म के संचित कर्म, ज्ञान, बुद्धि, शिक्षा, धर्म व इष्ट का बोध होता है। अरुण संहिता के अनुसार व्यक्ति के पूर्व जन्म में किए गए कर्म के आधार पर ग्रह या देवता भाव विशेष में स्थित होकर अपना शुभाशुभ फल देते हैं। पंचम स्थान में स्थित ग्रहों या ग्रह की दृष्टि के आधार पर आपके इष्ट देव तय होते हैं। सूर्य:- विष्णु, चंद्रमा:- राधा, पार्वती, शिव, दुर्गा, मंगल- हनुमानजी, कार्तिकेय, बुध- गणेश, विष्णु, गुरू- शिव, शुक्र- लक्ष्मी, तारा, सरस्वती। शनि- भैरव, काली।
जन्मकुंडली के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के इष्ट देवी या देवता निश्चित होते हैं। यदि उन्हें जान लिया जाए तो कितने भी प्रतिकूल ग्रह हो, आसानी से उनके दुष्प्रभावों से रक्षा की जा सकती है।
लग्न के अतिरिक्त पंचम व नवम भाव के स्वामी ग्रहों के अनुसार देवी-देवताओं का ध्यान पूजन भी सुख-सौहार्द्र बढ़ाने वाला होता है। इष्ट देव की पूजा करने के साथ रोज एक या दो माला मंत्र जाप करना चमत्कारिक फल दे सकता है और आपकी संकटों से रक्षा कर सकता है। ज्योतिष में इस बात का भी उल्लेख है कि कई बार स्वभाव व समय परिवर्तन के साथ इष्ट देवता भी बदल जाता है।
विषय को थोड़ा आगे बढ़ाते हुए यह जानने की कोशिश करते हैं कि जीवन में आने वाली समस्याओं के निवारण के लिए शास्त्रों में किन-किन ग्रहों की उपासना करने को कहा गया है। मानसिक समस्याओं के लिए शिवजी की उपासना, शारीरिक दर्द और चोट की समस्या के लिए हनुमान जी, शीघ्र विवाह के लिए पुरुष मां दुर्गा व स्त्रियां भगवान शिव की, बाधाओं के नाश के लिए भगवान गणेश की पूजा करें, धन के लिए मां लक्ष्मी की, विद्या अध्ययन के लिए सरस्वति, मोक्ष या आध्यात्मिक उपलब्धि के लिए श्रीकृष्ण या महादेव की उपासना करें। 
ऐसी भी मान्यता है कि भिन्न-भिन्न देवी-देवताओं की हमारे प्रति अनुकूलता व प्रतिकूलता भी होती है। जैसे यदि हम मोटापे से ग्रस्त हैं और निरंतर लक्ष्मी की ही पूजा करते हैं तो स्वास्थ्य बिगड़ सकता है। इसी प्रकार यदि काम-क्रोध-उत्तेजना अधिक है और आप काली माता या भैरव जी की पूजा कर रहे है, आप कलह -झगड़े -राजदंड और अकाल मृत्यु को आमंत्रित कर रहे है, आपको तो शिव की पूजा करनी चाहिए। इसी प्रकार सरस्वती की पूजा भावुक व्यक्तियों के लिए उचित नहीं है। चंचल प्रकृति के व्यक्ति दुर्गा जी की पूजा करेंगे तो उनकी संदेवनशीलता और बढ़ जाएगी और शांति समाप्त हो जाएगी।
तर्क ये है कि यदि सभी देवी-देवता सभी के लिए उपयुक्त होते तो उनमे इतनी विभिन्नता क्यों होती। आप किसी भी देवी-देवता की पूजा कर रहे है तो इसका मतलब है कि आप उस देवी-देवता को आप अपने शरीर में बुला रहे हैं। जिस तत्व की अधिकता है, उसी के देवी-देवता को बुलाने पर शरीर का शक्ति संतुलन बिगड़ सकता है।

-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

ज्योतिषियों की भविष्यवाणी मुझ पर फलित क्यों नहीं होती?

