बुधवार, 22 अप्रैल 2020

गिलास से नहीं, लोटे से पीयें पानी

हाल ही सोशल मीडिया पर एक रोचक पोस्ट देखी, जिसमें गिलास की बजाय लोटे से पानी पीने की सलाह दी गई है। हालांकि उसमें वैज्ञानिक तथ्यों को आधार बनाया गया है, जिनकी प्रमाणिकता के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता, मगर प्रस्तावना में स्वदेशी की पैरवी और विदेशी का परित्याग करने का भाव अधिक है। विषय दिलचस्प है, लिहाजा सोचा कि इसे विमर्श के लिए आपके समक्ष रखा जाए। इस पोस्ट में अनावश्क विस्तार था, जिसे हटा दिया गया है। भाषा को भी परिमार्जित किया गया है।
इसमें लिखा है कि भारत में हजारों साल की पानी पीने की जो सभ्यता है, वो गिलास नही है, ये गिलास जो है, विदेशी है। गिलास भारत का नहीं है। गिलास यूरोप से आया। और यूरोप में पुर्तगाल से आया था। ये पुर्तगाली जब से भारत देश में घुसे थे, तब से गिलास में हम फंस गये। गिलास अपना नहीं है, अपना लौटा है। लौटा कभी भी एकरेखीय नहीं होता, तो वागभट्ट जी कहते हैं कि जो बर्तन एकरेखीय हैं, उनका त्याग कीजिये।
आपको तो सबको पता ही है कि पानी को जहां धारण किया जाए, उसमे वैसे ही गुण उसमें आते हैं। पानी के अपने कोई गुण नहीं हैं, जिसमें डाल दो उसी के गुण आ जाते हैं। दही में मिला दो तो छाछ बन गया, दूध में मिलाया तो दूध का गुण। जिस आकार के पात्र में डाला जाएगा, उसी का गुण धारण कर लेता है। अगर थोड़ा भी गणित आप समझते हैं तो हर गोल चीज का सरफेस टेंशन कम रहता है। क्योंकि सरफेस एरिया कम होता है। स्वास्थ्य की दष्टि से कम सरफेस टेंशन वाली चीज ही आपके लिए लाभदायक है। अगर ज्यादा सरफेस टेंशन वाला पेय आप पीयेंगे तो बहुत तकलीफ देने वाला है।
चूंकि कुआं गोल है, इस कारण उसका पानी सबसे अच्छा है। आपने देखा होगा कि सभी साधु-संत कुएं का ही पानी पीते हैं। न मिले तो प्यास सहन कर जाते हैं। साधु-संत अपने साथ जो केतली रखते हैं, वह लोटे के तरह के आकार वाली होती है। गोल कुए का पानी है तो बहुत अच्छा है। गोल तालाब का पानी, पोखर अगर गोल हो तो उसका पानी बहुत अच्छा है। नदी में गोल कुछ भी नहीं है। वो सिर्फ लम्बी है, उसमे पानी का फ्लो होता रहता है। नदी का पानी हाई सरफेस टेंशन वाला होता है और नदी से भी ज्यादा खराब पानी समुद्र का होता है। उसका सरफेस टेंशन सबसे अधिक होता है।
प्रकृति में देखेंगे तो बारिश का पानी गोल होकर धरती पर आता है। सभी बूंदें गोल होती हैं, क्योंकि उसका सरफेस टेंशन बहुत कम होता है।
एक तर्क ये दिया गया है। सरफेस टेंशन कम होने से पानी का सफाई करने वाला गुण लम्बे समय तक जीवित रहता है। पानी का ये गुण इस प्रकार काम करता है- बड़ी आंत और छोटी आंत में मेम्ब्रेन है और कचरा उसी में जा कर फंसता है। उसकी सफाई तभी संभव है, जब कम सरफेस टेंशन वाला पानी आप पी रहे हो। अगर ज्यादा सरफेस टेंशन वाला पानी है तो ये कचरा बाहर नहीं आएगा, मेम्ब्रेन में ही फंसा रह जाता है।
एक प्रयोग भी बताया गया है-
थोड़ा सा दूध लें और उसे चेहरे पे लगाइए। 5 मिनट बाद रुई से पोंछिये, रुई काली हो जाएगी। स्किन के अन्दर का कचरा और गन्दगी बाहर आ जाएगी। इसे दूध बाहर लेकर आया। असल में दूध का सरफेस टेंशन सभी वस्तुओं से कम है। दूध ने स्किन का सरफेस टेंशन कम किया व त्वचा थोड़ी सी खुल गयी और त्वचा खुली तो अंदर का कचरा बाहर निकल गया। यही क्रिया लोटे का पानी पेट में करता है।
अगर आप गिलास का हाई सरफेस टेंशन का पानी पीयेंगे तो आंतें सिकुड़ेंगी क्योंकि तनाव बढ़ेगा। तनाव बढ़ते समय चीज सिकुड़ती है और तनाव कम होते समय चीज खुलती है। अब तनाव बढ़ेगा तो सारा कचरा अंदर जमा हो जायेगा और वो ही कचरा भगन्दर, बवासीर जैसी बीमारियां उत्पन्न करेगा।
कुल मिला कर गिलास की बजाय पानी लौटे में पीयें। गिलास का प्रयोग बंद कर दें। जब से आपने लोटे को छोड़ा है, तब से भारत में लोटे बनाने वाले कारीगरों की रोजी रोटी खत्म हो गयी। गांव-गांव में कसेरे कम हो गये। वो पीतल और कांसे के लोटे बनाते थे। सब इस गिलास के चक्कर में भूखे मर गये। तो वागभट्ट जी की बात मानिये और लोटे वापस लाइए।

