शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस शब्द उपयुक्त नहीं है?

इन दिनों आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का बोलबाला है। हर क्षेत्र में इसका उपयोग किया जा रहा है। यकायक ख्याल आया कि क्या आर्टिफिशियल षब्द उपयुक्त है। यह नकली इंटेलिजेंस कैसे हो सकता है। मेरी नजर में यह क्रिएटिव इंटेलिजेंस है, जिसमें इंटेलिजेंसी में क्रिएटिविटी की जाती है। इस सिलसिले में चैट जीपटी से पूछा गया कि उसकी राय क्या है तो उसका जवाब था कि विचार रोचक और विचारोत्तेजक है। “आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस” (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) शब्द वास्तव में मशीन द्वारा निर्मित या मानव-निर्मित बुद्धि पर जोर देता है, जबकि आज की अनेक एआई प्रणालियाँ केवल गणना ही नहीं करतीं, बल्कि लेखन, चित्रकला, संगीत, डिजाइन, शोध-सहायता और नए विचारों का संयोजन भी करती दिखाई देती हैं। इसी कारण आपको “क्रिएटिव इंटेलिजेंस” नाम अधिक उपयुक्त लग रहा है। लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है। “आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस” क्या बताता है?

यह बुद्धि मानव द्वारा बनाई गई है। मशीनें सीख सकती हैं, निर्णय ले सकती हैं, पैटर्न पहचान सकती हैं। इसमें केवल रचनात्मकता ही नहीं, बल्कि तर्क, योजना, भविष्यवाणी, अनुवाद, चिकित्सा विश्लेषण, रोबोट नियंत्रण आदि भी शामिल हैं। “क्रिएटिव इंटेलिजेंस” क्या बताता है?

आपका प्रस्ताव है कि एआई सृजनात्मक क्षमता पर जोर देता है।

कविता, कहानी, संगीत, चित्र, नए विचार उत्पन्न करने वाली प्रणालियों के लिए यह नाम आकर्षक लगता है। लेकिन यह एआई के गैर-रचनात्मक उपयोगों (जैसे मौसम पूर्वानुमान, बैंकिंग धोखाधड़ी पहचान, चिकित्सा निदान) को पूरी तरह नहीं समेट पाता।

दार्शनिक दृष्टि से आपका सुझाव एक गहरे प्रश्न की ओर इशारा करता है, क्या बुद्धि का सर्वोच्च रूप रचनात्मकता है? यदि हम मानें कि केवल गणना करने वाला तंत्र “बुद्धिमान” नहीं कहलाता, बल्कि नया अर्थ, नई कल्पना और नया समाधान उत्पन्न करने की क्षमता ही वास्तविक बुद्धिमत्ता है, तब “क्रिएटिव इंटेलिजेंस” वास्तव में अधिक सार्थक नाम प्रतीत हो सकता है।

यदि पूरे क्षेत्र का नाम बदलना हो तो “आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस” अभी भी अधिक व्यापक शब्द है। लेकिन जनरेटिव एआई (जो कविता, चित्र, संगीत, लेख आदि बनाती है) के लिए “क्रिएटिव इंटेलिजेंस” एक बहुत प्रभावशाली और भविष्यसूचक नाम हो सकता है। 


शनिवार, 25 अप्रैल 2026

नेता बडा या अधिकारी?

अपुन के दिमाग में आया कि सत्ता की गाड़ी को दो ही पहिये चलाते हैं, राजनेता और प्रशासनिक अधिकारी। दोनों में से एक के बिना भी सरकार नहीं चल सकती। मगर सवाल ये उठता है कि इनमें से बड़ा कौन? दोनों में कौन ज्यादा जिम्मेदार है?

एक अधिकारी से गुफ्तगू की तो वे बोले असल में सरकार तो अधिकारी और उसके नीचे का तंत्र चलाता है। राजनेता को तो कानून और नियमों की जानकारी तक नहीं होती। वह तो केवल मौखिक आदेश देता है, उनकी अनुपालना नियमों के अंतर्गत किसी प्रकार की जाए, यह रास्ता तो अधिकारी ही निकालता है। वैसे भी यदि नियम के खिलाफ कुछ हो जाए तो राजनेता का कुछ नहीं बिगड़ता, क्यों कि वह तो केवल जुबानी जमा-खर्च करता है, जबकि रिकार्ड के मुताबिक फंदा को अधिकारी और कर्मचारी के गले में ही पड़ता है। अगर प्रशासनिक तंत्र प्रभावी न हो तो राजनेता जो मन में आए, वही करे और इसके नतीजे में अराजकता ही हाथ आ सकती है। कुल मिला कर अधिकारी नकेल का काम करता है और उसी की वजह से सिस्टम चलता है। इस लिहाज से अधिकारी ही बड़ा और जिम्मेदार माना जाना चाहिए, मगर बावजूद इसके उसे दब कर चलना पड़ता है। इस वजह से, क्यों कि राजनेता चाहे जब उसे उठा कर दूर फिंकवा सकता है।

अपुन ने एक राजनेता का मन टटोला। उनका तर्क भी दमदार था। बोले- राजनेता ही बड़ा होता है। असल में सरकार बनी ही जनता के लिए है और जनता का दर्द राजनेता से ज्यादा कौन समझ सकता है। वह जनता में से उठ कर आता है, जनता के बीच ही रहता है और जनता के प्रति ही जवाबदेह होता है। आप ही सोचिये, हो भले ही रेलवे ट्रेक के कर्मचारी की वजह से ट्रेन एक्सीडेंट, मगर छुट्टी तो रेल मंत्री हो जाती है। इतना ही नहीं नेेता को हर पांच साल बाद जनता के सामने परीक्षा देने जाना पड़ता है। विपक्षी तो कपड़े फाड़ता ही है, खुद की पार्टी का भी टांग खींचने में लगा रहता है। जनता भी ऐसी है कि कब और किस वजह से फेल कर दे और कब पास, कुछ पता नहीं होता। दूसरी ओर अधिकारी केवल किताबों को रट कर या फिर टीप-टाप कर एक बार परीक्षा पास कर लेता है और ले-दे कर ऊंचे ओहदे पर पहुंच जाता है। फिर ताजिंदगी ए.सी. चेंबर में ऐश करता है। न तो जनता के पास जाने का झंझंट और न ही जनता से मिलने-मिलाने की परेशानी। दरबान ही नहीं घुसने देता। जनता उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती है। हद से हद उसका तबादला कर दो। जहां जाएगा, गाड़ी, बंगला, चपरासी, सब कुछ मिलेगा। अब आप ही बताइये, जिसका ज्यादा समर्पण और ज्यादा जवाबदेही है, वही तो ज्यादा जिम्मेदार हुआ।

दोनों की बातें सुन कर अपना तो सिर ही चकरा गया। कौन बड़ा और कौन ज्यादा जिम्मेदार? अपने लिए तो दोनों ही बड़े हैं। हां, अगर दोनों में से कोई भी गलती करे तो अपनी कलम के वार से बच नहीं सकते। और आप जानते हैं कि तलवार के वार से ज्यादा गहरा घाव करता है शब्द बाण। अरे..... आप कहीं ये तो नहीं समझ रहे कि अपुन  अपने आप को बड़ा साबित करने लगे हैं। अपुन कितने छोटे हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गर किसी नेता से अटके तो कुट जाएंगे और अधिकारी के जंच गई तो वह हमारी रिपोर्ट दर्ज नहीं होने देगा।


गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

क्या दवाइयां वास्तव में एक्सपायर होती हैं?

हम सब जानते हैं कि एक्सपायरी यानि अवधि पार दवाई नहीं लेनी चाहिए। जब भी दवाई खरीदते हैं तो उसकी एक्सपायरी डेट जरूर देखते हैं। सवाल उठता है कि क्या एक्सपायरी डेट के बाद दवाई नहीं लेनी चाहिए? क्या वह जहरीली हो जाती है?