हालांकि ज्योतिष के माध्यम से भविष्य जानने में मेरी कोई रुचि नहीं रही, मगर कुछ काल तक उतार-चढ़ाव अधिक होने पर इच्छा हुई कि मेरे भविष्य के बारे में जानकारी हासिल करूं। इस सिलसिले में चार-पांच ज्योतिषियों से संपर्क साधा तो उनमें से सभी ने यही कहा कि आगामी कुछ माह में आपके सितारे बुलंदी पर होंगे। लोकप्रियता शिखर पर होगी। मगर ऐसा कुछ हुआ नहीं। उसकी वजह क्या रही, मुझे आज तक समझ में नहीं अया।
भविष्य जानने की इस यात्रा में सबसे पहले मेरे एक सहयोगी की चचेरी बहिन, जो कि कुंडली, टैरो व तंत्र-मंत्र की गहरी जानकार हैं, उनसे मिला। उन्होंने कुछ तांत्रिक उपाय बताए, जो कि वाकई सौ फीसदी कारगर रहे। कुछ दिन बाद उन्होंने बताया कि यदि आपकी कुंडली सही है तो आपके गर्दिश के दिन समाप्त हो जाएंगे और आपकी प्रसिद्धि चरम पर होगी।  जब यह भविष्यवाणी असत्य साबित हुई तो उन्होंने अपने गुरू से मिलवाया। उन्होंने भी यही कहा कि जल्द ही आप इतने ऊंचे ओहदे पर पहुंचने वाले हैं कि हमें आपसे मिलने के लिए अपॉइंटमेंट लेना होगा। वह भविष्यवाणी भी फलित नहीं हुई। इसके बाद मेरे एक वरिष्ठ साथी पत्रकार मुझे केकड़ी के पास एक गांव में ले गए। वहां जिन ज्योतिषी से मिलवाया, वे करीब 90 साल के थे और विशेष रूप से अंक ज्योतिष व कुंडली के जानकार थे। जैसे ही हमने उनकी बैठक में प्रवेश किया, उन्होंने हमारे आने का समय नोट कर लिया। जब हमारा नंबर आया तो उन्होंने कहा कि क्या कुंडली ले कर आए हो। मैने कहा कि हां, ओर मैने कुंडली उनके हाथ में थमा दी। उन्होंने कुंडली को बिना देखे ही साइड में रख दिया। फिर मेरे चेहरे की ओर देखने लगे व मारवाड़ी भाषा में कुछ दोहे बुदबुदाते हुए आसमान में ही काल्पनिक कुंडली बनाने लगे। उन्होंने विभिन्न ग्रहों को अलग-अलग खाने में बैठने का आदेश दिया। तत्पश्चात कागज पर कुंडली बनाई व मेरे द्वारा लाई गई कुंडली से मिलान करके दिखाया। कुंडल हूबहू मेल खा रही थी। उन्होंने मेरे परिवार व शिक्षा आदि की जानकारी दी, वह भी शत प्रतिशत सही थी। इसके बाद मारवाड़ी में बोले- अठे क्यूं आयो। थने कठे ही जाबा की जरूरत कोनी। थारा ठंका बोलवा वाला है। खूब नाम होसी। कोई उपाय भी करबा की जरूरत कोनी। यह भविष्यवाणी भी असफल हुई।
इसके बाद संयोग से एक अध्ययनशील ज्योतिषी मेरे घर आए। उनसे मैने पूछा कि आखिर क्या वजह है कि सारी भविष्यवाणियां झूठी निकल रही हैं। क्या कुंडली में कोई गड़बड़ है या फिर कुंडली का जो विज्ञान है, उसकी कोई सीमा है। उन्होंने बताया कि यह सही है कि कुंडली में जीवन के सारे भावों की गणना होती है, उसके बाद भी कुछ छूट जाता है। पकड़ से बाहर रह जाता है। विशेष रूप कुल देवी अथवा पूर्वजों की नाराजगी को हम नहीं समझ पाते हैं।
एक अन्य ज्योतिषी ने कहा कि वे सटीक भविष्यवाणी कर सकते हैं, मगर कुंडली सही बनी हुई होनी चाहिए। उन्होंने इस सिलसिले में भीलवाड़ा के एक ज्योतिषी से मिलने को कहा, जो कि सटीक जन्म समय बता देते हैं। मैने उनसे मुलाकात की तो चकित रह गया। उन्होंने मेरी ओर देखा व केल्कूलेटर पर बड़ी तेजी से गणना शुरू कर दी। मेरे पिता व दादा का नाम बता दिया। परिवार के बारे में भी पूरी जानकारी दी। फिर मेरा जन्म दिन व जन्म समय भी बता दिया। कुंडली से मिलान करने पर वही समय उस पर अंकित था। उन्होंने भी शानदार समय आने की भविष्यवाणी की और कहा कि उनकी नब्बे फीसदी बातें सही साबित होंगी। केवल एक प्रतिशत त्रुटि रह सकती है।
खैर, उसके बाद मैने किसी भी ज्योतिषी से संपर्क नहीं किया। ये सोचा कि शायद यही एक प्रतिशत है, जो कि कुंडली में पकड़ में नहीं आता।
यह ब्लॉग लिखने का मात्र इतना मकसद है कि अगर कोई ज्योतिषी  उस एक प्रतिशत की भी गणना करना जानता हो तो कृपया मुझे जानकारी दीजिए।