गुरुवार, 16 अप्रैल 2020

सांस में छिपे हैं चमत्कारिक प्रयोग

भारतीय सनातन संस्कृति में शिव स्वरोदय एक ऐसा विज्ञान है, जिसका प्रयोग हर आम-ओ-खास कर सकता है, मगर दु:खद पहलु ये है कि इसके बारे में चंद लोगों को ही जानकारी है। हालांकि विस्तार में जाने पर यह बहुत गूढ़ भी है, पूरे ब्रह्मांड का रहस्य इसमें छिपा है, जिसे योगाभ्यास करने वाला ही जान-समझ सकता है, लेकिन इसमें वर्णित अनेक तथ्य ऐसे हैं, जो न केवल आसानी से समझ में आते हैं, अपितु उनका प्रयोग भी बहुत सरल है। शास्त्रों के अनुसार यह विज्ञान मूलत: भगवान शिव व शक्ति के बीच का संवाद है, जिसमें जन कल्याण के लिए भगवान इसकी विस्तार से व्याख्या करते हैं। इस आलेख में हम आम आदमी के हितार्थ कुछ टिप्स पर चर्चा करेंगे, ताकि वह उनका लाभ ले सके।
टिप्स के वर्णन से पहले हम जरा इस विज्ञान के बारे में मोटी-मोटी जानकारी हासिल कर लें। यह तो आपके अनुभव में है ही हम अपनी नासिका छिद्रों से सांस लेते हैं और छोड़ते हैं। सांस ही प्राण वायु है। सांस हर पल चल रही है, खाते, पीते, चलते-फिरते, कुछ भी करते। स्वत: चल रही है। यहां तक सोते समय भी यह स्वत: चलती है। यह एक सामान्य प्रक्रिया है। हम सोच भी नहीं सकते कि इसके पीछे प्रकृति का एक अनूठा विज्ञान काम कर रहा है। जरा गौर करेंगे तो पाएंगे कि कभी तो हमारे नाक के बायें छिद्र से सांस आती-जाती है तो कभी दायें छिद्र से। हमें उसके महत्व का कोई भान नहीं, मगर इसके पीछे एक गहरा रहस्य छिपा है।
बायें छिद्र से चलने वाली सांस को चंद्र स्वर कहते हैं और दायें छिद्र से चलने वाली सांस को सूर्य स्वर करते हैं। चंद्र स्वर स्त्री प्रधान है एवं इसका रंग गोरा है, यह शक्ति अर्थात पार्वती का रूप है। सूर्य स्वर पुरुष प्रधान है। इसका रंग काला है। यह शिव स्वरूप है। इड़ा नाड़ी शरीर के बाईं तरफ स्थित है तथा पिंगला नाड़ी दाहिनी तरफ अर्थात इड़ा नाड़ी में चंद्र स्वर स्थित रहता है और पिंगला नाड़ी में सूर्य स्वर। सुषुम्ना मध्य में स्थित है, अत: दोनों ओर से श्वास निकले तो वह सुषम्ना स्वर कहलाएगा। मध्यमा स्वर क्रूर है। यह चलने पर हर काम के विघ्न आते हैं।
चंद्र स्वर में किए जाने वाले कार्य
विवाह, दान, मंदिर, जलाशय निर्माण, नया वस्त्र धारण करना, घर बनाना, आभूषण खरीदना, शांति अनुष्ठान कर्म, व्यापार, बीज बोना, दूर प्रदेशों की यात्रा, विद्यारंभ, धर्म, यज्ञ, दीक्षा, मंत्र, योग क्रिया आदि कार्य आदि चंद्र स्वर के चलते करने चाहिए। इसी प्रकार पानी, चाय, काफी आदि पेय पदार्थ पीने, पेशाब करने आदि में बांया स्वर होना चाहिए।
सूर्य स्वर में किए जाने वाले कार्य
उत्तेजना, आवेश और जोश के साथ करने पर जो कार्य ठीक होते हैं, उनमें सूर्य स्वर उत्तम कहा जाता है। अर्थात यदि हम ऐसे कार्य के लिए जा रहे हैं, जिसमें वाद-विवाद होना है, तो सूर्य स्वर जीत दिलवाता है। सूर्य स्वर में स्नान, भोजन, शौच, औषधि सेवन, विद्या, संगीत अभ्यास आदि कार्य सफल होते हैं। घुड़सवारी अथवा वाहन पर चढ़ते समय सूर्य स्वर बेहतर होता है।
सुषम्ना स्वर का महत्व
सुषुम्ना स्वर साक्षात् काल स्वरूप है। इसमें ध्यान, समाधि, प्रभु स्मरण भजन-कीर्तन आदि सार्थक होते हैं। सुषुम्ना स्वर में अच्छी बात का चिन्तन न करें अन्यथा वह बिगड़ जाएगी। इस समय यात्रा न करें, अन्यथा अनिष्ट होगा। इस समय सिर्फ भगवान का चिन्तन ही करें। सुषुम्ना नाड़ी मोक्ष प्राप्त करवाती है।
कुछ उपयोगी टिप्स
सुबह उठते वक्त जो भी स्वर चल रहा हो, उसी तरफ का पैर जमीन पर पहले रखें। इसके अतिरिक्त उसी तरफ के हाथ के दर्शन करें व हाथ को चूमें। उसके बाद दोनों हाथों को मिला कर दर्शन करें। स्नान के बाद जब भी कपड़े पहनें, तो जिस तरफ स्वर चल रहा हो, उस तरफ से कपड़े पहनना शुरू करें।
जब शरीर में अत्यधिक गर्मी महसूस करें, तब दाहिनी करवट लेट लें और बायां स्वर शुरू कर दें। इससे तत्काल शरीर ठंडक अनुभव करेगा। जब शरीर ज्यादा शीतलता महसूस करे तब बांयी करवट लेट लें, इससे दाहिना स्वर शुरू हो जाएगा और शरीर जल्दी गर्मी महसूस करेगा।