इस बारे में जानकारों का मानना है कि “एक्सपायरी” का अर्थ अक्सर जैसा समझा जाता है, वैसा सीधा नहीं होता। वस्तुतः दवा पर लिखी एक्सपायरी डेट वह तारीख है, जिस तक निर्माता यह गारंटी देता है कि दवा पूरी शक्ति यानि पोटेंसी में होगी, सुरक्षित होगी और अपेक्षित असर देगी। यह तारीख वैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर तय की जाती है। अब सवाल यह कि एक्सपायर होने के बाद दवा का क्या होता है? जानकार कहते हैं कि एक्सपायरी के बाद दवा अचानक जहर नहीं बन जाती, तुरंत बेअसर नहीं होती, लेकिन उसकी ताकत धीरे-धीरे घटने लगती है। कुछ दवाओं में रासायनिक बदलाव हो सकता है। यानी दवा कम असरदार हो सकती है, न कि जरूरी तौर पर खतरनाक।

अब सवाल यह कि क्या सभी दवाएँ एक जैसी होती हैं? तो इसका जवाब है- नहीं। यहां बहुत फर्क पड़ता है। एक्सपायर हो चुकी एंटीबायोटिक, इंसुलिन, हार्ट की दवाइयां, एंटी-एपिलेप्टिक (मिर्गी की) दवाएं और आँखों के ड्रॉप्स (खास कर खुले हुए)

ज्यादा खतरनाक हो सकती हैं। इनमें एक्सपायरी के बाद कम असर भी जानलेवा हो सकता है। दूसरी ओर कम जोखिम वाली दवाइयों में पैरासिटामोल, विटामिन टैबलेट, एलर्जी की कुछ दवाएँ षामिल है। फिर भी नियमित सेवन के लिए इन्हें भी एक्सपायरी के बाद नहीं लेना चाहिए। 

एक दिलचस्प तथ्य भी जान लेते हैं। अमेरिका में सेना पर किए गए षोध में पाया गया कि कई दवाएँ सही स्टोरेज में एक्सपायरी के 5-15 साल बाद भी असरदार थीं। लेकिन यह प्रयोगशाला नियंत्रित स्थितियों में था, घरेलू हालात में नहीं।

कुल मिला का आम आदमी को क्या करना चाहिए? एक्सपायरी डेट को अंतिम सुरक्षा सीमा माने। जानलेवा या क्रॉनिक रोगों की दवाएँ एक्सपायरी के बाद न लें। हल्की समस्या में भी डॉक्टर व फार्मासिस्ट से पूछ ले। दवाएं ठंडी, सूखी और अंधेरी जगह रखे।

कुल मिला कर दवाएँ एक्सपायर होती हैं, लेकिन डराने के लिए नहीं, सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए। 

बुधवार, 1 अप्रैल 2026

कोर्ट में गीता पर ही हाथ क्यों रखा जाता है?

हम सब को जानकारी है कि न्यायालय में गवाही के दौरान गीता पर हाथ रखना होता है। सवाल उठता है कि गीता पर ही क्यों, हिंदुओं के दूसरे बडे ग्रंथ रामायण पर हाथ क्यों नहीं रखवाया जाता?

असल में अदालत में किसी भी धार्मिक ग्रंथ पर हाथ रखवाने का उद्देश्य यह होता है कि व्यक्ति ईश्वर या अपने नैतिक विश्वास के प्रति जवाबदेही महसूस करे और सच बोले। यह मनोवैज्ञानिक दबाव सत्य बोलने की संभावना बढ़ाता है। अब सवाल यह कि इसके लिए गीता ही क्यों चुनी गई। दरअसल सारगर्भित और दार्शनिक ग्रंथ गीता में धर्म, कर्तव्य और सत्य पर गहरा जोर है। हिंदू समाज के अधिकतर वर्गों में गीता को सार्वभौमिक सम्मान प्राप्त है। यह अपेक्षाकृत छोटी है, इसलिए शपथ के लिए व्यावहारिक रूप से उपयोगी मानी गई। यूं रामायण अत्यंत पूजनीय ग्रंथ है, फिर भी अदालतों में कम उपयोग के पीछे कुछ कारण जरूर होंगे। रामायण एक महाकाव्य कथा है, जबकि गीता सीधे उपदेशात्मक है। रामायण के कई संस्करण हैं (वाल्मीकि, तुलसीदास आदि), जिससे कौन-सा संस्करण? का प्रश्न उठ सकता है। इसके अतिरिक्त अंग्रेजी शासनकाल में जो प्रथा शुरू हुई, उसमें गीता को प्राथमिकता मिली और वही चलन बन गया। ब्रिटिश काल में जब भारतीय न्याय प्रणाली विकसित की गई, तब अंग्रेजों ने हिंदुओं के लिए एक प्रतीकात्मक धार्मिक ग्रंथ के रूप में गीता को चुना, जैसे ईसाइयों के लिए बाइबिल। यह चयन धीरे-धीरे परंपरा बन गया।

असल में आज भारतीय कानून में किसी विशेष ग्रंथ पर हाथ रखना अनिवार्य नहीं है। भारतीय शपथ अधिनियम 1969 के अनुसार व्यक्ति ईश्वर की शपथ ले सकता है या सिर्फ “सत्य कहने की प्रतिज्ञा” भी कर सकता है।

मंगलवार, 17 मार्च 2026

दवाइयां सिरहाने नहीं रखनी चाहिए

दवाइयां सिरहाने रखने से बीमारी से मुक्ति कठिन होती है, यह मान्यता भारत के कई हिस्सों में लोकविश्वास के रूप में मिलती है। यह धारणा मुख्यतः धार्मिक-सांस्कृतिक सोच, प्रतीकात्मक अर्थ और थोड़े-बहुत व्यावहारिक कारणों से बनी है।

भारतीय परंपराओं में सिर को शरीर का पवित्र और ऊर्जात्मक केंद्र माना जाता है। इसलिए सिरहाने ऐसी चीजें रखने से मना किया जाता है जो रोग, पीड़ा या नकारात्मकता का प्रतीक हों। दवा बीमारी का प्रतीक मानी जाती है। लोकमान्यता कहती है कि अगर दवा सिरहाने रखी हो तो रोग की “ऊर्जा” वहीं बनी रहती है, इसलिए रोग जल्दी नहीं जाता। यह धारणा धार्मिक ग्रंथों में स्पष्ट नियम के रूप में नहीं मिलती, बल्कि लोकपरंपरा में अधिक प्रचलित है।

कुछ लोग इसे वास्तु शास्त्र से भी जोड़ते हैं। वास्तु के अनुसार सोने के स्थान पर दवाइयां, जूते, लोहे की चीजें या बीमारी से जुड़ी वस्तुएं कम से कम रखनी चाहिए, क्योंकि इससे मानसिक रूप से रोग की स्मृति बनी रहती है। हालांकि विज्ञान में यह नहीं कहा गया कि सिरहाने दवा रखने से रोग ठीक नहीं होगा, लेकिन कुछ व्यावहारिक कारण जरूर हैं। कई दवाइयों को ठंडी और सूखी जगह में रखने की जरूरत होती है। सिरहाने रखने से बच्चों द्वारा गलती से खा लेने का भी खतरा रहता है। इसके अतिरिक्त कुछ दवाओं की गंध या रसायन नींद में असुविधा दे सकते हैं। अगर सोते समय दवा सामने दिखती रहे तो व्यक्ति को लगातार अपनी बीमारी की याद आती रहती है। इससे अवचेतन में रोग की चिंता बनी रहती है, जो स्वास्थ्य पर असर डाल सकती है। कुल जमा दवाइयों को सिरहाने रखने से बीमारी ठीक नहीं होगी, ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। यह मुख्यतः लोकविश्वास, वास्तु और मनोवैज्ञानिक कारणों से बनी परंपरा है।

बेहतर है कि दवाइयां अलग डिब्बे या अलमारी में सुरक्षित रखी जाएं।

शनिवार, 7 मार्च 2026

नाराजण बारेठ : पत्रकारिता जगत का निर्भीक स्वर हमेशा के लिए मौन हो गया

वरिष्ठ पत्रकार, प्रखर चिंतक, राजनीतिक विश्लेषक और राजस्थान के पूर्व सूचना आयुक्त Narayan Bareth के निधन के साथ ही पत्रकारिता जगत का एक निर्भीक और जनपक्षधर स्वर हमेशा के लिए मौन हो गया। वे उन पत्रकारों में थे जिन्होंने खबर को केवल पेशा नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रक्षा का माध्यम माना।

BBC, The Asian Age और The Pioneer जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से जुड़कर उन्होंने पत्रकारिता को वैचारिक गहराई और सामाजिक सरोकारों से जोड़ा। उनकी लेखनी में सत्ता से सवाल करने का साहस था, तो समाज के वंचित और हाशिए पर खड़े लोगों के प्रति गहरी संवेदना भी। वे उन पत्रकारों की परंपरा के प्रतिनिधि थे जिनके लिए निष्पक्षता केवल शब्द नहीं, बल्कि आचरण का मूल मंत्र होती है।

पत्रकारिता के साथ-साथ उन्होंने अकादमिक क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। University of Rajasthan के जनसंचार केंद्र तथा Haridev Joshi University of Journalism and Mass Communication में प्रोफेसर के रूप में उन्होंने अनेक युवा पत्रकारों को न केवल तकनीकी कौशल सिखाया, बल्कि पत्रकारिता की नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी का पाठ भी पढ़ाया। उनके विद्यार्थियों की एक पूरी पीढ़ी आज विभिन्न माध्यमों में सक्रिय है और कहीं न कहीं उनकी सीख को आगे बढ़ा रही है।

जब उन्होंने सूचना आयुक्त का दायित्व संभाला, तब भी उनकी मूल चिंता पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करने की रही। सूचना के अधिकार को उन्होंने लोकतंत्र की आंख और कान माना, जो जनता को शासन से प्रश्न पूछने की ताकत देता है।

नारायण बारेठ का जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि एक वैचारिक परंपरा के विराम जैसा है। उनकी बेबाक कलम, उनकी स्पष्ट दृष्टि और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता लंबे समय तक स्मरण की जाएगी।

पत्रकारिता के इस सजग प्रहरी को विनम्र श्रद्धांजलि। ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें और शोकाकुल परिवार को इस असह्य दुख को सहने की शक्ति दें।

बुधवार, 14 जनवरी 2026

दाल-बाटी-चूरमे की खोज कैसे हुई?