-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

सदा अधिकारी के बायीं ओर खड़े होइये, काम सिद्ध होगा

बताया जाता है कि सामुद्रिक शास्त्र में कहा गया है कि अगर आपको किसी अधिकारी या किसी ओर से भी कोई काम हो तो उसके बायीं ओर खड़े हो कर अपनी बात कहिये, वह आसानी से आपकी बात मान जाएगा। इसके पीछे तर्क ये दिया जाता है कि बायीं ओर हृदय होता है। हृदय अर्थात दिल, जो कि संवेदना का केन्द्र है। वाम अंग पर चंद्रमा का प्रभाव होता है। जब हम बायीं ओर खड़े हो कर उससे कोई मांग रखते हैं तो वह संवेदनापूर्वक हमारी बात मान जाता है। अर्थात दायीं ओर की तुलना में बायीं ओर खड़े होने पर काम सिद्ध होने की संभावना अधिक रहती है। इसलिए जब भी किसी अधिकारी के पास जाएं तो कोशिश करके उसके बायीं ओर खड़े होइये। मैने स्वयं इसे आजमाया है। मुझे तो यह तथ्य सही लगा। मैं गलत भी हो सकता हूं, अत: आप स्वयं आजमाइये। संभव है, हम इस तथ्य की बारीकी को न समझ पाएं, मगर बायीं ओर खडे होने में हर्ज ही क्या है? क्या पता तथ्य सही हो। अगर विद्वानों ने बताया है तो कोई तो राज होगा।

-तेजवानी गिरधर
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गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

इसलिए बदल गई भूखे को भोजन देने की आस्था

कमल गर्ग
इसे क्या कहेंगे, मैं और मेरी बड़ी बहन इंदौर से अजमेर ट्रेन से आ रहे थे। यह लगभग 40 साल पुरानी बात है। ट्रेन के सफर में 15 घंटे लगभग लगते थे। हमारी बहन ने अपने साथ इंदौर से खाना ले लिया था, जिसमे पराठे,  आलू की सब्जी एवं आचार था। खाने के टाइम पर उन्होंने जैसे ही खाना मुझे देना शुरू किया, एक भिखारी चाय के लिए पैसे मांगने लगा। हमारी बहन ने उसे दो पराठे और आलू की सब्जी उसे दे दी। उससे बोला, हम खाना खा रहे हैं, आप भी खाना खा लो। वह भिखारी कुछ नहीं बोल कर परांठे लेकर आगे सरक गया और उसी दौरान ट्रेन रुकी और प्लेटफार्म आया तो वह उस पर उतर गया। मैं भी पानी के लिए बर्तन लेकर उतरने लगा तो मैंने देखा की उस भिखारी ने उसको दिए पराठे और सब्जी उतरते समय दरवाजे के पास रख दी थी। मैंने यह सब बात अपनी बहन को बताई और मुझे लगा कि लोग भीख पैसे के लिए मांगते हैं, खाने के लिए नहीं। भूखे को अपने खाने से पहले खाना खिलाने का उद्देश्य किस तरह से अविश्वास में बदल गया। उसका यह एक  उदाहरण है। जरूर वह भिखारी शाम की दारू के पैसे इक्कठा करता होगा?
-कमल गर्ग, अजमेर

सुपरिचित वरिष्ठ बुद्धिजीवी श्री कमल गर्ग की यह प्रतिक्रिया मेरे एक ब्लॉग पर आई है, जो दान के विषय में था और उसका शीर्षक था- चोरी होना भी दान का एक रूप है? चूंकि उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया ब्लॉग पर जा कर नहीं दी है और वाटृस ऐप पर दी है, इस कारण अलग से ब्लॉग लिखा है।
ब्लॉग पढऩे के लिए इस लिंक पर क्लिक कीजिए:-