यदि किसी क्रोधी पुरुष के पास जाना है तो जो स्वर नहीं चल रहा है, उस पैर को आगे बढ़ाकर प्रस्थान करना चाहिए तथा अचलित स्वर की ओर उस पुरुष या महिला को लेकर बातचीत करनी चाहिए। ऐसा करने से क्रोधी व्यक्ति को शांत हो जाएगा। गुरु, मित्र, अधिकारी, राजा, मंत्री आदि से वाम स्वर से ही वार्ता करनी चाहिए।
सवाल ये उठता है कि यदि भोजन का समय हो गया हो और चंद्र स्वर चल रहा हो तो क्या करें? ऐसे में स्वर को बदलना ही होगा। यदि सूर्य स्वर चल रहा हो और चंद्र स्वर चलाना है तो दाहिनी करवट लेट जाना चाहिए। इसी प्रकार इसका विलोम भी किया जा सकता है। अनुलोम-विलोम के अतिरिक्त चल रहे स्वर नासिका को कुछ देर बंद करके भी स्वर बदल जा सकता है। जिस नथुने से श्वास नहीं आ रही हो, उससे दूसरे नथुने को दबाकर पहले नथुने से श्वास निकालें। इस तरह कुछ ही देर में स्वर परिवर्तित हो जाएगा। घी खाने से वाम स्वर और शहद खाने से दक्षिण स्वर चलना प्रारंभ हो जाता है।
इस विज्ञान में यात्रा के लिए कुछ उपयोगी जानकारी दी गई है। पूर्व तथा उत्तर दिशा में चन्द्र स्वर, पश्चिम तथा दक्षिण दिशा में सूर्य रहता है। दाहिना स्वर चलने पर पश्चिम या दक्षिण दिशा की यात्रा नहीं करनी चाहिए। बायें स्वर के चलते समय पूर्व तथा उत्तर दिशा की यात्रा नहीं करनी चाहिए। इससे यात्री को शत्रु का भय होता है और कभी-कभी तो यात्री घर वापस भी नहीं आता है। बायां या दाहिना कोई भी स्वर चल रहा हो और साथ ही सुषुम्ना भी चल रही हो तो मुख्य स्वर की तरफ वाला पांव आगे बढ़ा कर यात्रा करनी चाहिए। ऐसा करने से सफलता प्राप्त होती है।
आयु व मृत्यु के बारे में यह विज्ञान में विस्तार से जानकारी देता है। यदि किसी व्यक्ति का बायां स्वर लगातार चले और दाहिना स्वर बिलकुल न चले, तो समझना चाहिए कि उसकी मृत्यु एक माह में होगी। जिस व्यक्ति की आयु समाप्त हो गयी है उसे अरुन्धती, धु्रव, विष्णु के तीन चरण और मातृमंडल नहीं दिखायी पड़ते। जिह्वा को अरुन्धती, नाक के अग्र भाग को धु्रव, दोनों भौहें और उनके मध्य भाग को विष्णु के तीन चरण तथा आंखों के तारों को मातृमंडल कहते हैं। जिस व्यक्ति को अपनी भौहें न दिखें, उसकी मृत्यु नौ दिन में, सामान्य ध्वनि कानों से न सुनाई पड़े तो सात दिन में, आंखों का तारा न दिखे तो पांच दिन में, नासिका का अग्रभाग न दिखे तो तीन दिन में और जिह्वा न दिखे तो एक दिन में मृत्यु होती है। आंखों के कोनों को दबाने पर चमकते तेज बिन्दु यदि न दिखें, तो समझना चाहिए कि उस व्यक्ति की मृत्यु दस दिन में होगी।
ऐसा बताया गया है कि जो लोग चन्द्र नाड़ी से सांस अन्दर लेकर सूर्य नाड़ी से रेचन करते हैं और फिर सूर्य नाड़ी से सांस अन्दर लेकर चन्द्र नाड़ी से उसका रेचन करते हैं, वे दीर्घजीवी होते हैं। इसे ही अनुलोम-विलोम या नाड़ी-शोधक प्राणायाम कहा गया है।
ज्योतिषी भी इस विज्ञान का उपयोग करते हैं। प्रश्नकर्ता यदि अप्रवाहित स्वर की ओर से आकर प्रवाहित स्वर की ओर बैठ जाए और किसी रोग के सम्बन्ध में प्रश्न करे, तो मृत्यु शैया पर पड़ा व्यक्ति भी ठीक हो जाएगा। प्रश्नकर्ता सक्रिय स्वर की ओर से किसी रोग के विषय में प्रश्न करे, तो रोग किसी भी स्टेज पर क्यों न हो ठीक हो जाएगा। रोगी के बारे जानकारी चाहने वाला दूत प्रश्न करे तथा उस समय सूर्य स्वर प्रवाहित हो रहा हो, तो समझना चाहिए कि रोगी स्वस्थ हो जाएगा। परन्तु यदि उस समय चन्द्र स्वर प्रवाहित हो, तो समझना चाहिए कि रोगी अभी और बीमार रहेगा।
वशीकरण में भी इस विज्ञान का उपयोग किया जाता है। चूंकि हमारी व्यवस्था पुरुष प्रधान है, इस कारण इसमें स्त्री को वश में करने की विधि बताई गई है। पुरुष यदि स्त्री के प्रवाहित स्वर को अपने प्रवाहित स्वर के द्वारा ग्रहण करे और पुन: उसे स्त्री के सक्रिय स्वर में दे, तो वह स्त्री सदा उसके वश में रहती है। रजस्वला होने के पांचवें दिन यदि स्त्री का चन्द्र स्वर प्रवाहित हो और पुरुष का सूर्य स्वर प्रवाहित हो, तो समागम करने से पुत्र उत्पन्न होता है।

-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

क्या शगुन निर्मित करना कारगर टोटका है?