राजस्थान की पहचान यदि किसी एक व्यंजन से की जाए, तो दाल-बाटी-चूरमा का नाम सबसे पहले लिया जाएगा। यह केवल भोजन नहीं, बल्कि इतिहास, संघर्ष और लोकबुद्धि का सजीव उदाहरण है। बहुत कम लोग जानते हैं कि बाटी का जन्म किसी रसोई में नहीं, बल्कि रणभूमि की तपती रेत पर हुआ था।

इतिहासकारों और लोकपरंपराओं के अनुसार बाटी का उद्भव लगभग आठवीं सदी में हुआ, जब मेवाड़ में बप्पा रावल ने गुहिलोत वंश की नींव रखी। यह वह दौर था जब राजपूत शासक अपने राज्यों के विस्तार के लिए निरंतर युद्धरत रहते थे। युद्धकाल में हजारों सैनिकों के लिए ताजा भोजन जुटाना एक बड़ी चुनौती था। ऐसे ही एक अवसर पर सैनिकों ने सुबह आटे की लोइयाँ गूंथीं, लेकिन युद्ध छिड़ जाने के कारण वे उन्हें तपती रेत पर छोड़कर रणभूमि में चले गए।

शाम को लौटने पर वे लोइयाँ रेत में दब चुकी थीं। जब उन्हें बाहर निकाला गया तो दिनभर सूर्य और रेत की प्रचंड गर्मी से वे पूरी तरह पक चुकी थीं। थकान से चूर सैनिकों ने जब उन्हें खाया, तो स्वाद और तृप्ति ने सभी को चकित कर दिया। यहीं से जन्म हुआ बाटी का, एक ऐसा भोजन जो बिना बर्तन के, बिना निगरानी के पक जाता था और लंबे समय तक सुरक्षित भी रहता था।

धीरे-धीरे बाटी युद्धकालीन भोजन बन गई। सैनिक सुबह आटे की गोलियाँ बनाकर रेत में दबा देते और लौटकर उन्हें अचार, चटनी तथा ऊंटनी या बकरी के दूध से बने दही के साथ खाते। यह भोजन कम समय में तैयार होता और भरपूर ऊर्जा देता। बाद में बाटी आम जनजीवन में पहुँची और कंडों व अंगारों पर पकाई जाने लगी।

मुगल बादशाह अकबर के राजस्थान आगमन के साथ यह व्यंजन मुगल रसोई तक भी पहुँचा। मुगल खानसामों ने इसे उबालकर फिर सेंकने की विधि विकसित की, जिसे ‘बाफला’ नाम दिया गया। इस रूप में बाटी उत्तर भारत के कई हिस्सों में लोकप्रिय हो गई।

दाल-बाटी का संगम भी इतिहास की देन है। दक्षिण भारत से आए व्यापारियों ने बाटी को दाल के साथ चूर कर खाना शुरू किया। उस समय प्रचलित थी पंचमेल दाल- चना, मूंग, उड़द, तुअर और मसूर का मिश्रण, जिसमें घी या सरसों के तेल का तीखा तड़का लगाया जाता था। यही स्वाद आगे चलकर दाल-बाटी की पहचान बना।

चूरमा का जन्म भी संयोग से ही हुआ। लोककथाओं के अनुसार गुहिलोत कबीले के एक रसोइए से बाटियाँ गलती से गन्ने के रस में गिर गईं। नरम और मीठी बनी बाटियों ने नया स्वाद रच दिया। बाद में इसमें घी, मिश्री और इलायची का समावेश हुआ और बाटी को चूर-चूर कर बनाने के कारण इसका नाम पड़ा, चूरमा।

इस प्रकार दाल-बाटी-चूरमा किसी एक व्यक्ति की खोज नहीं, बल्कि समय, परिस्थिति और लोकजीवन की सामूहिक देन है। यह व्यंजन आज भी राजस्थान की थाली में इतिहास की खुशबू और परंपरा का स्वाद समेटे हुए है। युद्धभूमि से थाली तक का यह सफर, सचमुच अनूठा है।


शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

हम कुछ याद करते वक्त सिर क्यों खुजाते हैं?

आम तौर पर जब भी हम कुछ सोचते या याद करते वक्त सिर खुजाते हैं। यह आदत बहुत साधारण लगती है, लेकिन इसके पीछे दिमाग, शरीर और मनोविज्ञानक, तीनों की मिली-जुली भूमिका होती है। मान्यता है कि जब हम कुछ याद करते या गहराई से सोचने लगते हैं, तो मस्तिष्क में रक्त प्रवाह और तंत्रिका गतिविधि बढ़ जाती है। सिर की त्वचा में हल्की-सी संवेदना पैदा होती है, जिसे हम अनजाने में खुजली या झुनझुनी के रूप में महसूस करते हैं। सिर खुजाना एक तरह का “फोकस जेस्चर” है। जैसे कोई पेन घुमाता है या उंगलियां चटकाता है, वैसे ही यह क्रिया दिमाग को संकेत देती है कि “अब सोचना है”। कुछ याद नहीं आ रहा होता या दिमाग अटका हुआ होता है, तो हल्का तनाव पैदा होता है। सिर खुजाना उस तनाव को निकालने का एक स्वतःस्फूर्त तरीका बन जाता है। सिर पर हल्का-सा स्पर्श दिमाग को एक छोटा “झटका” देता है, जिससे अटकी हुई स्मृति या विचार को निकलने में मदद मिलती है। इसे यूं कहा जा सकता है कि जब “दिमाग के पहिए जाम हो जाएं, तो हाथ जाकर सिर पर लग जाता है, ताकि पहिये चलायमान हों।” आपको यह भी ख्याल में होगा कि सभी लोग सिर नहीं खुजाते, कुछ लोग ठुड्डी सहलाते हैं, कुछ नाक छूते हैं, कुछ आँखें बंद कर लेते हैं। यानि तरीका अलग-अलग, मगर उद्देश्य एक ही कि सोच को सक्रिय किया जाए।

कालजयी आरती ओम् जय जगदीश हरे के रचयिता कौन थे?

ओम् जय जगदीश हरे, आरती आज हर हिन्दू घर में गाई जाती है। इस आरती की तर्ज पर अन्य देवी-देवताओं की आरतियां बन चुकी है और गाई जाती है, परंतु इस मूल आरती के रचयिता कौन हैं, इस बारे में भिन्न भिन्न धारणाएं हैं। कुछ लोग बताते हैं कि यह आरती तो पौराणिक काल से गाई जाती है, तो कुछ इस आरती को वेदों का एक भाग बताते हैं। किसी ने कहा कि सम्भवतः इसके रचयिता अभिनेता मनोज कुमार हैं। कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि इस आरती के रचयिता थे पंडित श्रद्धाराम शर्मा या श्रद्धाराम फिल्लौरी। पंडित श्रद्धाराम शर्मा का जन्म पंजाब के जिले जालंधर में स्थित फिल्लौर शहर में हुआ था। वे सनातन धर्म प्रचारक, ज्योतिषी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, संगीतज्ञ तथा हिन्दी और पंजाबी के प्रसिद्ध साहित्यकार थे। उन्होंने वैसे तो किसी प्रकार की औपचारिक शिक्षा हासिल नहीं की थी परंतु उन्होंने सात साल की उम्र तक गुरुमुखी में पढाई की और दस साल की उम्र तक वे संस्कृत, हिन्दी, फ़ारसी भाषाओं तथा ज्योतिष की विधा में पारंगत हो चुके थे। उन्होने गुरूमुखी में सिक्खां दे राज दी विथियां और पंजाबी बातचीत जैसी पुस्तकें लिखीं। सिक्खां दे राज दी विथियां में उन्होने सिख धर्म की स्थापना और इसकी नीतियों के बारे में बहुत सारगर्भित रूप से बताया था। यह पुस्तक लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय साबित हुई थी और अंग्रेज सरकार ने तब होने वाली आईसीएस परीक्षा के कोर्स में इस पुस्तक को शामिल किया था।