-तेजवानी गिरधर
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बाल विवाह प्रतिबंध कानून बनवाने वाले शारदा खुद शिकार थे बाल विवाह के

यह सर्वविदित है कि बाल विवाह की रोकथाम के लिए सरकार हर साल कई उपाय करती है। प्रशासन की सख्ती से बाल विवाह रुकते भी है, बावजूद इसके अब भी गुपचुप तरीके से सामूहिक बाल विवाह होने के समाचार यदाकदा सुनाई देते हैं। अजमेर के लिए यह बड़े गौरव की बात है कि बाल विवाह प्रथा रोकने के लिए बने कानून शारदा एक्ट का श्रेय अजमेर के दीवान रायबहादुर हरविलास शारदा के खाते में दर्ज है, मगर यह उतना ही दिलचस्प है कि वे खुद बाल विवाह की चपेट में आए थे।
इतिहास में दर्ज यह तथ्य कई साल पहले दैनिक भास्कर में वरिष्ठ पत्रकार श्री सुरेश कासलीवाल ने उजागर किया था। अपनी स्टोरी में उन्होंने खुलासा किया था कि शारदा की पहली शादी मात्र साढ़े नौ साल की उम्र में 16 नवंबर 1876 को श्री लालचंद की पुत्री काजीबाई के साथ हुई थी। कम उम्र में ही काजीबाई का निधन हो गया। इस पर उन्होंने 1889 में दूसरी शादी की, मगर दूसरी पत्नी की भी कुछ समय बाद निधन हो गया। इस पर उन्होंने 1901 में तीसरी शादी की। उन्होंने अपनी पुस्तक री कलेक्शंस एंड रेमीनीसेंसेज में लिखा कि कम उम्र में ही शादी हो जाने के कारण लड़कियों की कम उम्र में ही मृत्यु हो जाती है क्यों कि वे शारीरिक रूप से परिपक्व नहीं हो पातीं।
कुछ वर्ष पहले राजस्थान पत्रिका ने इस विषय पर काम किया और वे शारदा के प्रपौत्र की बहू ममता शारदा का साक्षात्कार लेने में कामयाब हो गया। ममता शारदा ने बताया कि हरबिलास शारदा शुरुआत से समाज सुधार के लिए प्रयासरत थे। उनकी पत्नी पार्वती गांव की थी। इसलिए उनका गांव में आना-जाना लगा रहता था गांव में बालक बालिकाओं की कम उम्र में शादी को देखते हुए उन्होंने कुछ करने की ठान ली। उन्होंने कई पुस्तकों का अध्ययन कर वैज्ञानिक आधार पर शारीरिक और मानसिक रूप से परिपक्वता की उम्र के अनुसार विवाह का एक प्रस्ताव बनाया। वे इसे लेकर तत्कालीन ब्रिटिश अधिकारियों के पास गए। ब्रिटिश अधिकारियों को वह प्रस्ताव बहुत पसंद आया। तत्कालीन ब्रिटिश भारत में 1 अक्टूबर 1929 को को शारदा एक्ट पारित किया गया। एक अप्रैल 1930 को यह कानून लागू हो गया। इसके बाद बाल विवाह एक अपराध की श्रेणी में आ गया। इसके बाद लड़की की 18 वर्ष एवं लड़के के विवाह की आयु 21 वर्ष रखी गई। हरविलास शारदा ने अभियान चलाकर बाल विवाह का विरोध किया। तब की ब्रिटिश सरकार ने भी उनका सहयोग किया। साथ ही एक्ट को लागू करने में सख्ती दिखाई । इस दौरान उन्हें कई बार विरोध भी झेलना पड़ा। समाज सुधार के इस विशेष प्रयास के लिए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें दीवान रायबहादुर की उपाधि प्रदान की। साथ ही समय पर कहीं अन्य पुरस्कारों से सम्मानित किया।
हरविलास शारदा का जन्म 3 जून, 1867 को राजस्थान के अजमेर शहर में हुआ था। उनके पिता धार्मिक प्रवृति के व्यक्ति थे, जिसका प्रभाव उनके जीवन पर पड़ा। उन्होंने आगरा कॉलेज से स्नातक की डिग्री प्राप्त की। शिक्षा पूरी करने के बाद वे अदालत में अनुवादक के पद पर कार्य करने लगे। वे राजस्थान में जैसलमेर के राजा के अभिभावक रहे और 1902 में अमजेर के कमिश्नर के कार्यालय में 'वर्नाक्यूलर सुपरिटेंडेटÓ के पद पर कार्य किया। रजिस्ट्रार, सब जज और अजमेर-मारवाड़ के स्थानापन्न जज के रूप में काम करने के बाद 1924 में वे इस सेवा से निवृत्त हुए।
हरविलास शारदा ने आजादी के दौरान भारतीय समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने के लिए काफी संघर्ष किया। उन्होंने स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित 'परोपकारिणी सभाÓ के सचिव के रूप में कार्य किया और लाहौर में हुए 'इंडियन नेशनल सोशल सम्मेलनÓ की अध्यक्षता की।
वर्ष 1924 में हरविलास शारदा अजमेर-मेरवाडा से केंद्रीय विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए। वह पुन: इस क्षेत्र से 1930 में निर्वाचित हुए थे। किया था। शारदा ने अपने जीवन में लेखन का कार्य भी किया था। उनका सबसे प्रसिद्ध ग्रन्थ-'हिंदू सुपीरियॉरिटीÓ है। हरविलास शारदा का 20 जनवरी, 1952 को निधन हो गया।