मेरे एक परिचित जब भी शहर से बाहर जाते हैं अथवा किसी महत्वपूर्ण कार्य के लिए घर से निकलते हैं तो उनकी माता जी घर से बाहर आ कर सिर पर जल से भरा कलश लेकर खड़ी हो जाती हैं। जैसे ही मेरे परिचित अपनी कार स्टार्ट करते हैं तो उनकी माता जी उनके सामने से गुजरती हैं। ऐसा मैने कई बार देखा है।
मेरे मन में सवाल उठता है कि क्या वाकई ऐसा टोटका करने का फल मिलता है?
वस्तुत: भारतीय परंपरा में शगुन का बड़ा महत्व है। ऐसी मान्यता है कि जब हम किसी महत्वपूर्ण कार्य के लिए निकलते हैं तो शव यात्रा, झाडू़ लगाती महिला सफाई कर्मचारी, पानी का घड़ा भर कर लाती महिला आदि के सामने आने को शुभ माना जाता है। अर्थात जिस कार्य के लिए हम जा रहे हैं, उसके संपन्न होने की पूरी संभावना होती है। ठीक इसके विपरीत काली बिल्ली के रास्ता काटने, विधवा महिला, धोबी या स्वर्णकार का सामना होने सहित अन्य कई दृश्य निर्मित होने को अच्छा नहीं माना जाता। ऐसे में लोग कुछ मिनट रुक कर उसके बाद में निकलते हैं। अर्थात अशुभ समय को टाला जाता है।
शुभ-अशुभ समय की बात आई तो इस पर भी चर्चा कर लेते हैं। आपको जानकारी होगी कि लोग चौघडिय़ा, दिशा शूल आदि देख कर यात्रा करते हैं। यदि शुभ चौघडिय़े में निकलने में देरी हो रही हो तो यात्रा में साथ लिया जाना वाला सामान, यथा संदूक, थैला आदि शुभ के चौघडिय़े में घर से बाहर रख देते हैं। एक तरह से यह प्रकृति को चकमा देने के समान है।
एक ओर उदाहरण देखिए। कहा जाता है कि रास्ते में अगर सामने से गधा आ जाए तो उसके बायीं हो कर गुजरना चाहिए। यह शुभ होता है। इसे भले ही सही माना जाए कि सामने से आ रहा गधा हमारे बायीं ओर से गुजरे तो इससे प्रकृति शुभ होने का संकेत दे रही है, मगर सायास गधे के बायीं ओर से गुजरना कैसे शुभ फल दायक हो सकता है?
इसी प्रकार भिन्न-भिन्न वार के दिन बाहर निकलते समय अमुक-अमुक वस्तु मुंह में रखते हैं, यथा गुड़, दही आदि। ये मान्यताएं कितनी सही हैं, इसके पीछे कौन सा विज्ञान काम करता है, इस पर अलग से बहस हो सकती है, लेकिन मेरा सवाल अलग है। वो ये कि चलो यात्रा पर निकलने के वक्त शुभ या अशुभ शगुन स्वत: निर्मित होते हैं तो इसका मतलब ये है कि प्रकृति हमें संकेत दे रही है। वहां तक ठीक है। लेकिन क्या यदि प्रकृति अपनी ओर से कोई शगुन नहीं दे रही और हम अपनी ओर से शुभ शगुन निर्मित करते हैं, क्या वाकई वह काम करता है? क्या प्रकृति की अपनी व्यवस्था में हम दखल कर सकते हैं? हो सकता है, इसका पूरा नहीं, आंशिक असर पड़ता हो। ऐसा भी हो सकता है कि चूंकि हमारे मन में धारणा है कि मेरे बाहर निकलते ही जल का कलश लिए हुए महिला सामने से आना शुभ सूचक है, इस कारण हमारे मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता हो, जो कि हमारे की संपन्नता में मदद करती हो।
स्थितियों अथवा दृश्य के प्रति हम कितने सतर्क हैं, इसका अनुमान इन उदाहरणों से समझ सकते हैं। आपने देखा होगा कि हमारे यहां भोजन परोसते समय पहले जल पेश किया जाता है। उसके बाद भोजन की थाली। अज्ञानतावश कोई यदि भोजन की थाली एक हाथ में व दूसरे हाथ में पानी का गिलास ले कर आए या पानी का गिलास भोजन की थाली में लाए तो इसे अपशगुन माना जाता है। ज्ञातव्य है कि हमारे यहां मान्यता है कि ऐसा मृतक के लिए किया जाता है। इसी प्रकार अगर कोई मकान की चौखट पर बैठे तो उसे वहां न बैठने को कहा जाता है, क्यों कि चौखट पर बैठने से दरिद्रता आती है। इसके विपरीत तथ्य है कि जो दरिद्र हो जाता है, जिसके पास खाने को भी नहीं होता, वह चौखट पर बैठता है।
बहरहाल, मैने विषय आपके समक्ष रखा है, विद्वान या सुधिजन ही इस विषय पर बेहतर खुलासा कर सकते हैं। आप भी अपने परिचित विद्वानों से चर्चा कीजिए और संतोषजनक जवाब मिले तो शेयर जरूर कीजिए।