पं. श्रद्धाराम शर्मा गुरूमुखी और पंजाबी के अच्छे जानकार थे और उन्होंने अपनी पहली पुस्तक गुरूमुखी मे ही लिखी थी परंतु वे मानते थे कि हिन्दी के माध्यम से ही अपनी बात को अधिकाधिक लोगों तक पहुंचाया जा सकता है। हिन्दी के जाने माने लेखक और साहित्यकार पंडित रामचंद्र शुक्ल ने पंडित श्रद्धाराम शर्मा और भारतेंदु हरिश्चंद्र को हिन्दी के पहले दो लेखकों में माना है। उन्होंने 1877 में भाग्यवती नामक एक उपन्यास लिखा था, जो हिन्दी में था। माना जाता है कि यह हिन्दी का पहला उपन्यास है। इस उपन्यास का प्रकाशन 1888 में हुआ था। इसके प्रकाशन से पहले ही पंडित श्रद्धाराम का निधन हो गया, परंतु उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ने काफी कष्ट सहन करके भी इस उपन्यास का प्रकाशन करावाया था।

वैसे पं. श्रद्धाराम शर्मा धार्मिक कथाओं और आख्यानों के लिए काफी प्रसिद्ध थे। वे महाभारत का उद्धरण देते हुए अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जनजागरण का ऐसा वातावरण तैयार कर देते थे, उनका आख्यान सुनकर प्रत्येक व्यक्ति के भीतर देशभक्ति की भावना भर जाती। अंग्रेज सरकार ने 1865 में उनको फुल्लौरी से निष्कासित कर दिया और आसपास के गांवों तक में उनके प्रवेश पर पाबंदी लगा दी। 1870 में उन्होंने एक ऐसी आरती लिखी, जो भविष्य में घर-घर में गाई जाती थी। वह आरती थी ओम जय जगदीश हरे। पं. शर्मा जहां कहीं व्याख्यान देने जाते, ओम जय जगदीश आरती गाकर सुनाते। आज कई पीढियां गुजर जाने के बाद भी यह आरती गाई जाती है और कालजई हो गई है। इस आरती का उपयोग प्रसिद्ध निर्माता निर्देशक मनोज कुमार ने अपनी एक फिल्म में किया था और इसलिए कई लोग इस आरती के साथ मनोज कुमार का नाम जोड़ देते हैं।

पं. शर्मा सदैव प्रचार और आत्म प्रशंसा से दूर रहे थे। शायद यह भी एक वजह हो कि उनकी रचनाओं को चाव से पढने वाले लोग भी उनके जीवन और उनके कार्यों से परिचित नहीं हैं। 24 जून 1881 को लाहौर में पं. श्रद्धाराम शर्मा ने आखिरी सांस ली।

बुधवार, 31 दिसंबर 2025

हमारी शिक्षा पद्धति कितनी बेमानी है?

क्या आपने कभी ख्याल किया है कि हमारे यहां हायर एजुकेशन में जो विषय पढाए जाते हैं, उनका व्यावहारिक जीवन में कोई उपयोग नहीं होता। इस पर गौर करें तो यही प्रतीत होता है कि हमारी शिक्षा पद्धति बेमानी है या सार्थक नहीं है। बहुत से छात्र कहते हैं कि किताबों में बहुत कुछ पढ़ा, पर नौकरी में काम कुछ और आता है। थ्योरी पहाड़ जैसी, लेकिन व्यावहारिक ज्ञान शून्य। चार साल की डिग्री के बाद भी कौशल सीखने के लिए अलग से कोर्स करने पड़ते हैं। आपने देखा होगा कि विभिन्न विधाओं में महारत हासिल करने वाले औपचारिक शिक्षा में फिसड्डी होते हैं, जबकि अच्छे अंकों से डिग्रियां हासिल करने वाले बडे ओहदे पर पहुंचने के बाद भी व्यावहारिक ज्ञान न होने के कारण औसत परिणाम ही दे पाते हैं।

वस्तुतः हमारी शिक्षा व्यवस्था ज्ञान नहीं, अपितु अंक-केन्द्रित है। 

स्कूल हो या कॉलेज, पूरा सिस्टम परीक्षा और अंकों पर आधारित है। अंक अच्छे आए तो पढ़ा लिखा, नहीं आए तो कमजोर। यह मानसिकता ही असली समस्या है। सच तो यह है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था स्मृति आधारित है। जिसकी स्मृति अच्छी है या जो विषय वस्तु को ठीक से रट लेता है, याद कर लेता है, उसे अच्छे अंक प्राप्त होते हैं। पढ़ाई किताबों तक सीमित होती है, इसलिए सीखने की बजाय रटने का सिलसिला चलता है।

आपने देखा होगा कि अधिकतर विषयों में प्रयोगशालाएं सिर्फ औपचारिक हैं। इंटर्नशिप जैसे अनुभव वास्तविक नहीं होते

एक महत्वपूर्ण बात और। भारत में कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम 10-20 साल पुराने हैं, जबकि दुनिया में नौकरी, तकनीक, बिजनेस और समाज हर दिन बदल रहे हैं। इसके अतिरिक्त पाठ्यक्रमों में व्यावसायिक कौशल की कमी पायी जाती है। कॉलेजों में संवाद कौशल, समस्या-समाधान, वित्तीय साक्षरता, उद्यमिता, सॉफ्ट स्किल्स, डिजिटल कौशल आदि नहीं सिखाए जाते, जबकि वास्तविक जीवन में इन्हीं कौशलों की सबसे अधिक जरूरत होती है।

वन-साइज-फिट्स-ऑल मॉडल भी एक समस्या है। हर बच्चे को एक जैसे विषय पढ़ाए जाते हैं, जबकि हर बच्चे की रुचि अलग है। हर बच्चे की सीखने की गति अलग है, करियर लक्ष्य अलग है, परंतु शिक्षा सिस्टम सबको एक ही सांचे में ढालने की कोशिश करता है।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या हाई एजुकेशन पूरी तरह बेकार है? नहीं, बेकार नहीं है, पर उसकी संरचना और प्राथमिकताएं आज के समय के अनुरूप नहीं हैं। कुछ विषय, जैसे इंजीनियरिंग, मेडिसिन, विज्ञान, कानून आदि अपने मूल रूप में उपयोगी हैं, लेकिन प्रस्तुति, प्रशिक्षण और सिलेबस आज भी पिछले युग में अटके हैं। तो फिर कैसे बन सकती है शिक्षा प्रणाली उपयोगी? होना यह चाहिए कि नौकरियों और जीवन में काम आने वाले कौशलों को केंद्र में रखा जाए।

हर विषय में प्रयोग, परियोजना कार्य, इंटर्नशिप आदि में वास्तविक दुनिया से जुड़े असाइनमेंट को अनिवार्य किया जाना चाहिए। कंपनियां और उद्योग मिल कर सिलेबस तय करें, ताकि पढ़ाई वर्तमान बाजार से जुड़ सके। हर बच्चे को अपनी रुचि और भविष्य के अनुसार विषय चुनने की आजादी मिले।

शिक्षाविदों ने नई शिक्षा नीति में कई सुधार सुझाए गए हैं, जैसे बहु-विषयक शिक्षा, क्रेडिट ट्रांसफर, स्किल-डेवलपमेंट, इसका वास्तविक प्रभाव तभी होगा जब व्यावहारिक रूप से लागू हो।

-तेजवाणी गिरधर

7742067000


गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

ताश के पत्ते बंटने के बाद उन्हीं पत्तों से खेलना पड़ता है

बहुत समय पहले एक उक्ति मेरी जानकारी में आई थी। आज आप से शेयर कर रहा हूं। वो ये है कि एक बार ताश के पत्ते बंट जाने के बाद फिर हमको उन्हीं पत्तों से खेलना पड़ता है। चाहे मन मसोस कर, चाहे खुशी-खुशी। अमूमन आदमी इसीलिए दुखी होता है क्योंकि वह किस्मत को दोष देते हुए यह कहता है कि काश मुझे वैसे पत्ते मिले होते तो मैं जीत जाता। जबकि सच्चाई ये है कि पत्ते तो बंट चुके। उनमें कोई फेरबदल नहीं हो सकता। चाहे कितना ही सिर पीट लो। इसके दो ही रास्ते हैं। एक तो किस्मत को रोते हुए हम खेले ही नहीं, यानि कि बिना प्रयास के हार मान लें। दूसरा रास्ता है कि हमारे हिस्से में जो पत्ते आए हैं, उन्हीं से बेहतर से बेहतर खेल लें। प्रकृति ने हमें जो भी क्षमता दी है, वह उसका अधिकाधिक उपयोग करने के लिए दी है। कदाचित जीत भी सकते हैं। 