-तेजवानी गिरधर
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चोरी होना भी दान का एक रूप है?

सुना है कि चोरी होना भी दान का एक रूप है। अर्थात जब हमारी कोई वस्तु चोरी हो जाती है तो उसका वैसा ही महत्व है, जैसा कि अपनी ओर से किसी वस्तु का दान करना। इस सिलसिले में एक कहानी भी सुनी है। हुआ यूं कि एक बार एक ठेले वाले से नजर चुरा कर एक ग्राहक दो आम अपनी थैली में रख रहा था। उसे दूसरे ग्राहक ने देख लिया। वह चिल्लाया- अरे देखो, तुम्हारे ठेले से अमुक व्यक्ति आम चुरा रहा है। इस पर ठेले वाला नाराज हो कर बोला कि तुम्हारा क्या मतलब, तुम अपना काम करो। तुम मुझे मिलने वाले पुण्य में बाधा क्यों डाल रहे हो? मेरे यहां से भले ही आम चोरी हो रहे हैं, मगर असल में यह भी दान का ही रूप है। गुप्त दान। जिसका फल मुझे बाद में मिलेगा। शायद इसी वजह से चोरी या कोई नुकसान होने पर मन को यह तसल्ली देने का कहा जाता है कि मलाल न करो, जो वस्तु चली गई, वह या तो आपकी थी नहीं, या फिर वह दान के रूप में चली गई है।
असल में दान प्रकृति की आदान-प्रदान, लेन-देन, क्रिया-प्रतिक्रिया की व्यवस्था का ही रूप प्रतीत होता है। जैसे कोई वस्तु किसी स्थान से कहीं और जाएगी तो वह जो अंतराल उत्पन्न हुआ है, उसे प्रकृति किसी न किसी रूप में भर देती है। दान का सिद्धांत इसी व्यवस्था का आधार है। जब भी हम किसी को कोई वस्तु दान में देते हैं तो बाद में पलट कर वापस मिलती है। कब और कैसे, पता नहीं। प्रकृति की अपनी व्यवस्था है, जिसे समझना व जानना संभव नहीं है। कर्म का सिद्धांत भी तो ऐसा ही है। हम अच्छा कर्म करते हैं तो बाद में उसका फल भी अच्छा मिलता है। बुरे कर्म का बुरा फल।  इसी सूत्र से जुड़ी एक उक्ति आपने सुनी होगी कि बोये पेड़ बबूल का, आम कहां से होय।
दान के कई प्रकार हैं। अन्नदान, वस्त्रदान, विद्यादान, अभयदान और धनदान। इसी क्रम में रक्तदान, किडनी दान, मृत्योपरांत नेत्रदान व संपूर्ण शरीर का दान आदि आते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। इतना ही नहीं दान की प्रवृत्ति से सांसारिक आसक्ति यानी मोह माया से छुटकारा मिलता है। हवन-यज्ञ में अग्नि देवता को विभिन्न वस्तुओं की आहुति देने का भी अपना विधान है।
ज्योतिष के अनुसार दान करने से ग्रहों की पीड़ा से भी मुक्ति पाना आसान हो जाता है। अलग-अलग वस्तुओं के दान से अलग-अलग समस्याएं दूर होती हैं। ज्योतिष में तो इस पर पूरा विधान बना हुआ है कि अमुक वस्तु के दान को कब करने से क्या फल मिलता है। यहां तक बताया गया है कि उसी स्तर के कपड़ों का दान करें, जिस स्तर के कपड़े आप पहनते हैं। फटे-पुराने वस्त्रों का दान कभी न करें। ये भी बताया गया है कि मृत्यु आसान हो, इसके लिए दान किया जाता है। यही