-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

सोमवार, 13 अप्रैल 2020

कोराना जैसे वायरस से जैविक युद्ध करने का वर्णन मौजूद है पुराणों में

आज जब पूरा विश्व कोराना वायरस की महामारी से त्रस्त है, तो यकायक पूर्व में विद्वानों व वैज्ञानिकों द्वारा अगला विश्व युद्ध जैविक अस्त्रों से होने की भविष्यवाणी का ख्याल आ जाता है। कोरोना के भयंकर प्रकोप के बीच विद्वानों ने तो यह तक खोज निकाला है कि शिव पुराण में कोरोना रक्षा कवचम् का उल्लेख है। आपके अवलोकनार्थ शिव पुराण के संबंधित पृष्ठ भी प्रस्तुत है। हालांकि अभी इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा गया है कि यह महामारी प्रकृति के प्रकोप के रूप में उत्पन्न हुई या यह कोई षड्यंत्र है। बावजूद इसके चूंकि इसकी शुरुआत चीन से हुई, इस कारण इसे चाइनीज वायरस कहा जाने लगा है। कुछ लोगों का मानना है इसके पीछे चीन का साजिशाना हाथ है। महाशक्तियों की राजनीति के चलते चीन को इस साजिश के लिए दोषी तक ठहराया जा रहा है। इसमें कितनी सच्चाई है, इसके बारे में पक्के तौर पर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन इस किस्म के जैविक अस्त्रों का प्रयोग पुराणों में जरूर वर्णित है। उनके नाम माहेश्वर ज्वर व वैष्णव ज्वर बताए गए हैं। ज्ञातव्य है कि कोराना वायरस की मौजूदगी का प्राथमिक लक्षण भी तीव्र ज्वर को माना गया है।
ऐसी जानकारी है कि भगवान शिव व भगवान कृष्ण के बीच जो युद्ध हुआ था, उसमें इन जैविक अस्त्रों का प्रयोग किया गया था। बताया जाता है कि कृष्ण ने असम में बाणासुर और भगवान शिव से युद्ध के समय माहेश्वर ज्वर के विरुद्ध वैष्णव ज्वर का प्रयोग कर विश्व का प्रथम जीवाणु युद्ध लड़ा था। भागवत पुराण के दसवें स्कंध में अध्याय 62 में वर्णित है कि कृष्ण के पुत्र का नाम प्रद्युम्न था और प्रद्युम्न के पुत्र का नाम अनिरुद्ध। अनिरुद्ध की पत्नी उषा थी। उषा शोणितपुर के राजा वाणासुर की कन्या थी। अनिरुद्ध और उषा आपस में प्रेम करते थे। उषा ने अनिरुद्ध का हरण कर लिया था। वाणासुर को अनिरुद्ध-उषा का प्रेम पसंद नहीं था। उसने अनिरुद्ध को बंधक बना लिया था। वाणासुर को शिव का वरदान प्राप्त था। भगवान शिव को इसके कारण श्रीकृष्ण से युद्ध करना पड़ा था। बाणासुर द्वारा अनिरूद्घ के बंदी बनाए जाने की बात श्री कृष्ण को पता लगी तो वे, बलराम तथा प्रद्युम्र गरुण पर सवार होकर बाणासुर के नगर पहुंचे, जहां उनका सामना महान महेश्वर ज्वर से हुआ, जो तीन सींग, तीन पैर वाला था, उस ज्वर का ऐसा प्रभाव था कि उसके फेंके भस्म के स्पर्श से संतप्त हुए श्री कृष्ण के शरीर का आलिंगन करने पर बलराम जी बेहोश हो गए, तब श्री हरि के शरीर में समाहित वैष्णव ज्वर ने उस महेश्वर ज्वर को बाहर निकाल दिया। श्री हरी विष्णु के प्रहार से पीडि़त उस माहेश्वर ज्वर को देख ब्रह्मा जी ने श्री कृष्ण से कहा कि इसे क्षमा प्रदान करें, तब श्री हरी ने उस वैष्णव ज्वर को अपने अंदर समाहित के लिया। यह देख माहेश्वर ज्वर बोला कि जो मनुष्य आपके साथ मेरे इस युद्ध को याद करेगा, वह तुरंत ज्वरहीन हो जाएगा, यह कह कर वह वहां से चला गया।
एक अन्य प्रसंग के अनुसार दक्ष नाम से प्रसिद्ध प्रजापति यज्ञ करने का संकल्प लेकर उसके लिये तैयारी आरम्भ कर दी। उसमें सभी देवी-देवताओं को तो आमंत्रण था, मगर शिवजी को नहीं बुलाया गया। वस्तुत: देवताओं ने पहले सभी यज्ञों में से किसी में भी उनके लिये भाग नियत नहीं किया था। इस पर उमा ने दु:ख व्यक्त किया। जिससे क्रोधित होकर शिव ने योग बल का आश्रय ले अपने भयानक सेवकों द्वारा उस यज्ञ को सहसा नष्ट करा दिया। ऐसे में वह यज्ञ मृग का रूप धारण करके आकाश की ओर ही भाग चला। भगवान् शिव ने उसका पीछा किया। भगवान शिव के क्रोध के कारण उनके ललाट से पसीने की बूंद प्रकट हुई। उस पसीने की बूंद के पृथ्वी पर गिरते ही कालाग्नि के समान विशाल अग्नि पुंज का प्रादुर्भाव हुआ। उस समय उस आग से एक नाटा-सा पुरुष उत्पन्न हुआ, जो अत्यंत भयावह था। उसने दक्ष नाम से प्रसिद्ध प्रजापति के यज्ञ को दग्ध कर दिया। तत्पश्चात् वह देवताओं तथा ऋषियों की ओर दौड़ा। देवता भयभीत हो दसों दिशाओं में भाग गये। सारे जगत में हाहाकार मच गया। इस पर ब्रह्माजी ने शिव जी से आग्रह किया कि वे अपने क्रोध को शांत करें, आज से सब देवता आपके भी यज्ञ का भाग दिया करेंगे। उन्होंने कहा कि आपके पसीने से जो यह पुरुष प्रकट हुआ है, इसका नाम होगा ज्वर। यह समस्त लोकों में विचरण करेगा। यह ज्वर जब तक एक रूप में रहेगा, तब तक यह सारी पृथ्वी इसे धारण करने में समर्थ न हो सकेगी। अत: इसे अनेक रूपों में विभक्त कर दीजिये। इस पर शिव जी प्रसन्न हुए। उन्होंने यज्ञ में भाग प्राप्त कर लिया। भगवान शिव ने ज्वर को अनेक रूपों में बांट दिया। हाथियों के मस्तक में जो ताप या पीड़ा होती है, वही उनका ज्वर है। पर्वतों का ज्वर शिलाजीत के रूप में प्रकट होता है। सर्पों का ज्वर केंचुल है। गाय-बैलों के खुरों में जो खोरक नाम वाला रोग होता है, वही उनका ज्वर है। पशुओं की दृष्टि-शक्ति का जो अवरोध होता है, वह भी उनका ज्वर ही है। घोड़ों के गले में जो मांसखण्ड बढ़ जाता है, वही उनका ज्वर है। मोरों की शिखा का निकलना ही उनके लिये ज्वर है। कोकिल का जो नेत्र रोग है, उसे ज्वर बताया है। तोतों के लिये हिचकी को ही ज्वर बताया गया है। सिंहों में थकावट का होना ही ज्वर कहलाता है। मनुष्यों में यह ज्वर के नाम से ही प्रसिद्ध है। यह यह मृत्युकाल में, जन्म के समय तथा बीच में भी मनुष्यों के शरीर में प्रवेश कर जाता है। इसी ने वृत्रासुर के शरीर में प्रवेश किया था। पीडि़त होकर जब वह जंभाई लेने लगा, उसी समय इन्द्र ने उस पर वज्र का प्रहार किया। वज्र ने उसके शरीर में घुस कर उसे चीर डाला। वह परम धाम को चला गया।