ताश के पत्तों का यह खेल हमारे जीवन पर भी एक दम फिट बैठता है।  हर एक के जीवन में प्रारब्ध के अनुसार अलग-अलग हालात आते हैं। कोई सोने का चम्मच मुंह में लेकर पैदा होता है तो कोई ऐसे घर में, जहां दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होती। दोष चाहे प्रकृति को दें, प्रारब्ध को दें या अपने कर्मों को दें, मगर जीना उन्हीं हालात में पड़ता है। ऐसे में दो ही रास्ते हैं या तो संघर्ष से मुंह मोड़ लें, जिसमें सफलता की सारी संभावनाएं समाप्त हो जाती हैं। दूसरा ये कि संघर्ष करने को तप्तर हो जाएं, जिसमें कि सफलता की संभावनाएं रहती हैं। किसी ने कहा है न कि दो ही रास्ते हैं, या तो भाग लो, अर्थात पार्टिसिपेट करो या फिर भाग लो, अर्थात मैदान छोड़ दो। 

जीवन के बारे में सकारात्मक सोच रखने वाले हर हालात में संघर्ष करने को तैयार रहते हैं। हालात या किस्मत का रोना नहीं रोते। एक उदाहरण देखिए। यह जीवन एक जलती सिगरेट की भांति है। सिगरेट को तो जलना ही है और खत्म भी होना ही है। आप चाहें तो सिगरेट की नियति पर रोते रहें या फिर चाहें तो उसके कश ले लें। इसे जीवन के लिहाज से लें तो मतलब ये है कि जिंदगी एक दिन मौत को उपलब्ध होनी ही है। हम चाहें तो रोते हुए गुजारें और चाहें तो हंसते हुए।

प्रसंगवश मुझे एक कहानी याद आती है। वही कछुए व खरगोश वाली। दोनों के बीच दौड़ होती है। अगर कछुआ यह सोच कर बैठ जाए कि उसे प्रकृति ने अत्यंत धीमी गति दी है तो वह प्रतियोगिता हारा हुआ ही है। और अगर सोच ले कि मुझे जैसी भी गति मिली है, दौडऩा मेरा कर्तव्य है, अंजाम चाहे जो हो। कहानी के अनुसार खरगोश अपनी गति पर गुमान करते हुए सुस्ती कर लेता है कि कभी भी छलांग लगा कर जीत जाऊंगा, जबकि कछुआ धीमी गति से मगर लगातार दौड़ता है और आखिर में वह जीत जाता है।

एक और प्रसंग याद आ गया। एक बार श्रीकृष्ण भोजन के लिए बैठे थे। रुक्मणी पंखा कर रही थी। श्रीकृष्ण थाली से पहला ग्रास उठा कर मुंह के नजदीक लाए ही थे कि यकायक रुक गए। ग्रास वापस थाली में रख दिया और महल के मुख्य द्वार पर जा कर रुक गए। कुछ देर तक रुके रहे और वापस अंदर आ गए और भोजन करने लगे। रुक्मणी ने इसका सबब पूछा, तो श्रीकृष्ण ने बताया कि उनका कोई भक्त दुश्मनों से घिरा हुआ था। दुश्मन उस पर पत्थर फैंक रहे थे और वह श्रीकृष्ण को मदद के लिए पुकार रहा था। थोड़ी देर बाद अचानक उसने भी मुकाबले के लिए पत्थर उठा लिया, तो श्रीकृष्ण यह सोच कर लौट आए कि अब वह खुद निपट लेगा। हालांकि यह प्रसंग हिम्मते मर्दा, मददे खुदा के विपरीत बैठता है, मगर इसका अर्थ ये है कि जब तक हममें अहम है, तक तक ईश्वर मदद नहीं करता। जैसे ही हम अहम त्याग देते तो वह सारी जिम्मेदारी खुद ले लेता है। 

असल में यह एक दार्शनिक नजरिया है। इसका भाव ये है कि कर्म भले ही हम करें, मगर अहम भाव से नहीं, बल्कि भगवान को अपने साथ मान कर। तब तो उसकी मदद मिलती है, लेकिन जैसे ही यह भाव आता है कि मैं ही सक्षम हूं, तो भगवान साथ नहीं होता। आपको ख्याल में होगा कि आम तौर पर लोग जब कोई काम करते हैं तो साथ में यह जोड देते हैं कि भगवान ने चाहा तो या इंशा अल्लाह।  इति श्री।

 


https://youtu.be/VKm0L0kW1uk

गुरुवार, 18 दिसंबर 2025

महिलाएं पल्लू क्यों बांधती हैं?

आज भले ही हम मोबाइल में रिमाइंडर लगा लें, या घडी में अलार्म फीड कर लें, पुराने समय में न तो डायरी थी, न मोबाइल, लेकिन पुरानी परंपरा में यही गांठ बांधना या पल्लू में बांध लेना कहलाता था। आपको ख्याल में होगा कि महिलाएं अमूमन किसी बात को याद रखने के लिए साडी अथवा चुन्नी या दुपट्टे का पल्लू बांधती हैं। इसके अतिरिक्त जब भी कोई संकल्प लेती हैं तब पल्लू बांधती हैं। यानि कोई बात या संकल्प भूल न जाएं, इसीलिए पल्लू बांधा जाता है। प्रौद्योगिकी आने के बाद भले ही मोबाइल रिमाइंडर सक्रिय हो गया हो, लेकिन मनोवैज्ञानिक रूप से “पल्लू बांधना” आज भी एक प्रभावी तरीका है। क्या आपने कभी विचार किया है कि वे ऐसा क्यों करती हैं?

वस्तुतः पल्लू शरीर के उस भाग पर रहता है, जहां बार-बार हाथ जाता है, इसलिए हर बार स्पर्श होने पर झटके में बात याद आ जाती है। संकल्प याद आता है। संकल्प याद आता है तो उसे पूरा करने का ख्याल भी आता है। संकल्प और अधिक प्रगाढ हो जाता है। गांठ पर हाथ लगते ही अवचेतन मन में संकल्प पुनः सक्रिय होता है, जिससे इच्छाशक्ति प्रबल होती है। गांठ बांधना एक काइनेस्थेटिक रिमाइंडर (स्पर्श आधारित स्मृति संकेत) जैसा है। जिस विचार या संकल्प के साथ गांठ बांधी जाती है, वह स्पर्श होते ही मस्तिष्क में पुनः सक्रिय हो जाता है।

पल्लू पर गांठ इसलिए भी बांधी जाती है कि हमारा अमुक कार्य पूरा होगा तो हम अमुक देवी-देवता को इतने का प्रसाद चढाएंगे। जब जब गांठ पर हाथ जाता है तो संकल्पित काम के लिए देवी-देवता से प्रार्थना का ख्याल आता है। संकल्प व आस्था गहरी होती है। और जब वह कार्य सिद्ध हो जाता है गांठ का ख्याल आता है। फिर प्रसाद चढा कर गांठ खोल दी जाती है। यह ठीक वैसा ही है कि जैसे कई लोग किसी काम के पूरा होने तक पैदल चलते हैं, दाढी बढाते हैं। विशेषकर बुजुर्ग महिलाएँ कुछ छोटी-छोटी वस्तुएं जैसे पैसे, चाबी आदि सुरक्षित रखने के लिए उन्हें साड़ी के पल्लू में बांध लेती हैं। इससे वस्तु सीधे संपर्क में रहती है, खोने की संभावना कम रहती है।

पल्लू बांधने को गांठ बांधना भी कहते हैं। हम कहते हैं न कि अमुक व्यक्ति ने गांठ बांध ली है कि वह अमुख कार्य करेगा ही। इसका अर्थ यह है कि उसने ठान ली है कि वह अमुख काम करके ही चैन से बैठेगा।

https://youtu.be/aDX8ufTQcCs

https://ajmernama.com/vishesh/440023/

सोमवार, 15 दिसंबर 2025

क्या रिटायर्ड आदमी की उम्र कम हो जाती है?

ऐसी मान्यता है कि सेवानिवृत्ति के बाद आदमी की उम्र तेजी से ढलने लगती है। वस्तुतः सेवानिवृत्ति के बाद व्यक्ति के जीवन का ढांचा अचानक बदल जाता है और यदि वह इस बदलाव के लिए तैयार नहीं होता, तो यह उसके स्वास्थ्य और जीवन-ऊर्जा पर नकारात्मक असर डाल सकता है। यह समस्या आमतौर पर अधिकारी व कर्मचारी के साथ आती है, व्यापारी तब तक सेवानिवृत नहीं होता, जब तक कि शारीरिक क्षमता बनी रहती है।

एक महत्वपूर्ण बात यह है कि नौकरी के दौरान व्यक्ति की पहचान उसके काम, पद या जिम्मेदारी से जुड़ी होती है। रिटायरमेंट के बाद अचानक वह पहचान समाप्त हो जाती है, जिससे अब मेरी जरूरत नहीं रही जैसी भावना पैदा होती है। वह हीन भावना से ग्रसित हो जाता है। इसके अतिरिक्त सेवानिवृत्ति के बाद अकेलापन व उदासी छा सकती है। कार्यस्थल के साथी, दिनचर्या और सामाजिक संपर्क कम हो जाते हैं। यह अवसाद और निराशा को जन्म दे सकता है। साथ ही जीवन में कोई निश्चित लक्ष्य न रहने पर मनुष्य की जीने की प्रेरणा घट जाती है। जब तक लक्ष्य बना रहेगा, तब तक जीवनी शक्ति कायम रहेगी। लक्ष्य विहीन होते ही, निठल्लतापन आते ही, शरीर व मन शिथिल होने लगता है।