कारण है कि हमारे यहां मृत्यु शैया पर पड़े व्यक्ति के हाथों से दान करवाया जाता है, ताकि उसकी सद्गति हो। हमारे यहां मकर संक्रांति जैसी तिथियों पर दान करने की परंपरा है। और तो और अपनी बेटी का विवाह करने को कन्यादान कहा गया है, जिसका बड़ा महत्व बताया गया है। कहते हैं कि कन्यादान न करने से मुक्ति नहीं मिलती। इसी कारण जिन के बेटी नहीं होती, वे किसी अन्य की कन्या की शादी करवा का पुण्य कमाते हैं। हिंदुओं में कई लोग ऐसे हैं, जिनकी मान्यता है कि अपनी कमाई का दसवां हिस्सा दान करना चाहिए। इससे विभिन्न प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है।
इस्लाम में भी दान की बड़ी महिमा बताई गई है। हैसियतमंद मुसलमान को जकात देना जरूरी है। आमदनी से पूरे साल में जो बचत होती है, उसका 2.5 फीसदी हिस्सा किसी गरीब या जरूरतमंद को दिया जाता है, जिसे जकात कहते हैं। ईद से पहले यानी रमजान में जकात अदा करने की परंपरा है। यह जकात खासकर गरीबों, विधवा महिलाओं, अनाथ बच्चों या किसी बीमार व कमजोर व्यक्ति को दी जाती है। जकात और फितरे में बड़ा फर्क ये है कि जकात देना रोजे रखने और नमाज पढऩे जैसा ही जरूरी होता है, बल्कि फितरा देना इस्लाम के तहत जरूरी नहीं है। फितरे की कोई सीमा नहीं होती। इंसान अपनी हैसियत के हिसाब से कितना भी फितरा दे सकता है।
कोरोना वायरस की हाहाकार के दौरान गरीबों व जरूरतमंदों को फूड पैकेट्स व सूखी खाद्य सामग्री के वितरण को भले ही सभ्य व सुसंस्कृत समाज का प्रतीक माना जाए, मगर वस्तुत: अंश दान देने वाले के मन में दान का ही भाव पाया जाता है। इन दिनों यह देखने में आ रहा है कि अपात्र या अपेक्षाकृत कम जरूरतमंद भी फूड पैकेट्स हासिल कर रहे हैं। जरा गहरे में जाएं तो उसका एक पहलु ये जानकारी में आ रहा है कि ऐसा आगामी नगर निगम चुनाव के कारण है।
कई लोग संस्थागत दान की बजाय जांच-परख कर पात्र व्यक्ति को दान देने को अधिक उचित मानते हैं।  यही वजह है कि अनेक लोग परंपरागत व आदतन भिखारी को दान देने की बजाय उसी को दान देना अधिक उपयुक्त मानते हैं जो कि वाकई जरूरतमंद हो। जरूरतमंद को सहायता करने से वह सच्चे दिल से दुआ करता है। कई लोग भिखारी को खाना तो खिलवा देते हैं, मगर धन नही देते। उनकी मान्यता है कि पेशे से भिखारी व्यक्ति उसका उपयोग नशे के लिए कर सकता है, जिससे पुण्य की बजाय उलटे पाप लगेगा। लोगों की इस प्रवृत्ति को भिखारी भी जान गए हैं, इस कारण वे खाने या दवाई के नाम पर पैसा मांगते हैं। सिद्धांत के पक्के लोग किसी भिखारी को पैसे देने की बजाय खुद भोजन व दवाई दिलवाते हैं।

-तेजवानी गिरधर
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tejwanig@gmail.com

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