-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

पूरे दिन में एक पल जिह्वा पर सरस्वती विराजमान होती है

वाणी का चमत्कार देखिए, भारतीय संस्कृति में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जिनमें देवता, ऋषि-मुनि, सती आदि के मुख से जो भी श्राप या वरदान निकलता है, वह अक्षरश: सत्य साबित होता है। उन पर विस्तार से विचार फिर कभी, अभी सिर्फ दो उदाहरण। ये दोनों उदाहरण अपने आप में अद्वितीय हैं।
महाराज धृतराष्ट्र की पतिव्रता धर्मपत्नी महारानी गांधारी ने अपने सौ पुत्रों के वध के लिए भगवान श्रीकृष्ण को जिम्मेदार ठहराते हुए उन्हें श्राप दिया कि जैसे कौरव वंश को उन्होंने नष्ट कर दिया, वैसे ही युद वंश का भी नाश हो जाएगा। बताते हैं कि यह श्राप पूरी तरह से सफल हुआ।
इसी प्रकार महाराजा दशरथ ने आखेट करते समय नदी किनारे पानी की कल-कल आवाज को सुन कर वहां हिरण होने व उसके पानी पीने के भ्रम में तीर चलाया और वृद्ध माता-पिता को तीर्थाटन को निकले श्रवण की उससे मौत हो गई। इस पर उनके माता-पिता ने पुत्र वियोग में दशरथ को श्राप दिया कि उनकी मृत्यु भी पुत्र वियोग में होगी। ज्ञातव्य है कि भगवान राम के चौदह वर्ष के वनवास के दौरान पुत्र वियोग में ही दशरथ का देहांत हो गया था।
खैर, अब शीर्षक में दिए गए विषय पर चर्चा करते हैं। ऐसी मान्यता है कि प्रकृति ने हर मनुष्य को भी इसी प्रकार की शक्ति प्रदान कर रखी है। लेकिन उसकी सीमा ये है कि पूरे चौबीस घंटे में केवल किसी एक पल में मनुष्य की जिव्हा पर वाणी की देवी सरस्वती विराजमान होती है। उस पल में मनुष्य के मुख से जो भी वचन निकलता है, वह सच साबित हो जाता है। यही वजह है कि हमारे यहां परंपरा है कि सामान्य बोलचाल में भी पूरी सावधानी बरती जाती है। यानि कि शब्दों का चयन सोच-समझ कर किया जाता है, कहीं कोई गलत शब्द उस पल की वजह से किसी पर फलित न हो जाए।
जैसे जब कोई दुकानदार पूरे दिन काम करने के बाद दुकान के पट बंद करता है तो यह नहीं कहता कि दुकान बंद कर दी। कहता है कि दुकान मंगल कर दी। कहीं दुकान बंद शब्द का इस्तेमाल कर दे और वाकई दुकान सदा के बंद न हो जाए। इसी प्रकार रात्रि में शयन के वक्त दीया शांत करने को यह नहीं कहते कि दीया बुझा दिया, बल्कि ये कहते हैं कि दीया बढ़ा दिया। यहां तक कि किसी को गुस्से में अपशब्द कहने के दौरान भी पूरी सावधानी बरती जाती है। अपशब्द के विलोम शब्द का उपयोग किया जाता है। जैसे किसी से कोई वस्तु टूट जाए या कोई और गलती हो जाए तो सिंधी भाषा में यह नहीं कहा जाता कि अंधो आहीं छा, बल्कि ये कहा जाता है कि सजो आहीं छा? अंधो माने अंधा व सजा माने आंख का पूरा।
यदि कोई घर से बाहर गया हुआ हो तो उसके बारे में पूछने पर पहले उसकी खैर की कामना की जाती है, तब उसका नाम लिया जाता है।
इतना ही नहीं घर में कोई वस्तु के बारे पूछने पर यह नहीं कहा जाता कि क्या अमुक वस्तु नहीं है क्या, बल्कि ये पूछा जाता है कि अमुक वस्तु है क्या? अर्थात नकारात्मकता से बचा जाता है।
इसी प्रकार किसी के घर से बाहर जाने के वक्त पीछे से ये नहीं पूछा जाता कि कहां जा रहे हो। यह अशुभ माना जाता है।