सेवानिवृत्ति के बाद शारीरिक सक्रियता घट जाती है। इससे रक्त-संचार, मेटाबॉलिज्म और हृदय स्वास्थ्य पर असर पड़ता है। मनोवैज्ञानिक तनाव और निष्क्रियता के कारण कॉर्टिसोल और अन्य हार्मोन असंतुलित हो जाते हैं। सोने-जागने, खाने और व्यायाम का समय बिगड़ने से शरीर की जैविक घड़ी प्रभावित होती है।

सामाजिक कारण भी महत्वपूर्ण कारक हैं। पहले परिवार के निर्णयों में प्रमुख भूमिका रहती थी, अब वह सीमित हो जाती है। यदि पेंशन या बचत पर्याप्त न हो तो चिंता बढ़ जाती है। धीरे-धीरे दोस्तों का दायरा छोटा होता जाता है, जिससे मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है।

सेवानिवृत्ति के बाद उम्र जल्द न ढले, इसके लिए सलाह दी जाती है कि आप सदैव सक्रिय रहें। कुछ न कुछ सकारात्मक करिये। व्यस्तता से शारीरिक व मानसिक सक्रियता बनी रहती है। अतः अपने समय का नया अर्थ खोजने की कोशिश करें और समाजसेवा, बागवानी, लेखन, अध्यापन, कला के प्रति दिलचस्पी जागृत करें। नियमित व्यायाम और ध्यान को दिनचर्या का हिस्सा बनाएं। परिवार और मित्रों से जुड़े रहें। नई चीजें सीखने या मस्तिष्क को सक्रिय रखने वाली गतिविधियां करें। जब सेवानिवृत्ति का समय नजदीक हो, उसी समय आगे क्या करना है, इसकी प्लानिंग कर लेनी चाहिए। 

कुल जमा बात यह है कि सेवानिवृत्ति के बाद जीवन में उद्देश्य, गतिविधि और सामाजिक जुड़ाव की कमी ही धीरे-धीरे जीवन-ऊर्जा को कम करती है। अतः रिटायर होना चाहिए नौकरी से, जीवन से नहीं।

गुरुवार, 30 अक्टूबर 2025

एआई जनित चुनाव प्रचार सामग्री कितनी चुनौतिपूर्ण?

हाल ही चुनाव आयोग ने एआई के जरिए बनाई गई प्रचार सामग्री के लिए गाइड लाइन जारी की है। वह इसको लेकर बहुत चिंतित है। वह फर्जी प्रचार सामग्री पर कितना अंकुष लगा पाएगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। 

वस्तुतः एआई जनित प्रचार सामग्री चुनाव आयोग के लिए एक बड़ी नई चुनौती बनकर उभर रही है। एआई की मदद से उम्मीदवारों या नेताओं की नकली आवाज और चेहरे वाले वीडियो आसानी से बनाए जा सकते हैं, जिन्हें आम जनता वास्तविक मान लेती है। चुनाव आयोग के लिए यह तय करना मुश्किल होता है कि कौन-सा वीडियो असली है और कौन सा एआई से तैयार किया गया है। एआई टूल्स बड़ी मात्रा में झूठे या आधे-सच वाले संदेश, पोस्ट और ग्राफिक्स तैयार कर सकते हैं। सोशल मीडिया पर इन सामग्रियों को रोकना लगभग असंभव हो जाता है, जिससे मतदाताओं की राय प्रभावित होती है। एआई मतदाताओं के ऑनलाइन व्यवहार और डेटा के आधार पर पर्सनलाइज्ड संदेश बना सकता है। इससे चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं क्योंकि यह मतदाताओं की सोच को छिपे तरीके से प्रभावित करता है। वर्तमान कानूनों में एआई-जनित सामग्री के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं हैं। चुनाव आयोग को तय करना पड़ता है कि क्या ‘एआई प्रचार’ स्वतंत्र अभिव्यक्ति के अंतर्गत आता है या यह आचार संहिता का उल्लंघन है। एआई सामग्री इतनी तेजी से बनती और फैलती है कि आयोग के पास मौजूद तकनीकी संसाधन उसे तुरंत सत्यापित नहीं कर पाते। वास्तविकता जांच और नियंत्रण में समय लग जाता है। अधिकतर मतदाता एआई जनित सामग्री और असली सामग्री में फर्क नहीं कर पाते।

इससे गलत जानकारी के आधार पर वोटिंग निर्णय लिए जा सकते हैं।

कुल मिला कर एआई जनित प्रचार सामग्री चुनाव की निष्पक्षता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता, तीनों के लिए गंभीर खतरा है। इससे निपटने के लिए चुनाव आयोग को चाहिए कि वह एआई सामग्री की पहचान के लिए तकनीकी सेल बनाए, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के साथ रीयल-टाइम मॉनिटरिंग करे, और जनता में डिजिटल साक्षरता अभियान चलाए।


शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2025

किसी देश में राइट हैंड तो किसी में लेफ्ट हैंड डाइव क्यों?

कुछ देशों में सड़क के बाईं ओर गाड़ी चलाई जाती है, यानि लेफ्ट हैंड डृाइव और कुछ देशों में दायीं ओर चलाई जाती है, यानि राइट हैंड डाइव। क्या आपने सोचा है कि ऐसा क्यों? आइये समझने का प्रयास करते हैं। जहां तक लेफ्ट हैंड डाइव का सवाल है, उसके मूल में यह वजह है। जब तक आदमी लड़ता-झगड़ता नहीं था, तब तक सब सही था. लेकिन फिर वो साथ में तलवार लेकर चलने लगा। ज्यादातर लोग राइटी होते हैं, तो ज्यादातर तलवारबाज दाएं हाथ से तलवार चलाते थे। जब वो घोड़ा लेकर सड़क पर निकलते तो सड़क के बाईं ओर चलते, ताकि सामने से आने वाले दुश्मन को उनके दाईं तरफ से ही गुजरना पड़े. ऐसे में उस पर आसानी से वार किया जा सकता था।

इस तरह सड़क पर बायीं चलने की रवायत पड़ी। इसमें ट्विस्ट आया 18वीं सदी में। फ्रांस और अमेरिका में खेत की उपज ढोने के लिए बड़ी-बड़ी बग्घियां बनीं, जिन्हें कई घोड़े जोत कर खींचा जाता था. लेकिन इन बग्घियों में गाड़ीवान के लिए जगह नहीं होती थी. तो एक आदमी किसी एक घोड़े पर बैठ कर बाकी को हांकता था. अब चाबुक चलाने के लिए इस आदमी को अपना दायां हाथ फ्री रखना होता था. इसलिए ये बाईं तरफ जुते आखिरी घोड़े पर बैठता था. अब चूंकि ये आदमी बग्घी की बाईं तरफ बैठा होता था, वो बग्घी सड़क की दाईं तरफ चलाता था ताकि सामने से आने वाली गाड़ियां उस तरफ से निकलें जहां वो बैठा हुआ है. इससे दो बग्घियों के क्रॉस होते वक्त टक्कर वगैरह पर नजर रखी जा सकती थी. इस तरह सड़क पर दाएं चलने की रवायत पड़ी।

कुछेक देशों में नियम भी बने. जैसे रूस ने दाएं चलने का नियम बनाया 1752 में. लेकिन सज्जे-खब्बे की असल लड़ाई शुरू हुई फ्रांस में क्रांति के साथ. क्रांति के दौरान फ्रांस में बड़े पैमाने पर रईसों का कत्ल हुआ. इसलिए वहां के रईसों में डर बैठ गया और कहीं जाने के लिए उन्होंने भी सड़क की दाईं ओर चलना शुरू किया. इससे वो सफर के दौरान निचले तबके में घुल-मिल और अपेक्षाकृत सुरक्षित रहते. क्रांति के बाद फ्रांस में नियम बना कि सड़क पर दाईं तरफ ही चला जाएगा. साल था 1794.

फ्रांस की क्रांति से जो देश अछूते रहे, वहां बाईं तरफ चलने का नियम बन गया. जैसे ब्रिटेन (1835) और पुर्तगाल. कुल मिला कर यूरोप में इसी तरह तय हुआ कि सड़क पर बाईं तरफ चला जाए कि दाईं तरफ. लेकिन एक ट्विस्ट फिर आया. उसका नाम था नेपोलियन. नेपोलियन जहां-जहां जाकर जीता, वहां-वहां उसने दाईं तरफ चलने का नियम बनाया. नेपोलियन के बहुत बाद जब हिटलर हुआ तो उसने यूरोप के बचे-खुचे देशों में भी दाएं चलने का नियम बना दिया. 