हम सब की जानकारी में है कि जब किसी अतिथि अथवा घर के ही किसी सदस्य को पानी पिलाते हैं तो यह नही कहते कि पानी दो, बल्कि ये कहते हैं कि पानी पिलाओ। वजह ये कि पानी देना शब्द का इस्तेमाल मृतक के लिए किया जाता है। वैसे प्रसंगवश यह जिक्र करना भी जरूरी है कि पानी पिलाने को किसी को परास्त करने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है।
मान्यता ये भी है कि किसी-किसी की जुबान काली होती है और उसके मुख से निकली वाणी सत्य साबित हो जाती है। जब उस व्यक्ति को भी इसका ज्ञान हो जाता है तो वह कुछ बोलने से पहले सावधानी बरतता है, ताकि किसी का अनिष्ट न हो जाए।
वाणी की सदाशयता देखिए। कई लोगों को आपने देखा होगा कि हर बात कहने के साथ यह जोड़ देते हैं कि भगवान आपको नेकी दे। वाणी के उपयोग में अतिरिक्त सावधानी का उदाहरण ये है कि जब कि कोई भगवान, देवी-देवता या गुरु से जुड़ा कोई प्रसंग बताते हैं तो कान पकड़ते हैं। इसका मतलब ये है कि कोई भूलचूक हो जाए तो अग्रिम माफी मांग ली जाए।
वाणी की महिमा अपरंपार है। एक दिलचस्प अपवाद मेरी जानकारी है, वह आपसे शेयर करता हूं। स्वामी हिरदाराम साहेब के बारे कहा जाता था कि वे अपने शिष्यों में से जिस को भी नाराज हो कर अपशब्द कहते थे, उसका सौभाग्य उदय हो जाता था। वह अपने आप को धन्य समझता था। यानि अपशब्द उसी को बोलते थे, जिसके प्रति उनका स्नेह होता था।
यह तो हुई वाणी की महिमा। ऐसी मान्यता है कि कभी-कभी दृ्रश्य या स्थिति भी फलित हो जाती है। इस कारण ऐसे अनिष्टकारी दृश्यों से बचा जाता है। जैसे उसके बारे में चर्चा फिर कभी।

-तेजवानी गिरधर
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tejwanig@gmail.com

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

सत्यनारायण भगवान की मूल कथा कौन सी है?

हमारे यहां पूर्णिमा के दिन भगवान सत्यनारायण की कथा करने का प्रचलन है। किसी शुभारंभ के मौके पर भी यह कथा करवाई जाती है। इस कथा में पांच अध्याय होते हैं, जिनमें यह वर्णन होता है कि अमुक व्यक्ति ने कथा की तो उसे बहुुत फायदा हुआ और अमुक ने भूल से कथा नहीं की या कथा का अनादर किया तो उसका अनिष्ट हो गया। आज हम जो कथा कर रहे हैं, वह वाकई सत्यनाराण भगवान की कथा ही है, चूंकि उसमें भगवान की महिमा है, मगर सवाल ये उठता है कि पांचों अध्यायों में जिन लोगों ने कथा की वह आखिर कौन सी कथा थी? यह बिलकुल साफ है कि हम जो कथा कर रहे हैं, वह उन पांच अध्यायों में कथा करने वालों ने नहीं की थी। वह कथा कोई और ही है। वह कहां खो गई? यदि पांच अध्याय वाली कथा से हमें सुख-संपत्ति मिलती है तो मौलिक कथा का न जाने कितना लाभ होगा।
इस बारे में मैने अनेक विद्वानों व पंडितों से जानकारी चाही तो वे ये नहीं बता पाए कि वह कथा कौन सी थी।
जहां तक मुझे समझ में आता है, पांच अध्यायों में जिस कथा का उल्लेख है, वह मूलत: कोई कथा नहीं थी। वह व्रत करते हुए धार्मिक विधि विधान पूर्वक सत्यनारायण भगवान की पूजा-अर्चना व आरती थी। गलती से उसे कथा कह दिया गया है। वर्तमान में हम जिस कथा की पुस्तक का पूजा-अर्चना  के दौरान पाठ करते हैं, वह तो भिन्न-भिन्न प्रकरणों के पांच अध्यायों का संगलन मात्र है।

-तेजवानी गिरधर
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tejwanig@gmail.com

गुरुवार, 9 अप्रैल 2020

कोरोना ने ज्योतिष को भी कर दिया ठप?