यूरोप के देशों ने दुनिया भर के देशों को अपना गुलाम बनाया. जहां-जहां वो जाते, अपने यातायात नियम भी लागू करते. मसलन ब्रिटेन जहां-जहां गया- जैसे भारत, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड वगैरह में बाएं चलने का नियम बना और जहां-जहां फ्रांस गया, वहां दाएं चलने का नियम बना. कुछ अपवाद रहे. जैसे मिस्र (ईजिप्ट), जो अंग्रेजों का गुलाम रहा था लेकिन दाएं ही चला. चक्कर ये था कि मिस्र में अंग्रेजों से बहुत पहले नेपोलियन पहुंच गया था. और तब से ही मिस्र सड़क की दाईं तरफ चलता है.

स्वीडन का मामला थोड़ा अलग है. वहां बाईं तरफ चलने का नियम बना हुआ था. लेकिन ये छोटा सा देश सब तरफ से दाएं चलने वाले देशों से घिरा था. तो यहां लेफ्ट-राइट में से एक को चुनने के लिए बाकायदा रेफरेंडम (माने रायशुमारी) कराया गया. रेफरेंडम में 82.9 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वो बाएं चल कर खुश हैं. फिर भी सरकार ने 1967 में दाएं चलने का नियम बना दिया.

एक दिलचस्प बात और। म्यांमार में ट्रैफिक बाईं ओर चलता था. लेकिन 1970 में वहां के तानाशाह जनरल ‘ने विन’ ने एक ओझा के कहने पर ट्रैफिक बाएं से दाएं कर दिया. अब जनरल से पंगा कौन लेता, तो लोग अपनी राइट हैंड ड्राइव गाड़ी ही सड़क पर दाईं ओर चलाने लगे. आज भी म्यांमार की अधिकतर गाड़ियां राइट हैंड ड्राइव हैं.

भारत में कारों के बायीं ओर चलने का कारण इंग्लैंड है। इंग्लैंड ने भारत में कई साल राज किया। और भारत में इंग्लैंड के कई कानूनों का पालन किया जाता है। दरअसल, इंग्लैंड में शुरू से ही कारें सड़क के बायीं ओर ही चलती हैं। 1756 में इंग्लैंड में इसे कानून बना दिया गया और इस कानून का पालन सभी ब्रिटिश शासित देशों में किया जाने लगे। भारत भी इंग्लैंड का गुलाम रह चुका है और इस कारण भारत में भी ये कानून लागू हुआ और कारें सड़के के बायीं ओर चलने लगीं।

सवाल यह कि अमेरिका में दायीं ओर क्यों चलतीं हैं कारें? माना जाता है कि 18वीं शताब्दी में अमेरिका में टीमस्टर्स की शुरुआत हुई थी। इसे घोड़ों की मदद से खींचा जाता था। इस वैगन में ड्राइवर के बैठने के लिए जगह नहीं होती थी और इसलिए वो सबसे बाएं घोड़े पर बैठकर दाएं हाथ से चाबुक इस्तेमाल करता था। लेकिन इससे वो ड्राइवर पीछे आने वाले वैगनों पर नजर नहीं रख पाता था और इसलिए बाद में अमेरिका में सड़क के दायीं ओर चलने का कानून बन गया। 18वीं शताब्दी के अंत तक इस कानून को पूरे अमेरिका में लागू कर दिया गया और लोग इस नियम के मुताबिक ही गाड़ी चलाने लगे।

मौजूदा समय में विश्व भर में 163 देशों में सड़क के दायीं ओर चलने का नियम है, वहीं 76 देश ऐसे हैं, जहां सड़क के बायीं ओर चला जाता है। यूरोप में ब्रिटेन, आयरलैंड, माल्टा, साइप्रस को छोड़कर कहीं भी गाड़ियां बायीं ओर नहीं चलतीं। चीन की बात करें तो यहां भी गाड़ियां दायीं ओर ही चलतीं हैं। लेकिन चीन के आधिपत्य वाले हॉन्गकॉन्ग में गाड़ियां बायीं ओर चलतीं हैं।


बुधवार, 1 अक्टूबर 2025

तेज तर्रार नेताओं का बोलबाला

इन दिनों राज्य में तेज तर्रार नेता खूब चर्चा में हैं। पुलिस से टकराव की एक के एक बाद घटनाएं हो रही हैं। चूंकि सोषल मीडिया का जमाना है, इस कारण ऐसे नेता ही सुर्खियां बटोर रहे हैं। सवाल उठता है कि क्या राज्य की राजनीति करवट ले रही है? क्या नए युग का सूत्रपात हो रहा है? क्या यह लोकतंत्र का नया चेहरा है? क्या व्यवस्था में मौजूद प्रषासनिक संवेदनहीनता के खिलाफ आमजन में आक्रोश बढता जा रहा है? नेताओं की जो तेजतर्रारी है, वह जनता के मन में उमड रहे असंतोश की निश्पत्ति है। जो जितनी आक्रामक षैली में विरोध प्रदर्षन करता है, उसे उतना ही अधिक जनसमर्थन मिल रहा है। कहीं हम कानून-व्यवस्था बनाने वाली पुलिस को दुष्मन मानने लगे हैं? कहीं युवा पीढी में सरकार व प्रषासन से टकराव की प्रवृत्ति तो नहीं बढ रही है? क्या पुलिस को ललकारना गौरव है? बेषक संविधान ने पुलिस को अपार अधिकार दिए हैं, कानून के हाथ बहुत लंबे हैं, मगर ऐसा लगता है कि मौजूदा राजनीतिक सिस्टम में पुलिस दबाव की स्थिति में आ गई है। विरोध प्रदर्षन के दौरान वह बहुत संयम बरतती है, मगर स्थिति काबू से बाहर होने पर चरणबद्ध उपाय करने को मजबूर होती है।

पिछले दिनों हुई कुछ वारदातों के बाद यह कयास भी लगाए जा रहे हैं कि क्या राज्य में तीसरा मोर्चा खडा हो जाएगा? क्या गैर कांग्रेसी व गैर भाजपाई क्षत्रप एकजुट हो जाएंगे? अब तक अनुभव का देखते हुए तो यही कहा जा सकता है कि इसकी संभावना कम है। और अगर वे आगामी चुनाव में प्रभावषाली स्थिति में रहते हैं तो उसका नुकसान कांग्रेस को ही होगा। क्योंकि भाजपा का वोट आमतौर पर इधर उधर नहीं होता।


बुधवार, 30 जुलाई 2025

जगदीप धनखड अजमेर में एक चूक की वजह से हार गए थे

अज्ञात परिस्थितियों में उप-राष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने वाले जगदीप धनखड का नाम इन दिनो सुर्खियों में है। उनको लेकर कई तरह की चर्चाएं हो रही हैं। स्वाभाविक रूप से उनकी अब तक की राजनीतिक यात्रा पर भी चर्चा हो रही है। ज्ञातव्य है कि उनका अजमेर से गहरा संबंध है। उन्होंने 1991 में अजमेर संसदीय सीट पर कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लडा था, मगर भाजपा के प्रो. रासासिंह रावत से हार गए। हालांकि वे पेराटूपर की तरह अजमेर आए थे, मगर पूरी ताकत से चुनाव लडा। जीत भी जाते, मगर एक चूक की वजह से पराजित हो गए। अजमेर के लोगों को उस चुनाव का मंजर अच्छी तरह से याद है। कंप्यूटर की माफिक तेजी से दायें-बायें चलती उनकी आंखें बयां करती थीं कि वे बेहद तेज दिमाग हैं। चाल में गजब की फुर्ती थी, जो कि अब भी है। बॉडी लैंग्वेज उनके ऊर्जावान होने का सबूत देती थी। हंसमुख होने के कारण कभी वे बिलकुल विनम्र नजर आते थे तो मुंहफट होने के कारण सख्त होने का अहसास करवाते थे। जब अजमेर में लोकसभा चुनाव लडने को आये स्वर्गीय श्री माणक चंद सोगानी शहर जिला कांग्रेस अध्यक्ष थे। नया बाजार में सोगानी जी के सुपुत्र के दफ्तर में हुई पहली परिचयात्मक बैठक में ही उनका विरोध हो गया, चूंकि उन्हें यहां कोई नहीं जानता था। प्रचार का समय भी बहुत कम था। फिर भी उन्होंने प्रोफेशनल तरीके से चुनाव लड़ते हुए सारे संसाधन झोंक दिए। उन्होंने चुनाव लडने की जो स्टाइल अपनाई, वैसा करते हुए पहले किसी को नहीं देखा गया। टेलीफोन डायरेक्टरी लेकर सुबह छह बजे से आठ बजे तक आम लोगों से वोट देने की अपील करते थे। हालांकि उन्होंने चुनाव बड़ी चतुराई व रणनीति से लड़ा, मगर सारा संचालन अपने साथ लाए दबंगों के जरिए करवाने के कारण स्थानीय कांग्रेसियों को नाराज कर बैठे। वे जीत जाते, मगर स्थानीय कांग्रेस नेताओं को कम गांठा और सारी कमान झुंझुनूं से लाई अपनी टीम के हाथ में ही रखी। यही वजह रही कि स्थानीय छुटभैये उनसे नाराज हो गए और उन्होंने ठीक से काम नहीं किया।

प्रसंगवश बता दें कि उनकी राजनीतिक यात्रा 1989 में झुंझुनूं से जनता दल सांसद के रूप में हुई थी। पहली बार में ही वी पी सिंह सरकार में संसदीय कार्य राज्य मंत्री बनाए गए। 1991 में जनता दल छोड़ कर कांग्रेस की सदस्यता ले ली। अजमेर से लोकसभा चुनाव लडा। उसके बाद 1993 में अजमेर जिले की किशनगढ़ विधानसभा सीट से कांग्रेस टिकट पर लड़ कर विजयी हुए। 1998 में झुंझुनू से कांग्रेस टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा, मगर तीसरे स्थान पर रहे थे। 2003 में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बनने पर भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली थी। कुछ समय तक सुर्खी से गायब रहे, मगर लोग तब चौंके जब उन्हें पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनाया गया। उसके बाद वे उप-राष्ट्रपति पद पर आसीन हुए। हाल ही उन्होंने अचानक इस्तीफा दिया तो सब भौंचक्क हैं।


मंगलवार, 29 जुलाई 2025

सिंधी समाज के पर्व गोगडो का क्या महत्व है?


सिंधी समाज के पर्व गोगोड़ो का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। यह पर्व खासकर सावन महीने में नाग पंचमी को मनाया जाता है, और इसे गोगा देवता या गोगा जी की पूजा के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व विशेष रूप से सांपों से रक्षा और सर्पदंश से सुरक्षा की कामना से जुड़ा होता है।

गोगा जी जिन्हें गोगा वीर, गोगा चोबदार, या जाहरवीर गोगा भी कहा जाता है, को सर्पों के देवता के रूप में पूजा जाता है। सिंधी समाज में मान्यता है कि वे नागों पर नियंत्रण रखते हैं और अपने भक्तों को सर्पदंश से बचाते हैं। 

इस दिन गोगड़ो की कथा सुनाई जाती है। स्त्रियां और बच्चे मिलकर गोगा जी के गीत गाते हैं और मिट्टी की मूर्ति बनाकर पूजा करते हैं। यह पर्व सिंधी संस्कृति की उस जीवंत परंपरा को दर्शाता है जो सिंध से जुड़ी हुई है और प्रवासी सिंधियों में अब भी जीवित है। गोगडो यह सिखाता है कि जीव-जंतुओं के साथ मेलजोल बनाकर कैसे जीवन जिया जाए।

बहुत समय पहले की बात है, गोगा जी एक शक्तिशाली और पराक्रमी राजा थे। उनकी माता ने सर्पों की आराधना कर उन्हें प्राप्त किया था। जन्म के समय से ही गोगा जी के पास सर्पों पर नियंत्रण की शक्ति थी। वे जहां भी जाते, सांप उनकी आज्ञा का पालन करते। गोगा जी ने जीवन भर न्याय, धर्म और सेवा का मार्ग अपनाया और सर्पदंश से पीड़ित लोगों को बचाया। उन्होंने कई जगहों पर नागों का आतंक समाप्त किया और लोगों की रक्षा की। इसलिए लोग उन्हें सांपों के स्वामी कह कर पूजते हैं।

इस दिन सिंधी परिवारों में गुड़ या शक्कर डाल कर मीठी रोटी बनाई जाती है। इसे प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है और बाद में परिवार में बांटा जाता है। गोगड़ो के दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता। एक दिन पहले बनाया गया ठंडा भोजन किया जाता है। इस दिन को नंढी थदडी कहा जाता है।


शनिवार, 26 जुलाई 2025

ज्योति मिर्धा व रिछपाल मिर्धा अब क्या करेंगे?

नागौर की पूर्व सांसद श्रीमती ज्योति मिर्धा व डेगाना के पूर्व विधायक रिछपाल मिर्धा को भाजपा ज्वाइन करवाने में अहम भूमिका अदा करने वाले जगदीप धनखड के इस्तीफे बाद यह सवाल उठ खडा हुआ है कि इन दोनों का अगला राजनीतिक कदम क्या होगा? हालांकि भूतपूर्व सांसद स्वर्गीय श्री नाथूराम मिर्धा की पोती श्रीमती ज्योति मिर्धा की खुद अपनी पहचान है, अपना पारीवारिक जनाधार है और रिछपाल मिर्धा भी कम लोकप्रिय नहीं हैं, मगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक उनकी सीधी पहुंच धनखड की वजह से ही थी। अब जब बीच की कडी गायब हो गई तो यह सवाल उठता ही है कि ये दोनों आगे क्या करेंगे? क्या धनखड के अगले कदम के साथ कदम मिलाएंगे या भाजपा में बने रहेंगे? वस्तुतः धनखड के इस्तीफे से सर्वाधिक असर पडा है तो नागौर जिले की राजनीति पर। अब नागौर में जाट राजनीति नई करवट लेगी। इस बात की संभावना भी जताई जा रही है कि दोनो नेता कांग्रेस में लौट आएंगे, मगर ऐसा होना मुश्किल प्रतीत होता है, क्योंकि जमीन पर समीकरण पूरी तरह से बदल चुके हैं। उधर हनुमान बेनीवाल भी खम ठोक कर खडे हैं। कुल मिला कर नाागौर में राजनीति के समीकरण उलझे मांझे की तरह गड्ड मड्ड हो गए हैं।


ज्योति मिर्धा ने जताई धनखड के प्रति गहरी संवेदना

नागौर की पूर्व सांसद श्रीमती ज्योति मिर्धा जगदीप धनखड के इस्तीफे से स्तंभित हैं। हों भी क्यों न, आखिर धनखड ही तो उन्हें भाजपा में ले गए थे। नए राजनीतिक समीकरणों में एक तरह से वे ही दिल्ली में उनके आका थे। अब उन्हें नए सिरे से राजनीति का ताना बाना बुनना होगा। या तो धनखड जिस दिषा में जाएंगे, उसी ओर कदम उठाएंगी या फिर भाजपा में रह कर नए सिरे से अपने आपको स्थापित करने की कोशिश करेंगी।

आइये देखते हैं, ज्योति मिर्धा की नजर में धनखड की कितनी अहमियत है। उन्होंने अपने फेसबुक अकाउंट पर एक भावपूर्ण पोस्ट साझा की है, जो यह जाहिर करती है कि धनखड के प्रति उनके मन में कितना श्रद्धा है। वह पोस्ट आप भी पढियेः-
एक युग का विराम: श्रद्धा, सम्मान और स्मृति में
भारत के यशस्वी उपराष्ट्रपति श्री जगदीप धनकड़ जी के इस्तीफे की खबर केवल एक संवैधानिक पद से विदाई नहीं, बल्कि एक ऐसे युग का विराम है जिसने संवैधानिक गरिमा, जनसरोकारों और किसान चेतना को एक नई ऊंचाई दी।
एक किसान पुत्र, जननायक और न्यायप्रिय विचारक के रूप में उन्होंने जो भूमिका निभाई, वह इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित रहेगी। उनकी आवाज संसद में उन करोड़ों किसानों की पीड़ा और आशाओं की अनुगूंज थी, जो अक्सर नीति-निर्माण की परिधि से बाहर रह जाते हैं।
उन्होंने न केवल स्वर्गीय ‘बाबा’ के विचारों को सम्मान दिया, बल्कि उन्हें अपने सार्वजनिक जीवन में जिया भी। अनेक अवसरों पर जब उन्होंने स्व. नाथूराम जी मिर्धा को अपना प्रेरणास्रोत कहा, वह मेरे लिए गर्व और भावनात्मक जुड़ाव का विषय रहा।
धनखड़ साहब ने उपराष्ट्रपति जैसे गरिमामयी पद की मर्यादा को केवल निभाया नहीं, उसमें संवेदनशीलता, निष्ठा और दृढ़ता का एक विलक्षण समावेश किया।
उनकी दृष्टि में संविधान था, हृदय में भारत की जनता और संवाद में सादगी व स्पष्टता।
आज जब वे उस पद से विदा ले रहे हैं, तो मन एक विशेष शून्यता का अनुभव करता है, पर साथ ही उनके विचार, उनकी संघर्षशीलता और उनकी सेवाभावना सदैव हमारे मार्गदर्शक रहेंगे।
कोटिशः नमन और भावपूर्ण शुभकामनाएं
एक सच्चे किसान-नेता को, एक साहसी विचारक को, और एक आत्मीय मार्गदर्शक को।

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