वैश्विक महामारी कोराना से जहां पूरा जनजीवन ठप सा हो गया है, मंदिरों में भगवान की पूजा तक नहीं रुक गई है, वहीं ज्योतिषीय राशिफल  को भी निष्फल कर दिया है। कहते हैं न कि समय बड़ा बलवान है, यह कहावत चरितार्थ होती दिख रही है। उसके आगे ग्रहों-नक्षत्रों का भी जोर नहीं है।
आइये ताजा राशिफल पर नजर डालते हैं:-
मेष राशि-आज आपको शासन द्वारा सम्मानित किए जाने की संभावना रहेगी। यदि आप किसी व्यक्ति, बैंक या संस्था से कर्ज लेना चाहें तो कदापि न लें, आज लिए गए कर्ज का उतरना कठिन रहेगा।
सवाल ये है कि जब किसी भी प्रकार के समारोह नहीं हो रहे तो मेष राशि वाले सम्मानित कैसे होंगे? इसी प्रकार कर्ज न लेेने की सलाह दी जा रही है। अरे भाई, अभी लोन दे कौन रहा है?
वृषभ राशि-आज रुके हुए कार्यों की पूर्ति होगी।
प्रश्र ये है कि जब सब कुछ ठप है तो रुके हुए काम पूरे होंगे कैसे?
मिथुन राशि-सामाजिक कार्यकलापों में व्यवधान उपस्थित हो सकता है।
जनाब, जब कोई भी सामाजिक कार्यकलाप हो ही नहीं रहा तो व्यवधान उत्पन्न किसमें होगा?
कर्क- आज अपनी शान शौकत के लिए धन खर्चा करेंगे, जिससे आपके शत्रु परेशान होंगे।
महाशय, जब कोई घर से ही नहीं निकल पा रहा तो वह शान शौकत पर खर्च कहां करेगा?
सिंह राशि-ससुराल पक्ष से आज नाराजगी के संकेत मिलेंगे, मधुरवाणी का प्रयोग करें, अन्यथा संबंधों में कटुता आएगी।
हां, ये राशिफल शायद सही हो, क्योंकि आपने यदि अपनी बीवी को ठीक से नहीं रखा तो उसके पीहर वाले आपसे नाराज हो सकते हैं।
कन्या राशि-व्यर्थ व्यय का योग भी है। व्यापार में धन लाभ होगा।
ये राशिफल कदाचित सही हो सकता है। जब रुपए का माल डेढ़ या दो रुपए में मिल रहा है तो ये व्यर्थ व्यय ही कहलाएगा, मगर यह राशिफल तो सभी राशि वालों पर भी फिट बैठता है। रहा सवाल व्यापार में धन लाभ को हो सकता है कि आप कोई ऐसा धंधा करते हों, जिसमें कि इन दिनों जम कर कालाबाजारी हो रही है।
तुला राशि-आपके अधिकार व संपत्ति में वृद्धि होगी। आज नए कार्यों में इनवेस्ट करना पड़े तो शुभ रहेगा।
जब सब कुछ थम सा गया है तो अधिकार व संपत्ति में वृद्धि कैसे हो जाएगी? ऐसे में जब काम ही बंद हैं तो आप इन्वेस्ट कहां करेंगे?
वृश्चिक राशि-व्यापार वृद्धि के लिए किए गए प्रयास निष्फल हो सकते हैं।
अरे भाई, जब व्यापार-धंधा ही चौपट हो गया है तो उसमें वृद्धि के प्रयास चाह कर भी कोई कैसे कर सकता है?
धनु राशि-आज आपकी विद्या-ज्ञान की वृद्धि होगी।
समझ में नहीं आता कि मौजूदा परिस्थिति में विद्या व ज्ञान कैसे बढ़ेगा?
मकर राशि-रुके कार्य पूर्ण हो जाएंगे। किसी नए कार्य में इनवेस्ट करना पड़े तो अवश्य करें, भविष्य में लाभ होगा।
ये राशिफल भी कामकाज के ठप रहते कैसे सही साबित होगा। भविष्य में लाभ तो तब मिलेगा ना, जब आप नया कार्य कर पाएंगे।
कुम्भ राशि- सांसारिक सुख भोग, नौकर-चाकरों का सुख पूर्ण रूप से मिलेगा।
भई वाह, नौकर-चाकर काम पर ही नहीं आ रहे तो सुख मिलेगा कैसे?
ये तो हुई रशिफल की बात। अब जरा इस पर विचार कीजिए कि जिन लोगों की कुंडली में इस लॉक डाउन के दिनों के दौरान एक्सीडेंट का योग था, वह भी काल के प्रभाव से टल गया है। जब लोग बाहर निकल ही नहीं रहे तो एक्सीडेंट होगा कैसे?
एक और दिलचस्प बात ये है कि जरा गौर करेंगे तो पाएंगे कि इस काल में रूटीन में मरने वालों की संख्या में भी कमी आई है। यकीन न हो तो श्मशान जा कर देख लें। ऐसा लगता है कि यमदूत भी लॉक डाउन के कारण अपने घर से बाहर नहीं निकल रहे।
मेरी तो छोटी बुद्धि है, इसकी असली विवेचना तो कोई पंडित जी ही कर सकते हैं।

-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस शब्द उपयुक्त नहीं है?

इन दिनों आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का बोलबाला है। हर क्षेत्र में इसका उपयोग किया जा रहा है। यकायक ख्याल आया कि क्या आर्टिफिशियल षब्द उपयुक्त है...